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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 869 में से

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पृष्ठ 224

२०८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रत्यक्ष दुःख भोगना पड़ता है। उस वेश्या ने वैराग्ययुक्त विवेक के सामर्थ्य से दुर्वासना के मूल को ही नष्ट कर
दिया। उसे उससे तत्काल शान्ति प्राप्त हो गयी और वह स्वात्मसुख का आनन्द लेने लगी। नित्यसिद्ध सुख देने
वाले हृदयस्थ कांत का आश्रय लेते ही उसके मन के विकल्प नष्ट हो गये और वह हृदयस्थ आत्माराम के साथ
एक हो गयी। अनुभव दृष्टि से उसे ऐक्यभाव से आलिंगन देते ही उस सुन्दरी को तत्काल निजसुख प्राप्त हुआ।
वाणी से वाणी अवाक हो गयी, लज्जा स्वयं ही लज्जित हो गयी, दृश्य-द्रष्टा यह अवस्था समाप्त हो गयी इससे
विषय का मार्ग ही बन्द हो गया। मन आत्मसुख से सुखी हो गया, वह पूर्ण रूप से सुखस्वरूप हो गया। संकल्प
और विकल्प उजाड़ हो गये, दोनों ही निजप्रेम में निमग्न हो गये। मिश्री पानी में घुलते ही जल मीठा हो गया,
उसी प्रकार वैराग्य के कारण उसकी भगवान से भेंट हो गयी और वह निजानंद में समरस हो गयी। वहाँ हेतु को
स्थान नहीं था, भाव-अभाव ठंडे पड़ गये और दोनों का निजप्रेम सीमातीत हो गया। 'मैं' और 'तू' का भाव
छोड़कर आलिंगन में समरस हो गये और समाधि की सेज पर उस निजपुरुष के साथ उसने शयन किया। कहीं
माया की दृष्टि न लग जाये इसलिये उस सुन्दरी ने असंख्य स्फूर्ति को उस पर न्यौछावर कर दिया। इस प्रकार
पिंगला समाधिरूपी शय्या पर निजसुख से सो गयी। यदु से अवधूत कहते हैं—इस प्रकार वैराग्य से वेश्या को
शान्ति प्राप्त हुई। वैराग्य ने आशा के बन्धन तोड़ दिये और पिंगला निरिच्छ हो गयी। सारांश निरिच्छ को ही
अपार सुख और आनन्द सर्वकाल प्राप्त होता है।
आशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम्।
यथा संछिद्य कान्ताशां सुखं सुष्वाप पिङ्गला ॥ ४४॥
जहाँ आशा है वहाँ आसक्ति है, आशा के पास दीनता और ममता सदा नृत्य करती है। आशा के पास
महाशोक है, आशा ही महान दोष कराती है और आशा के ही पास सम्पूर्ण पापों का संग्रह रहता है। आशा के
पास सभी अधर्म वास करते हैं, आशा किसी से परहेज नहीं करती, आशा के लिये समय का निर्धारण नहीं रहता,
वह सभी कर्मों का नाश कर डालती है। आशा नीच की उपासना कराती है, आशा नीचों की सेवा कराती है,
आशा मृत को भी नहीं छोड़ती वह प्रेत के पास भी जाती है। अनन्त में आशा उत्पन्न होते ही उसे लघु वामनरूप
प्राप्त हुआ। आशा ने देवताओं को भी दीन-हीन कर छोड़ा फिर दूसरों की क्या बात की जाय? जो जगत का
शाश्वत दाता है उसे भी आशा ने भिखारी बना डाला। शत्रु के घर वह याचक बनकर गया तो उसे द्वारपाल बनना
पड़ा। जहाँ आशा है वहाँ सुख नहीं है, आशा के पास परम दुःख है, आशा सबके लिये बाधक ही होती है।
सारांश, आशा यही मुख्य दोष है। जिसकी आशा पूर्णतया नष्ट होती है वही परमसुख प्राप्त करता है। जो आशा
को जीत लेता है, उसी के पास भगवान रहता है। उसकी बात का उल्लंघन भगवान भी नही करता। जो
आशारहित है वही बुद्धिमान है, वही विवेकनिधि है—चारों मुक्तियाँ पग-पग पर उसका वन्दन करती हैं। निराशा
सभी तीर्थों का तीर्थ है, निराशा ही मुमुक्षुओं का अर्थ है और निराशा के ही पास परमार्थ सदा खड़ा रहता है।
नैराश्य के पास वैराग्य सदा दास बनकर रहता है, हृषीकेश दिन-रात आशारहित को देखने की इच्छा करता रहता
है। नैराश्य को देखते ही दुःख भाग जाता है, निराशा के पास नित्य सुख रहता है, और निराशा के पास संतोष
निर्भय होकर खेलता रहता है। नैराश्यवंत से भेंट करने वैकुण्ठ का राणा दौड़ कर आता है। महादेव भी सहज
स्वभाव से नैराश्य की उपासना करता है। निराशा के सन्निकट मनोदुःख नहीं भटकता, जितने भी निहित धर्म हैं वे
सब निराशा के पास आकर बैठते हैं, आशारहित निश्चित रूप से सच्चिदानन्द के पद पर विराजमान होता है।