श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
छठां अध्याय १४९
तुम ही हो। 'प्रकृति' और पुरुष ये दोनों तुम्हारी ही गोद में खेलते हैं। तुम माया से भी अधिक श्रेष्ठ हो, प्रकृति
पुरुषों से भिन्न हो, काल का दुर्धर काल तथा सभी संहारों का कर्ता तुम ही हो। हे मेघश्याम! हमारे उत्तम
निजसुख के लिए तुम्हारा चरण विस्तार ही कारणीभूत है। इसलिये हे पुरुषोत्तम! आपकी हमारे ऊपर सदा कृपा
रहे यही आप से प्रार्थना है।
अस्यासि हेतुरुदयस्थितिसंयमानांमव्यक्तजीवमहतामपि कालमाहुः।
सोऽयं त्रिणाभिरखिलापचये प्रवृत्तः कालो गभीरस्य उत्तमपूरुषस्त्वम्॥१५॥
हे श्रीपति! जगत की उत्पत्ति और स्थिति तुम से ही होती है और अंततः सबका संहार करने वाले निश्चित
रूप से तुम ही हो। तामस शक्ति का क्षोभ होने पर वह अन्त में सारी सृष्टि का प्रलय कर देती है। उस समय
समस्त जीव सूक्ष्मरूप से बीजरूप अव्यक्त में रहते हैं। जब उत्पत्ति का समय आता है तो यही सारे बीज अंकुरित
होते हैं और वे यथासमय पल्लवित होते हैं और उनमें पुष्प और फल लगते हैं। हे कृष्णनाथ! यदि आप यह कहें
कि यह तो गुण क्षोभ की अवस्था है, इसलिये मैं प्रलयकर्ता नहीं हूँ तो जिसे तुम्हारे स्वरूप का यथार्थ ज्ञान हो
जाता है उन भक्तों के लिये माया, महत्तत्त्व और जीव इन सभी भावों का विनाश होकर वे निजपद स्वरूप का
आनन्द भोगते हैं। हे कृष्णनाथ! तुम्हें उन सबका संहार करने में क्या कठिनाई है? इसलिए परिस्थिति के अनुसार
'महाकाल' यथार्थ में तुम ही हो। तुम संसार की स्थिति जानने नहीं देते। काल की गति तो तुमने अत्यन्त सूक्ष्म
बनाकर रख छोड़ी है। अंततः अपनी प्रकृति के विकारों का विनाश भी तुम ही करते हो। प्रलय का मूल आधार
लय, निमेष, घटिका, पल, अहोरात्र तथा त्रिकाल है जिसे 'त्रिनामी' कहते हैं। ऐसे प्रचण्ड मायामहत्तत्त्व का तुम
विनाश करते हो। इसलिये हे श्रीकृष्ण! हे ऋषीकेश! इस प्रकार तुम महाकाल हो।
त्वत्तः पुमान् समधिगम्य यथाऽस्थ वीर्यं धत्ते महान्तमिव गर्भममोघवीर्यः।
सोऽयं तयानुगत आत्मन आण्डकोशं हैमं ससर्ज बहिरावरणेरुपेतम्॥ १६॥
हे अनन्ता! कालान्तर में सृष्टि का निर्माणकर्ता भी तुम ही बन जाते हो और उस उत्पत्ति का पालनकर्त्ता
भी तुम-ही हो। तुम्हारी वीर्यशक्ति प्राप्त कर पुरुष को पुरुषत्व प्राप्त होता है इसीलिये वह प्रकृति को अंगीकार
कर उसमें गर्भादान करता है। उस समय वही प्रकृति महत्तत्त्व से गर्भवती होती है और पंचतत्त्वों को गर्भ में
धारण कर हिरण्यवर्ण के अण्डे को धारण करती है। वह वीर्य अमोघ तथा प्रबल होने के कारण वह प्रिया
विश्वाकार का बालक धारण करती है और उस अण्डे में सारा ब्रह्माण्ड रहता है। गर्भ को जिस प्रकार गर्भवेष्टन
होता है उसी प्रकार इस अण्डे को सात प्रकार का बाह्य आवरण रहता है। उसका परिमाण तुम ही निश्चित
करते हो। वे सप्त आवरण हैं, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, स्थूल अहंकार तथा अत्यन्त प्रबल क्रियासूत्र।
जिस प्रकार कठपुतली का एक सूत्रधार होता है उसी प्रकार उस गर्भ की सुरक्षा करने के लिये अंतरबाह्य तुम
ही रहते हो। ऐसे जगत की सृष्टि दो से ही हुई है। तीसरा कोई भी, कहीं भी नहीं दिखायी देता। सारी सृष्टि
दो ही वस्तुओं से भरी पूरी दिखायी देती है। दीपक जलाकर देखने पर भी तीसरा कोई नहीं दिखायी देता।
प्रकृति के बारे में सोचते हैं तो वह भी मिथ्या है। इस प्रकार किसी दूसरे के बिना अकेले तुम ही पूरा विश्व
बने बैठे हो। हे मल्लमर्दन श्रीकृष्ण! तुम अपनी कुशलता की चतुराई स्वयं प्रकट कर रहे हो। इस प्रकार तुम
अकेले ही कर्त्ता होने के कारण किसी में लिप्त नहीं होते। अब कर्म करते हुए भी तुम अकर्त्ता किस तरह हो
यह भी बताता हूँ, सुनो!
१५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
तत्तस्थुषश्च जगतश्च भवानधीशो यन्माययोत्थगुणविक्रिययोपनीतान्।
अर्थाञ्जुषन्नपि हृषीकपते न लिप्तो येऽन्ये स्वतः परिहृतादपि बिभ्यति स्म॥ १७॥
चर और अचर, स्थावर तथा जंगम आदि सारे जगत के स्वामी तुम ही हो। अब यह स्वामित्व कैसे आता
है यह सचमुच ही पूछते हो तो उसके बारे में भी स्पष्ट रूप से सुन लो। माया के योग से तुम स्वयं अनेक प्रकार
के भोग करते हो लेकिन वे भोग तुम्हारे शरीर को स्पर्श नहीं करते। क्योंकि अकर्त्तात्म बोध के कारण तुम
अलिप्त रहते हो। हे हृषीकेश! वह अकर्त्तात्मक बोध ऐसा होता है कि वह वेदशास्त्रों के लिये भी अतर्क्य है।
भोग्य, भोग और भोक्ता इन तीनों को प्रकाशित करने वाले तुम ही हो। जिस प्रकार सूर्य घट में प्रतिबिम्बित होने
पर भी घट से स्वभावतः अलिप्त ही रहता है, घट, जल और प्रतिबिम्ब इन तीनों को ही सूर्य स्वयं प्रकाशित
करता है लेकिन तिस पर भी वह स्वयं उनसे अलिप्त रहता है, उसी प्रकार हे श्रीकृष्ण! तुम भी भोग भोगते हुए
उससे अलिप्त रहते हो। अथवा कर्म, कार्य और कर्त्ता इन तीनों में ही निजआत्मा रहती है फिर भी तुम उससे
अलिप्त रहते हो। जो दर्पण के प्रतिबिम्ब से ही विलास करने को प्रवृत्त हुआ है उस पर कोई व्यभिचार का
आरोप कैसे लगा सकता है? जो स्वयं ही सारा संसार बन कर रहता है उस निजात्मयोगयुक्त योगी को कौन से
भोगों की बाधा सताएगी? ऐसे बोध के सामर्थ्य से जो विषयोपभोग कर रहा है उसके विषयों के स्पर्श से उसका
आत्मज्ञान कैसे मलिन हो सकता है? वह लेन-देन का व्यवहार करता रहता है, देखने में व्यावहारिक लगता है,
घर में रहता है, गृहस्थी चलाता है लेकिन यथार्थ में वह उसमें नहीं रहता है। इस प्रकार आत्मबोध का मार्ग बिना
जाने योगियों ने भोगों का त्याग अवश्य किया किन्तु शरीर में वासना होने के कारण उनका सारा शरीर काँपता
रहता है। वे स्वप्न में विषय को देखते हैं और नींद खुलने पर प्रायश्चित्त करते हैं। इसका कारण यह है कि
उनका अहंकार समाप्त नहीं हुआ होता और वे सदा भयभीत रहते हैं। विषय भय से कम्पित ऐसे लोगों को
आत्मबोध नहीं हुआ रहता लेकिन तुम वैसे नहीं हो। तुम अत्यन्त धैर्यवान हो और तुम्हारा आत्मबोध स्पष्ट
दिखायी देता है।
स्मायावलोकलवदर्शितभावहारिभ्रूमण्डलप्रहितसौरतमन्त्रशौण्डैः।
पत्न्यस्तु षोडशसहस्रमनङ्गबाणैर्यस्येन्द्रियं विमथितुं करणैर्न विभव्यः ॥ १८॥
शायद तुम अब कहोगे कि मैं धैर्यवान हूँ, आत्मज्ञान से परिपूर्ण हूँ ऐसा कौन कहेगा? तो हे स्वामी! मैं
उसके लक्षण तथा उदाहरण भी बताता हूँ, सुनो। घर में सोलह हजार स्त्रियाँ और गोकुल की अन्य स्त्रियों के
अलावा मथुरा में कुब्जा आदि मिश्र जाति की कुमारियों का भोग किया। यज्ञोपवीत भी नहीं हुआ था उसके पहले
ही तुमने ग्वाले की विकलांग लड़की का भोग किया। राह चलती भी कितनी पकड़ी होंगी इसका कोई हिसाब ही
नहीं है। हे हरि। इस प्रकार तुमने कितनी ही लड़कियों का भोग किया लेकिन तुम्हारा आत्मबोध मलिन नहीं हो
पाया। अर्जुन का हाथ पकड़ स्वयं क्षीरसागर में चले गये। शेषशायी नारायण को भी तुम्हारे दर्शन की उत्कंठा लगी
हुई थी इसलिये उसने जान-बूझ कर ही ब्राह्मणों के वस्त्रों का हरण कर लिया था। जिस प्रकार अपने ही स्वरूप
को देखने के लिए दर्पण लेना पड़ता उसी प्रकार कृष्णार्जुन को देखने के लिये ही नारायण स्वयं उन बालकों को
ले आये। "तुम नारायण के अवतार हो, तुम्हारा दर्शन लेने के उद्देश्य से ही मैं स्वयं ब्राह्मणों के लड़के यहाँ ले
आया।" इस प्रकार नारायण के मुख से निकले हुए शब्द हमने स्वयं सुने हैं। इसीलिये कहता हूँ, हे श्रीकृष्ण!
