श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 219, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम अध्याय | २०३
तस्या वित्ताशया शुष्यद्वक्त्राया दीनचेतसः।
निर्वेदः परमो जज्ञे चिन्ताहेतुः सुखावहः॥ २७॥
आखिर आशा की आर्द्रता समाप्त हुई, होंठ सूखने लगे, गला सूख गया तथा मुखकमल निस्तेज होने लगा।
चिन्ता बढ़ने लगी। हाथ में द्रव्य नहीं आया इसलिये भीतर हालत से दीन हीन हो गयी। वैराग्य से चिन्ता बढ़ी
और वही उसके सुख स्वार्थ का कारण बनी।
तस्या निर्विण्णचित्ताया गीतं शृणु यथा मम।
निर्वेद आशापाशानां पुरुषस्य यथा ह्यसिः॥ २८॥
न ह्यङ्गाजातनिर्वेद देहबन्धं जिहासति।
यथा विज्ञानरहितो मनुजो ममतां नृप॥ २९॥
जरा देखो, उसमें वैराग्य किस तरह आया। जो विषय का चिन्तन कर रही थी वही उससे ऊब गयी।
सारांश यह कि वैराग्य आशा को तोड़ता है। उस वैराग्य के कारण पिंगला ने विवेकपूर्ण गीत गाया, हे राजा!
विवेक सागर! जिसकी बुद्धि में वैराग्य नहीं है उसे जन्म-मरण की व्याधि पग-पग पर बाधक होती है। जिसे
अनुताप नहीं होता, जिसके अंतःकरण में विवेक उत्पन्न नहीं होता, वह संसार का क्रीतदास है, वह आशा की
डोर से बँधा रहता है। उसके पैर में मोह ममता से कसी हुई देहबुद्धि की बेड़ी पड़ी रहती है। वह रात-दिन
विषय का अनाज पीसता रहता है। क्षणभर का भी विश्राम नहीं रहता। जीर्णशीर्ण कथरी में लिपटा हुआ खाट पर
पड़ा रहता है। उसके विवेक की आँखें फूटी रहती हैं। उसे विधियुक्त मार्ग नहीं दिखाई देता। ऐसे लोग इधर-
उधर भटकते रहते हैं और घबराकर अन्धे कुएँ में गिर पड़ते हैं। वहाँ से ऊपर आने के लिये उन्हें रास्ता नहीं
दिखाई देता। सच तो यह है कि काया, वाचा तथा मन से उन्हें बाहर निकलने की इच्छा ही नहीं होती। इतने में
घने बालों वाला बिच्छू डंक मारता है। उसका विष शरीर में जोर मारने लगता है। फिर अन्दर से निंदारूपी कराह
उठने लगती है। द्रव्यनाश की आग तथा द्वेष की गुर्राहट शुरू होती है। वह अहंकार की अंगड़ाई लेने लगता है
और मोह की उबासियाँ आने लगती हैं। फिर भी यह विषय का अनाज तीव्रता से पीसता रहता है और गृहस्थी
की सेज पर लोटता रहता है। इस प्रकार बेचारा अवैराग्य के कारण देह के कैदखाने में फँसकर अनन्त दुःख
भोगता हुआ रसातल तक पहुँच जाता है। जरा देखो, सभी वर्णों में नीच, निकृष्ट तथा अत्यन्त निन्दनीय कर्म
करने वाली उस वेश्या के हृदय में वैराग्य उत्पन्न हुआ और उसने देह बन्धन तोड़ दिया। जिससे देहबन्धन टूट
सके ऐसी ही बातें उस वेश्या ने कही। हे चक्रवर्ती राजा! उस पिंगला में किस प्रकार विरक्ति हुई उसे सुनो।
पिंगलोवाच
अहो मे मोहविततिं पश्यताविजितात्मनः।
या कान्तादसतः कामं कामये येन बालिशा॥ ३०॥
पिंगला ने कहा—सचमुच, मैंने व्यर्थ ही माया का विस्तार किया था। मेरी मूर्खता का अवलोकन करने से
विचार कुंठित हो जाता है। मेरे मन की कोई मर्यादा ही नहीं थी। नीच पुरुष के साथ रत होकर उसमें आनन्द
मानने में मैंने अपने भ्रम को शिखर पर चढ़ा दिया। स्त्री को यदि पुरुष चाहिये लेकिन मैं निरन्तर नीच पुरुष के
साथ रत रही, यही मेरी पहली मूर्खता थी।