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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 233, कुल 869 में से

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पृष्ठ 233

नवाँ अध्याय २१७
चैतन्य भर जाता है, वहाँ दूसरा कुछ भी नहीं दिखायी देता। वृत्ति पूर्णतयः समर्पित रहती है। ध्येय, ध्याता और
ध्यान इन तीनों को एक साथ देखकर मन उल्हास से भर जाता है। इसी को 'सविकल्प समाधि' कहते हैं।
उसका निर्गुण रूप में ही उपभोग करते हैं। वहाँ मन पूरी तरह समरस होकर रहता है और वह सुखरूप
चिद्घनस्वरूप होकर ही रहता है। ज्ञानीजन ऐसी समाधि को अत्यन्त श्रेष्ठ मानते हैं। ब्रह्म इन्द्रियों के लिये गोचर
नहीं है, गुण नष्ट होने पर ही वह आँखों को दिखाई देता है। जो अनुभव लेता है उसी को वह प्रतीत होता है।
उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उस पर विवाद करते-करते शास्त्र भी एक दूसरे के विरुद्ध हो गये हैं। वेदों
में तो उसे 'नेति', 'नेति' कहा गया है। योगियों के समुदाय तो हाथ टेक कर शान्त बैठ जाते हैं। अनुभवी लोग
उसे आत्मज्ञान से जानते हैं। वहाँ हेतु-मात्र दृष्टांत समूल डूब जाते हैं और अद्वैतवाद ने भी मात कर दी।
अंतर्बाह्य समदृष्टि होना यही अनुभव का निश्चित लक्षण है। इसी बात को ध्यान में रख कर मैंने शरकर्ता को गुरु
बनाया। बाण की नोक को तपा कर उसे सीधा करते समय उसकी दृष्टि एकाग्र होकर वहीं लग गयी थी। केवल
उतने से ही उसका बाह्य प्रपंच की ओर से ध्यान हट गया। फिर राजा की सवारी पूरी शान शौकत के साथ उसके
द्वार पर से गयी लेकिन सारा ध्यान.शर तैयार करने में लगा होने के कारण उसे उसका भान ही नहीं रहा। इतने
में, पीछे से राजा का नौकर आया और उसने पूछा, "क्या राजा की सवारी इधर से गयी है?'' लेकिन उसने उत्तर
दिया, "देखा तो नहीं।" (अवधूत कहते हैं) उस शरकर्ता को मैंने अपनी आँखों से देखा और उसकी बात
सुनकर मैंने यह बोध ग्रहण किया कि संसार में एकाग्रता ही श्रेष्ठ वस्तु है। वह प्रपंच को आँखों के सामने नहीं
आने देती। यही सिद्ध करने के लिए मैंने सर्प से यही शिक्षा ली कि घरबार किये बिना अकेले ही रहना उचित है
और मैंने सर्प को गुरु बना लिया।
एकचार्यनिकेतः स्यादप्रमत्तो गुहाशयः।
अलक्ष्यमाण आचारैर्मुनिरेकोऽपभाषणः ॥ १४॥
सर्प को किसी का भी संग अच्छा नहीं लगता। वह अकेला ही सुखपूर्वक विचरण करता रहता है। वह
निरन्तर सावधान रहता है और एक भी साँस व्यर्थ नहीं जाने देता। योगी की स्थिति भी ऐसी ही रहती है। उसे भी
दूसरे का उपसर्ग अच्छा नहीं लगता। जहाँ लोगों की दृष्टि न पड़े ऐसे एकान्त स्थल में वह रहता है। वह खराब
आदमी की संगत नहीं करता लेकिन अच्छे का भी साथ नहीं निभाता। जिस प्रकार साँप अपनी केंचुल उतार
फेंकता है, उसी प्रकार योगी भी अपने देहसंग से बाहर निकल पड़ता है। निरन्तर सावधान रहकर वह एक भी
क्षण व्यर्थ नहीं जाने देता। सचमुच वह अपना स्वरूपानुसंधान टूटने नहीं देता। सर्प स्वयमेव बिल में घुस जाता है
क्योंकि जिस मार्ग से वह गया है उसे सब लोग देखते हैं। लेकिन उसने खाया है या नहीं इसे कोई नहीं देखता।
उसी प्रकार योगी भी योगसामर्थ्य से लोगों के सम्पर्क में न रहकर गुफा में पड़ा रहता है और स्वयं से ही क्रीड़ा
करता रहता है। योगी का आचार छोटे-बड़े सभी देखते हैं लेकिन वह वास्तव में सविकल्प है या निर्विकल्प है
यह किसी की समझ में नहीं आता। कोई कहता है कि वह कर्मनिष्ठ है तो कोई उसे कर्मभ्रष्ट कहता है। लेकिन
उसके सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से किसी को कुछ भी मालूम नहीं होता। सर्प को तो बोलना नहीं आता वह केवल
किसी शब्द का उच्चार मात्र करता है। उसी प्रकार योगी भी किसी प्रकार के वाद-विवाद में नहीं फँसता।
अंतःकरण की कृपा के बल से थोड़ा सा ही किन्तु मृदु, मंजुल और कोमल कुछ तो बोलता है। इसलिये उसे एक
ही बार सुन लेने पर भी कान तृप्त हो जाते हैं देखा जाय तो उसका बोलना अत्यन्त संक्षिप्त होता है, लेकिन वह