तुम्हारा आत्मबोध अगाध है। कितने ही काल पूर्व मरे हुए ब्राह्मणों के बच्चे तुमने ला दिये। तुम्हारी ही ये सारी
छठां अध्याय १५१
लीलायें हमने प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देखी हैं। जब नारायण को ही तुम्हारे प्रति इतना आदर है तो हमारी क्या
कथा है ? हे अच्युत ! गुणातीत श्रीकृष्ण ! तुम्हारा आरपार किसी की समझ में नहीं आयेगा। पहले भी आपने अनेक
अवतार लिये थे लेकिन उस समय ऐसे चरित्र नहीं दिखलाये। वेदविधि भी लज्जित हो गयी और आपने व्यभिचार
करने वालों को भी आत्मपद दे दिया। अगर तुम यह कहोगे श्रीकृष्ण कि मैंने उदासीन होकर उन स्त्रियों का भोग
किया, उससे आत्मज्ञान में कोई बाधा नहीं आयी। लेकिन श्रीकृष्ण! वैसा कुछ भी नहीं हुआ। वे स्त्रियाँ भी
साधारण नहीं थी। वे विलास में चतुर थीं और शृंगारयुक्त हावभाव करती थीं। नखरे के साथ शरीर की कमनीयता
का भी प्रदर्शन करती थीं और तुम्हें, पुरुषोत्तम को देखकर कामबाणों की भी वर्षा करती थीं। जिन बाणों के प्रहार
से इन्द्र के शरीर में भी हजार छेद हो गये, जिन प्रचण्ड बाणों ने शंकर को भी मोहिनी के जाल में फँसा दिया,
जिन बाणों की बौछार से तपस्वी लोग घबरा उठते हैं और वे घरबार छोड़कर भाग उठते हैं, ऐसे सोलह हजार
कामबाणों का प्रहार होते हुए भी तुम्हारा आत्मबोध नहीं ढला। तुम्हारा यह कैसा सामर्थ्य है। घर की सोलह हजार
तथा गोकुल की और मथुरा की स्त्रियाँ। लेकिन इतनी सारी स्त्रियाँ भी तुम्हें लंपट बनाने में समर्थ नहीं थीं। वे तो
तुम्हें लंपट नहीं बना सकीं, उल्टे तुमने ही उन्हें विषयरहित बना दिया। हे श्रीकृष्ण ! इस प्रकार तुम त्रैलोक्य के
स्वामी अर्थात् श्रेष्ठ हो। तुम्हारी ऐसी कीर्ति सुनने से या तुम्हारा चरणोदक लेने से संसार पवित्र हो उठता है।
विभ्व्यस्तवामृतकथौदवहास्त्रिलोक्याः पादावनेजसरितः शमलानि हन्तुम्।
आनुश्रवं श्रुतिभिरङ्घ्रिमङ्गसङ्गैस्तीर्थद्वय शुचिषदस्त उपस्पृशन्ति॥ १९॥
तुम्हारी कीर्ति का श्रवण करने से अंतःकरण के पातकों का क्षालन होता है और वृत्ति अत्यन्त प्रवृत्त हो
जाती है। उसी प्रकार तुम्हारे चरणों से निकली हुई गंगा समस्त पातकों का विनाश करती है। हे श्रीरंग ! आपका
चरणतीर्थ सारे जगत को पवित्र कर देता है। इसीलिये साधुजन इन दोनों तीर्थों का अखण्ड सेवन करते हैं जिसके
कारण वे परम पवित्र होकर समाधानपूर्वक निजात्मवृत्ति में लीन रहते हैं। हे श्रीपति ! अवतार के अन्त समय में
तुमने इन दो तीर्थों को प्रसिद्ध कर रखा है ताकि तुम्हारे दासों का तरना सम्भव हो सके।
बादरायणिरुवाच
इत्यभिष्टूय विबुधैः सेशः शतधृतिर्हरिम्।
अभ्यभाषत गोविन्दं प्रणम्याम्बरमाश्रितः ॥ २० ॥
शुक्राचार्य कहते हैं, हे राजा परीक्षित ! इस प्रकार सभी देवताओं ने भक्तिभाव से तथा आनन्दपूर्वक श्रीकृष्ण
का स्तवन किया। इस प्रकार स्तुतिस्रोत गाकर उन्होंने श्रीकृष्ण को सन्तुष्ट किया। समस्त देवताओं को अत्यन्त
कौतुक और प्रसन्नता हुई। यह स्तुति करने के लिए ब्रह्मदेव और शंकर सबके आगे आये थे, उन्होंने जय-जयकार
करते हुए दण्डवत किया। शेष सारे देवतागण विमान में हाथ जोड़कर बैठे थे। उन सबकी ओर से पुनः विनती
करते हुए ब्रह्मदेव आगे कहने लगे।
ब्रह्मोवाच
भूमेर्भारावताराय पुरा विज्ञापितः प्रभो।
त्वमस्माभिरशेषात्मंस्तत्तथैवोपपादितम् ॥ २१ ॥
हे यादवश्रेष्ठ ! श्रीधर ! पहले हमने आपसे सुरवरों को अभय देने के लिये पृथ्वी का भार कम करने के
१५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
लिये प्रार्थना की थी। जैसी हमने प्रार्थना की थी उसके विचार से आपने अपनी लीला से कुछ अधिक ही
धर्मवृद्धि की थी। हे पुरुषोत्तम ! हे घनश्याम ! तुम सर्वेश्वर और सर्वात्मा·हो इसलिये जो काम हमारी समझ में
नहीं आता वह भी आपने कर डाला।
धर्मश्च स्थापितः सत्सु सत्यसंधेषु वै त्वया।
कीर्तिश्च दिक्षु विक्षिप्ता सर्वलोकमलापहा॥ २२॥
जो सत्यवादी और साधु थे, तुम्हारे ही चरणों के प्रति जिनका संकल्प था उनके लिये तुमने यथार्थ रूप में
धर्म स्थापना की और अपनी यह कीर्ति तुमने दसों दिशाओं में फैलायी। सचमुच उसके श्रवण से त्रिभुवन पावन
हो जायेगा।
अवतीर्य यदोर्वंशे बिभ्रद्रूपमनुत्तमम्।
कर्माण्युद्दामवृत्तानि हिताय जगतोऽकृथाः॥ २३॥
हे श्रीकृष्ण! पूर्ण पुरुष होते हुए तुमने यादवकुल में जन्म लिया। तुम्हारे स्वरूप की शोभा की तो कोई
सीमा नहीं है। सबमें सर्वोत्तम तुम हो। तुम्हें देखते ही विचलित चित्तवृत्ति शान्त हो जाती है। इस प्रकार लीला से
