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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

सातवाँ अध्याय १७३
कितने ही प्राणी अनेक पैरों से चलने वाले हैं। इस प्रकार मैंने अनेक प्रकार के शरीर गढ़े हैं। इस प्रकार पृथ्वी पर
मैंने बनाये हुए शरीरों की संख्या कितनी है, इसका अन्त नहीं है, लेकिन वे प्राणी मुझ कर्त्ता को नहीं पहचानते
इसलिये मतिमंद हैं। मुझ कर्त्ता की प्राप्ति हो सके इसलिये मैंने अपने अंश से ज्ञानशक्ति प्रकाशित कर मनुष्य
शरीर का निर्माण किया। जिस देह से वे मुझे प्राप्त करते हैं, उस देह से मुझे अत्यन्त प्रीति है, इसीलिये वेद
नरदेह का वर्णन करते हैं और देवता भी नरदेह की कामना करते हैं। अनेक युक्तियों से लोग इसी नरदेह से मुझे
प्राप्त करते हैं। ऐसे नरदेह की प्रीति के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण ने उद्धव को बताया।
अत्र मां मार्गयन्त्यद्धा युक्ता हेतुभिरीश्वरम्।
गृह्यमाणैर्गुणैर्लिङ्गैरग्राह्यमनुमानतः ॥ २३ ॥
नरदेह प्राप्त करने के बाद वे कर्ता की खोज करते हैं—मेरी, जो त्रिभुवन की उत्पत्ति, स्थिति और संहार
करने वाला परमेश्वर, मेरी बुद्धि का विवेक से अनुमान लगाते हैं, लेकिन वह अनुमान और उससे निष्पन्न होने
वाला ज्ञान भी जड़ ही रहता है, क्योंकि उस ज्ञान को प्रकाशित करने वाला स्वयंप्रकाश मैं उन सबसे भिन्न हूँ। ऐसे
लक्षणों से वे मुझे जानते हैं लेकिन इस प्रकार के कितने ही अनुमान वे करें लेकिन मैं उनके वश में आनेवाला
नहीं हूँ। तो जो भी कोई अभिमान त्याग कर मेरा स्वरूप देखने का प्रयास करते हैं, केवल उन्हें ही मेरे स्वरूप का
साक्षात अनुभव प्राप्त होता है, यह बात ध्यान में रखो। जिसकी सारी आशाएँ नष्ट होती हैं, वही धीरे-धीरे
ब्रह्मस्वरूप प्राप्त करता है, उसने ही कलिकाल से लड़ने के लिये कमर कस ली है ऐसा समझना चाहिए। चेहरा
तो स्वतःसिद्ध रहता है लेकिन यदि निर्मल दर्पण हो तभी उसकी छवि दिखायी दे सकती है, उसी प्रकार जब बुद्धि
को विवेक प्राप्त होता है तभी नरदेह में आत्मा दिखायी देने लगता है। इस सम्बन्ध में एक प्राचीन इतिहास है, वह
मैं अब तुम्हें सुनाता हूँ। यदु और अवधूत इन दोनों का संवाद साधकों के लिये ज्ञानसाधन रूप हैं।
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
अवधूतस्य संवादं यदोरमिततेजसः ॥ २४॥
श्रीकृष्ण ने प्रसन्नतापूर्वक कहा, उद्धव ! हमारा पूर्वज जो यदु था उसने अवधूत के साथ ब्रह्मज्ञान के सम्बन्ध
में सुन्दर संवाद किया था। वह यदुराजा मानों क्षत्रियों में सूर्य था, अन्य नृपति रूप चन्द्र के प्रकाश को वह अपने
तेज से देदीप्यमान करता था। उसने अवधूत से गुरु के लक्षण श्रवण किये थे इसलिये उसे लगे हाथ सायुज्यता
मुक्ति प्राप्त हो गयी थी। वही प्राचीन कथा अब तुम्हें सुनाता हूँ।
अवधूतं द्विजं कञ्चिच्चरन्तमकुतोभयम्।
कविं निरीक्ष्य तरुणं यदुः पप्रच्छ धर्मवित् ॥ २५ ॥
आत्मतेज से प्रकाशित तथा ब्रह्मानन्द से डोलने वाले किसी एक अवधूत को यदु ने आते हुए देखा। यदु ने
उस अवधूत के स्वरूप का सूक्ष्मता से निरीक्षण किया। उसने यज्ञोपवीत धारण किया था इसलिये वह ब्राह्मण
होगा तथा ब्रह्मवेता होगा ऐसा उसको विश्वास हो गया। यदु क्रीड़ा करने के लिये वन में गया था तभी यह
अवधूत निर्भय और निःशंक होकर विचरण करता हुआ सामने से आता दिखायी दिया। भीतर के प्राण को वह
बाहर नहीं निकलने दे रहा था, ऐसी प्राणाप्राण की समता, धारणा किये बिना ही उसे प्राप्त हो गयी थी। उसका
देखना भी विचित्र प्रकार का था। दृश्यरूप से देखना वह नहीं जानता था। वह सर्वांग सुन्दर हो गया था और
द्रष्टा के रूप में ही वह दृश्य देखता था। मैं जंगल में भटकने वाला एक व्यक्ति हूँ इसकी उसे जानकारी ही नहीं

१७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
थी। समदृष्टि के योग से उसे सर्वत्र व्यापकता ही प्राप्त हो गयी थी। कर्म, कार्य और कर्ता यह सब वह स्वयं ही
बन गया था। जीव ने शपथ लेकर क्रिया को अर्पण कर दिया था। देह पर जो अहंकार था वह देह के मिथ्या होते
ही भाग गया था। नित्यानित्य विवेकरूपी होम से जो ब्रह्माग्नि उत्पन्न हुआ उससे चारों आश्रमों के घर जल गये
और वह निराश्रमी हो गया। उस आश्रम में शास्त्रश्रवण विधि की पोथी थी, वह भी जलकर राख हो गयी। वह
राख भी हाथ नहीं लगी। विधिनिषेध की शर्त तथा पंचायतन देवपूजा राख में मिल गयी। संचित-क्रियमाण कर्म
की,जो पूँजी थी वह भी जलकर खाक हो गयी। इस प्रकार ब्रह्मानन्द से डोलने वाले तथा निजसुख से झूलने
वाले उस अवधूत को यदु ने आते देखा। उसने सर्वसंकल्प विकल्परहित होने की विभूति शरीर में लगायी थी
इसलिए उसे अवधूत कहना पड़ेगा अन्यथा वह ब्राह्मण ही था। सामने दीखने वाला सारा प्रपंच उसने आत्मबोध
से धो डाला था इसीलिये उसे 'अवधूत' कहते हैं, वैसे वह प्रसिद्ध ब्राह्मण था। जो 'अहं' को धो देता है वही
अवधूत है, वही योगी है और वही पुनीत है। जो अहंकारग्रस्त होता है वही जन्मकर्म में पतित होता है ऐसा
समझना चाहिये। उस अवधूत के देह को वार्धक्य नहीं आता क्योंकि जब देह में देहत्व ही नहीं रहता तो वार्धक्य
कहाँ से आयेगा? और यही चिरयुवा होने का मूल कारण है। उसके और भी लक्षण हैं। उसका चिरनूतन रहने
वाला ज्ञान मैला नहीं होता, वह नित्य नये रूप में ही उसका भोग करता रहता है। इसलिये वह यौवन से भरा पूरा
था। आत्मज्ञान के तेज से उसने द्वैत को जीत लिया था इसलिये वह इस प्रकार निःशंकर होकर घूम रहा था। उसे
किसी भी बात का भय नहीं लग रहा था। इस प्रकार अवधूत के लक्षणों का निश्चय हुआ और वह आत्मज्ञान से
परिपूर्ण है ऐसा लगा। यदु के मन में उसके प्रति पूज्यबुद्धि उत्पन्न हुई, उसके प्रति अनन्य श्रद्धा और नम्रता हो
आयी। राजा का चित्त प्रसन्न हुआ और उसने उसे साष्टांग दण्डवत कर, भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर प्रश्न किया।
यदुरुवाच
कुतो बुद्धिरियं ब्रह्मन्नकर्तुः सुविशारदा।
यामासाद्य भवांल्लोकं विद्वांश्चरति बालवत् ॥ २६॥
यदु ने कहा, स्वामी! धर्म-कर्म का आचरण कर अथवा यमनियम साधकर भी जो बुद्धि प्राप्त नहीं हो
सकती वह अपूर्व बुद्धि मुझे आपमें दिखायी दे रही है। आप सारे कर्मों में तो कुशल दिखायी देते हैं किन्तु बिना
कुछ किये निश्चल रहते हैं। आत्मबोध के कारण आप में अकर्तृत्वबोध आ गया है और इसीलिये अहेतुक
बालक की तरह आपकी स्थिति दिखायी देती है। आप बालकों की तरह व्यवहार करते हैं किन्तु आप में
बालबुद्धि नहीं है। आप सर्वथा सर्वज्ञ हैं ऐसा मुझे लगता है। इस मृत्युलोक में आकर नरदेह प्राप्त कर उसकी
जैसी सार्थकता आपने की है वह अन्यत्र नहीं दिखायी देती।
प्रायो धर्मार्थकामेषु विवित्सायां च मानवाः।
हेतुनैव समीहन्ते आयुषो यशसः श्रियः॥ २७॥
इस लोक के लोग प्रायः धर्मार्थकाम की ही इच्छा करने वाले हैं इसलिये उन विषयों का ज्ञान वे अवश्य
प्राप्त कर लेते हैं। वे कहते हैं, हम स्वधर्म का पालन करते हैं, स्नान संध्या में कीर्ति प्राप्त करते हैं और धन
प्राप्ति के लिये गायत्री के फल दे डालते हैं। वे कहते हैं, हम वेदों के अनुसार यज्ञ करते हैं, वेदमार्ग की स्थापना
करते हैं और अन्त में स्वर्ग की इच्छा कर उसे उदरनिर्वाह का साधन बना देते हैं। कुछ लोग स्वयं को
स्वकर्मनिष्ठ बताते हैं और दर्भ, मृत्तिका आदि नष्ट करते हैं लेकिन यदि कोई याचक आ जाय तो उसे मुट्ठीभर

