श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
दिया और निद्रा को अपने वश में कर लिया। इस प्रकार दिन-रात सावधान रहकर योगरूपी किले को जीतने के
लिये वे तत्पर रहते हैं। समरांगण के वीर बड़े रणधुरंधर थे। वे अपने ही बल पर आगे कूच करने लगे और
सत्रहवीं जीवन कला अर्थात् ब्रह्मरन्ध्र के अमृत संग्रह (तालाब) को उन्होंने हस्तगत कर लिया। वहाँ प्रचण्ड युद्ध
हुआ। युद्ध में कामादिक छह शत्रुओं का संहार हुआ और वह अमोघ तथा दिव्य खड्ग चमकता रहा। इस प्रकार
रणांगण में शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर सत्रहवीं का जल अर्थात् अमृत प्राशन किया। तभी उस किले में से
एकाएक अनुहत का ध्वनि सुनायी देने लगा। यहाँ सोहंवीरों की एकाग्रता होते ही भीतर का सारा भेद हाथ में आ
गया। किले की रक्षा करने वाली अहंता मरने-मरने को हो आयी।
यस्मिन् मनो लब्धपदं यदेतच्छनैः शनैर्मुञ्चति कर्मरेणून्।
सत्त्वेन वृद्धेन रजस्तमश्च विधूय निर्वाणमुपैत्यनिन्धनम्॥ १२॥
कामक्रोधादि वीर पुत्र युद्ध में मारे गये इस दुःख से विह्वल होकर अहंता और ममता मृत्यु की प्रतीक्षा
करने लगे। किले की यह वार्त्ता सुनकर उन शमदमादि वीरों में और भी अधिक स्फूर्ति का संचार हुआ और
उन्होंने पुनः उस किले को जीतने के लिये आह्वान किया। उन वीरों का धैर्य विलक्षण था। पराक्रम करने में तो
वे प्रसिद्ध थे ही। उन्होंने आगे का मार्ग देखा तो उन्हें उसमें विकट संकट दिखायी दिया। वहाँ वासनाओं के
दुर्धर घाट थे जिसमें चलना अत्यन्त कठिन था। लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे उस घाट पर चढ़कर उसे समतल बना
दिया। उसके आगे रजतम की भीषण खाई दिखायी दी। वह अपार गहरी खाई थी लेकिन उसमें निवृत्ति के
पत्थर डालकर उसे बन्द कर दिया। फिर किसी को भी आहट न लगने देकर 'मनकर्णिका वोवरी' नामक
आज्ञाचक्र हस्तगत कर ब्रह्मगिरी पर चढ़ने के लिये रस्सी की बनी सीढ़ी लगायी और ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश किया।
तब चारों ओर दिग्विजय की जयजयकार सुनायी देने लगी। देखा तो वहाँ कोई भी शत्रु नहीं था, चारों ओर
अपना ही राज्य था। तब रजतम की राहें अपने आप समतल होकर वहाँ रामराज्य की मुनादी की गयी। वहाँ
कोई भी पराया नहीं दिखा। तब ध्यानरूप खड्ग को मुट्ठी में पकड़ लिया, समदृष्टि से वैराग्य कवच की गाँठ
भी कुछ ढीली की। देखने पर ध्येय, ध्यान और ध्याता ही दिखायी नहीं दिये इसलिये ध्यान खड्ग की
आवश्यकता ही नहीं रही। सत्त्व ने युद्ध की प्रचण्ड सामग्री एकत्र की थी लेकिन सामने कोई शत्रु नहीं दीख
रहा था इसलिए उसे दूर फेंक दिया। तब तन्मयतारूपी छत्र धारण कर वह योगी जीवभाव को त्याग कर सहज
समाधान से समसाम्य के सिंहासन पर आरूढ़ हुआ। फिर शुद्ध सत्त्वगुण बढ़ा और उसने सर्वस्व को त्याग कर
तथा प्रणाम कर वह स्वयं आत्मस्वरूप में लीन हो गया। जिस प्रकार मंथन कर उत्पन्न किया हुआ अग्नि उन
काष्ठों की होली जलाता है और स्वयं शान्त होता जाता है उसी प्रकार रजतम रहित सत्त्व निकाल लेने पर रज
और तम का अपने आप ही विनाश हो जाता है और फिर सत्त्व के संभ्रम का अपने आप विलय हो जाता है।
तब जीव का जीवत्व नष्ट हो जाता है, ज्ञातृत्व के साथ ज्ञान का लय हो जाता है, प्रपंच का भी ध्यान नहीं
रहता और पूरी तरह चिन्मात्र स्वरूप भर जाता है।
तदैवमात्मन्यवरुद्धचित्तो न वेद किंचिद् बहिरन्तरं वा।
यथेषुकारो नृपतिं व्रजन्तमिषौ गतात्मा न ददर्श पार्श्वे॥ १३॥
इस प्रकार परिपूर्ण भरे हुए चिन्मात्र स्वरूप में चित्त को संयत कर लाने से हे राजेन्द्र ! उस चित्त को भी
वहाँ चैतन्यस्वरूप ही प्राप्त होता है, इसे ध्यान में रखो। तब हृदय में भी चैतन्य धन और बाहर भी परिपूर्ण शुद्ध