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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 869 में से

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पृष्ठ 225

अष्टम अध्याय २०९
निराशा का नाम लेते ही देवाधिदेव दौड़ कर आता है और उसे आलिंगन देकर नामरूप भी भूल जाता है। उस
निराशा का प्यार मिलने के कारण पिंगला ने जारपुरुष की आशा का मूल ही तोड़ दिया। जो आशा पाश का छेदन
करे उसे ही समाधि का निजस्थान प्राप्त होता है। ऐसी निजसमाधि प्राप्त कर पिंगला ने शयन किया। सभी वर्णों
में नीच और कर्म भी निन्दनीय, लेकिन वह वेश्या इस जगत में पावन हो गयी। इसीलिये उसकी कथा मुझे याद
आयी। इसलिये यहाँ वैराग्य के सिवा दूसरा कोई साधन नहीं है। इस प्रकार कृष्ण ने उद्धव की पीठ पर थपकी
मारकर कहा। अवधूत ने यदु से कहा—जो वेदों के अनुसार अधिकारी नहीं थी उस वेश्या के चित्त में विरक्ति
आते ही उसे स्वात्मसुख प्राप्त हुआ। इसलिये काया, वाचा तथा मन से नैराश्य की ही उपासना करनी चाहिये,
परमार्थ प्राप्ति के लिये इससे अच्छा कोई साधन नहीं है। अन्य जो भी साधन हैं, वे सब निराशा के ही लिये हैं।
इसलिये जिसने निराशा को साध लिया उसने परमार्थ लूट लिया। अवधूत करुणा से व्याप्त हो गया, उसने यदु को
गले लगा लिया और कहा, “ऐसी जो यह निराशा अर्थात् विरक्ति है उसे अवश्य साध्य करो।” एकनाथ जनार्दन
की शरण में आया है, उसकी पूर्ण कृपा है, वही आशा के पाश तोड़कर समाधान प्राप्त करायेगा।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकदश स्कंधे,
यदु अवधूत संवादे एकाकार टीकायां अष्टमोध्यायः ॥८॥
श्री कृष्णार्पणमस्तु।