सातवाँ अध्याय १७५
अनाज भी नहीं देते। ढोंगी लोग अपना नाम बढ़ाने के लिये वैष्णवदीक्षा लेते हैं और चकाचक देवताओं की पूजा
कर दोनों हाथ से शंख बजाते हैं। आयुष्य दान करने वाले पुण्यपुरुष स्वयं को वैद्य और अहिंसक कहते हैं किन्तु
स्थावर जंगम आदि समस्त जीवों की हत्या कर सफलता की पताका फहराते हैं। अपनी कीर्ति बढ़ाने के लिये
कुछ लोग तुलाभार कराते हैं। वे लोग मलमूत्र से भरे देह को द्रव्य से तौलते हैं। लेकिन परमार्थ के नाम पर कोई
एक कौड़ी भी नहीं खर्च करता। देखिये, मूर्ख लोग कैसे भुलावे में आ जाते हैं। वे सच्चे स्वार्थ को भूल जाते हैं।
पूर्व कर्म से जिन्हें लक्ष्मी प्राप्त नहीं है, वे लोग लक्ष्मी की उपासना करते हैं, लेकिन लक्ष्मी के पति श्रीहरि का
भजन नहीं करते। विश्व का गुरु जो श्रीहरि है उसकी पत्नी है। उसकी अभिलाषा कर वे उसे अपने पास रखते
हैं, हरि को अर्पण नहीं करते। हरि उन्हें नरक में भेजता है। रोग का विनाश हो और आरोग्य प्राप्त हो इसलिये
सूर्य की उपासना करते हैं लेकिन उन्हें इस बात का स्मरण नहीं रहता कि देह नश्वर है। इससे आत्मस्वरूप का
विस्मरण होता है। इस प्रकार हम आयुष्य, यश और द्रव्य के लिये लोगों को भजन में लिप्त देखते हैं लेकिन
स्वामी ! आश्चर्य की बात है कि आप परब्रह्मस्वरूप में लीन दिखायी देते हैं। विषय का जोर विचित्र रहता है।
इससे लोग मिथ्या भ्रम में पड़े हुए हैं। वे ज्ञान के साधन साध्य कर विषय की कामना करते हैं। वेदान्त-वार्तिक
की वाक्पटुता से अद्वैत ब्रह्म का प्रतिपादन करते हैं किन्तु पेट के लिये वे ज्ञान का विक्रय करते हैं। इस आश्चर्य
का वर्णन कौन करेगा? कोई योगाभ्यास कर श्वांस को रोक कर रखते हैं और आँखें मूंदकर ध्यान करते हैं
लेकिन मन में विषय का ही चिन्तन करते रहते हैं। इस प्रकार ज्ञानेच्छु लोग अनेक प्रकार के साधन अपना कर
मूर्ख बनते हैं। लेकिन आपने आत्मसुख प्राप्त कर अलौकिक कार्य किया। इस प्रकार हे अवधूत स्वामी ! तुमने
जीवित को तृण समान किया, समस्त लोक को तुच्छ मानकर निजात्म हित में लीन हो। आप आत्मानन्द में तृप्त
होकर हृदय में शान्त हो गये हैं ऐसा हम देख रहे हैं। उनके लक्षण सुनिये।
त्वं तु कल्पः कविर्दक्षः सुभगोऽमृतभाषणः।
न कर्ता नेहसे किंचिज्जडोन्मत्तपिशाचवत् ॥ २८ ॥
आप सर्वज्ञ हैं लेकिन वह ज्ञानतत्त्व आप प्रकट नहीं होने देते। आप कुछ करते भी नहीं हैं और किसी
वस्तु की इच्छा ही करते हैं। आपकी आत्मशान्ति से जड़त्व प्रकट होता है, आप सर्वथा मौन रहते हैं, आपमें
किसी भी प्रकार की विकलता नहीं दिखायी देती। शरीर से अव्यंग होने के कारण आप स्वरूप से सुन्दर दिखायी
देते हैं। ज्ञान तो अकेला ही था, उसके साथ दूसरा कोई न होने के कारण वह परदेसी हो गया था। वह आप में
लीन हो गया इसलिये आपको 'कवि' यह नाम प्राप्त हुआ। कर्म करते हुए भी आप 'अकर्ता' हैं, यह आपकी
दक्षता है। आप ब्रह्मरस से परिपूर्ण 'रसाल' भाषण करते हैं वह माधुर्य अमृत में कहाँ से आयेगा ? ब्रह्मरस प्राशन
कर आप ब्रह्मानन्द में मस्त हो गये हैं इसलिये आप 'उन्मत्त' अवस्था में किसी को देखते भी नहीं। सदासर्वदा
आत्मस्वरूप में लीन होने के कारण आप 'मेरा' और 'तेरा' जैसी बात नहीं करते। आपका यह पागलपन सारे
संसार को अवश्य दिखायी देता है। आप आत्मज्ञान से तृप्त तथा परमानन्द से शान्त हो गये हैं यह लक्षण भी
साफ दिखायी दे रहा है।
जनेषु दह्यमानेषु कामलोभदवाग्निना।
न तप्यसेऽग्निनामुक्तो गङ्गाम्भस्थ इव द्विपः ॥ २९ ॥
कामलोभरूपी दावाग्नि में जलने वाले लोक हमें दिखायी दे रहे हैं, उससे कोई नहीं बच पाया है। लेकिन

१७६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
हे अवधूत! आप उस दावाग्नि में रहते हुए भी उससे झुलसते नहीं हैं। आपकी यह अविचलित अवस्था सचमुच
ही आश्चर्यजनक है। वह हमारी समझ में कभी नहीं आयेगी। नदी के दोनों किनारों पर आग लगने पर जिस
प्रकार हाथी पानी में डुबकी लगा लेता है और फिर उस पर आग की लपटों का प्रभाव नहीं होता, उसी प्रकार
आप भी दुःख से मुक्त हैं ऐसा लगता है। शीत और ऊष्मा आपको स्पर्श नहीं करते, आप ब्रह्मस्वरूप में निश्चल
हैं इसलिये हे दयाधन! हे कृपामूर्ति! आप से थोड़ी विनती करता हूँ।
त्वं हि न पृच्छतां ब्रह्मन्नात्मन्यान्दकारणम्।
ब्रूहि स्पर्शविहीनस्य भवतः केवलात्मनः॥ ३०॥
आप ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण हैं तथा आत्मानंद से परिपूर्ण हैं। उस आनन्द का कारण क्या है, कृपया स्पष्ट करके
बतायें। देह में होते हुए भी आप विदेहस्थिति में रहते हैं, आपको विषय स्पर्श भी नहीं कर सकता। इतनी
अलिप्तता आपने किस प्रकार प्राप्त की? आपको राजा का भय नहीं है, धनवानों की चिन्ता नहीं है, दीन का
भाषण आपको प्रिय लगता है और उसका मनोरथ आत्मज्ञान देकर पूरा करते हैं। इस प्रकार आप बिलकुल
कृपालु हैं, आप दुखियों के बन्धु तथा दीनों के लिये दयालु हैं। उसी प्रकार निजात्मभाव से आप भक्तों के
भक्तवत्सल हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण यदु का भाषण बड़े चाव से सुनाने लगा। उसने उद्धव से कहा "इस बोध को
सावधानी से चित्त में धारण करो।"
श्रीभगवानुवाच
यदुर्नैवं महाभागो ब्रह्मण्येन सुमेधसा।
पृष्टः सभाजितः प्राह प्रश्रयावनतं द्विजः॥ ३१॥
वह श्रीपति अपने मुख से यदु के भाग्य का वर्णन करने लगा। यदुराजा ब्राह्मणों का अत्यन्त भक्त होते हुए
सत्त्वशील था। उसी प्रकार वह अत्यन्त बुद्धिमान और श्रद्धालु था। भगवत् कृपा से उस भाग्यवान अवधूत की
यदु से भेंट हुई। तब यदु ने अत्यन्त विनम्र होकर अपने लाभ के लिये उससे विनती की। मधुपर्क विधि से
उसकी पूजा कर मृदु मधुर वाणी से उसने प्रार्थना की। इससे अवधूत सन्तुष्ट होकर प्रेम से बोलने लगे।
ब्राह्मण उवाच
सन्ति मे गुरवो राजन् बहवो बुद्धयुपाश्रिताः।
यतो बुद्धिमुपादाय मुक्तोऽटामीह तान्छृणु ॥ ३२॥
क्षीरसागर में उफान आता है या मेघ गर्जना करते हैं या आत्मसुख की तुरही बज उठे, उसी प्रकार वह
ब्राह्मण बोलने लगा। हे राजचूडामणि सुनो। तुम यदुकुल दीप के साक्षात सूर्य ही हो। तुम्हारी वाणी धन्य है। तुमने
अपने गुणों से मुझे संतुष्ट किया। राजा होते हुए भी सात्त्विक, सिद्ध लक्षणों से युक्त ऐसे इस पृथ्वी पर तुम एक ही
हो। तुमने जो प्रश्न किया, वह सुन्दर, गुणयुक्त और उत्तम से उत्तम है। तुम स्वानंद का कारण पूछते हो, वह मैं
तुम्हें यथार्थ रूप में बताता हूँ, सुनो। हे राजा! गुरु के बिना आत्मप्राप्ति कभी सिद्ध नहीं होती। उन गुरुओं के बारे
में भी मैं तुम्हें यथार्थ रूप में बताता हूँ। आत्मबुद्धि के विचारों में जब मैं तल्लीन था उस समय मैंने अनेक गुरु
किये। जिस किसी भी प्राणी में मुझे कोई सद्गुण दिखायी दिया, उस गुण के लिये मैंने उस गुरु को स्वीकार
किया। बुद्धि से उस गुण को स्वीकार किया और धैर्यपूर्वक उसे धारण किया। इसलिये मैं मुक्त हो गया और इस

सातवाँ अध्याय १७७
प्रकार स्वेच्छा से विचरण करता रहता हूँ। संसार सागर पार करने के लिये मुख्य रूप से 'सद्बुद्धि' चाहिये। यहाँ
अन्य किसी उपाय की परम्परा नहीं है फिर व्यर्थ ही कष्ट सहने की क्या आवश्यकता है ? जिसके पास सद्बुद्धि
नहीं होती वह क्रीतदास की तरह होता है। दिन-रात हजारों कष्ट भोगते-भोगते उसे क्षण भर का भी विराम नहीं
मिलता। जिसके हृदयमन्दिर में सद्बुद्धि नहीं होती उसके मन में कभी वैराग्य नहीं उत्पन्न होता। फिर संसार सागर
कैसे पार होगा ? विवेक तो उसे स्वप्न में भी नहीं दिखायी देता। वैराग्य के साथ यदि सद्बुद्धि भी मिली हो तो
उसके सामने बेचारा संसार क्या करेगा ? वह तो एक घाव में उसके दो टुकड़े कर देगा। यदि संसार नाम की कोई
चीज हो तो उसके विनाश के लिये प्रयास करना आवश्यक है लेकिन जो मनुष्य विवेक का आश्रय लेता है उसका
तो संसार ही नष्ट हो जाता है। संसार के नाश का कारण उसकी 'प्रज्ञा' है। वह यदि कायम रहे तो संसार
'मृगजल' की तरह हो जाता है। मैं जिन गुरुओं का वर्णन कर रहा हूँ, वह मैं अपनी निजबुद्धि से बतानेवाला हूँ,
उसमें से जो ग्राह्य हो उसे स्वीकार करें, जो त्याज्य हो उसका त्याग करें। वही मैं देशी भाषा में बताने वाला हूँ,
उसे ध्यानपूर्वक सुनो। उसके कारण शिष्य की ग्रहणशक्ति स्पष्ट रूप से दिखायी देगी। अब उदाहरण के रूप में
उस बुद्धि के लक्षण बताता हूँ। सूप, चलनीं तथा चूल्हा की तरह बुद्धि का उपयोग करना चाहिये। चलनी में जो
भी गिरता है, उसका सूक्ष्म तत्त्व नीचे गिर पड़ता है और गुण दोषों के कंकड़ चलनी में ही रह जाते हैं और
खड़खड़ाहट करते रहते हैं। ऐसी स्थिति में त्याग करना चाहिये। वैसा न करने से गुणदोषों के कंकड़ उसके पेट में
ही रह जाते हैं और स्वार्थ की निश्चित रूप से हानि होती है। लेकिन सूप की स्थिति निराली रहती है। भूसा तथा
कचरा वह फेंक देता है और केवल बीज अपने पेट में रहने देता है। स्वयं वैराग्य से तप्त होना तथा अपने गुणों से
अपरिपक्व को परिपक्व बनाना चूल्हे का स्वभाव है। हे वीर श्रेष्ठ! इस प्रकार इन तीनों स्थितियों को निश्चित रूप
से धारण करना चाहिये ताकि दर्पण के समान परमार्थ भी प्राप्त हो सके। यदु से उस ब्राह्मण ने कहा कि जो लक्षण
मैंने बताये हैं उन्हें ध्यान देकर सुनो। जिससे जो गुण मैंने लिया, उसे मैंने गुरु बनाया इसलिये मेरे गुण अगणित हो
गये—इतने कि सारा जगत ही मुझे गुरुओं से भरा दिखाई पड़ रहा है। जिससे मैंने ग्रहण किया वह सहज ही मेरा
गुरु हो गया लेकिन उसके दोषों का मैंने त्याग किया वह भी मेरा गुरु हो गया। इस प्रकार गुण ग्रहण और दोष
त्याग इन दोनों के समान भाव से दोनों ही मेरे गुरु हो गये। राजा! अब तुम भी विचार करके देखो तो तुम्हें भी
सारा जग गुरुमय ही दिखायी देगा। इस प्रकार शान्त होकर देखने से सारा जगत ही गुरु मालूम होने लगा। यह
साधन जिसके पास रहता है, वही परमार्थ को साधता है। तुम्हें यह कठिन मालूम होगा। इसलिये मैंने जिन श्रेष्ठ
गुरुओं को स्वीकार किया उनमें से जो प्रमुख हैं उनके बारे में बताता हूँ।
पृथिवीवाय्वाकाशमापोऽग्निश्चन्द्रमा रविः।
कपोतोऽजगरः सिन्धुः पतङ्गो मधुकृद् गजः ॥ ३३ ॥
मधुहा हरिणो मीनः पिङ्गला कुररोऽर्भकः ।
कुमारी शरकृत्सर्प ऊर्णनाभिः सुपेशकृत् ॥ ३४ ॥
अपने सभी गुरुओं के बारे में बताता हूँ। उनकी संख्या चौबीस है। उनके नाम मैं धीरे-धीरे सुनाता
हूँ। (१) पृथ्वी, (२) वायु, (३) आकाश, (४) अग्नि, (५) जल, (६) चन्द्रमा और (७) सूर्य,
(८) कपोत। (९) अजगर, (१०) समुद्र, (११) पतंग, (१२) मधुमक्खी, (१३) हाथी, (१४) भौंरा, (१५)
हिरन, (१६) मछली, (१७) पिंगला नामक वेश्या, (१८) टिटिहरी, (१९) बालक, (२०) कुमति,