देह धारण करने वाले तुम्हें देखकर सभी को मनोरम लग रहा है। तुमने अत्यन्त अद्भुत कर्म किये। बायें हाथ से
गोवर्धन पर्वत उठाया, मुख से बडवाग्नि को निगलकर गोपालों का संरक्षण किया। मृत हुए गुरुपुत्र को वापस ले
आये। गत गर्भों से देवकी को मिलाया और स्वयं गोपाल वत्स बनकर ब्रह्मदेव को भी भ्रम में डाल दिया। हे
श्रीकृष्णनाथ ! अनंता ! इस प्रकार जगत के हित के लिये तुमने अनेक प्रकार के चरित्र खेले।
यानि ते चरितानीश मनुष्याः साधवः कलौ।
शृण्वन्तः कीर्तयन्तश्च तरिष्यन्त्यञ्जसा तमः॥ २४॥
आपने यह अवतार लेकर अत्यन्त पावन तथा विचित्र कथाओं की रचना की और नाना प्रकार के चरित्र
कर दिखाये। साधुजन कलियुग में इन चरित्रों का श्रवण-कीर्तन कर त्रिगुणों के साथ मायामोह से मुक्ति पा लेंगे।
यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरुषोत्तम।
शरच्छतं व्यतीताय पञ्चविंशाधिकं प्रभो॥ २५॥
हे पुरुषोत्तम ! हे ऋषीकेशी ! इस यदुवंश में आपने अवतार लिया। उस अवतार को लिये कितने वर्ष बीत
गये यह भी मैं आपसे बताता हूँ। हे गोविन्दा ! मृत्युलोक में मनुष्य की आयु सीमा सौ वर्ष निर्धारित है। उस
मर्यादा को समाप्त होकर भी पचीस वर्ष बीत गये।
नाधुना तेऽखिलाधार देवकार्यावशेषितम्।
कुलं च विप्रशापेन नष्टप्रायमभूदिदम्॥ २६॥
तिस पर भी भूतल पर कोई देवकार्य शेष नहीं रह गया है। यादवकुल तो वैसे भी नष्टप्राय हो गया है।
मरणप्राय हाथी या जिसका पंख उखड़ गया हो ऐसे पक्षी की तरह यादवों की सेना भूमि के लिये भारस्वरूप हो गयी
है। जैसे फूस की टूटी झोपड़ी हो या जैसे राजकुमार को क्षयरोग जड़ जाय अथवा अग्नि में अजगर झुलस जाय उसी
प्रकार यादववीरों की स्थिति हो गयी है। ब्राह्मणों का शाप महाभयंकर होता है इसलिये यादवों का वीर्य, शौर्य, प्रताप
तथा शिखर तथा पहुँचा हुआ उनका घमण्ड यह सब नष्ट होकर उन सब पर मुर्दैनी छा गयी है।
छठां अध्याय १५३
ततः स्वधाम परमं विशस्व यदि मन्यसे।
सलोकाँल्लोकपालान्नः पाहि वैकुण्ठकिङ्करान् ॥ २७ ॥
इसलिये हे देवाधिदेव ! हे यादवराया ! हे श्रीकृष्ण ! हम सब तुम्हारे चरणों की बाट जो रहे हैं। कृपया
वैकुण्ठ चलने की तैयारी करें। हे देवकीनन्दन ! यदि आप चाहें तो इसी क्षण चलने की तैयारी करें। देवताओं की
सेना खड़े-खड़े आपकी प्रतीक्षा कर रही है। जो भी लोक या लोकपाल हैं उन पर आप कृपा करें। हम सब
आपके दास हैं इसलिये इन दासों की बात को सम्मान प्रदान करें। हे वैकुण्ठनाथ महाराज ! मुझे तथा शंकरादि
समस्त देवताओं को भी आपकी सेवा की उत्कंठा है।
श्रीभगवानुवाच
अवधारितमेतन्मे यदात्थ विबुधेश्वर।
कृतं वः कार्यमखिलं भूमेर्भारोऽवतारितः ॥ २८ ॥
ब्रह्मदेव का यह भाषण सुन कर योगज्ञानियों के मुकुटमणि श्रीकृष्ण ने अपनी मेघ गम्भीर वाणी से,
हास्यवदन होकर ब्रह्मदेव से बातें शुरू कीं। जैसे नादब्रह्म पूर्ण हो गया हो अथवा आत्मानन्द का फल पक गया
हो इस प्रकार श्रीकृष्ण ने बोलना प्रारम्भ किया। इससे कर्ण के भाग्य का उदय हो गया। उन्होंने गौरव के साथ
कहा, "ब्रह्मदेव! तुम्हारी भक्ति देखकर मैं अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ हूँ।" कहकर श्रीहरि उस समय पुत्रप्रेम से
आलिंगन देने के लिये उत्सुक हो गये और उन्होंने प्रेम से कहा, "हे देवेन्द्र ! तुम्हारा कहना सत्य है। हे
ब्राह्मणेन्द्र ! तुम्हारी विनती के अनुसार मैंने पृथ्वी का भार तो हल्का कर दिया। मैंने अपना कार्य पूर्ण किया है।
कुछ भी शेष नहीं रहा है। फिर भी एक बड़ा काम रह गया है और मेरे लिये वही समस्या है।"
तदिदं यादवकुलं वीर्यशौर्यश्रियोद्धतम्।
लोकं जिधृक्षद्रुद्ध मे वेलयेव महार्णवः ॥ २९ ॥
यद्यसंहृत्य दृप्तानां यदूनां विपुलं कुलम्।
गन्तास्म्यनेन लोकोऽयमुद्वेलेन विनङ्क्ष्यति ॥ ३० ॥
यहाँ हमारा जो यादवों का कुल है, वह वीर्य, शौर्य और वैभव से उन्मत्त हो गया है। अपने बल के घमण्ड
में वे धर्म का नाश करने पर तुल गये हैं। वे धर्म की जड़ें खोदना चाहते हैं लेकिन जिस प्रकार समुद्र को सीमाओं
ने नियन्त्रित कर रखा है, उसी प्रकार मैंने योगबल से उन्हें काबू में रखा है। उन्हें यदि इसी तरह यहाँ छोड़ कर
निजधाम के लिये चला जाऊँ तो ये अधर्म के लिए प्रवृत्त होंगे। उनका निस्तारण कौन करेगा ? समुद्र अपनी
मर्यादा तोड़कर उन्मत्त होने पर जब सारी चीजों को स्वाहा कर देता है तो उस पर कौन नियंत्रण कर पाता है ?
