श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 223, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम अध्याय २०७
गये तो कोई तृष्णा की दलदल में धँस गये। कोई दुःख की चट्टान पर टकरा गये और स्वर्ग की सीढ़ी पर रुक
गये, कोई वहाँ से भी नीचे गिरे और संसाररूपी जल से दम घुट कर मर गये। जो नास्तिक थे उन्हें सम्पूर्ण
जलसमाधि प्राप्त हुई, जो कर्मठ थे उन्होंने कर्मरूपी चट्टान पकड़ ली और जो बेचारे वेदबाह्य थे वह ड्योढ़ी के
तल में जाकर गिर पड़े। वहाँ निन्दा के काँटे चुभकर खरोंच लग गयी, उसी प्रकार द्वेष के बड़े-बड़े पत्थरों की
टक्कर से शरीर पर प्रहार हुए और हृदय के टुकड़े-टुकड़े हो गये। काम का उफान प्रचण्ड रहता है। भीतर से
उफन कर आता है। उसके कारण वह पानी मटमैला हो जाता है और जीव घबरा उठता है। वहाँ क्रोध रूपी
पत्थर टूटते हैं, वे मस्तक पर गिरते ही कुछ भी शेष नहीं रहता और स्त्रीरूपी मगर खींच कर अन्दर ले जाते हैं।
वहाँ कालरूपी सर्प एक ही साथ सबको निगल लेता है। भयानक विष से वे घिर जाते हैं और ज्ञान से बिछुड़
जाते हैं। जिस पर सर्प का विष चढ़ जाता है वह जिस प्रकार कडुई नीम भी मीठा गुड़ समझ कर खाने लगता है
उसी प्रकार गृहस्थों को विषय विष की तरह कड़ुआ होते हुए भी मीठा मालूम होता है और परमार्थ अमृत की
तरह मीठा होते हुए भी विषयजनों को वह कड़ुआ मालूम होता है। जो इस कूप के बाहर हैं वे भीतर वालों को
नहीं देख पाते और जो कूप के अन्दर हैं वे बाहर वालों को नहीं देख पाते। ऐसे पीड़ित प्राणियों का उद्धार करने
का धैर्य हे हृषीकेश, तुम्हारे सिवा अन्य किसी में नहीं है। तो हे कृपालु, मुझसे शीघ्र आ मिलो। इस प्रकार
दुःखरूपी कुएँ में गिरे हुए प्राणियों का तारनहार तुम हृदयस्थ नारायण ही हो। तो हे कृष्णनाथ, दौड़कर आओ,
दर्शन दो और मेरे संसार दुःख से मुझे उबार लो। यह तत्त्व जानकर मैं अब उसकी शरण में जा रहा हूँ। इससे
मेरा संसार दुःख सहज ही दूर हो जायेगा ऐसा मुझे विश्वास है।
आत्मैव ह्यात्मनो गोप्ता निर्विद्येत यदाखिलात्।
अप्रमत्त इदं पश्येद् ग्रस्तं कालाहिना जगत्॥ ४२॥
मुझे तत्त्वतः यह ज्ञात हो चुका है कि समस्त पदार्थों के प्रति वैराग्य उत्पन्न होने पर मनुष्य स्वयं ही अपना
उद्धारकर्ता बन जाता है। दृढ़ वैराग्य वह है कि गहरी नींद में सोये प्राणी के पास यदि रंभा भी आ जाय तो वह
जिस प्रकार निर्विकार रहता है, उसी प्रकार विषय शरीर से भिड़ने पर भी उसके इन्द्रियों को विकार नहीं होता।
जिस प्रकार कै किये हुए अन्न पर रसना की इच्छा नहीं होती, उसी प्रकार विषय देखकर मन आसक्त नहीं होता।
ऐसा वैराग्य कैसे प्राप्त होगा? यदि विवेक दृष्टि से देखें तो मालूम होगा कि सारे जगत को काल ने ग्रस लिया
है, उससे कोई बच नहीं पाया है। बाप, दादा आदि को काल ले गया, पुत्र और नाती पोतों को काल ने निगल
लिया। यह प्रत्यक्ष देखकर भी जिसमें वैराग्य उत्पन्न नहीं होता उसका मनुष्य जन्म व्यर्थ गया। इसका नाम ही
मृत्युलोक है। स्वर्ग भी इसी प्रकार नाशवान है। उसकी इच्छा करना भी किस काम का? वैराग्य के सिवा सारे
जीव भाग्यहीन हो गये हैं।
ब्राह्मण उवाच
एवं व्यवसितमतिर्दुराशां कान्ततर्षजाम्।
छित्त्वोपशममास्थाय शय्यामुपविवेश सा॥ ४३॥
अवधूत यदु से कहता है—उस वेश्या का भाग्य महान है कि उसमें उत्तम विवेक के साथ वैराग्य उत्पन्न
हुआ। इस प्रकार स्वात्मबुद्धि से विचार कर, जिन परपुरुषों के प्रति दुर्वासनाएँ उसे अनेक प्रकार के ताप दे रही
थीं उसे उसने पूरी तरह झटक दिया। जिन उपाधियों के कारण जन्म-मरण की बाढ़ आती है और जीव को