१७८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
(२१) हथौड़ा चलाने वाला लोहार, (२२) साँप, (२३) केंचुली, (२४) रानी मक्खी इस प्रकार कुल मिलाकर
चौबीस गुरु हैं। पच्चीसवाँ तत्त्व जो परब्रह्म है, उसे प्राप्त करने के लिये इन चौबीस गुरुओं की उपासना करनी
चाहिये। सुविचार तथा आत्मबुद्धि से इन गुरुओं का भजन करना चाहिये। हृदय में आत्मज्ञान ठीक से प्रविष्ट हो
जाय इसलिये मैंने आत्मविचार से ही रात दिन अनेकों को गुरु बना लिया। किस युक्ति से, किस विचार से, किस
गुण के लिये कौन-सा गुरु बनाया ? वह भी सविस्तार बता रहा हूँ, सुनो।
एते मे गुरवो राजंश्चतुर्विंशतिराश्रिताः ।
शिक्षा वृत्तिभिरेतेषामन्वशिक्षमिहात्मनः ॥ ३५ ॥
हे निर्मल विवेकचक्रवर्ती राजराजेश्वर ! गुरुओं की जो संख्या थी वह मैंने तुम्हें बतायी। उनके पास जो लेने
लायक गुण थे उन्हें मैंने अपनी युक्ति से सीखा और फिर विकल्प का भ्रम त्याग कर आत्मस्थिति तक पहुँचा।
यतो यदनुशिक्षामि यथा वा नहुषात्मज ।
तं तथा पुरुषव्याघ्र निबोध कथयामि ते ॥ ३६ ॥
नहुष का पुत्र ययाति, ययाति का पुत्र यदु, इस वंश परम्परा के अनुसार यदु को नहुषनंदन कहते हैं।
इसलिए अवधूत ने कहा, हे नहुष पुत्र ! अब गुरु के लक्षण बताता हूँ, तो हे चतुर ! उन्हें तुम श्रवण करो। जिस
गुरु के पास जो गुण था उसे मैंने सीखा। किस प्रकार सीखा यह तुम्हें बताता हूँ, ध्यान देकर सुनो। यदु सारे शरीर
को मानों कान बनाकर सुनने लगा। शब्दों को पीछे छोड़ वह उसमें अर्थ की ओर ध्यान देने लगा। सारे विकल्पों
का त्याग कर विनम्र हुआ वह राजा जो भी विषय सुनता था उसके अनुसार तद्रूप हो जाता था।
भूतैराक्रम्यमाणोऽपि धीरो दैववशानुगैः ।
तद्विद्वान्न चलेन्मार्गादन्वशिक्षं क्षितेर्व्रतम् ॥ ३७ ॥
परमार्थ में शान्ति प्रमुख है। साधक में वह अवश्य होनी चाहिये इसलिये उस शान्ति के लिये मैंने सबसे
पहले पृथ्वी को गुरु बनाया। पृथ्वी तीन प्रकार से गुरु है। पर्वत, वृक्ष और भूमि। इन तीनों के गुण देह में धारण
करने के कारण पृथ्वी में गुरु के गुण आ गये हैं। अन्तर्निग्रह करने का अर्थ 'शान्ति' और बाह्येन्द्रिय निग्रह का
अर्थ 'दांति' होता है और इन्द्रसहिष्णुता का अर्थ 'क्षांति' है इसलिये क्षोति यह गुण प्राप्त करने के लिये पृथ्वी को
गुरु बनाया। अनेक प्रकार के प्राणी 'यह पृथ्वी मेरी है' यह कहकर उससे चिपकते हैं और अपनी-अपनी प्रवृत्ति
तथा व्यवहार के अनुसार उसके अनेक प्रकार से टुकड़े करते रहते हैं। लेकिन उन जीवों के अलग-अलग प्रकार
के व्यवहार पृथ्वी स्वयं ही संचालित करती रहती है और अपनी एकात्मता साधते हुए वह सदा अखण्ड ही रहती
है। ऐसा ही लक्षण योगियों का भी लक्षण रहता है, वह भले ही भिन्न-भिन्न कर्म करता हो लेकिन उसकी प्रवृत्ति
सदा एक-सी रहती है। यह देह प्रारब्धयोग से चलता है और जीव भी प्रारब्धयोग से ही आचरण करते हैं। इसे
ध्यान में रखकर, प्रत्येक जीव में मेरी ही आत्मा है, इस भावना से जो रहते हैं उन साधकों को दूजे की बाधा नहीं
होती। जीव पृथ्वी की पूजा करे अथवा उस पर मलमूत्र विसर्जन करे लेकिन इससे उसे न हर्ष होता है और न
विषाद ही होता है। अपनी शान्ति के कारण वह बिलकुल निश्चल रहती है। समस्त प्राणी पृथ्वी से उत्पन्न हुए हैं।
उन्होंने अपने अच्छे-बुरे कर्म से पृथ्वी की पूजा न की हो या उसे कष्ट भी न दिया हो लेकिन वह ऐक्य भाव से,
द्वंद्व भाव भूलकर आत्मरूप से निश्चल ही रहती है। उसी प्रकार योगी भी प्राणियों के भिन्न-भिन्न स्वभाव के
कारण भयभीत नहीं होते। समस्त प्राणियों के प्रति उनकी निजात्मभावना होने के कारण, विषय के प्रति भी उनमें

सातवाँ अध्याय १७९
समभाव होता है। हे राजा ! अब तुम्हें पृथ्वी की अद्भुत शान्ति के बारे में बताता हूँ, सुनो। वही शान्ति साधु-सन्तों
ने धारण करने के कारण वे भगवद्भक्ति के लिए पात्र हुए। पृथ्वी पर अग्नि प्रज्ज्वलित कर उसे जलायें अथवा
उस पर हल चलायें, या लातों से उसे मारे, लेकिन पृथ्वी उस अपराध का विचार न कर उलटे उन पर प्रसन्न ही
होती है और वही अनेक प्रकार की फसलें उगाकर प्राणिमात्र को तृप्त कर देती है। इस प्रकार की निजात्म-शान्ति
के लिये मैंने पृथ्वी को गुरु बनाया। हे भाग्यशाली राजा। इस शान्ति की अभिनव स्थिति के बारे में सुन लो। सुनो!
किसी ने दूसरे का अपराध किया और दूसरे ने उसे चुपचाप सहन कर लिया, अर्थात् उसकी उपेक्षा की, लेकिन
इतने से ही उसे शान्त कैसे कह सकते हैं ? ईंख को तोड़ने से वह मीठा लगता है, जिस शस्त्र से उसे तोड़ते हैं उसे
भी मीठा बना देता है और उसे पेरने से या पकाने से भी वह उपकार करने वालों को उत्कृष्ट स्वाद ही देता है।
इस प्रकार दूसरे का अपराध सहन कर उसका हित करना यही निर्द्वन्द्व शान्ति है। दूसरे का अपराध सहन कर उस
पर उपकार करना यह गुण मैंने पृथ्वी पर स्थित परोपकारी पर्वत से सीखा।
शश्वत्परार्थसर्वेहः परार्थैकांतसम्भवः।
साधुः शिक्षेत भूभृत्तो नगशिष्यः परात्मताम् ॥ ३८ ॥
पृथ्वी पर उत्पन्न पर्वतों को भी मैंने गुरु बनाया और उनसे मैंने जो सीखा वह भी सुनो। रत्न आदि मूल्यवान
वस्तु जिन्हें पर्वत अपने में संग्रह करके रखता है वह केवल परोपकार के ही लिये रहता है। घास, पानी आदि
अन्य पदार्थ भी वह केवल परोपकार के ही लिये रखता है। वह न किसी को बुलाता है न किसी को आने से
मना करता है और न किसी से ऊब कर उसे बाहर जाने के लिये कहता है। याचक की जो भी इच्छा रहती है
उसे वह परोपकार बुद्धि से पूरी करता है। ग्रीष्मऋतु समाप्त होते ही उस पर की घास तथा अनाज समाप्त हो
जाता है लेकिन पर्वत किसी को देने से पीछे नहीं हटता इसलिये ईश्वर भी तत्काल मेघवृष्टि कर उसे समृद्ध कर
देता है। दाता जिस उल्लास से देने लगता है, उसी उत्साह से जगन्नाथ उसकी आपूर्ति करता रहता है। मन में यदि
कोई विकल्प न रखें तो अच्युत भगवान अखण्ड देने वाला है। लेकिन शंकालु लोगों की समझ में यह बात नहीं
आती कि सच्चा दाता ईश्वर ही है। इसीलिये उन्हें दारिद्र्य भोगना पड़ता है। इस प्रकार पर्वत की उत्पत्ति केवल
परोपकार के लिये है। परोपकार के अतिरिक्त कोई अन्य कल्पना ही उसके मन में नहीं आती। साधक में सचमुच
पर्वत की जैसी उदारता चाहिये। काया, वाचा तथा मन से सर्वस्व देते समय भी प्रसन्नता होनी चाहिये। हमेशा
कोई भी कार्य करते समय सब पर उपकार करते रहना चाहिये। करोड़ों प्रकार के लाभों पर लात मार कर भी
परोपकार के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिये। परमार्थ की सच्ची इच्छा रखने वाला साधक सामने दिखाई देने
वाला स्वार्थ छोड़ कर परोपकार के लिये कठिन से कठिन संकट में भी कूद पड़ता है। मूर्त्तिमंत उपकार जन्म ले
ले अथवा साक्षात परोपकार ही साकार हो जाय इस प्रकार यह उपकारी बनकर रहता है। देखो ! जिस प्रकार ईंख
अपने माधुर्य से सब पर उपकार करता है उसी प्रकार योगी भी संसार में रहकर अपने समधुर व्यवहार से
परोपकार करता रहता है। जिस प्रकार पर्वत में से पानी के सोते निकलते रहते हैं उसी प्रकार उसमें से परोपकार
के सोते निरन्तर बहते रहते हैं। वे सूखने का नाम ही नहीं लेते। उसने जगत को इतना उपकारबद्ध किया रहता
है। कंजूसी की संगत छोड़ कर पर्वत एकान्त में उपकार करता रहता है अथवा धैर्यवृत्ति का निश्चय कर वह
उपकार की साक्षात मूर्ति ही बन जाता है। अब वृक्ष से क्या सीखने लायक है यह बताता हूँ। सर्वांग से, सर्वोपरी,
सर्वकाल एवं सर्वत्र सबकी पराधीनता में ही रहना चाहिये यह मैंने वृक्ष से सीखा। जिसने वृक्ष को लगाया है,
उसके ही अधीन वह रहता हो यह बात नहीं है बल्कि जो उसे काटने के लिये तैयार होता है उसके भी वह