वैसी ही स्थिति होगी। ये अधर्मरत हो जाएँगे और आपके लिये संकट उत्पन्न करेंगे और तब आप ही उनकी
शिकायत लेकर मेरे पास आयेंगे। ये देवताओं के वश में नहीं आयेंगे, दैत्य अथवा दानवों से भी ये हार नहीं
मानेंगे और जब ये अधर्म का विद्रोह करेंगे उस समय आप ही शिकायत लेकर मेरे पास आयेंगे।
इदानीं नाश आरब्धः कुलस्य द्विजशापजः।
यास्यामि भवनं ब्रह्मन्नेतदन्ते तवानघ ॥ ३१ ॥
इसलिये हमारे इस यादव कुल का शीघ्र विनाश करने का निश्चय कर तथा उसको यथोचित बना कर
१५४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
आज से ही उसका शुभमुहूर्त किया है। हे सखा ब्रह्मदेव! सुनो। एक बार इस कुल का नाश हो जाय तो फिर मैं
सचमुच ही निजधाम आऊँगा और वह भी तुम्हारे लोक के रास्ते से। श्रीकृष्ण ने कही हुई यह बात शंकर और
ब्रह्मदेव ने भी सुनी। समस्त देवताओं का समुदाय भी आनन्दित होकर आनन्द का घोष करने लगे। सब ने जोर-
जोर से जय-जयकार कर करतल ध्वनि की और श्रीकृष्ण के चरणों का वन्दन कर उन पर पुष्पांजलि अर्पित की।
श्रीशुक उवाच
इत्युक्तौ लोकनाथेन स्वयम्भूः प्रणिपत्य तम्।
सह देवगणैर्देवः स्वधाम समपद्यत ॥ ३२॥
शुक्राचार्य कहते हैं, हे राजा परीक्षित्! कृष्ण का यह भाषण सुनकर सुरवरों के मन में अत्यन्त आनन्द
उत्पन्न होकर उन्होंने उन्हें नमस्कार किया। ब्रह्मदेव, सूर्य, शंकर आदि देवताओं ने मिलकर कृष्ण को दण्डवत
किया और चरणस्पर्श कर वे चले गये।
अथ तस्यां महोत्पातान् द्वारवत्यां समुत्थितान्।
विलोक्य भगवानाह यदुवृद्धान् समागतान्॥ ३३॥
उधर श्रीकृष्ण को कुल का विनाश जल्द से जल्द करने का निश्चय करने की ही देर थी कि इधर द्वारका
में भयंकर उपद्रव होने लगे। आकाश में तिधारी केतु, धूमकेतु, दण्डकेतु आदि दिखायी देने लगे। शिखायुक्त
पुच्छलतारा भी आकाश में दिखायी देने लगा। भरी दुपहरिया में भूकम्प के धक्के लगने लगे, दिन में उल्कापात
होने लगे भूत नग्न होकर आकाश में नाचने लगे और क्रन्दन करने लगे। सियार नगर में घुस कर दिन दहाड़े
चौराहों पर चिल्लाने लगे। शहर में चारों ओर सियारों के चिल्लाने की आवाज सुनायी पड़ने लगी। उसे सुनकर
लोग भय से काँपने लगे। गाँव के अन्दर और बाहर श्वानों ने रोना शुरू किया। मार्जारों के कोलाहल का स्वर तो
गाँव के प्रत्येक घर में सुनाई पड़ रहा था। गायें मध्यरात्रि में गुहारने लगीं। बच्चे खेलते समय मारपीट करने लगे,
गिद्ध लोगों पर झपट्टे मारने लगे। उल्लू घर-घर बोलने लगे। लोगों की वाग्देवी क्षुब्ध हो उठी। वह कहने लगी,
अरे यम की सवारी आ गयी, क्यों व्यर्थ ही जल्दी-जल्दी दौड़ कर आग में कूद रहे हैं। ज्वालामुखी के विस्फोट
हुए, भूचाल के धक्के लगने लगे, धूप तो आग की तरह तपने लगी। हवा भी कम्प उत्पन्न करने लगी। ऊष्ण वायु
के झोंकों से शरीर झुलसने लगे। नगर में चारों ओर धूल उड़ने लगी और आँखों में भरने लगी। स्त्री-पुरुषों में
आँख खोलने की शक्ति नहीं रह गयी। चारों दिशाओं में जैसे धुंध छा गयी। शहर में रक्त की वर्षा होने लगी।
यह सब देखकर समस्त यादवगण भय से दिग्मूढ़ हो गये। उनमें जो वृद्ध थे उन्होंने विचार किया कि ये अनिष्ट
के संकेत हैं। किसी बड़े संकट की आशंका दिखायी देती है। यह सोच कर वे कृष्ण के पास आये और उन्होंने
कृष्ण को सारा वृत्तांत सुनाया। सभी यादवों को उद्विग्न हुआ देख श्रीकृष्ण ने बोलना प्रारम्भ किया।
श्री भगवानुवाच
एते वै सुमहोत्पाता ह्युत्तिष्ठन्तीह सर्वतः।
शापश्च नः कुलस्यासीद् ब्राह्मणेभ्योदुरत्ययः ॥ ३४॥
श्रीकृष्ण यादवों से कहने लगे कि ये जो दिन में पृथ्वी और आकाश में बड़े उपद्रव हो रहे हैं वे सब जगह
समान हैं। ये अशुभ चिह्न देखकर मुझे भी स्मरण हो आया कि हमारे यादवकुल को ब्राह्मण का शाप है। ये चिह्न
छठां अध्याय १५५
इसी बात के सूचक हैं। ब्राह्मणों का शाप तो सच ही होकर रहता है। हरिहर भी उससे मुक्त नहीं हैं। इसलिये
आप इसी क्षण इस सम्बन्ध में विचार करें। पहले सबको गाँव के बाहर निकालिये।
न वस्तव्यमिहास्माभिर्जिजीविषुभिरार्यकाः।
प्रभासं सुमहत्पुण्यं यास्यामोऽद्यैव माचिरम्॥ ३५॥
यदि प्राणों की आशा हो तो हमें आज ही द्वारका छोड़कर प्रभास की ओर चलना पड़ेगा। सोच क्या
रहे हैं? शीघ्रता कीजिये। आज ही निकल चलिये। घर बार की आशा छोड़िये। अब यहाँ एक क्षण के लिये भी
न रुकिये।
यत्र स्नात्वा दक्षशापद्गृहीतो यक्ष्मणोडुराट्।
विमुक्तः किल्बिषात् सद्यो भेजे भूयः कलोदयम्॥ ३६॥
समस्त यादवश्रेष्ठ! सुनिये। प्रभासतीर्थ एक अत्यन्त पवित्र स्थान है। यहाँ स्नान करने से नक्षत्राधिपति
चन्द्रमा क्षय रोग से मुक्त हुआ। यक्ष ने अपनी सत्ताईस कन्याएँ चन्द्र को दी थीं। अन्य सबको छोड़कर वह
केवल एक रोहिणी के साथ रममाण हुआ। इसलिये दक्ष ने चन्द्रमा को शाप दिया जिसके कारण उसे क्षयरोग ने
ग्रस लिया। तब उसने यहाँ आकर स्नानादि कर्म किया। स्नान करते ही तत्काल उसका क्षयरोग दूर हो गया और
उसकी सारी कलाएँ उसे प्राप्त होकर वह अपने मूल तेज से प्रकाशित होने लगा।
वयं च तस्मिन्नाप्लुत्य तर्पयित्वा पितॄन्सुरान्।
भोजयित्वोशिजो विप्रान्नानागुणवतान्धसा ॥ ३७॥
हम भी वहीं पर स्नान, दान, पितृतर्पण करें तथा वेदशास्त्र सम्पन्न ब्राह्मणों का पूजन करें। नाना प्रकार के
पकवान तैयार कर उन्हें देवब्राह्मणों को समर्पित करें और यथाविधि दान-दक्षिणा दें।
तेषु दानानि पात्रेषु श्रद्धयोप्त्वा महान्ति वै।
वृजिनानि तरिष्यामो दानैर्नौभिरिवार्णवम् ॥ ३८॥
जिस प्रकार गीली भूमि में बीज बोया जाता है उसी प्रकार दान देने के लिये उत्तम ब्राह्मण देखकर उसे
श्रद्धापूर्वक उत्तमोत्तम दान देते रहना चाहिये। ब्राह्मण का मुख ही खेती लायक भूमि है। वह जड़ तथा पत्तियों से
विहीन होने पर भी पवित्र है। ऐसा उत्तम खेत देखकर ही उसमें चित्रविचित दानों की बोआई कीजिये। विनय की
उत्तम आर्द्रता, श्रद्धायुक्त निर्मल चाह, उसमें शमदमादि मजबूत बैलों से जुताई कर देनी चाहिये। इस प्रकार खेत
में बीज बोने से फसल लहलहाएगी और चारों पुरुषार्थ प्राप्त होंगे। जिस प्रकार नौका के बल से समुद्र के जल में
से तैर कर जाया जा सकता है, उसी प्रकार उस फसल के बल से हम सब पातकों को पार कर लेंगे।
श्रीशुक उवाच
एवं भगवताऽऽदिष्टा यादवाः कुलनन्दन।
गन्तुं कृतधियस्तीर्थं स्यन्दनान् समयूयुजन्॥ ३९॥
शुक कहते हैं, हे सुजान परीक्षित! सुनो। इस प्रकार प्रभास जाकर तीर्थ विधि करने के लिये श्रीकृष्ण ने
अनुज्ञा दी। तब यादवों का झुण्ड एक साथ निकल पड़ा। उन्होंने अपने घोड़े तैयार किये और एक के पीछे एक
