श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवाँ अध्याय २१३
स्वरूप की प्राप्ति के कारण वह चिद्घन स्वरूप में क्रीड़ा करता रहता है। वह क्रीड़ा अभिमान रहित तथा दैवयोग
से चलती रहती है। जब आत्मसुख की प्राप्ति होकर मन के साथ सारे इन्द्रिय शान्त हो जाते हैं, वृत्तियों में जब
अणुमात्र का भी स्फुरण नहीं होता तो उस स्थिति को 'समाधि' कहते हैं। उसी स्वरूप में मन लगाकर जब बाह्य
स्फूर्ति का स्फुरण होता है तो उस स्थिति को साधुजन 'व्युत्थान' कहते हैं। ड्योढ़ी पर दीपक रखने से जिस
प्रकार दोनों ही ओर की चीजें दिखायी पड़ती हैं, उसी प्रकार व्युत्थान दशा को जीवभावना तथा शिवस्वरूप दोनों
का ही ज्ञान रहता है। नमक और पानी जिस प्रकार मिल कर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार आत्मस्वरूप में जब
मन घुल मिल जाता है तो उसका आत्मस्वरूप से तादात्म्य हो जाता है और वह 'समाधि' तथा 'व्युत्थान' दोनों
को लात से झटक देता है। फिर उसे न किसी का मान ही रहता है और न अपमान ही रहता है। फिर घरबार और
स्त्री, पुत्रों की चिन्ता कौन करेगा? मन स्वस्वरूप में खो जाने के कारण वह उसे आत्मसंतोष प्राप्त होता है। मन
विरहित शरीर व्यापार किसी बच्चे की तरह होते हैं। दैवयोग से ही जो हलचल हो जाय वही पर्याप्त है अर्थात्
सदा शून्यवृत्ति से व्यवहार करना।
द्वावेव चिन्तया मुक्तौ परमानन्द अप्लुतौ।
योविमुग्धा जडो बालो यो गुणेभ्यः परं गतः ॥४॥
चिन्ता की भँवर बहुत बलवान है। उसमें ब्रह्मदेव सरीखे देवतागण भी डूब जाते हैं। लेकिन हे यदुवीर!
उसमें से केवल दो ही बच पाते हैं, योगी और बालक ! उन दोनों को ही द्वैत का भान नहीं होता, दोनों को ही
मान अपमान का ज्ञान नहीं होता, दोनों ही सुख में सुखी रहते हैं और दोनों ही मन विरहित व्यवहार करते हैं।
लेकिन एक को बाद में दुःख प्राप्त होता है और दूसरा सुख और दुःख पर विजय प्राप्त कर चुका होता है। एक
को मुग्धता का अर्थात् अज्ञान का सुख रहता है तो दूसरा आत्मज्ञान के कारण सुखी रहता है। बालक के मन में
सुप्त वासना रहती है, उसी में बाद में अंकुर फूटते हैं जो उसे चक्कर में डाल देते हैं लेकिन योगी की यह बात
नहीं होती। वह गुणातीत रहता है। संसार में उसका सुख-दुःख के साथ कोई सम्पर्क नहीं होता। जब देह में जीव
विद्यमान रहता है तो वह गुणातीत कैसे रहता है? तो उसका रहस्य भी बताता हूँ। साधक साधुजनों की सेवा
करके अपना सत्त्वगुण बढ़ाता रहता है। इस प्रकार सत्त्वगुण बढ़ जाने पर ज्ञान का साधन सिद्ध हो जाता है। उस
सिद्ध ज्ञानसाधना के योग से वे मृत्युलोक में मोह ममता का भोग भोगने की समस्या को नष्ट कर देते हैं। सारांश
यही कि शुद्ध सत्त्व की वृद्धि से रज और तम का संहार हाता है और सत्त्व एकमेव रह जाता है जो धीरे-धीरे
स्वयं ही शान्त हो जाता है। जब तक लकड़ी के बोझ आग में पड़ते रहते हैं तब तक वह बड़े उल्लास से उसे
जलाती रहती है लेकिन जब लकड़ी का एक भी टुकड़ा शेष नहीं रहता तब वही अग्नि अपने मूल तेज में
विलीन हो जाता है। इसी प्रकार गुणावस्था को जीत कर योगी गुणातीत अवस्था तक पहुँच जाता है। इसलिये
कल्पांत होने पर भी उसे संसार की व्यथा नहीं सताती। जो सुख अनन्त है, उसकी प्राप्ति उन्हें आत्मस्वरूप के
रूप में ही प्राप्त हुई रहती है। देह में विचरण करते हुए भी वे देहातीत रहते हैं इसलिये चिन्ता का भँवर उनके
लिये नहीं है। सचमुच, एक हुए बिना यह अवस्था नहीं प्राप्त होती। इसीलिये, हे राजेश्वर ! मैंने कुमारी को गुरु
बनाया था, उसकी कथा सुनाता हूँ।
क्वचित् कुमारी त्वात्मानं वृणानान् गृहमागतान्।
स्वयं तानर्हयामास क्वापि यातेषु बन्धुषु ॥ ५ ॥