१८० श्रीमद् एकनाथी भागवत
अधीन रहता है। उसी प्रकार योगी को पालकी में बिठाया जाय तो वह उसके अधीन होता है अथवा कोई यदि
सूली पर चढ़ाने के लिये ले जाय तो वह उसकी भी आज्ञा में चलता रहता है। देह का अहंकार छोड़ देने के
कारण योगी को पराधीनता प्राप्त हुई रहती है। विश्व सभी दृष्टियों से मेरी आत्मा ही है वह समझ कर वह
सबके कहने के अनुसार चलता है। जो कुछ है वह सब मैं ही हूँ यह सोच कर वह साधक-बाधक का विचार न
कर, उसकी आज्ञा में संतोषपूर्वक रहता है। सुख या दुःख जो भी प्राप्त होगा वह भाग्य के अधीन रहता है, सब
लोग मेरी ही आत्मा है यह मान कर वह पराधीन होकर आचरण करता रहता है। सबमें मेरी आत्मा है यह जान
लेने पर उसे सहज ही पराधीनता प्राप्त होती है। यह 'परात्मता' मैंने वृक्ष से सीखी। वृक्ष से मैंने एक और गुण
सीखा है। वह गुण है अतिथि की पूजा करना। वृक्ष के पास यदि कोई अतिथि आता है तो वह उसे खाली हाथ
नहीं लौटाता। पान, फूल, फल, जड़, छाया, छाल, लकड़ी, कुछ न कुछ वह उसे देता ही है। जो वृक्ष का पालन
करता है या जो उसे काटता है, उन दोनों को ही वह समान रूप से पुष्पों से और फलों से सन्तुष्ट करता है। जिस
प्रकार वृक्ष अपना पूरा शरीर अतिथि पर खर्च कर सार्थकता प्राप्त करता है, उसी प्रकार साधु भी अपना चित्त,
वित्त, देह और शब्द सब कुछ अतिथि को अर्पण कर उसे सन्तुष्ट करता है। अतिथि को निराश न करना यही
साधु का अलौकिक गुण होता है। वह उसे अन्न, द्रव्य, जल आदि बड़े आनन्द से देता रहता है। याचक द्वार पर
आता है तो भले ही उसे अपना सर्वस्व देना पड़े लेकिन उसे खाली हाथ नहीं जाने देना है, यह विचार मैंने
आत्मबुद्धि से वृक्ष के पास सीखा। इस प्रकार पृथ्वी मेरी गुरु बनी। अब दूसरा गुरु वायु बना, उससे जो-जो
सीखने की इच्छा हुई वह भी सुनो, राजा ! वायु को गुरु पद प्राप्त हुआ वह दो प्रकार से। एक तो प्राणवायु के
द्वारा और दूसरा बाह्य वायु के द्वारा।
प्राणवृत्त्यैव संतुष्येन्मुनिर्नैवेन्द्रियप्रियैः ।
ज्ञानं यथा न नश्येत नावकीर्येत वाङ्मनः ॥ ३९ ॥
जो प्राण की ही तरह विषय की आसक्ति नहीं रखता या विषय सेवन करने के बाद भी जिसे अहंकार, नहीं
उत्पन्न होता, उसी प्रकार उसे अहंकार नहीं होता। प्राणों की हलचल से क्षुधा उत्पन्न होती है, उसके कारण प्राण
क्षुब्ध होता है, उससे काया, वाचा, मन और इन्द्रिय भी विगलित होते हैं। उस प्राण की रक्षामात्र के लिये कैसा भी
आहार क्यों न मिले, वह मधुर है या नहीं इसका भी प्राण विचार नहीं करता। उसी प्रकार योगी देह का अभिमान
नहीं करता, वह विषय सेवन करता है लेकिन उसमें उसे आसक्ति नहीं होती। भूख लगने पर पकवान मिले या
भूसा मिले, इसकी वह चिन्ता नहीं करता। ज्ञानधारणा कहीं ढल न जाये, इन्द्रियाँ विकल न हों इसलिये वह बहुत
सम्भल कर तथा धैर्यपूर्वक आहार करता है। प्राण के ही कारण इन्द्रियाँ सशक्त रहती हैं, प्राण के ही योग से देह
चलता है, लेकिन प्राणकर्म में देह लिप्त नहीं होता। वह अलिप्त होकर ही चलता रहता है। उस प्राण की ही तरह
योगी की स्थिति रहती है। सब कुछ करने पर भी उसकी किसी में आसक्ति नहीं रहती। इसलिये उसे देहस्थिति
का स्पर्श नहीं होता। ब्रह्मादिकों का देह सुन्दर है इसलिये उसका पालन किया जाय और सुअर आदि के देह से
परहेज किया जाय ऐसी अस्पृश्यता प्राण दयालु तथा समदृष्टि होने के कारण नहीं करता। उसी प्रकार योगी का
मन, यह कर्म उच्च है और यह कर्म नीच है ऐसी भावना नहीं रखता। राजा के शरीर का प्रेम से संपादन किया जाय
और भिखारी का देह छोड़ दिया जाय ऐसी कुंठा प्राण कभी नहीं करता। उसका समभाव सदा शुद्ध ही रहता है।
प्राण, अपान, समान, उदान अथवा अणु-रेणु में बसे व्यान इतने नाम और उसके इतने स्थान होते हुए भी प्राण
अपना एकत्व नहीं छोड़ता। उसी प्रकार ऊँच-नीच वर्णावर्ण देख अथवा उत्तम अधम आदि गुणावगुण देखकर

सातवाँ अध्याय १८१
योगी अपना सर्वत्र समभाव कभी नहीं छोड़ते। प्राण यथार्थ में देह के भीतर रहते हुए भी बाह्य वायु से भेदभाव
नहीं करता। इसी प्रकार योगी में भी अंतर्बाह्य एक ही भावना होती है।
विषयेष्वाविशन् योगी नानाधर्मेषु सर्वतः।
गुणदोषव्यपेतात्मा न विषज्जेत वायुवत्॥ ४० ॥
पार्थिवेष्विह देहेषु प्रविष्टस्तद्गुणाश्रयः।
गुणैर्न युज्यते योगी गन्धैर्वायुरिवात्मदृक् ॥ ४१ ॥
चतुर पुरुष को इस वायु की तरह दोहरी एकता साधनी चाहिये। अंतर्बाह्य सदा एक से एकभाव से व्यवहार
करना चाहिये। अब तक तुम्हें प्राणवृत्ति के सारे लक्षण बताये। अब बाह्य वायु के लक्षण भी ध्यान देकर सुनो।
वायु सबको स्पर्श करके जाता है, लेकिन कहीं भी फँस कर नहीं रहता। उसी प्रकार योगी भी विषय सेवन करते
हुए किसी में आसक्त नहीं होता। वह इन्द्रियों की संगति में रहकर भले ही विषय में खेलता रहता हो लेकिन
गुणदोषों की आसक्ति से उसके ज्ञान में कोई खराबी नहीं आती। वस्त्र, चन्दन, स्त्री अथवा सुवासिक पुष्पों की
मालायें आदि विलास की वस्तुओं का वह भले ही उपभोग करता हो, लेकिन जिस प्रकार वायु जल में नहीं
रुकता उसी प्रकार योगी भी विषय से अलिप्त ही रहता है। जिस प्रकार वायु से जाल उड़ता रहता है किन्तु वायु
जाल में नहीं फँसता, उसी प्रकार अनेक भोग भोगते हुए भी योगी उस भोग में नहीं फँसता। वायु से भेंट करने
अनेक प्रकार के सुगन्ध आते हैं, लेकिन मन में उसके प्रति आसक्ति न रख वह तत्काल उन्हें छोड़कर आगे बढ़
जाता है। उसी प्रकार आत्मस्वरूप से योगी भी समस्त देह में प्रविष्ट रहता है इसलिये उस देह के गुणों का
आश्रय वह उक्त स्थान में लेता रहता है। जिस प्रकार सुगन्ध पर वायु खेलती रहती है फिर भी वह सुगन्ध को
स्पर्श नहीं करती, उसी प्रकार आत्मदृष्टि के सामर्थ्य से वह देह के गुणों में लिप्त नहीं होता। राजा ! तुम्हें यह
परिपूर्ण आत्मस्थिति बताता हूँ, सुनो। जिस प्रकार आकाश सभी पदार्थों से अलिप्त है ऐसा अनुभव होता है, उसी
प्रकार यह स्थिति है।
अन्तर्हितश्च स्थिरजङ्गमेषु ब्रह्मात्मभावेन समन्वयेन।
व्याप्त्याव्यवच्छेदमसङ्गमात्मनो मुनिर्नभस्त्वं विततस्य भावयेत्॥ ४२ ॥
आकाश निर्मल, अभेद्य, अलिप्त तथा सभी पदार्थों के साथ समभाव रखने वाला है इसलिए मैंने आकाश
को गुरु बनाया। वह विषम में होते हुए सम, संग में होते हुए भी असंग तथा भेद करने पर भी उसका अभेद नहीं
टूटता, इसलिये आकाश को गुरु बनाया है। साँप और नेवला में बैरभाव है लेकिन दोनों के ही हृदय में आकाश
तो है ही। बैर और निर्बैर यह आकाश नहीं जानता, वैसी ही स्थिति आकाश की होनी चाहिये। आकाश की ही
तरह योगी भी अपने परिपूर्ण व्यापक रूप से ब्रह्म की भावना से ही स्वयं को देखता रहता है। ब्रह्मसमन्वय से
देखने पर स्थावर जंगम सब जगह मैं ही भरा हुआ हूँ, मेरे सिवाय तिलमात्र की भी जगह नहीं बची है, ऐसा उसे
दिखायी देने लगता है। आकाश तो सभी पदार्थों में रहता है लेकिन वह सबको नहीं दिखायी देता। उसी प्रकार
योगी भी दृश्य और द्रष्टा इसके पार की स्थिति में विचरता रहता है। बरछे-भाले से आकाश में छिद्र नहीं होता,
अथवा ज्वालाग्नि से वह नहीं जलता, ज्वाला से अलग न होने पर भी वह जैसा का तैसा दिखाई देता है। उसी
प्रकार योगी के लिये भी सारे द्वंद्व किसी भी काल में बाँध नहीं सकते। द्वंद्व से विलग न होते हुए भी वह
शोभायमान रहता है। योगी पर भले ही शस्त्रों से आक्रमण किया जाय लेकिन उन शस्त्रों में वह स्वयं को ही

