श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 227, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवाँ अध्याय २११
आत्मसुख प्राप्त करती है इस आशय का वर्णन है। सारांश यही है कि जैसे-जैसे पुरुष परिग्रह शून्य होता जाता है,
वैसे-वैसे आत्मसुख प्राप्त होने लगता है। भाषण का यही सार उस ब्राह्मण ने वर्णन किया।
ब्राह्मण उवाच
परिग्रहो हि दुःखाय यद् यत् प्रियतमं नृणाम्।
अनन्तं सुखमाप्नोति तद् विद्वान् यस्त्वकिंचनः ॥ १ ॥
ब्राह्मण ने राजा से कहा, “जिसके पास परिग्रह अर्थात् किसी प्रकार का संग्रह रहता है उसे दिन रात दुःख
भोगना पड़ता है। कुटुम्ब परिग्रह की आसक्ति से ही दुर्बुद्धि कपोतपक्षी का नाश हुआ। अकेले रहते हुए भी जो
परिग्रह के चक्कर में फँसते हैं वे भी दुःख प्राप्त करते हैं। गृह का परिग्रह करने पर पत्थर और मिट्टी से भी
आसक्ति होने लगती है। एक तिनके के लिये भी वे स्नेहसम्बन्ध तोड़ कर कलह के लिये उद्यत हो जाते हैं।
लेकिन आश्चर्य की बात है कि विरक्त पुरुष भी परिग्रह के फेर में पड़ जाते हैं। वे अपने शिष्य सम्प्रदाय के पाश
में फँस जाते हैं। शास्त्र के ग्रन्थों में रुचि जगती है जिससे मठ बनाने की इच्छा होती है और फिर मठ के शिष्यों
को समझाते समझाते बेचारा थक जाता है। फिर वे उस परिवार से ऊब कर सारा परिवार ही छोड़ देते हैं। मठ
की आशा जगने पर, उसके लिये शिष्य सम्प्रदाय जुटाना पड़ता है। शिष्य सम्प्रदाय एकत्र होते ही उनमें परस्पर
कलह उत्पन्न होता है। इस प्रकार परिग्रह के कारण संन्यासी को विरोध अवश्य होता है। पहले पत्नी और बच्चों
का परिग्रह त्याग कर लंगोटी भी त्यागकर निर्वस्त्र हो गया था लेकिन अब खुले बदन ही सिर पर गगरी लेकर
मठ के चारों ओर लगे पेड़ों को सींचने लगता है। यदि कोई उस पेड़ का एक पत्ता भी तोड़ता है तो वह आकाश
पाताल एक कर देता है। इस प्रकार परिग्रह का संकट अत्यन्त कठिन रहता है। वह सभी को दुःखी कर देता है।
शोक से जो भी परिग्रह करो तो वही दुःख और कलह उत्पन्न करता है। यह अनुभव होते हुए भी वैराग्य उत्पन्न
नहीं होता। परिग्रह की स्थिति कुछ ऐसी है। यह सब देखकर ही जो ज्ञाता है वह उसके प्रति आसक्ति सदा के
लिये छोड़कर अकिंचन मार्ग पर चल पड़ता है। प्रपंच स्वयं ही क्षणभंगुर है तो फिर उसका परिग्रह शाश्वत कैसे
होगा? इस प्रकार सारी बातों का विचार कर वे अकिंचन हो जाते हैं। सभी परिग्रहों में देह परिग्रह अत्यन्त कठिन
होता है। उसे मिथ्या समझ कर जो उसे तोड़ देता है वही सच्चा विचारी और ज्ञाता होता है। जिसका देह-परिग्रह
मिथ्या हो जाता है वह अनंत सुख के मन्दिर में प्रविष्ट होता है, जहाँ सुख का अन्त नहीं होता, ऐसा निजसुख
वह प्राप्त करता है। इतना कहने के बाद अवधूत ने विनोदपूर्वक कहा, “परिग्रह कितना दुःखदायी है इसका
वर्णन तुम्हें टिटिहरी को गुरु बनाने के प्रसंग में बताया।” यह सुनते ही राजा को झटका सा लगा। उसने अपने
मन में कहा, मैं भी राज-परिग्रह के पाश में फँस गया हूँ और देह परिग्रह में बन्दी हो गया हूँ। इसलिये मुझे अब
इनका त्याग करना चाहिए। इस प्रकार राजा के मन में वैराग्य उत्पन्न होकर वह अपना सर्वस्व त्याग करने के
लिये तत्पर हो गया। उसे श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त होने के कारण वह आत्मज्ञान के लिये सुपात्र बना।
टिटिहरी को गुरु बनाने से परिग्रह का विचार करने के लिये वह ध्यानपूर्वक श्रवण करने लगा।
सामिषं कुररं जघ्नुर्बलिनो ये निरामिषाः।
तदामिषं परित्यज्य, स सुखं समविन्दत ॥ २ ॥
कोई एक नर टिटिहरा पक्षी था। उसे स्वादिष्ट माँस का एक टुकड़ा मिला। उसे तुरन्त खा लेना चाहिये था
लेकिन अपने लोभी स्वभाव के कारण उसने उसे अपने पास जतन करके रख लिया। उस मांस के टुकड़े को