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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 231, कुल 869 में से

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पृष्ठ 231

नवाँ अध्याय २१५
तक मैंने 'अरिमर्दन' किया यह कहना उचित नहीं होगा। काम आदि जो षड्रिपु हैं उन्हें इस उपदेशरूपी शस्त्र से
जब तक हतवीर्य नहीं कर देते तब तक संसार में मेरा कोई शत्रु नहीं है यह नहीं कह सकते। अस्तु ! अब तुम
यदि पूछोगे कि तुम अवधूत लोकविरहित होकर रहते हो और वह कन्या तो घर के भीतर रहने वाली, तो तुम्हें
उसका एकान्त का वृत्तांत कैसे मालूम हुआ ? तो सुनो, मैंने निर्जन अरण्य में रहकर, गुरुवचन पर विश्वास कर,
आसन पर अटल बैठ कर ध्यान से निजत्त्व का आकलन किया है। उस तत्व निश्चय के लिये मैं इस पृथ्वी पर
विचरण करता फिरता हूँ और भले ही मैं जन में रहूँ या वन में, लेकिन मैं निजात्मभाव दृढ़ करके ही देखता रहता
हूँ। भले ही दृश्य पदार्थ से भेंट हो जाय लेकिन दृश्य दृश्यत्व से नहीं दिखायी देता। इतना ही नहीं, अपितु
द्रष्टापन भी नष्ट हो जाता है। ऐसी दृष्टि से मैं भटकता रहता हूँ। इस प्रकार गुरुत्व के गुण स्वीकार कर जब मैं
संसार की ओर देख रहा था, तभी मुझमें चैतन्य भाव का स्मरण हुआ। इस आत्मदृष्टि से चराचर सृष्टि में
विचरण करते समय मैं एकाएक उसी समय उस लड़की के घर पहुँच गया। हे चतुरा ! अपना हेतु सिद्ध करने के
लिये उस लड़की ने कंगन की युक्ति का कैसे विचार किया, उसका विचार कर मैंने उससे किस प्रकार का बोध
लिया उसे श्रवण करो।
वासे बहूनां कलहो भवेद् वार्ता द्वयोरपि ।
एक एव चरेत् तस्मात् कुमार्या इव कङ्कणः ॥ १० ॥
जिस स्थान पर अनेक लोग निवास करते हैं, वहाँ सदा कोलाहल मचा रहता है। इतना ही नहीं, केवल
दो ही व्यक्ति जब एकान्त में बैठते हैं तो भी वे अनेक प्रकार की बातें करने लगते हैं। जहाँ बातें करने में ही
समय व्यतीत हो जाता है वहाँ अपना कोई स्वार्थ नहीं सध पाता। इसीलिये मैं अकेला ही घूमता रहता हूँ।
अकेले होते हुए एकाग्रता सधी तो बहुत बड़ा लाभ होता है और इसीलिये मैंने सचमुच ही बाण बनाने वाले
को अपना गुरु बनाया।
मन एकत्र संयुञ्ज्याज्जितश्वासो जितासनः ।
बैराग्याभ्यासयोगेन ध्रियमाणमतन्द्रितः ॥ ११ ॥
वैराग्य के बिना अभ्यास शुरू करने से विषयरूपी चोर उठ खड़े होते हैं, काम डाका डालता है और
मूलधनरूपी आत्मज्ञान ही नष्ट हो जाता है। इसलिये सबसे पहले विवेकरूपी दीपक से अज्ञानरूपी अन्धकार को
पहले नष्ट करना चाहिये और महामुद्रा (भूचरी, खेचरी, अगोचरी तथा अलक्ष्य) के योग से वैराग्य की भी पूरी
सहायता लेनी चाहिये। प्राण और अपान की बहुत दिनों से भेंट नहीं हुई थी वह अभ्यास के योग से हो गयी। वह
भेंट होते ही पुराने परिचय के चिह्न स्मरण हो आये। तब उन दोनों ने एक-दूसरे को आलिंगन दिया और समसाम्य
से दोनों का समाधान हुआ। इस प्रकार आसन पर स्थिर बैठकर प्राण और अपान में ऐक्य उत्पन्न किया और
ब्रह्मस्थान में प्रवेश करने के लिये बाँहें सरकायीं। ब्रह्म-गिरी के किले को शमदम से घेर कर इन्द्रियों के अंतर्मुख
से प्रहार किया। प्राणापान की सुरंग में पूर्व परिचय होते हुए भी मन को एकाग्र रखकर उनमें ऐक्य स्थापित किया।
एकाग्रता के हमले से आगे बढ़ने वाले प्राण और आगे बढ़े और उन्होंने कुण्डलिनी शक्ति के द्वारा षट्चक्रों का
भेदन किया। उन वीरों ने वैराग्य का कवच पहन लिया और पूरी एकाग्रता से उनके हाथ में ध्यानरूपी खड्ग
चमकने लगे। उन खड्गों के चमत्कार का वर्णन किन शब्दों में किया जाय ? उन्होंने छोटे-बड़े सभी को साफ कर
दिया। उसके सामने कोई सन्देह भी आ जाता तो उसके टुकड़े-टुकड़े हो जाते। उसने आलस को रसातल में भेज