१८२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
देखता है। इसलिये जिस प्रकार आकाश को घाव नहीं लगता उसी प्रकार उसे भी घाव नहीं लगता। जो भी द्वंद्व
उसे बाधा करने आता है, वह सब मेरा ही स्वरूप है ऐसा उसे लगने लगता है इसलिये सहज ही द्वंद्वभाव दूर
होकर अबाधित निजरूप ही शेष रह जाता है। आकाश जलाशय में डूबा दिखायी देता है लेकिन जैसे वह पानी
से गीला नहीं होता उसी प्रकार योगी समस्त देह में रहते हुए भी उससे अलिप्त रहता है। आकाश में कीचड़
लगाने का प्रयास करने से वह आकाश में नहीं लगता बल्कि लगाने वाले को ही गन्दा कर देता है। उसी प्रकार
जो योगी को दोष लगाता है वही दोष का भागी होता है। आकाश सारे जनों पर फैला रहता है लेकिन उनके
घर्षण से वह मैला नहीं होता। उसी प्रकार योगी भी सारे कर्म कर कर्मठ होकर कभी मलिन नहीं होता। आकाश
को कपड़े में बाँधने जाओ तो चारों छोर खाली रहते हैं उसी प्रकार कर्म से योगी को बद्ध करने का प्रयास करने
से वह कर्म ही निष्कर्म हो जाता है। घट में जो आकाश रहता है उसे 'घटाकाश' कहते हैं। यथार्थ में घट के
भीतर और बाहर आकाश पूरी तरह व्याप्त रहता है। उसी प्रकार आत्मा देह के भीतर है ऐसा कहते हैं, लेकिन
वह देह के बाहर भी रहता है। देह मिथ्या है लेकिन चैतन्यस्वरूप परिपूर्ण है।
तेजोऽबन्नमयैर्भावैर्मेघाद्यैर्वायुनेरितैः।
न स्पृश्यते नभस्तद्वत् कालसृष्टैर्गुणैः पुमान् ॥ ४३॥
पृथ्वी की धूल से आकाश गन्दा नहीं होता, पानी के कारण वह गीला नहीं होता, अग्नि की ज्वाला से वह
जलता नहीं है अथवा वायु के बल से वह उड़ता नहीं है। जब बादलों की गड़गड़ाहट होती है तो आकाश ढँक
जाता है लेकिन उसमें से किसी को भी वह स्पर्श नहीं करता, अपने अलिप्त होने की सामर्थ्य से वह यथावत
रहता है। उसी प्रकार योगी भी आत्मस्वरूप की समरसता में होने के कारण कालनिर्मित गुणों के वश में नहीं
होता। काल की सामर्थ्य अपार है वह शरीर में जरामरण का प्रादुर्भाव करता है लेकिन योगी स्वयं देहातीत होने
के कारण जन्म-मरण का विचार नहीं करता। स्वप्न में यदि चिन्तामणि प्राप्त हो जाय और वह तभी किसी कुएँ
में गिर जाय तो नींद खुलने पर वह उसके खोने की बात नहीं करता। उसी प्रकार योगी का देहसंग होता है।
ब्रह्मदेवादि के देह को भी जो काल खा जाता है वह भी योगियों के चरणों का वन्दन करता है क्योंकि योगी काल
की भी आत्मा होने के कारण स्वयं काल का महाकाल होता है। बिजली आकाश में गड़गड़ाहट उत्पन्न कर अपने
तेज से आकाश को प्रकाशित करती है लेकिन भीतर और बाहर आकाश होते हुए भी वह उसमें लिप्त नहीं होता।
उसी प्रकार सत्त्वगुण ज्ञान का प्रकाशक है लेकिन योगी उसे भी स्पर्श नहीं करता इसे ध्यान में रखो। वह स्वयं
शुद्धज्ञानस्वरूप ही रहता है इसलिये वह बौद्धिक ज्ञान नहीं लेता। सूर्य का उदय होते ही दीपक के प्रकाश का
कोई उपयोग नहीं होता उसी प्रकार 'सहजज्ञान' प्राप्त होने पर बौद्धिक ज्ञान को कौन पूछेगा? सत्त्व से जो ज्ञान
उत्पन्न हुआ रहता है वह भी इच्छापूर्वक नहीं ग्रहण करता अथवा रजोगुण का प्रभाव बढ़ने पर भी उसमें कर्मठता
नहीं आ पाती। तमोगुण के प्रभाव से वह क्रोध मोह के वश में नहीं होता। ज्ञान के कल्लोल तथा आत्मानन्द से
वह अपने आप गुणातीत हुआ रहता है। अवधूत ने कहा, "हे राजकुमार, यदुवीर ! अब उदक को गुरुपद कैसे
प्राप्त हुआ यह बताता हूँ। ध्यानपूर्वक उसके लक्षण श्रवण करो।"
स्वच्छः प्रकृतितः स्निग्धो माधुर्यस्तीर्थभूर्नृणाम्।
मुनिः पुनात्यपां मित्रमीक्षोपस्पर्शकीर्तनैः ॥ ४४॥
उदक के लक्षणों के बारे में विचार करें तो वह स्वभाव से ही अत्यन्त निर्मल रहता है और उसके गुण धर्म

सातवाँ अध्याय १८३

के अनुसार वह सबको कोमल और मधुर मालूम होता है। प्राणि पवित्र हो सके इसीलिये तीर्थ स्थानों में जल में
पवित्रता होती है। योगियों के शरीर में भी रात दिन इतने लक्षण होने चाहिये। मैले शरीर से जो भी कोई जल में
प्रवेश करता है उन्हें वह अपने स्वभाव धर्म से निर्मल कर छोड़ता है। लेकिन मैंने इन सबका मैल साफ किया
ऐसा अहंकार वह मन में नहीं रखता। उसी प्रकार योगी भी केवल भक्ति से भजन में लगे भक्त लोगों के,
कलिकालजन्य पापों का विनाश करके भी गुरुत्व का अहंकार नहीं धरते। उससे जो भी कोई मिलता है, उसके
साथ उसका व्यवहार इतना कोमल रहता है कि भले ही उसके प्राण चले जाएँ लेकिन उसके मन में प्राणिमात्र के
प्रति कठोरता नहीं उत्पन्न होती। चकोर के लिये जिस प्रकार चन्द्र किरण है अथवा पक्षी के बच्चों के लिये उसकी
माताओं के पंख हैं या जीवों के लिये जीवन है, उसी प्रकार उसकी सबके प्रति मृदुता रहती है। उदक केवल
बाह्य मल को स्वच्छ करता है लेकिन योगी यह अंतर्बाह्य दोषों का क्षालन कर उसे भीतर और बाहर से शुद्ध
करता है। उदक केवल एक ही बार सुखी करता है लेकिन योगी सभी काल सुख प्रदान करता है। उदक का
सुख रहता ही कितना है? क्षणभर के बाद पुनः प्यास लगती है किन्तु योगी आत्मानन्द से इस प्रकार तृप्त कर
देता है कि उस सुख में पुनः बाधा नहीं आती। उदक का माधुर्य केवल जिह्वा को ही मालूम होता है लेकिन योगी
का माधुर्य सारी इन्द्रियों को तृप्त कर देता है। योगी की मिठास एक बार मालूम हो जाय तो उसके आगे अमृत
का स्वाद भी फीका मालूम होता है। वह घड़ी आधी घड़ी में ब्रह्मदेव अथवा इन्द्र के पदों को भी ठुकरा देती है।
धूप से संतप्त लोग जब जल के पास आते हैं तो वह अपने स्पर्शमात्र से उन्हें शीतल कर छोड़ता है। योगी की
स्थिति भी वैसी ही है। वह भी अपने स्पर्श से सबका ताप दूर करता है। उदक जिसे शान्त करता है, उसे पुनः
ताप होता ही है लेकिन योगी कृपा करके जिसे स्पर्श करता है, वह त्रिविध तापों से भी मुक्त हो जाता है। योगी
जिसका ताप हरते हैं उसे जीवनपर्यन्त पुनः ताप नहीं होता। वह शान्ति में ही रम जाता है और स्वानुभव में डोलता
है। मेघ के मुख से उदक का अधःपतन होता है और उसके नीचे आने से ही सारे लोग शान्त होते हैं और उन्हें
अन्नदान भी मिलता है। योगी इस लोक में इसीलिये जन्म लेते हैं कि लोग श्रवण-कीर्तन से तृप्त हो जाएँ और
आत्मज्ञान से उनका उद्धार हो सके। पर्जन्य का जल देखते ही जिस प्रकार सब लोग प्रसन्न हो उठते हैं अथवा
गंगादि तीर्थों का दर्शन करने से जिस प्रकार पापों का क्षालन होता है, उसी प्रकार योगियों का दर्शन भी बिना
भाग्य के नहीं होता। उसके चरणों का जो दर्शन करता है वह भवरोगों से मुक्त हो जाता है। उसका दर्शन या
स्पर्श न हो सके तो उसका नामस्मरण करना चाहिये ताकि केवल उतने से ही वह नाम संसार के मूल में छिद्र
कर देगा। भगवान का कीर्तन करने के बजाए भक्त का नामस्मरण करने से संसार बन्धन कैसे टूटेगा यह नहीं
पूछना चाहिये। सच तो यह है कि भगवान का कोई नाम ही नहीं होता। भक्तों ने उसकी प्रतिष्ठा के अनुरूप उसे
नाम, रूप आदि विलास अर्पित किये हैं। इस प्रकार भक्तों ने ही भगवान की प्रतिष्ठा बढ़ायी और उसे वैकुंठ में
बैठाया। ऐसे भक्त के उपकार से ही वह झुक जाता है और उसकी आज्ञा में रहता है। भक्त के वचन के अनुसार
भगवान न नर है न सिंह है, ऐसा रूप धारण कर वह खम्भे में से प्रकट हुआ और उसने भक्त का वचन सच कर
दिखलाया। आज भी इस बात का प्रमाण है कि वह ज्ञानानंदघन भगवान अपने भक्तों के वचन के अनुसार पाषाण
में भी प्रकट होता है। भक्तों के प्रेम से भगवान झुक जाता है, भक्तों का वचन वह तोड़ नहीं सकता। इसलिये
जहाँ भक्त का नाम आता है वहाँ भगवान दौड़ कर आता है। भक्त के उपकार का ऋण चुकाने के लिये उसे
तत्काल दौड़ कर आना पड़ता है। यह कहते समय अवधूत का प्रेम भी उफनने लगता है। इसके बाद का गुरु
अग्नि है, उसके भी लक्षण बताता हूँ। उन्हें कर्ण और मन को एकत्र लाकर सुनो।

१८४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तेजस्वी तपसा दीप्तो दुर्धर्षोदरभाजनः।
सर्वभक्षोऽपि युक्तात्मा नादत्ते मलमग्निवत्॥ ४५॥
अग्नि अपने स्वयंभू तेज से ही देदीप्यमान रहता है। उसे हाथ में पकड़ना सम्भव नहीं है, लेकिन वही
अग्नि सबके पेट में उपस्थित रहकर अपने तेज से सब कुछ भक्षण कर लेता है। उसी प्रकार योगी भी
भगवद्भाव से दीप्त होने के कारण, देवादि भी उसे नहीं पकड़ पाते। जिस प्रकार हाथ में अंगार रखना कठिन है
उसी प्रकार योगी को पकड़ना भी अत्यन्त कठिन है। माया भी अपने गुणों से उस पर काबू नहीं पा सकती।
अग्नि के लिये जिस प्रकार मुख यही एक पात्र रहता है, उसी प्रकार योगी का एकमात्र पात्र उदर ही होता है।
किसी विशिष्ट निधि को रखने के लिये उसके पास पात्र ही नहीं होता। अग्नि जो कुछ भी सेवन करता है, उसे
वह जलाकर अपने ही जैसा कर डालता है। इसी प्रकार योगी सब कुछ भक्षण करता है लेकिन मलिनता को
स्पर्श नहीं करता। सुगन्ध से युक्त चन्दन की लकड़ी हो, अथवा दुर्गन्धयुक्त कोई अन्य लकड़ी हो, नीम की
कडुई लकड़ी हो या गन्ने की लकड़ी हो, उनका आकार-विकार आदि सब कुछ जलाकर वह उन्हें अपने जैसा
बना देता है। उसी प्रकार योगी जिस वस्तु को स्वीकार कर लेता है, उसकी ओर वह पहले आत्मदृष्टि से देखता
है, उसके सारे दोष दूर कर फिर उन पदार्थों को आत्मभाव से स्वीकार करता है। जिस भोग्य पदार्थ का भोग
करने के लिये वह जाता है, वहाँ वह स्वयं को ही देखता है इसलिये भोक्ता भी तद्रूप ही हो जाता है। यही योगी
का भोग है। अग्नि में जो मैली वस्तु पड़ती है वह अग्निमुख से निर्मल ही हो जाती है। उसी प्रकार योगी भी जो
थोड़ा-बहुत सेवन करता है वह परमपवित्र ही हो जाता है। अग्नि के मुख में आहुति पड़ने से यज्ञ होता है और
उस कर्म से स्वर्ग प्राप्त होता है लेकिन योगी के मुख में जो पड़ता है उससे आत्मपद ही प्राप्त होता है। हे राजा!
अग्नि का एक और भी लक्षण है। वह भी ठीक से सुन लो। वही साधक का साधन और सिद्धों का लक्षण है।
क्वचिच्छन्नः क्वचित्स्पष्ट उपास्यः श्रेय इच्छताम्।
भुङ्क्ते सर्वत्र दातॄणां दहनप्रागुत्तराशुभम् ॥ ४६ ॥
होमकुण्ड में दबाया हुआ अग्नि भीतर तेजस्वी होता है किन्तु ऊपर से राख से ढँका रहता है, अथवा
यज्ञशाला में उसे प्रज्ज्वलित कर याज्ञिक लोग बड़ा यज्ञ भी करते हैं। उपासक के मन में जैसी भावना रहती है,
वैसा श्रेय वह उसके लिये उत्पन्न करके देता है और पहले के सारे पापों को जलाकर हवि ग्रहण करता है। उसी
प्रकार योगी की लीला भी भक्तों के नेत्रों में प्रकट होती है। किसी से वह बिल्कुल गुप्त रहता है, आँखों से
दिखायी भी नहीं देता। ऐसे लोगों की जगह लोग भक्ति के बल पर जो भी अर्पण करते हैं उससे मुमुक्षुओं को
मोक्ष प्राप्त होता है। योगी के मुख में उसके पड़ते ही सारे संचित सुख-दुःखों को जलाकर उसे आत्मपद दिला
कर सुखी करता है। हे राजा! जिसके योग से सगुण और निर्गुण समभाव से एकरूप दिखायी देते हैं ऐसे अग्नि
का एक और लक्षण तुम्हें बताता हूँ।
स्वमायया सृष्टमिदं सदसल्लक्षणं विभुः।
प्रविष्ट ईयते तत्तत्स्वरूपोऽग्निरिवैधसि ॥ ४७॥
स्वभावतः अग्नि निराकार ही है। लकड़ियाँ लम्बी, टेढ़ी, गोल, बड़ी या छोटी जिस आकार की होती हैं
उसी आकार का वह मालूम होता है। भगवत्स्वरूप की जाति भी वैसी ही है। स्वमाया की कल्पना से ही
आकृतियों का निर्माण कर वह उसमें सहज रूप से घुसा रहता है इसलिये अनेक रूपों में भासित होता है। जिस