दौड़ने लगे चारों ओर गड़बड़ी मच गयी।
१५६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तन्निरीक्ष्योद्धवो राजन् श्रुत्वा भगवतोदितम्।
दृष्ट्वारिष्टानि घोराणि नित्यं कृष्णमनुव्रतः ॥ ४० ॥
बड़े-बड़े वीरों का जमघट, हाथियों और घोड़ों की घरघराहट, द्वारका में किसी को भी राह चलना कठिन
हो गया। प्रभास जाने की इतनी हड़बड़ी मच गयी। हे राजा परीक्षित ! सारी द्वारका ही जब खड़बड़ा कर निकल
पड़ी तो उद्धव के मन में वही बात आयी जो श्रीकृष्ण ने देवताओं से कही थी। शीघ्र ही कुल का विनाश करना
और आज से ही उसका मुहूर्त है ऐसा भगवान ने कहा था। उसी कार्य की आज भगवान ने शुरुआत कर दी ऐसा
उसने देखा। उद्धव हमेशा कृष्ण के साथ रहता था और कृष्ण की अनुमति से ही रहता था। स्वर्गस्थ देवताओं
तथा भगवान के बीच हुआ भाषण उसने सुना था। श्रीकृष्ण की उपस्थिति में जब यहाँ द्वारका में बड़े-बड़े उत्पात
हुए इसका अर्थ यही है कि यह सब श्रीकृष्ण की इच्छा से ही हुआ। यादवों को प्रभास ले जाकर यह क्षणार्ध में
उनका विनाश करा देगा क्योंकि श्रीकृष्ण अब निजधाम जाने के लिये उतावला हो गया है। लेकिन यदि उनका
विनाश ही करना था तो वह द्वारका में ही क्यों नहीं किया ? उन्हें इतनी दूर क्यों ले गये ? इसका कारण यह है
कि श्रीकृष्ण सर्वज्ञ था, उसे सब कुछ ज्ञात था और वह इस सबका सूत्रधार था। यादव वास्तव में देवांश थे और
द्वारका सातवीं मोक्षपुरी थी इसलिये यदि यहाँ उनका विनाश हुआ तो उन्हें सायुज्यमुक्ति प्राप्त होगी। यही सोच
कर श्रीकृष्ण ने यहाँ उनका विनाश नहीं किया क्योंकि उन्हें पदाभिमान है इसलिये उन्हें द्वारका में मृत्यु नहीं
आयेगी यह जानकर ही श्रीकृष्ण ने उन्हें प्रभास भेजा। ब्रह्मशाप का मूल कारण था वह मूसल जो प्रभास में उत्पन्न
हुआ था। यह बात श्रीकृष्ण जानते थे। इस प्रकार अपने कुल का विनाश कर श्रीकृष्ण निजधाम के लिये निकल
पड़ेंगे यह ध्यान में आते ही उद्धव के मन को बुरा लगा। उसका गला भर आया। आँखों से अश्रुधाराएँ बहने
लगीं। सारे शरीर से पसीना चुहचुहाने लगा और हिचकी आने लगी। कृष्ण वियोग यदि आधे क्षण का भी हो
जाता तो उसकी समझ में नहीं आता था कि क्या किया जाय ? वह कृष्ण के चेहरे की ओर एकटक देखता रह
गया। आने वाले वियोग के तीव्र घाव उसके हृदय में होने लगे। धैर्य के साथ-साथ उसकी बुद्धि भी स्तब्ध हो
गयी। मन बेचैन हो उठा। तब एकान्त है यह देखकर वह दौड़ कर श्रीकृष्ण के पास पहुँचा, उनके पैर पकड़
लिये और रोने लगा।
विविक्त उपसंगम्य जगतामीश्वरेश्वरम्।
प्रणम्य शिरसा पादौ प्राञ्जलिस्तमभाषत ॥ ४१ ॥
संसार का नियंता है काल और उसका नियंता जो श्रीकृष्ण है उसके चरणों पर मस्तक रखकर वह
विनयपूर्वक बोलने लगा।
उद्धव उवाच
देवदेवैश योगेश पुण्यश्रवणकीर्तन।
संहृत्यैतत्कुलं नूनं लोकं संत्यक्ष्यते भवान्।
विप्रशापं समर्थोऽपि प्रत्यहन्न यदीश्वरः ॥ ४२ ॥
उद्धव ने कहा "हे यादवेंद्र ! हे देवेंद्र के भी आदिन्द्र ! हे योगियों के ज्ञानचन्द्र ! तुम्हारा स्वरूप कलारहित
है। देवों में इन्द्र श्रेष्ठ है लेकिन तुम उस इन्द्र के भी इन्द्र हो। योगियों में शंकर श्रेष्ठ हैं लेकिन हे श्रीकृष्ण ! तुम
छठां अध्याय १५७
उनके भी ईश हो। तुम्हारा श्रवण और कीर्तन पुण्य को भी पावन करता है। कीर्तन से संसार भवबन्धन टूटकर
समाधान प्राप्त होता है अपने कुल का विनाश कर तथा यह लोक छोड़ कर, हे श्रीकृष्ण तुमने निश्चय ही
निजधाम जाने का विचार किया है ?"
नाहं तवाङ्घ्रिकमलं क्षणार्धमपि केशव।
त्यक्तुं समुत्सहे नाथ स्वधाम नय मामपि॥ ४३॥
ब्राह्मण का शाप झूठ साबित करने की सामर्थ्य तुझमें होते हुए भी केवल निजधाम जाने के लिये ही तुम
अपने कुल का संहार कर रहे हो न? यह कहते समय उसे रुलाई आ गयी। उसे रोक न पाने के कारण वह जोर-
जोर से सुबकने लगा। आँसुओं से उसकी आँखें भर आयीं। ऐसी स्थिति में ही उसने दौड़कर श्रीकृष्ण के पैर
पकड़ लिये। चरणों पर मस्तक रखकर उसने कहा, हे श्रीहरि! तुम मेरे सखा हो, मेरे मालिक हो ऐसा होते हुए
तुम हमें छोड़कर कैसे जा रहे हो? हे अच्युत! तुम जा रहे हो यह सुनते ही मन में दुःख का जो कोलाहल मचा
है वह रुकता ही नहीं है। इसलिये मैं चाहता हूँ कि ऐसा वियोग न हो। जिस प्रकार पानी के बिना मछली
छटपटाती है, उसी प्रकार मेरे प्राण छटपटा रहे हैं। तो हे कृष्ण! आखिर अंतकाल में तुम मेरे प्रति इतने निष्ठुर हो
ही गये न? तुम्हारे जाने के बाद मैं दीन हीन हो जाऊँगा। फिर मीठी-मीठी बातें किसके साथ करूँगा? अब देह
में प्राण भी नहीं रह गया है। आत्मा निकल जाने पर देह केवल प्रेतरूप रह जाता है उसी प्रकार तुम्हारे निजधाम
जाने के बाद हमारी गति होगी। हमारा माता-पिता तू ही है ऐसा हमारा दृढ़ विश्वास है। ऐसा होते हुए, देखता हूँ
तुम हमें छोड़ कर कैसे जाते हो? इतना कहकर वह उनके कदमों पर लौट गया। तुम तो निजधाम के लिये चल
पड़े हो हो और हमें किसके हाथ सौंप रहे हो? हे पुरुषोत्तम! तुम मुझ पर क्यों रूठे हो? यह हमारे ही कर्मों का
फल है। तुम क्या करोगे? गूंगे बालक को जमीन पर रख कर जिस प्रकार माँ सती जाने के लिये निकल पड़ती
है और उस समय बालक जिस प्रकार व्याकुल हो जाता है वैसी ही अवस्था उद्धव की हुई। बंसी में लगा हुआ
स्वादिष्ट मांस का टुकड़ा मछली निगल भी नहीं पाती कि तब तक मछुआरा बंसी को झटका देकर उसे ऊपर
खींच लेता है, उसी प्रकार प्रेमविकृत उद्धव व्याकुल हो उठा। भगवान! आपके जाने के बाद मैं सेवा किसकी
करूँ? हे श्रीकृष्ण! तुम यथार्थ में ही हमारा भाग्य हो। ऐसा होते हुए तुम हम पर क्यों रूठ गये? कोई अन्धा
व्यक्ति अपने साथी को छोड़कर किसी गलत रास्ते से कँटीले जंगल में फँसकर असह्य हो उठता है, वैसी ही
उद्धव की अवस्था हुई। वह बार-बार दौड़ कर पैरों पर गिरने लगा। जोर-जोर से रोने लगा। कहने लगा मुझे
छोड़कर कहाँ जा रहे हो? मैं इन चरणों से दूर नहीं रह पाऊँगा। ये चरणकमल मैं एक क्षण के लिये भी नहीं
छोड़ पाऊँगा। हे गोपाल! तुम्हारा प्रयाण वास्तव में मेरे अन्तकाल का काल है। मुझे तुम्हारे संग की आदत लग
गयी है। इसलिये मुझे भी अपने साथ ले चलो। मेरी आपसे यही प्रार्थना है। श्रीकृष्ण मुझ पर इतनी कृपा करें।
तुम जब गरुड़ पर बैठोगे तो मुझे भी पीछे बिठा लो। लेकिन मुझे छोड़कर न जाओ। मुझे अपने निजधाम ले
चलो। जीवनभर मुझे साथ दिया और अब अन्त समय में क्यों मुझे दूर कर रहे हो? हे कृपासागर कृष्ण! इतनी
कृपा करो। अब तुम कहोगे कि मैं अपने ही कुल का काल बन गया हूँ, तुम्हारे लिये दयालु कैसे बना रहूँ?
