सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 220

२०४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सन्तं समीपे रमणं रतिप्रदं वित्तप्रदं नित्यमिमं विहाय।
अकामदं दुःखभयादिशोकमोहप्रदं तुच्छमहं भजेऽज्ञा ॥ ३१ ॥
संत अर्थात शाश्वत पुरुष का लाभ अत्यन्त निकट होते हुए भी, मुझे विषयासक्ति के कारण मालूम नहीं
हुआ। उसके साथ रत होने पर तत्काल कामनिवृत्ति होती है। काम की निवृत्ति कर जो अपार शाश्वत सुख प्रदान
करता है, वही वित्तदाता भी होता है। उसका दान अलौकिक होता है। प्रेमरति से सन्तुष्ट होकर वह निजात्मपद
के साथ सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्रदान करता है और वह पुरुष तथा स्त्री दोनों को ही रममाण कर सकता है। वही एक
सबका रमण अर्थात पति है। ऐसे कांत को त्याग कर मैंने कितनी बड़ी भूल की। निरन्तर कामप्राप्ति के लिये ऐसे
पुरुष को भज रही थी जो काम पूर्ण नहीं कर सकता। जो स्वयं अपना ही काम पूर्ण नहीं कर सकता वह मुझे
कैसे निष्काम करेगा ? ऐसों की संगति से मैंने मिथ्या मोह तथा अत्यन्त दुःख अवश्य प्राप्त किया। वे मुझे सुख
तो नहीं ही दे सकते थे, उल्टे उन्होंने मुझे दुःख ही दिया।
अहो मयाऽऽत्मा परितापितो वृथा सांकेत्यवृत्त्याऽतिविगर्ह्यवार्तया।
स्त्रैणान्नराद् यार्थतृषोऽनुशोच्यात् क्रीतेन वित्तं रतिमात्मनेच्छती ॥ ३२ ॥
जार पुरुष के साथ मैं जिस सुख की इच्छा करती थी वह मेरी मूर्खता के कारण ही। व्यर्थ ही मैंने संताप
कर लिया। मैंने स्वयं ही अपने को दुःखी कर लिया। स्त्री के अधीन रहने वाले पुरुष नराधम होते हैं। वेश्यागामी
पुरुष तो उनसे भी अधम होते हैं। ऐसे ही लोगों की संगत मैं चाह रही थी। अत्यन्त निंदनीय जो वृत्तियाँ हैं वे
सब मुझे टालना चाहती होंगी। (हरहर!) भोगेन्द्रिय पर उदरनिर्वाह करना। व्यभिचार व्यवसाय की जाति तो
निकृष्ट है ही। जो कोई थोड़ा-सा भी धन देता है उसकी जाति भी नहीं देखी जाती। इससे अधिक लज्जास्पद
स्थिति क्या होगी ? मेरे जीने को धिःकार है। जिस पुरुष को देह बेचा वह भी अत्यन्त दीन, हीन। उस पुरुष के
लक्षणों का क्या वर्णन किया जाय? सभी गुणों में शून्य। कंजूसी के कारण पूरा पैसा नहीं दे सकता। काम भी पूरा
नहीं करता, प्रेम का तो नामोनिशान भी नहीं। इतना ही नहीं बल्कि वह बाद में मुँह भी नहीं दिखाता। ऐसे लोगों
से सुख की आशा करने से दुःख अवश्य ही बढ़ जाता है। उसे आग लगे। उसका मुँह भी नहीं देखना चाहिये।
देखने से कै होने लगती है। सारांश, उस पुरुष की स्थिति का स्मरण होते ही मन को घिन होने लगती है। बस हो
गयी वह संगत। मन उससे पूरी तरह ऊब गया।
यदस्थिभिर्निर्मितवंशवंश्यस्थूणं त्वचा रोमनखैः पिनद्धम्।
क्षरन्नवद्वारमगारमेतद् विण्मूत्रपूर्णं मदुपैति कान्या ॥ ३३ ॥
यह मनुष्य देहरूपी घर बड़ा कठिन है। इसकी आड़ी-टेढ़ी लकड़ियाँ केवल हड्डियाँ हैं, दोनों ओर हड्डियों
की बनी मेढ़ है और उस पर गीली चमड़ी चढ़ी हुई है। उस पर रोमावलियों की कीलें लगी हुई हैं। अग्र भाग पर
नखों की कोंपल से झरी बन्द कर दी गयी है। अस्थि, मांस, चमड़ी आदि की चौखट बना कर स्वाद लेने के
लिये लाल चमड़े की जीभ आगे ही तैयार करके रखी हुई है। वायु भीतर-बाहर आ जा सके इसलिये प्राण,
अपान के झरोखे तैयार किये गये हैं तथा ऊपर हिलने-डुलने वाले शिखर पर केशरूप कोंपल लगा दिये गये हैं।
भीतर की खाली जगह को भर कर उसे नौ नाड़ियों से कसकर बाँध दिया है। इसमें नित्य नये मलमूत्र का ढेर
एकत्र होता रहता है। अन्दर की खाली जगह में कितनी दुर्गन्ध भरी हुई है। नवद्वारों से दिन रात उसी का प्रवाह
चलता रहता है। नालियाँ निरन्तर गन्दगी से बहती देख मनुष्य ऊब जाता है। रात-दिन उन्हें पानी से धोने पर भी