सातवाँ अध्याय १८५
प्रकार गंगा का जल एक ही होते हुए भी, भँवरा, तरंग आदि विभिन्न स्वरूपों में भासमान होता है। अथवा मण्डप
के छायाचित्र बत्तियों के प्रकाश से ही निर्मित होते हैं। राम, रावण आदि नामों से लोगों को परदे पर नाट्याभिनय
करके दिखलाते हैं। उसी प्रकार नाना प्रकार के प्राणी, नाना प्रकार के मत, नाना प्रकार की आकृतियाँ दिखायी
पड़ती हैं, उन सब में श्रीहरि ही प्रवेश कर सहज रीति से उन्हें नचाता रहता है। योगी की स्थिति भी वैसी ही
रहती है। नाना प्रकार के आकार और व्यक्ति दिखायी पड़ने पर भी वह उन सब में समदृष्टि से स्वयं को ही
देखता है इसलिये उसे किसी प्रकार भ्रम नहीं होता। वह जो भी कुछ देखता है वह सब वह स्वयं ही रहता है
ऐसी मीमांसा अवधूत ने हाथ उठा कर की। जन्म और मृत्यु इस देह का ही होता है, आत्मा यह नित्य और
अविनाशी है यह निश्चय चन्द्रमा को गुरु बना कर दृढ़ कर लिया।
विसर्गाद्याः श्मशानान्ता भावा देहस्य नात्मनः।
कलानामिव चन्द्रस्य कालेनाव्यक्तवर्त्मन ॥ ४८ ॥
शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष के योग से चन्द्रमा की कलाएँ बढ़ती हैं और घटती हैं लेकिन मूल चन्द्रमा को
वृद्धि या क्षय नहीं होता। वैसी ही स्थिति सच्चे योगी की रहती है। जन्म, मृत्यु आदि जो छह विकार हैं वे
सचमुच देह के ही लिये हैं। आत्मा स्वरूप से ही अविनाशी निर्विकार, अनंत और अमर है। घट स्वाभाविक रूप
से ही नाशवान है, लेकिन उसमें चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब रहता है, उसी प्रकार अशाश्वत में शाश्वत दिखाई देता है,
लेकिन उसे नश्वर का विकार नहीं लगता। घट के साथ चन्द्रमा की उत्पत्ति नहीं होती किन्तु घट के विनाश के
साथ चन्द्रमा का विनाश नहीं होता। चन्द्रमा अपनी सहज स्थिति के अनुसार नाश तथा उत्पत्ति रहित ही होता है।
उसी प्रकार योगी आत्मस्वरूप होने के कारण देह के साथ जन्म नहीं लेता और न देह के साथ उसका विनाश
होता है। वह अखण्ड रूप से परिपूर्ण ही रहता है। काल की गति अत्यन्त गहन है। उसी के कारण नाश और
उत्पत्ति हुई दिखाई पड़ती है। लेकिन काल का यह प्रभाव शरीर पर है, आत्मस्थिति पर वह लागू नहीं होता।
सारांश यह कि काल का सामर्थ्य अगाध है यह जो कहा जाता है वह देह के कारण ही। आत्मस्थिति की ओर
देखा जाए तो वहाँ काल रहता ही नहीं है। काल की सूक्ष्म गति का विवेचन करते हुए अवधूत को सहसा स्मरण
हुआ और उसने सिंहावलोकन करते हुए अग्नि का पुनः उदाहरण दिया।
कालेन ह्योघवेगेन भूतानां प्रभवाप्ययौ।
नित्यानापि न दृश्येते आत्मनोऽग्नेर्यथार्चिषाम् ॥ ४९ ॥
उस काल की नदी की गति अत्यन्त प्रचण्ड है। उसकी गति अत्यन्त सूक्ष्म है। उसमें प्राणीरूप तरंगें उठती हैं
और टूटती हैं लेकिन यह जगत को दिखायी नहीं देता। इस नदी में जरा से जर्जर हुए लोगों का कचरा तैरता रहता
है और षड्विकाररूप भयंकर भँवरे उसमें घूमते रहते हैं। बाह्य और युवावस्था की उछाल चलती रहती है। वार्धक्य
का जल मन्द गति से बहता रहता है और जन्म-मरण की लहरें उछल-उछल कर शोर मचाती रहती हैं। प्रवाह की
धारा के प्रहार से जीवन के बुर्ज ढहते हैं। स्वर्गादि मन्दिर तोड़कर शिखरों पर स्थित इन्द्रों को भी वह प्रवाह वेग
नीचे गिराता है। यही जल पाताल में प्रवेश करता है और सर्पों का संहार कर उनकी हड्डी-पसली एक कर देता है।
काल के ऐसे प्रवाह में भूत तरंगों का बनना-टूटना रात-दिन निरन्तर चलता रहता है। लेकिन मजे की बात है कि
यह सब किसी के ध्यान में नहीं आता। महाप्रलय के समय जब प्रलयमेघों की गर्जना होती है, तो उस समय भयंकर
बाढ़ आती है और उसमें ब्रह्मदेवादि अनेक बड़े-बड़े वृक्ष टूट कर, जड़ के साथ उखड़ कर बह जाते हैं। वहाँ काल

१८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
भी प्रवेश नहीं कर पाता। सब कुछ अकस्मात ही हो जाता है। कालरूप इस नदी की जाति बड़ी विचित्र है। अत्यन्त
सूक्ष्म होने के कारण उसका निश्चित स्वरूप ध्यान में नहीं आ पाता। उस सूक्ष्म गति की यथार्थ स्थिति अब जान
लो। कहते हैं दीप वही है लेकिन उसकी शिखा क्षण प्रतिक्षण विलय होती है और दूसरी उत्पन्न होती है। लेकिन
यह सूक्ष्म बात लोगों की समझ में नहीं आती और अन्त में वह दीप बुझ जाता है। नदी का पानी जो प्रतिक्षण बहता
रहता है वह भी सदा नया ही रहता है लेकिन अनाड़ी लोग सारा पानी एक ही समझते हैं। उसी प्रकार काल की गति
सब की समझ में नहीं आती। यदि देह को ही देखा जाय तो काल उसे ग्रसता ही रहता है। बाल्य, कौमार्य अथवा
युवावस्था में काल भी निकट ही रहता है लेकिन कोई उसे नहीं देखता। इसीलिये मैंने काल सूर्य को गुरु बनाया।
उससे मैंने क्या सीखा यह भी सुन लो।
गुणैर्गुणानुपादत्ते यथाकालं विमुञ्चति।
न तेषु युज्यते योगी गोभिर्गा इव गोपतिः ॥५०॥
सूर्य धीरे-धीरे अपनी किरणों से रसों के साथ पृथ्वी पर के समुद्र आदि का पानी सोख लेता है और वही
बरसात में उस जल की वृष्टि कर लोगों को अनेक प्रकार से तृप्त कर देता है। किन्तु सूर्य अपने किरणों से जो
शोषण क्रिया करता है वह किसी की समझ में नहीं आती फिर भी मेघों के द्वारा वृष्टि कराकर वह समस्त लोगों
के साथ पृथ्वी को शीतल कर देता है। योगियों की बात भी वैसी ही है। वह थोड़ा बहुत जो किसी से लेता है
उसका कल्याण करने के लिये हजार प्रकार से उसके मनोरथ पूरे करता है। आत्मानन्द में निमग्न योगी जिस
किसी का भी कुछ सेवन करते हैं, उनके सारे मनोरथ परिपूर्ण होते हैं और अन्त में वे उन्हें निष्काम कर
विश्रामस्थल तक ले जाते हैं। इस प्रकार योगी अपने योगबल से इन्द्रियों के द्वारा विषयों का सेवन करते रहते हैं।
उन्हें यदि कोई कुछ देता है तो वह योग्य समय पर कृपा के बल से सन्तुष्ट कर देते हैं। उनमें विषय देते समय
या लेते समय किसी प्रकार की आसक्ति नहीं होती। जल का शोषण करते समय या वर्षा के रूप में उसे वापस
करते समय सूर्य जिस प्रकार अलिप्त रहता है उसी प्रकार वे भी अलिप्त रहते हैं।
बुद्धयते स्वेन भेदेन व्यक्तिस्थ इव तद्गतः।
लक्ष्यतेस्थूलमतिभिरात्मा चावस्थितोऽर्कवत् ॥५१॥
जलाशय में सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखायी देता है इसलिये मूढ़ लोग कहते हैं कि सूर्य जलाशय में डूब गया।
यदि उसमें का पानी हिलता है तो समझते हैं कि सूर्य ही हिल गया और यदि जल गन्दा होता है तो मानते हैं कि
सूर्य गन्दा हो गया। लेकिन सूर्य उस जलाशय का स्पर्श भी नहीं करता और आकाश में निर्बाध रूप से रहता है,
उसी प्रकार योगी की योग्यता देहकर्म में रहते हुए भी देहातीत रहती है। लोग कहते हैं कि देहबुद्धि के छंद से
योगी देह में विचरण करता है। उसी प्रकार वह देह के अनेक प्रकार के बन्धनों से बँधा रहता है, ऐसा भी वे
अपनी स्वबुद्धि से कहते हैं। उसमें देह का मिथ्याभिमान रहता है। योगी का यह गुह्यज्ञान किसी की समझ में
नहीं आता। रस्सी के साँप ने क्या किसी को काटकर मारा है? उसी प्रकार आत्मा चिदाकाश में रहते हुए मिथ्या
देह में मिथ्या रूप से ही प्रतिबिम्बित होकर देहकर्म को दर्शाता है, इसीलिये वह कर्म उसे बाधक नहीं होता।
अपना प्रतिबिम्ब वह जल में देखता है लेकिन यह नहीं कहता कि मैं जल में डूब गया हूँ। उसी प्रकार वह देह
से भिन्न है, इसका जिसे पक्का ज्ञान हो गया है वह देहकर्म से नहीं डरता। मृगजल की बाढ़ देखकर जो नाव
पकड़ने के लिये दौड़ पड़ते हैं,वे मूर्ख हैं। उसी प्रकार संसार खुद ही मिथ्या है। मूर्ख उसे भयंकर समझता है