लेकिन तुम कृपया ऐसा न कहो क्योंकि तुम दीनों के प्रति दयालु तथा भक्तों के प्रति स्नेहपूर्ण हो। भक्त पर
तुम्हारी कृपा है इसीलिये मैं तुमसे इतनी निकटता कर रहा हूँ। लेकिन हे श्रीहरि! मेरा उद्धार करो। मेरी विनय न
ठुकराओ।
१५८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तव विक्रीडितं कृष्ण नॄणां परममङ्गलम्।
कर्णपीयूषमास्वाद्य त्यजत्यन्यस्पृहा जनः ॥ ४४॥
तुम्हारी नाना प्रकार की क्रीडाएँ तथा खेल जीवों को परम मंगलदायक होने के कारण लोग उस प्रिय तथा
निर्मल लीला का आस्वाद कर्णद्वार से करते हैं। तुम्हारी कीर्तिश्रवणामृत की मधुरता का आस्वाद कर्णों ने आधी
घड़ी के लिये ही लिया था कि उन्हें वह इतना मधुर लगा कि उसके आगे अमृत का माधुर्य भी फीका लगने
लगा। तुम्हारी ऐसी कीर्ति सुनते ही वासनाओं के साथ इच्छा समाप्त हो जाती है, इसलिये जो तुम्हारे भक्त हैं वे
तुम्हारी कीर्ति की सदा हृदय में धारण करते हैं। ऐसे श्रीकृष्ण का वियोग मुझे सहन नहीं होगा। आपके स्वामित्व
और आपके अच्छेपन का हमें व्यसन ही लग गया है।
शय्यासनाटनस्थानस्नानक्रीडाशनादिषु ।
कथं त्वां प्रियमात्मानं वयं भक्तास्त्यजेमहि ॥ ४५ ॥
सच पूछो तो तुम हमारे स्वामी हो लेकिन तुम मुझे अपने आसन पर बिठाते थे। हे श्रीकृष्ण! कोई मन की बात
कहनी होती थी तो मेरे सिवा तुम्हारा और कोई नहीं था। कोई कठिन कार्य करना होता तो उस समय तुम मेरी ही
राय लेते थे और जो राय मैं देता था वह तुम्हें उचित लगती थी। तुम भोजन करने जाते तो मेरी थाली अपने साथ
लगवाते थे और खाना खाते समय नाना प्रकार का विनोद करते हुए अपने थाली में की चीज मुझे खिलाते थे।
ब्रह्मदेवादि देवताओं को भी तुम्हारी पंगत का लाभ दुर्लभ था किन्तु मैं तुम्हारे साथ खाना खाने बैठता था और
तुम्हारी थाली में बचा हुआ खाना तो तुम स्वयं मुझे हिस्सेदार बना कर खिलाते थे। मेरा हाथ पकड़ कर तो तुम
अकेले एकान्त में बैठा करते थे। ब्रह्मदेव आदि देवताओं की कोई विनती होती तो उसे मैं तुम्हें सुनाता था। बिना
किसी के जाने तुमने रासक्रीडा की लेकिन वह गोपनीय बात मुझे बताकर तुमने मुझे गोकुल भेज दिया था। पलंग
पर सोयी हुई रुक्मिणी को जगा कर तुम मुझे अपने पास सुलाते थे। उस निद्रा के सुख के आगे बेचारी समाधि क्या
चीज है ? इस प्रकार तुम्हारी संगति में कितनी रातें काटीं उसकी कोई गिनती नहीं है। हे श्रीकृष्ण, फिर भी मुझे
छोड़कर तुम जा रहे हो ? हे कृष्ण ! जब तुम्हारा समय नहीं बीतता था तो तुम रुक्मिणी को भेजकर मुझे बुलवा लेते
थे और फिर हम दोनों बैठकर चौपड़ खेला करते थे। तुम जंगल में घूमने जाते थे तो रथ में मुझे बिठा लेते थे और
फिर हम दोनों साथ-साथ घूमते थे। क्या अब तुम मेरी संगति से ऊब गये? पानी में जलक्रीड़ा करते समय या
गोपियों के साथ हँसी-ठट्ठा करते समय भी मैं तुम्हारे साथ रहता था। स्नान करते समय तो मैं हमेशा तुम्हारे सामने
खड़ा रहता था। ऐसी कितनी बातें तुम्हें बताऊँ? हे श्रीपति ! रात को भी मैं तुमसे कभी अलग नहीं हुआ, फिर अन्त
समय में तुम्हारा साथ कैसे छोड़ूँ? तुम हमारे स्वामी, हमारे सखा, सारे जीवों का प्राण हो। हे पुरुषोत्तम ! हे
मेघश्याम ! तुम्हारा वियोग हमें कैसे सहन होगा? तुम्हारे श्रीचरण ही हमारा प्राण है। ऐसे इन चरणों के वियोग का
दुःख सहने का सामर्थ्य मुझमें नहीं है। तुम्हारे चरणों का सान्निध्य मुझमें नहीं है। तुम्हारे चरणों का सान्निध्य यही
हमारा सर्वस्व है, प्राण भी चले जाएँ तो भी उनका वियोग हमें सहन नहीं होगा। शरीर चाहे रहे या जाये लेकिन
तुम्हारे चरणों का वियोग हमें बिलकुल सहन नहीं होगा। तुम्हारा मोह अत्यन्त कठिन है। ब्रह्मदेव भी उस पर
नियंत्रण नहीं कर सकते। लेकिन हे श्रीकृष्ण! तुम्हारे शेषग्रहण के कारण मैंने उसे भी सुगमता से पार कर लिया।
त्वयोपभुक्तस्रग्गन्धवासोऽलंकारचर्चिताः।
उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव मायां जयेमहि ॥ ४६ ॥
छठां अध्याय १५९
हे गोपाल ! मैं तुम्हारा दास होने के कारण, तुम्हारे चन्दन में से बचा हुआ चन्दन अपने ललाट पर लगाने में
तथा तुम्हारी माला अपने गले में डालने से कलिकाल भी मेरे सामने दीन-हीन हो जाता है। तुम्हारी कमर का
पीला पीताम्बर मेरी कमर में लग गया तभी मैंने काम को जीत लिया और वह दृढ़ होकर मेरी कमर से लग
गया। तुमने अपने हृदय पर लगा पदचिह्न मुझे दिया तभी माया मुझसे दूर चली गयी। वह तुम्हारे दासों के सामने
खड़ी भी नहीं हो सकेगी। सच तो यह है कि यदि माया का कोई चेहरा होता तो वह सामने खड़ी होती। लेकिन
वह तो स्वयं ही मिथ्या है। लेकिन लोग व्यर्थ ही परिश्रम कर रहे हैं। देखो। तुम्हारा उच्छिष्ट खाने के आगे
