श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 221, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम अध्याय २०५
वे साफ नहीं होतीं। इसकी बात करते ही पेट में जाने कैसी खलबली मच जाती है और उल्टी हो जाती है और मैं
अभागन ऐसे शरीर के भुलावे में आ गयी थी। मैंने अपना विवेक खो दिया था। ऐसे इस हाड़ मांस के लोथड़े का
तथा विष्ठा मूत्र के खजाने का मैं आलिंगन कर रही थी। आग लगे ऐसे शरीर को। पता नहीं क्यों मैं उससे ऊबती
भी नहीं थी।
विदेहानां पुरे ह्यस्मिन्नहमेकैव मूढधीः।
यान्यमिच्छन्त्यसत्यस्मादात्मदात् काममच्युतात् ॥ ३४ ॥
इस जनक नगरी में जन्म लेने वाली मैं अकेली मूर्ख थी। हृदयस्थ श्रीहरि को छोड़कर नीच पुरुष के साथ
व्यभिचार किया। रात दिन मैंने ऐसे कितने पुरुषों का उपभोग किया उनकी कोई गिनती नहीं है। जब तक ईश्वर
के प्रति प्रेम नहीं उत्पन्न होता तब तक वास्तविक सुख मिल ही नहीं सकता। जो निकट हृदयस्थ है जो पुरुषों में
पुरुषोत्तम तथा अच्युत है, जो वीर्य का स्खलन किये बिना रति करता है और सन्तोष से निजात्मपद देता है, उस
अच्युत ने जिसे निजसुख प्रदान किया, उस सुख की अधःपतन नहीं है। ऐसे नारायण को भूल गयी और जिनसे
कामप्राप्ति नहीं हो सकती ऐसे लोगों के भुलावे में आ गयी। अकामदायी पुरुष नाशवान होते हैं। ऐसों की संगति
से वे दुःख ही देंगे। लेकिन जरा मेरा मन तो देखिये। कितना मूर्ख है। वे उस पर आसक्त थे। अब उस आसक्ति
से छुटकारा मिला और अच्युत सुख की, अक्षय हरिसुख की लगन लग गयी। उसका सुख भोगने से हर क्षण
उसकी वृद्धि ही होती है।
सुहृत् प्रेष्ठतमो नाथ आत्मा चायं शरीरिणाम्।
तं विक्रीयात्मनैवाहं रमेऽनेन यथा रमा ॥ ३५ ॥
जो मेरा हृदयस्थ है, जो मेरा सुख, जो मेरी प्रीति, मेरा प्रियतम अच्युत वही मेरी अंतरात्मा में भरा हुआ है।
वही मेरा स्वामी, वही मेरा पति है। उसे ही मैं स्वयं के बदले में खरीद लूँगी और अन्य अश्लील बातों को त्याग
कर मैं उसे ही परमानन्द से आलिंगन दूँगी। लक्ष्मी पैरों की दासी हो गयी है। लेकिन मैं उसे हर क्षण, सर्वत्र,
सभी रूपों में अकेले ही भोगूँगी।
कियत् प्रियं ते व्यभजन् कामा ये कामदा नराः।
आद्यन्तवन्तो भार्याया देवा वा कालविद्रुताः ॥ ३६ ॥
हृदयस्थ अच्युत को छोड़ अन्य कर्मदरिद्रों को पति बनाया। जो स्वयं ही भयाक्रांत हैं वे स्त्री को कैसे सुख
दे पायेंगे ? सभी काल के जबड़े में फँसे हुए हैं। इस लोक में सुख देने वाला कोई भी नहीं दिखायी देता। अस्तु!
यह तो मनुष्यों की स्थिति है। अब अगर देवाधिदेव इन्द्र का वरण किया जाय तो एक कल्प में चौदह इन्द्र होते
हैं, अर्थात् देवताओं में श्रेष्ठ इन्द्र को पदभ्रष्ट होना पड़ता है। इस प्रकार लोकों में चाहे वह देवता हो या मनुष्य
हो सब अपने ही मरण से दुःखी रहते हैं। वे अपनी स्त्री को किस प्रकार सुखी करेंगे ? वहाँ मूर्ख ही रममाण होते
हैं। मेरा अहोभाग्य कि इसी रात, इसी क्षण मुझे विवेक और वैराग्य इन दोनों की मुझे प्राप्ति हुई मुझ पर
लक्ष्मीपति प्रसन्न हो गये।
नूनं मे भगवान् प्रीतो विष्णुः केनापि कर्मणा।
निर्वेदोऽयं दुराशाया यन्मे जातः सुखावहः ॥ ३७ ॥