सातवाँ अध्याय १८७
इसलिये घरबार, स्त्री, बच्चे, जमीन-जायदाद आदि पर अधिक प्रेम करना ही नहीं चाहिये। इसलिये अवधूत राजा
को कपोतपक्षी की कथा सुनाने लगे।
नातिस्नेहः प्रसंगो वा कर्तव्यः क्वापि केनचित्।
कुर्वन् विन्देत संतापं कपोत इव दीनधीः ॥ ५२ ॥
संसार दुःख का मूल कारण है, स्त्री की आसक्ति ! जहाँ स्त्री के प्रति लंपटता का जोर अधिक रहता है,
वहीं सारा दुःख रहता है। स्त्री से पुत्र होते हैं और उन पर विचित्र मोह जड़ता है। इसलिये सांसारिक लोग दुःख
के पात्र बनते हैं। आसक्ति और मोहजाल से मनुष्य पराधीन होकर पग-पग पर विलक्षण दुःख भोगते रहते हैं।
इसलिये किसी को किसी के प्रति आसक्ति अथवा स्नेह नहीं रखना चाहिये। जिसने अतिस्नेह किया उसे दुःख
भोगना ही पड़ेगा। हे राजेश्वर ! स्नेह और दुःख का परिणाम मालूम हो इसलिये तुम्हें कपोत-कपोती की कथा
सुनाता हूँ, उसे शांतचित्त होकर सुनो।
कपोतः कश्चनारण्ये कृतनीडो वनस्पतौ।
कपोत्या भार्यया सार्धमुवास कतिचित्समाः ॥ ५३ ॥
एक वन में एक कपोत पक्षी रहता था। वह कपोती के प्रेम से अत्यन्त क्षुब्ध हुआ। स्त्री सुख की लालसा
से उसने एक कठिन पेड़ देखकर उस पर अपना घरौंदा बनाया। वन में विहार करने वाले उस कपोत ने स्त्री के
मोह में पड़कर अपनी स्त्री की संगति में काफी समय व्यतीत किया।
कपोतौ स्नेहगुणितहृदयौ गृहधर्मिणौ।
दृष्टिं दृष्ट्याऽङ्गमङ्गेन बुद्धिं बुद्ध्या बबन्धतुः ॥ ५४ ॥
कपोत और कपोती का परस्पर बहुत प्रेम था। उनका वह प्रेम निरन्तर बढ़ता ही गया। हृदय में नित नयी
आसक्ति उत्पन्न होने लगी। वे कामुक दृष्टि से एक दूसरे की ओर देखते, अनेक प्रकार की कामचेष्टाएँ करते,
एक दूसरे को प्रेम से सहलाते, एक दूसरे को गले लगाते। तन से या मन से एक दूसरे को अलग न होते, दोनों
दो शरीर एक प्राण बनकर रहते, खाना-पीना साथ-साथ। ऐसा निरन्तर चल रहा था।
शय्यासनाटनस्थानवार्ताक्रीडाशनादिकम्।
मिथुनीभूय विस्रब्धौ चेरतुर्वनराजिषु ॥ ५५ ॥
खाते समय उन्हें जो वस्तु अत्यन्त प्रिय लगती उसे वे एक-दूसरे को खिलाते। कपोत बड़े कष्ट से जो
चीज ले आता उसे वह प्यार से अपनी स्त्री को देता। स्त्री को छोड़कर वह कहीं नहीं जाता था। एक दूजे का
हाथ थामकर वे भीतर-बाहर टहलते। वे सदा एकान्त में बैठते, दोनों एक ही जगह रहते, नाना प्रकार की क्रीड़ा
करते, नाना प्रकार के बिहार करते और आनन्दपूर्वक अनेक प्रकार के खेल खेलते। स्त्रियाँ जब एकान्त में होती
हैं तो बड़ी मीठी बातें करती हैं, पति के मन में सास-ससुर के सम्बन्ध में विकल्प भर देते हैं, देवर-भाभी की
निन्दा करती हैं और मीठी बातों से पति को भुलावा देती हैं। खैर! वे एक ही आसन पर बैठते, एक-दूसरे से
टिक कर बैठते और रात-रात भर एक ही शय्या पर सोते। इस प्रकार स्त्री समागम सुख पर विश्वास कर वे
अपने हित-अहित को भूल गये। गृहिणी के वैभव में ही वह नाचने लगा। वन उपवन में उनका समागम होता
था। घरौंदा केवल नाम मात्र के लिये था। विषय विलास सब कुछ वन में ही होता था।

१८८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
यं यं वाञ्छति सा राजंस्तर्पयन्त्यनुकम्पिता।
तं तं समनयत्कामंकृच्छ्रेणाप्यजितेन्द्रियः ॥ ५६ ॥
प्राणों से भी मूल्यवान् जो कुछ भी वह माँगती, उसे वह काममोहित होकर अत्यधिक परिश्रम करके देता
था। उसकी इच्छा भाँप कर ही वह उसे उसकी इच्छित वस्तु ला देता था फिर माँगने पर क्या कहना ? अपने को
बेचकर भी वह उसके लिये ले आता। धर्म का स्मरण नहीं, गरीब पर दया करना तो मालूम नहीं, जो भी कृपा
करता वह केवल स्त्री पर। शक्कर पर बैठी हुई मक्खी मारने पर भी नहीं उड़ जाती उसी प्रकार विषय का भोग
करते समय वृद्धावस्था की तथा मृत्यु भी याद नहीं रहती। सत्यवादी लोग जिस प्रकार पूर्वजों के दिये वचन का
पालन करते हैं, उसी प्रकार कामीजन स्त्रीसुख में बाधा नहीं आने देते। जिस प्रकार कामोपासक की सर्वत्र
एकात्मता होती है, उसी प्रकार संसार में स्त्री के अतिरिक्त उसे कुछ भी नहीं दिखायी देता।
कपोती प्रथमं गर्भं गृह्णती काल आगते।
अण्डानि सुषुवे नीडे स्वपत्युः संनिधौ सती ॥ ५७ ॥
वैसे ही लाडली पत्नी, तिस पर वह गर्भवती हुई, फिर क्या पूछने ? धन के लालची को जैसे एकाएक धन
की पेटी मिल जाय, उसी प्रकार वह उसके गर्भ का कुछ ज्यादा ही कौतुक करने लगा। दारू पीकर वह बन्दर
जिस प्रकार मस्त होकर नाचने-डोलने लगता है उसी प्रकार वह गर्भ का कौतुक करने लगा। गर्भिणी के सारे
मनोरथ उसने पूरे किये और प्रसूति काल आने तक वह उसी के लाड़-प्यार में खेलता रहा। इतने में अपने घरौंदे
में प्रसूत होकर उसने अण्डे दिये। उसके प्रसूत होने की वार्ता सुनकर उसकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा।
तेषु काले व्यजायन्त रचितावयवा हरेः।
शक्तिभिर्दुर्विभाव्याभिः कोमलाङ्गतनूरुहाः ॥ ५८ ॥
हरि की माया अघटित को घटित करने वाली है। वह दुर्गम होने के कारण उसकी लीला साक्षात ब्रह्मदेव
की भी समझ में नहीं आती। उस देवमाया ने अण्डे में अवयवों की रचना की। पहले उस अण्डे में केवल रस
भरा हुआ था। हरि की माया से उसी में नाखून, पंख, चोंच तथा नेत्रों के द्वार खुलकर चमत्कार हुआ।
अण्डे अपने आप फूटे और उसमें से नन्हें-नन्हें कोमल चूजे बाहर निकले। उन्हें देखते ही माँ-बाप जीव-प्राण
भूल गये।
प्रजाः पुपुषतुः प्रीतौ दम्पती पुत्रवत्सलौ।
शृण्वन्तौ कूजितं तासां निर्वृतौ कालभाषितैः ॥ ५९॥
बच्चे अत्यन्त कोमल और लुभावने थे इसलिये माता-पिता पुत्र वात्सल्य के कारण मंजुल वाणी तथा स्नेह
से उनका सांत्वन करते थे। जिस समय जो करना उचित होता था, उसके अनुसार वे दोनों मिलकर अपने
उस शिशु का पालन-पोषण करते थे। उनके मंजुल शब्द सुनकर वे दोनों खुशी से डोलने लगते और बच्चों की
नजर उतारते।
तासां पतत्रैः सुस्पर्शैः कूजितैर्मुग्धचेष्टितैः ।
प्रत्युद्गमैरदीनानां पितरौ मुदमापतुः ॥ ६० ॥
उन्हें आलिंगन और चुम्बन लेने से, उनके वे मधुर, मृदु और मंजुल शब्द सुनने से, उनके पंखों के स्पर्श से

सातवाँ अध्याय १८९
उन दोनों को अत्यन्त आनन्द होता था। माँ-बाप जब बैठे होते तो नन्हें-नन्हें बच्चे दौड़कर इधर-उधर आड़े-
तिरछे दौड़कर तथा एक-दूसरे की चोंच से चोंच मिलाकर एक दूसरे को दिखाते थे और फिर आलिंगन देकर
चुपचाप भागकर दूर चले जाते और फिर वहाँ से दौड़ते हुए उनके पास आते। माँ-बाप के पंखों की छाया रहने
से बालकों में हीनता नहीं रहती। ऐसे बच्चों को जन्म देने के कारण उन्हें धन्यता मालूम होती है। उनके वे बच्चे
अत्यन्त दुलारे होने के कारण वे उनसे बहुत लाड़-प्यार करते और उनकी इच्छा पूरी करते। उन्हें देखकर उनके
नेत्र तृप्त हो जाते थे। एक-दूसरे पर उनका अत्यन्त प्रेम था। बालकों को खेलते देखकर वे उन्हें प्रेम से उठा लेते
और उनके कोमल मुख का चुम्बन ले लेते।
स्नेहानुबद्धहृदयावन्योऽन्यं विष्णुमायया।
विमोहितौ दीनधियौ शिशून्युपुषतुः प्रजाः ॥ ६१ ॥
हे राजा! उस अजन्मा 'अजा' माया ने कैसा भुलावा दिया, जरा देखो। हृदय में परस्पर प्रेमबन्धन होने के
कारण वे उनका पोषण करने के लिये तत्पर रहते थे। स्त्री-पुत्रों का मोह बड़ा कठिन है। उनका पोषण करने के
लिये वे चिन्तातुर होकर अन्न के लिये भ्रमण करते फिरते थे।
एकदा जग्मतुस्तासामन्नार्थौ तौ कुटुम्बिनौ।
परितः कानने तस्मिन्नर्थिनौ चेरतुश्चिरम् ॥ ६२ ॥
इस प्रकार वे बच्चे थोड़े बड़े हुए। परिवार बढ़ गया, भोजन की अधिक आवश्यकता मालूम होने लगी।
तब गृहस्थी के विचार से वे चिन्ता में पड़ गये। इस प्रकार कुटुम्ब वत्सल वह कपोत और कपोती पुत्र प्रेम में
बद्ध होने के कारण दोनों एक साथ बाहर निकल पड़ते और अधिक समय बाहर रहकर भक्ष्य ले आते। अब एक
ही स्थान पर भक्ष्य कैसे मिलेगा? इसलिये वे जंगल-जंगल घूमने लगे लेकिन पर्याप्त भक्ष्य नहीं मिल पाता था।
बहुत-सा चारा एकत्र कर फिर अपने घरौंदे की ओर जाएँ और अपने बच्चों को नाना प्रकार का भक्ष्य देकर
उनका पोषण करें इस विचार से वे दोनों अनेक स्थानों, अनेक वनों और उपवनों में घूमने लगे।
दृष्ट्वा ताँल्लुब्धकः कश्चिद्यदृच्छातो वनेचरः।
जगृहे जालमातत्यचरतः स्वालयान्तिके ॥ ६३ ॥
इस प्रकार एक दिन जब इनके माँ-बाप दूर गये हुए थे उनके बच्चे घरौंदे में ही उड़ रहे थे। वे भूख से
क्षुब्ध हो गये और दुर्भाग्यवश बाहर निकल पड़े। उसी जंगल में एक बहेलिया पक्षी पकड़ने के काम में बहुत
माहिर था। संयोगवश उसकी दृष्टि इन कपोत बच्चों पर पड़ी। उसने जाल फैलाकर उन बच्चों को उसमें फँसाया
और अब कपोत कपोती के आने की प्रतीक्षा करने लगा।
कपोतश्च कपोती च प्रजापोषे सदोत्सुकौ।
गतौ पोषणमादाय स्वनीडमुपजग्मतुः ॥ ६४ ॥
बच्चों के प्रति मोह के कारण कपोत और कपोती जल्दी-जल्दी घरौंदे की ओर आये। स्त्री सुख की
आसक्ति ही बढ़ती व्यथा का मूल कारण है। स्त्री की संगति के कारण कितना अनिवार दुःख भोगना पड़ता है,
कौन बताये ? पुरुष को दुःख देने के लिये स्त्री संग ही कारण है। वही पुत्र, नाती आदि के द्वारा कैसे-कैसे दुःख
भोगने को बाध्य करता है।

gra? "दीनचित्ताऽजमायया।"?
Yes! "दीनचित्ताऽजमायया।".

