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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 869 में से

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पृष्ठ 235

नवाँ अध्याय २१९
एक एवाद्वितीयोऽभूदात्माधारोऽखिलाश्रयः।
कालेनात्मानुभावेन साम्यं नीतासु शक्तिषु।
सत्त्वादिष्वादिपुरुषः प्रधानपूरुषेश्वरः॥ १७॥
परावराणां परम आस्ते कैवल्यसंज्ञितः।
केवलानुभवानन्दसंदोहो निरुपाधिकः॥ १८॥
इस प्रकार कार्यकारण नष्ट करने के बाद एक अकेला परिपूर्ण नारायण ही शेष रहता है। लेकिन यहाँ पर
अकेला नारायण रहता है यह कहने वाला भी कौन है? यह लक्षण तो अद्वितीय है, इसी को भेद शून्य अवस्था
कहते हैं। वहाँ न 'सजातीय भेद' है, न 'विजातीय' भेद है और 'स्वगत' भेद भी वहाँ नहीं है। इस प्रकार वह
भेदरहित ही रहता है। ऐसा जो भेदरहित है वही प्रकृति पुरुषों का ईश्वर है। वही सबका श्रेष्ठ नियंता तथा 'पर'
और 'अवर' है। उसके सम्बन्ध में भी निर्णय सुन लो। मनरहित संकल्प से जिसने प्रकृति और पुरुष को उत्पन्न
किया वही वास्तव में ईश्वर है। उसी के सामर्थ्य से वे व्यवहार करते हैं। प्रकृति को चेताती सत्ता ही उसका
पुरुषत्त्व है। इसीलिये प्रकृति का पति सभी दृष्टि से यही है। ब्रह्मदेवादि देवता 'पर' है तथा मनु से लेकर स्थावर
तक सभी जीव 'अवर' हैं। इनका नियंता और चालक वही है। उसकी आज्ञा के बिना वायु भी नहीं हिलता, समुद्र
अपनी मर्यादा में रहता है और सूर्य दिनमान नियंत्रित करता है। जिसकी आज्ञा को नमन कर प्राण भी (नाक में)
बारह अंगुल तक ही घूमता रहता है। आज्ञा के भय से उसके आगे नहीं जा सकता। कठोर आज्ञा को ध्यान में
रखकर मेरु भी अपना स्थान नहीं छोड़ता। चेतनशक्ति को आज्ञा मिलते ही वह अचेतन देह को सचेतन कर
डालती है। वह स्वयं निराधार होते हुए भी सारे विश्व के लिये आधार बन गया है उसी प्रकार जैसे सर्पाभास के
लिये रस्सी का ही आश्रय रहता है। सत्त्व आदि जो गुणशक्ति है वह आत्मकाल गति को नियंत्रित कर उसे
समस्थिति में ला कर रखती है। वही प्रकृति अदृश्य रूप में निर्गुण स्थान में रहती है। जिस प्रकार वटवृक्ष अपने
बीज में समा कर रहता है उसी प्रकार समस्त उपाधियों को निगल कर ब्रह्म केवल निरुपाधिक स्वरूप में रहता है।
जिस प्रकार मंदराचल न होने पर क्षीरसागर निश्चल रहता है, अथवा विभिन्न आकार के अलंकारों को भट्टी में
डालने पर वह मूल सुवर्ण की तरह हो जाता है अथवा जिस प्रकार सूर्य अपने तेज से आकाश के समस्त नक्षत्रों
को तेजहीन कर देता है उसी प्रकार माया के कारण आकार लेने वाली सारी सृष्टि लुप्त होकर केवल निरुपाधिक
परमात्मा ही शेष रह जाता है अथवा ग्रीष्म ऋतु के अन्त में जिस प्रकार सभी प्रकार के बीज पृथ्वी में लीन हो
जाते हैं उसी प्रकार प्रकृति उसमें लीन होकर वह केवल सुखस्वरूप में शेष रहता है। ऐसा केवल निरुपाधिक,
सुखस्वरूपानंद का कल्लोल, चिन्मात्र तेज से तेजयुक्त तथा सद्-अंश के कारण निरन्तर निर्मल उस ज्ञानस्वरूप
अनन्त ने उत्पत्ति काल में सृष्टि की रचना कैसे की उसे भी ध्यानपूर्वक श्रवण करो।
केवलात्मानुभावेन स्वमायां त्रिगुणात्मिकाम्।
संक्षोभयान् सृजत्यादौ तय सूत्रमरिंदम॥ १९॥
तामाहुस्त्रिगुणव्यक्तिं सृजन्तीं विश्वतोमुखम्।
यस्मिन् प्रोतमिदं विश्वं येन संसरते पुमान्॥ २०॥
उसने अपनी कालसत्ता से अपनी माया की ओर देखा तो वह क्षुब्ध हो गयी और उसने निजसूत्र अर्थात्