समाधि का सुख भी शरमा जाता है और आत्मानन्द परिपक्व हो जाता है। इस प्रकार तुम्हारी सेवा करके ही मैं
इतनी ऊँचाई तक पहुँचा हूँ। तुम्हारे ही अवशिष्ट का सेवन कर, मैं उस माया को भी तर गया हूँ जिसने योगियों
को भी भयाक्रान्त किया है।
वातरशना य ऋषयः श्रमणा ऊर्ध्वमन्थिनः।
ब्रह्माख्यं धाम ते यान्ति शान्ताः संन्यासिनोऽमलाः ॥ ४७ ॥
मिथ्या माया के भय से योगी गिरिकन्दराओं में छिप कर बैठ गये, लंगोटी भी छोड़ दी। फिर भी मन में
भय तो है ही। वे स्वस्तिकादि आसन लगाकर प्राणायाम करने के लिये मूलबन्ध से गात्रों का अवरोध कर दृढ़
धारणा करते हैं। नाक से निकलने वाली वायु को नियंत्रित करने के लिये अभ्यास करते हुए शरीर को कष्ट देते
हैं। भूख से ही भूख को खाते हैं, प्यास से ही प्यास का शमन करते हैं, इस प्रकार अत्यन्त निश्चयपूर्वक सुख
और दुःख पर विजय प्राप्त करते हैं। सद्बुद्धि को हाथ में लेकर इन्द्रिय वृत्तियों को नियंत्रण में रख तथा वैराग्य
की ख्याति सम्पादित कर ऊर्ध्व गति से चलने लगते हैं। मणिकर्णिका की ड्योढ़ी लाँघ कर ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश कर
फिर ब्रह्मगिरी पर विजय की दुंदुभि बजाते हैं। वहाँ उनके सर्वांग में शान्ति सुख का संचार होता है। सभी
संकल्पों का त्याग हो जाने के कारण वे स्वयं चिद्ब्रह्म ही हो जाते हैं। इस प्रकार योगी लोग योगबल से माया पर
विजय प्राप्त करते हैं। लेकिन उस माया को जीतने के लिये तुमने हमें उससे भी आसान रास्ता खोल दिया है।
वयं त्विह महायोगिन् भ्रमन्तः कर्मवर्त्मसु।
त्वद्वार्तया तरिष्यामस्तावकैर्दुस्तरं तमः ॥ ४८ ॥
हे कृष्ण! तुम्हारे भक्तों का भजन करें, तुम्हारी कथावार्ता सुनें, बस इतने से ही मैंने तुम्हारी माया को पार
कर लिया है। कर्ममार्ग पर चलने वाले हम कर्मठ लोगों पर तुमने बहुत बड़ा उपकार किया है। तुम्हारी कथा के
श्रवण मनन से ही मोक्ष का द्वार खुलता है। मोक्ष की बात दूर ही रखें, हमें उसकी जरा भी इच्छा नहीं है क्योंकि
तुम्हारे भक्त जब तुम्हारी कथा श्रवण करते हैं तो उन्हें सांसारिक बाधाएँ नहीं सतातीं। तुम्हारी अभेद भक्ति प्रिय
होने के कारण हमें संसार में रहना ही अच्छा लगता है। जो भक्त होते हैं वे त्रिगुणों का भी सामना कर अत्यन्त
प्रेम के साथ भजन करते हैं।
स्मरन्तः कीर्तयन्तस्ते कृतानि गदितानि च।
गत्युत्स्मितेक्षणक्ष्वेलि यन्नृलोकविडम्बनम् ॥ ४९ ॥
प्रेमपूर्वक तुम्हारे चरित्र का श्रवण और कीर्तन करने से तुम स्वयं ही उनके संसार बन्धन का विच्छेद करते
हो। संसारभाव को दूर कर तुम उन्हें आत्मपद के निकट स्थान देते हो। इस प्रकार हम तुम्हारे भक्त तुम्हारे श्रवण-
अध्याय ७ से १२: उद्धव-श्रीकृष्ण संवाद, माया-स्वरूप एवं सत्संग-महिमा
१६० श्रीमद् एकनाथी भागवत
कीर्तन लाभ के लिये सहज ही पात्र हो जाते हैं। सहज कीर्तन करने से जब सचमुच इतना लाभ होता है तो
तुम्हारे मुख की कथाओं का गायन करने से तो तुम स्वयं को अर्पण कर दोगे। गोकुल में चलते समय तुम्हारे
कदमों की जो छाप पड़ी हुई है उसका जो आनन्दपूर्वक वर्णन करते हैं उन्हें तुम कन्धे पर बिठाकर निजबोध से
तथा कीर्तन के छंद से नाचते हो। हे गोपाल ! तुमने जो लीला की है उसका प्रेमपूर्वक गायन करने से उन सेवकों
के साथ तुम्हारी निकटता हो जाती है। तुम्हारे हास्यवदन का जो वर्णन करते हैं उन भक्तों का तुम ध्यान करते हो
और उनकी बातों से तुम स्त्री शूद्रों को समाधान देते हो। दृष्टि से तुम्हारा दर्शन सचमुच दृश्यातीत का दर्शन है,
तुम्हारी सर्वत्र दिखायी देने वाली सुन्दरता का जो कीर्तन में वर्णन करते हैं उनके पग-पग पर तुम अपने सर्वांग
को न्योछावर करते हो और अपना बड़प्पन त्याग कर उनके पास सर्वकाल रहते हो। हे ज्ञानश्रेष्ठ ! अपनी गुह्य
ज्ञानमुद्रा भी तुम उन्हें अर्पण करते हो और हे प्रबोधचन्द्र आत्मबोध देकर तुम उनका कल्याण करते हो।
रासक्रीडादि नाना प्रकार की लीलाएँ अथवा 'अंगनामंगनादि' प्रबन्ध में वर्णित तुम्हारी कीर्ति का जो गायन करते
हैं अथवा हे श्रीकृष्ण ! ब्रह्मदेव को ठग कर तुम ही गोपाल और बछड़ा कैसे बने थे उनका वर्णन जो भक्त गाता
है, उन्हें सभी भूतों में निजात्मता है यह प्रतीत कराकर तुम अपनी ही सत्ता उसे सौंप देते हो और हे कृष्णनाथ !
उनके कहने के अनुसार तुम आचरण करते हो। मनुष्य रूप धारण कर तुमने जो जो लीलाएँ कीं उन्हें प्रेम से गाते
हुए और सुनते हुए तुम्हारे भक्त तर गये। मैंने जब भी किसी चीज के लिए हठ किया उसे तुमने पूरा किया। ऐसा
होते हुए भी हे कृष्ण ! अब अन्त समय में तुम मेरी उपेक्षा कर क्यों जा रहे हो ?
