श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
देखकर अनेक टिटिहरी पक्षी जो उससे बलवान भी थे, वे दौड़ कर उसके पास आये। वे अब जोर जबरदस्ती से
मुझसे वह टुकड़ा छीन लेंगे यह जानकर वह भागने लगा। वह दौड़ रहा है यह देख कर सबने उसे घेर लिया।
माँस के उस टुकड़े की लालच में वहाँ बहुत बड़ा झगड़ा शुरू हो गया। कोई पंख से प्रहार करने लगे तो कोई
नाखून गड़ाने लगे तो कोई मुँह से काटने लगे। इससे उसे अत्यन्त दुःख हुआ। मुँह में माँस का टुकड़ा होने के
कारण वह चिल्ला भी नहीं सकता था। वे लोग कितनी ही धक्का-मुक्की कर रहे थे लेकिन उसका मुँह बन्द
था। वह मन में विचार करने लगा कि ये मेरे सजातीय बाँधव होते हुए मुझे क्यों पीड़ा दे रहे हैं ? उसने कहा कि
मेरे पास का यह माँस का टुकड़ा ही मेरे दुःख का मूल कारण है और यह कहकर उसने तत्काल वह टुकड़ा
फेंक दिया और सुखपूर्वक, शान्त होकर बैठ गया। लेकिन जहाँ माँस का वह टुकड़ा गिरा था वहाँ झगड़े के
कारण विचित्र सा कोलाहल मच गया। लोग एक-दूसरे का सिर फोड़ने लगे और मुँह नोचने लगे। वह टिटिहरी
उस झगड़े को बड़े मजे में देख रही थी। सारांश जहाँ मूल परिग्रह विद्यमान है, वहाँ दुःख रहता है और उसका
त्याग करने पर अपार सुख की प्राप्ति होती है। अट्टालिकायें, गोपुर, बाडे, धन, धान्य, वस्त्रालंकार, रत्न, पत्नी,
बच्चे आदि जो समुदाय है, वही परिग्रह है। इस सारे परिग्रह का मूल यदि खोजा जाय तो केवल देहबुद्धि, अर्थात्
'देह ही मैं हूँ' यह भावना है। वह भी अभिमान में सनी हुई, अर्थात् सबका मूल कारण अभिमान है। उस
अभिमान का ही जब त्याग करेंगे, तभी प्रपंच की जड़ नष्ट होती है। जब जड़ ही टूट जाती है तब वृक्ष भी गिर
पड़ता है। अभिमान देहबुद्धि के लिये जीवन की तरह है और देहबुद्धि भी संग से दृढ़तर होती है। इन दोनों की
संगति का निवास स्थान परिग्रह है। इस प्रकार ये दोनों परस्पर चिपके रहते हैं। इनका त्याग करने से अपार सुख
प्राप्त होता है और उसका संग्रह करने से वह दुःख का कारण बनता है। पहले अभिमान का त्याग करना चाहिये।
अभिमान के साथ सब कुछ छोड़ देने से सुख की बिछावन पड़ेगी। उस सुख का वर्णन करने में शब्द लजाकर
पीछे हट जाते हैं। हे राजा! अब तुम यदि पूछोगे कि अभिमान छोड़ कर कैसे रहा जाय तो उसके लिये बालक
को गुरु बनाने का वृत्तांत सुनाता हूँ।
न मे मानावमानौ स्तो, न चिन्ता गेहपुत्रिणाम्।
आत्मक्रीड आत्मरतिर्विचरामीह बालवत् ॥ ३॥
बालक कभी नहीं कहता कि यह मेरा है या यह तेरा है। उसकी समझ में ऊँच-नीच नहीं आता। इसलिये
वह सुखपूर्वक मान-अपमान को सहकर रहता है। तीन महीने के बालक को मान-अपमान की समझ नहीं होती,
वह अपने ही आनन्द में प्रसन्न रहता है। दूजेपन को वह स्पर्श ही नहीं करता, अपनी ही लीला में मस्त होकर
वह खेलता रहता है स्वयं ही अपना मनोरंजन करता है। बच्चे को घरबार की चिन्ता कभी स्पर्श नहीं करती। वह
स्वभाव से ही चिन्तामुक्त रहता है। उसे चिन्ता की बात मालूम ही नहीं रहती इसलिये वह स्वयं से ही प्रेम करता
है। अपने में ही रममाण रहता है। वही स्थिति योगी की है। उसे प्रपंच का भान नहीं रहता इसलिये उसके लिये
मान और अपमान एक समान रहते हैं। चित्र में बने सर्प का दंश किया हुआ जिस प्रकार चित्त के ही अमृत से
बच जाता है, उसी प्रकार योगी जन्म-मरण की झंझट से छूट कर द्वंद्व से मुक्त होकर निश्चल बना रहता है।
घरबार, पत्नी तथा बच्चों की चिन्ता उसके लिये मिथ्या है, क्योंकि जब उसे अपना देह ही सच्चा मालूम नहीं
होता तो पत्नी और बच्चों की चिन्ता क्यों होगी? यदि संसार का मूल खोजा जाय तो वह है कल्पना। वह कल्पना
मन के अधीन रहती है। जब वह मन ही स्वस्वरूप में लीन हो जाता है तो सब कुछ चिद्धन बन जाता है। उस