श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 226, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवाँ अध्याय
हे ओंकाररूप सद्गुरो ! तुम्हें मेरा प्रणाम । तुम स्वयं अमरावती के इन्द्र हो तथा अनुभव यही तुम्हारा ऐरावत
है। वह हाथी स्वानंद में मत्त होकर डोलता रहता है। तुम्हारे हाथ में उपदेशरूपी तीक्ष्ण वज्र है। उससे तुम
जड़जीवरूपी पर्वतों के संकल्प विकल्परूपी पंख तोड़कर उनकी पुनः सम्यक रीति से स्थापना करते हो। विवेक
यही पारिजातक है जो वैराग्यरूपी पुष्पों से अपनी सुगन्ध बिखेर रहा है। मुमुक्षुरूपी भ्रमर उन पुष्पों में घुसकर
चित्तसुखरूपी मकरंद का सेवन करते हैं। उपशम ही बृहस्पति है, जो तुम्हारे विश्वास के कारण तुम्हारे बिलकुल
सन्निकट रहता है। तुम भी प्रेमपूर्वक उसका सम्मान करते हो। वही तुम्हारी सभा का प्रमुख सभासद है। तुम्हारे
पास कृपारूपी कामधेनुओं के वत्स हैं। श्रद्धारूपी वत्सों की गुहार से उनके स्तनों में दूध उतर आया है और वह
बह रहा है जो केवल भगवद्भक्तों के लिये है। तेजस्वी चिन्तामणि के टुकड़े तुम्हारे चारों ओर की भूमि पर बिखरे
पड़े रहते हैं लेकिन भक्त उस ओर ध्यान भी नहीं देते। तुम्हारे चरणों के प्रति भक्ति से ही वे सन्तुष्ट रहते हैं। स्वर्ग
की अप्सरायें अर्थात् अष्टमहासिद्धि तुम्हारे आगे नाना प्रकार से नृत्य करते हैं किन्तु जो यथार्थ में तुम्हारे दास हैं वे
उधर ध्यान भी नहीं देते। जो मन्दबुद्धि पुरुष हैं वे ही उसके भुलावे में आते हैं। सर्वत्र समदृष्टि का तुम्हारा
सिंहासन अटल है। उस पर सच्चिदानन्द की जो गद्दी है, वही तुम्हारा सुखासन रहता है। तुम्हारा वह पद प्राप्त
करने के लिये यज्ञकर्त्ता पुरुष साधन चतुष्टय जुटाकर 'सोऽहं' (मैं ही परब्रह्म हूँ) इस विश्वास से यज्ञ करते हैं।
जो सावधानीपूर्वक मन का होम करते हैं, उन भक्तजनों का भजन देखकर तथा उनके भक्तिभाव से सन्तुष्ट होकर
तुम अपना पद उन्हें प्रदान करते हो। उन्हें निजात्मता अर्पण कर अपने पद पर बैठाते हो। मृत्यु के बिना अमर कर,
जहाँ पतन नहीं है ऐसे स्थान पर उनकी स्थापना करते हो। इन्द्र ने अहिल्या के साथ व्यभिचार किया और तुमने
वृंद के संग व्यभिचार किया। इन्द्र केवल सहस्रनेत्र हुआ और तुम सर्वांग से सब कुछ देखने वाले हो गये। इन्द्र
को दैत्य दीन-हीन कर देते हैं और उसका पद छीन लेते हैं, भक्तजन तुम्हें प्रसन्न कर लेते हैं और तुम्हारा चिद्धन
पद छीन लेते हैं। ककुत्स्थ इन्द्र के कन्धे पर बैठा (सूर्यवंशी इक्ष्वाकु राजा के पौत्र ने इन्द्र को वृषभ बनाकर उसके
कन्धे पर बैठकर युद्ध में दैत्यों पर विजय प्राप्त की।) तुम्हारे कन्धे पर दुर्वासा बैठा। इन्द्र विष्णु की बुद्धि से
चलता है और तुम भक्तों की मर्जी से चलते हो। रावण ने इन्द्र को बंदी बनाया। इन्द्र यज्ञ का हविर्भाग माँगता है
और तुमने बलि से भूमिदान माँगा। इन्द्र अग्नि के मुख से सन्तुष्ट होते हैं और तुम विश्वतोमुख से तृप्त होते हो।
हे गुरुराया! इस प्रकार तुम कृपा की साक्षात मूर्ति हो तथा अमर चक्रवर्ती हो। अब तुम्हारी विनती करने की इच्छा
होती है तो वहाँ वाणी प्रवेश नहीं कर पाती क्योंकि तुम्हारे ही कारण वाणी प्रकट होती है। सचमुच वाणी के रूप
में बोलने वाले तुम ही हो। यह एका (एकनाथ) जनार्दन में एकरूप हो गया। इसलिये वह जनार्दन ही वास्तव में
वक्ता है। वही इस प्रकार मुख में तथा शब्दों में प्रवेश कर ग्रन्थ लिखवाने का कार्य करा रहा है। यहाँ अहंकार
पूर्णरूप से नष्ट हो गया है। अर्थात् 'मैं' नष्ट हो जाने के कारण अब तुम ही कवि-कर्त्ता बन गये हो। तुम ही
अभंगों में अर्थात् कविता में एकनाथ का नाम लिखते हो। एकनाथ का गुरु के चरणों में तादात्म्य भाव हो गया है।
उस गुरुचरण के प्रसाद से ही अवधूत ने यदु को बताये हुए गुरु के लक्षणों का यथातथ्य वर्णन किया। पिछले
अध्याय में, पिंगला किस प्रकार अकेली रहने पर विवेक और विवेक से उसकी प्रवृत्ति बदलती है और वह