Line 9:
"स्वयं चाबध्यत शिचा बद्धान्पश्यन्त्यपस्मृतिः॥ ६६॥"

Line 10:
"अपने मृत पुत्रों को देख उसका अंतःकरण प्रेम से भर आया। पति को दुःखी करने के लिये वह कपोती कैसा"
Wait, "अंतःकरण" or "अन्तःकरण"?
Line 10: "अंतःकरण" (with anusvara and visarga).
"दुःखी": with visarga.
"लिये": लिये.

Line 11:
"विलाप कर रही थी। पुत्र स्नेह ने उन्हें बेचैन कर दिया था। उनके गुणों को याद कर वह रोने लगी। उसके आगे उसे"

Line 12:
"अपना हित-अहित भी नहीं दिखायी दिया और वह अपने से ही जाल में फँस गयी। मायामोह के कारण वह कैसे"

Line 13:
"भुलावे में आ फँसी! जिस जाल में बच्चे बँधे हुए थे, उसी जाल में वह स्वयं फँस गयी।"

Line 14:
"कपोतश्चात्मजान् बद्धानात्मनोऽप्यधिकान् प्रियान्।"
Notice avagraha: "बद्धानात्मनोऽप्यधिकान्".
Danda at the end: "प्रियान्।"

Line 15:
"भार्या

सातवाँ अध्याय १९१
करती हैं। कुछ गन्दी और आलसी होती हैं। कुछ अत्यन्त झगड़ालू होती हैं, कुछ नाजुक और विलासिनी होती हैं।
लेकिन मेरी पत्नी वैसी नहीं थी। वह मेरे लिये सदा अनुकूल रही। वह यथार्थ में मेरी धर्मपत्नी थी और मेरे
अनुरूप आचरण करती थी। मैं धर्म कर्म की ओर प्रवृत्त होता तो वह भी भक्तिपूर्वक मेरी सहायता करती थी और
मुझमें जब कामेच्छा होती थी तो उसे भी पूरा करने में वह कुशल थी। सचमुच वह मेरे सिवा किसी देवता को नहीं
भजती थी। मुझे छोड़कर वह किसी तीर्थ को नहीं जाती थीं। मेरी बात का तो उसने कभी भी उल्लंघन नहीं किया।
इस प्रकार मेरी पत्नी रूपगुण तथा शील आदि से सुसम्पन्न, मेरे लिये सदा अनुकूल, पतिव्रता तथा अत्यन्त निर्मल
थी। वह महासाध्वी मुझे घर में अकेला छोड़ कर मुझे संकट में डालकर अपने पुत्रों के साथ स्वर्ग सिधर गयी।
सोऽहं शून्ये गृहे दीनो मृतदारो मृतप्रजः।
जिजीविषे किमर्थं वा विधुरो दुःखजीवितः ॥ ७० ॥
स्त्री गयी, पुत्र चले गये, अब मैं भी यहाँ किसके लिये रहूँ? लोकलज्जा और निन्दा के दुःख से मेरे प्राण
निकल जायेंगे। इतना दुःख आन पड़ा, अब लोगों को मुँह कैसे दिखाया जाय ? संसार का सुख तो नष्ट ही हो
गया। अब यदि जीवित रहा तो लोग मुझे मूर्ख कहेंगे। आग लगे ऐसे विधुर के जीने को। वह निन्दनीय और
लज्जास्पद रहता है। श्राद्ध का निमंत्रण भी कोई नहीं देता। हमेशा अकेले पड़े रहना। इस प्रकार यदि मैं इन लोगों
में रहा तो उस उजाड़ घर में मुझे अकेले बैठा रहना पड़ेगा, ठीक से खाने को भी नहीं मिलेगा। इससे मुझे और
भी दुःख होगा।
तांस्तथैवावृताञ्छिग्भिर्मृत्युग्रस्तान् विचेष्टतः।
स्वयं च कृपणः शिक्षु, पश्यन्नप्यबुधोऽपतत् ॥ ७१ ॥
ऐसा बोलकर उसने क्या किया? उसने मृत स्त्रीपुत्रों को देखा। उसने पत्नी और बच्चों को कालपाश में
बँधा देखा। उनकी हलचल बिलकुल बन्द हो गयी थी। यह देखकर भी उस मूर्ख ने विचार नहीं किया और स्वयं
भी उस जाल में फँस गया। मृत के पीछे मरना यह तो सबके पीछे लगा हुआ है लेकिन जन्म-मृत्यु को टाल कर
अपना हित साध्य करना यह कोई नहीं करता। देखिये, स्त्री-पुत्रों के लिये अपना प्राण भी दे देते हैं, लेकिन
भगवद्पद प्राप्त कर लिया जाय यह बात किसी के मन में नहीं आती।
तं लब्ध्वा लुब्धकः क्रूरः कपोतं गृहमेधिनम्।
कपोतकान्कपोतीं च सिद्धार्थः प्रययौ गृहम् ॥ ७२ ॥
इस प्रकार वह दुर्बुद्धि कपोत जाल में फँसते ही बहेलिया का काम अनायास ही हो गया। कपोत को
सपरिवार कन्धे पर लाद कर वह अपने घर की ओर चल पड़ा। ऐसा जो भी कोई मोहग्रस्त गृहस्थाश्रमी होता है,
उसे काल तत्काल हरण करके ले जाता है। जैसी बुद्धि कपोत की थी वैसी ही घर गृहस्थी पर आसक्ति रखने
वाले की होती है। नयों के लिये बिलखते हुए कपोती मर गयी यह अपनी आँखों से देखते हुए भी उस मूर्खबुद्धि
ने फिर उसी जाल में छलांग लगायी। इस प्रकार वह कपोत परिवार की चिन्ता करते-करते स्वयं भी मर गया।
मन में जरा भी विचार नहीं किया।
एवं कुटुम्ब्यशान्तात्मा द्वन्द्वारामः पतत्रिवत्।
पुष्णन्कुटुम्बं कृपणः सानुबन्धोऽवसीदति ॥ ७३ ॥

१९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इस प्रकार सांसारिक व्यक्ति कुटुम्ब का पोषण करने में ही आसक्त हो जाने के कारण विषयवासना से
सदा अतृप्त रहता है, इसीलिये उसका परिवार के साथ विनाश होता है। गृह की आसक्ति और गृहस्थाश्रम यह
केवल द्वंद्व का सुख है। इसलिए वह कपोत की तरह संभ्रमित होता है। इसलिये इस प्रकार अपने जन्म को व्यर्थ
नहीं करना चाहिये।
यः प्राप्य मानुषं लोकं मुक्तिदारमपावृतम्।
गृहेषु खगवत्सक्तस्तमारूढच्युतं विदुः ॥ ७४॥
श्लोक ७४-इस मृत्युलोक में आकर जिसे उत्तम देह प्राप्त हुआ है और वह भी श्रेष्ठवर्ण ब्राह्मण का
जन्म, जो मनुष्य देह प्राप्त करता है, उसके लिये मुक्ति का द्वार सदा खुला रहता है। एक दिन में एक क्षण में वह
इस जन्म से पार निकल जाता है। यह बात अन्य वर्णों की है, फिर ब्राह्मण तो वैसे भी पूण्यमूर्ति ही है। वे सदा
मुक्त ही हैं लेकिन व्यर्थ ही आसक्ति में फँसे रहते हैं। विद्वत्ता के साथ वैराग्य का होना बड़े भाग्य की बात है।
वह ब्रह्मदेव आदि को भी प्राप्त नहीं होती। व्यर्थ की आसक्ति में अभागे हुए ये लोग शिश्नोदर के अधीन होकर
व्यर्थ चले जाते हैं। मनुष्यदेह प्राप्त कर जो गृहासक्त होता है, उसे 'आरूढच्युत' अथवा पढ़तमूर्ख कहते हैं। वह
हाथ में आये स्वार्थ को छोड़कर कपोत की तरह दुःखी होता है। विषय से कभी तृप्ति नहीं होती ऐसा वेद और
पुराण कहते हैं। ऐसा होते हुए विषय से आसक्ति कर, व्यर्थ ही नरदेह को नष्ट करते हैं। नरदेह की महत्ता
विचित्र है। केवल रामनाम का आवर्तन करने से भी चारों मुक्ति दासी बनकर रहती हैं। ऐसा होते हुए भी वही
देह विषय के लिये नष्ट करते हैं। विषयसुख की आसक्ति से आज तक किसी को तृप्ति नहीं हुई। प्यासा व्यक्ति
मृगजल पाकर कैसे शान्त होगा? इसलिये ज्ञानी पुरुष नरदेह प्राप्त होते हुए विषय के प्रयास में पागल बनकर
क्यों कष्ट सहे? नरदेह जैसी निधि अनायास ही प्राप्त हुई है। इसलिये अभिमान बिलकुल छोड़ दो। तभी तुम्हें
समाधान प्राप्त होगा। इसके बाद पुनः नरदेह प्राप्त होगा ही इसकी कोई आशा नहीं है। इसलिये विषयासक्ति
छोड़ कर भक्तिभाव से श्रीहरि का भजन करना चाहिये। कलियुग में साधन बिलकुल सरल है। न योग की
आवश्यकता है न यज्ञ की, न त्याग चाहिये न दान चाहिये। बिना लज्जा के हरिकीर्तन करने से चारों मुक्तियाँ
चरणों पर आकर गिरती हैं। ऊब कर यदि उसके बदले में पारस मिले तो दुःख क्यों हो? उसी प्रकार कीर्तन के
बल पर साक्षात ईश्वर की प्राप्ति होती है, इसे ध्यान में रखो। एकाजनार्दन कहता है, नश्वर देह के साधन से ही
जन में जनार्दन होना यही स्पष्टतया बतलाया। एका जनार्दन की शरण में आया तभी जनार्दन एकत्व से एका हो
गया, वैसे जैसे सुवर्ण और कंगन नाम से दो होते हुए भी मूलतया एक ही होते हैं। एकादश स्कन्ध में श्रीकृष्ण ने
जो गुरुपदेश उद्धव को सुनाया तथा अवधूत ने यदु को बताया वही गुरुपदेश जनार्दनरूप एकनाथ सुना रहा है।
इति श्रीमद्भागवते एकादश स्कंधे, श्रीकृष्ण उद्धव संवादे,
यदु अवधूत इतिहासे एकाकार टीकायाम सप्तमोध्यायः ॥७॥