श्रीशुक उवाच
एवं विज्ञापितो राजन् भगवान् देवकीसुतः ।
एकान्तिनं प्रियं भृत्यमुद्धवं समभाषत ॥ ५० ॥
श्री शुक्राचार्य कहते हैं—इस प्रकार देवकी के पुत्र अर्थात् पूर्णांश में पूर्ण भगवान श्रीकृष्णनाथ से उसके ही
सेवक उद्धव ने विनती की। उद्धव को श्रीकृष्ण का 'व्यक्तिगत सेवक' इसीलिये कहा क्योंकि श्रीकृष्ण अपने मन
की कोई भी गुप्त बात उससे कहते थे। रुक्मिणी की भी जहाँ पहुँच नहीं है, वसुदेव अथवा देवकी को भी जहाँ
स्थान नहीं है, प्रद्युम्न, बलिभद्र अथवा अनिरुद्ध को भी जहाँ जाने की मनाही है वहाँ कृष्ण के पास उद्धव हमेशा
रहता था। इसीलिये ज्ञानी लोग उसे 'एकांती' अर्थात् 'एकान्तभक्त' कहते हैं। श्रीकृष्ण के लिये जो चीज प्राणों से
भी प्यारी थी, उसे वह उद्धव को देता था इतना उस भक्त का असीम प्रेम था। अगर उद्धव उस चीज को लेने से
मना करता तो वह उसे मनाने के लिए उसके गले लग जाता था या पैर भी पड़ता था। भक्तों के प्रेम के आगे भक्त
इतना असहाय हो जाता है। इसलिए कृष्ण का अत्यन्त प्रिय भक्त उद्धव ही था। इसीलिये 'प्रिय', 'सेवक',
'एकांती' आदि उपाधियाँ उद्धव पर ही भली लगती हैं। इसीलिये उसने अपने स्वामी से यह विनती की। उद्धव
का भाषण सुनकर जिस प्रकार चातक के लिये मेघ द्रवित होता है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण प्रेम से प्रसन्न हो उठा।
चातक की प्यास होती ही कितनी है ? उसे तृप्त कर जिस प्रकार मेघ सारी पृथ्वी को हरियाली से भर देता है,
उसी प्रकार श्रीकृष्ण अब उद्धव के बहाने सारे त्रिभुवन को सन्तुष्ट कर देगा। उद्धव का भाषण सुनकर श्रीकृष्ण
डोलने लगा। भक्त का भाग्य श्रेष्ठ था इसलिये प्रेम की आर्द्रता उत्पन्न हुई। अब उस भक्तरूपी गीली भूमि में
श्रीकृष्ण आत्मबीज बोयेंगे और उसकी फसल सारे संसार के लिये पर्याप्त होगी। मुमुक्षुओं के लिये तो मानों
मुक्ति की राशि ही मिल गयी। गाय बछड़े के बहाने पूरे घर को दूध पिलाती है उसी प्रकार उद्धव के बहाने
छठां अध्याय १६१
श्रीकृष्ण पूरे संसार को शान्त कर देगा। घर में मेहमानों के लिये अनेक पकवान तैयार होते हैं, वे बच्चों को बिना
माँगे मिल जाते हैं। बच्चे वह पकवान नहीं खा सकते फिर भी माँ जबर्दस्ती उनके मुँह में ढूँसती है उसी प्रकार
जनार्दन ने हमारे साथ किया। अपना शेष प्रसाद हमें दे दिया। कैसी अपूर्व कृपा की कि कृष्ण ने उद्धव को जो
उपदेश किया उसका हमारी देशी भाषा में अर्थ करके हमें बताया। एका जनार्दन कहता है कि अब श्रोताओं को
सावधान हो जाना चाहिये। लेकिन मैं यह अब किस मुँह से कहूँ? वास्तव में अब उन्हें मुझे सावधान करना
चाहिये। निजभक्त ने ही प्रार्थना की है इसलिए वह भक्तपति अब आत्मज्ञान सुनाएगा। इसलिए अब उस बोध की
ओर ध्यान लगाइए। क्योंकि युक्तों की पसन्द तथा मुमुक्षुओं की इच्छा जिससे तृप्त होगी ऐसी कथा आगे आने
वाली है। उसे सुनने के लिये श्रवणरूप द्वार सहज ही खुलेगा। उद्धव ने यह श्रीकृष्ण को की हुई विनती नहीं
बल्कि भगवान कृष्ण अब आत्मज्ञान की वृष्टि करने के लिये तैयार हुए हैं, उसका लाभ उठाने के लिये लोग
आयें इसलिये उद्धव नगाड़ा पीट रहा है। अर्थतृषा से तृषित मोक्षमार्ग के प्रवासियों के लिये उद्धव ने यह बोध का
मानों पौसरा ही खोल दिया है। मेरी भक्तिरूपी माँ मुझे गोद में लेकर वहाँ ले गयी, जिसके कारण मुझे
जनार्दनरूप परमामृत प्राप्त हुआ। भगवान्! आपकी इस भक्ति का लाभ हमें सदा मिलता रहे। तुम्हारे पास मुक्ति
की माँग करना तो मूर्खता ही होगी क्योंकि यदि वास्तव में बद्धता हो तब तो मुक्तता की माँग करना उचित होगा
लेकिन जब वास्तव में बन्धन है नहीं तो मुक्तता की माँग करने से मूर्खता ही हाथ आयेगी। 'मैं' और 'तुम' के
अतिरिक्त तुम्हारी जो अभेद 'सहज स्थिति' है उसी का लाभ हमें होने दो। संतों के पास भी सदा-सर्वदा यही
माँगना है। अब कृष्णनाथ उद्धव से गुह्यज्ञान का उपदेश करेंगे। तो एका (एकनाथ) जनार्दन से विनती करता है
कि श्रवण करने के लिये मुझे दत्तचित्त करें।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादश स्कंधे एकाकार टीकायां
देवस्तुत्युद्धव विज्ञापनं नाम षष्ठोध्यायः ॥ ६ ॥
सातवाँ अध्याय
हे ओंकारस्वरूप चतुराक्षर देव ! चतुरों के मन को आह्लाद प्रदान करने वाले हे प्रबोध चन्द्र ! हे इन्द्रों के भी
इन्द्र जनार्दन ! हे ज्ञाननरेन्द्र ! निजबोधरूप ! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारी बात करते ही तुम भीतर से और बाहर से प्रकट
होते हो। हृदय की गाँठ खोलकर दृष्टि के सामने खड़े हो जाते हो। हे जनार्दन ! विषय वासनाओं का संहार कर तुम
स्वयं प्रकट हो जाते हो और मन को संसार अथवा असंसार की भावना का स्पर्श नहीं होने देते। तुम्हारे चरणों का
स्पर्श होते हुए मन स्थिर हो जाता है और फिर हे आनन्दधन अच्युत ! तुम सहज समाधान प्रदान करते हो। अब हे
गुरुनाथ ! आपके चरणों पर एकात्मभाव से माथा टेकता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि अगली कथा में जिसमें साक्षात
श्रीकृष्ण का भाषण है उसे श्रवण करें। जब उद्धव ने विनती की तो श्रीकृष्ण के मन में कृपा उत्पन्न होकर वह रोमांच
भर आया और उसने बड़े कौशल से आत्मज्ञान का विशद वर्णन करना प्रारम्भ किया। कृष्ण के मन में भी यह बात
थी कि निजधाम जाने से पहले मैं अपना निजज्ञान किसे सौंपूँ? इतने में उद्धव की भी व्याकुल दृष्टि पड़ी और
श्रीकृष्ण को बड़ा संतोष हुआ इसलिये उसने वैराग्ययुक्त सम्पूर्ण आत्मज्ञान का उपदेश करना प्रारम्भ किया। उद्धव
को ब्रह्मशाप से बचाने के लिये ब्रह्मज्ञान का उपदेश करना आवश्यक था क्योंकि ब्रह्मवेत्ता पर शाप की बाधा नहीं
होती यह बात श्रीकृष्ण को मालूम थी। ब्रह्मज्ञान का उपदेश मन पर किस प्रकार अंकित किया जाय यह कला
श्रीकृष्ण को पूर्णरूप से ज्ञात थी। इसलिये जिस युक्ति से आत्मतत्व से ही भेंट हो जाय ऐसा वैराग्य वह देखते-
देखते उत्पन्न कर देता था। किसी अन्य अच्छी युक्ति से बताने से वैराग्य उत्पन्न नहीं होता यह बात कृष्ण को मालूम
थी इसलिये उसने वैराग्य का निरूपण बहुत सुन्दर रीति से किया। कृष्ण ने पहले उद्धव के भाषण का अनुमोदन
किया और तदुपरान्त उसी सन्दर्भ के साथ धीरे-धीरे ज्ञान वैराग्य के सम्बन्ध में बताने लगा।
श्रीभगवानुवाच
यदात्थ मां महाभाग तच्चिकीर्षितमेव मे।
ब्रह्मा भवो लोकपालाः स्वर्वास मेडभिकाङ्क्षिणः ॥ १ ॥
जो वेदों का वेदवक्ता तथा ज्ञानियों को दान प्रदान करने वाला है उस श्रीकृष्ण ने कहा- हे भाग्यवान भक्त
उद्धव, सुनो! तुमने जो भावपूर्ण भाषण किया वह त्रिवार सत्य है और सचमुच मेरा मन्तव्य भी वही है। शंकर
आदि देवताओं को मेरी कितनी उत्कंठा लगी हुई है, वे सब झुण्ड के झुण्ड यहाँ आकर मुझसे मिले भी और मेरे
मन में प्रयाण की जो इच्छा थी उसके सम्बन्ध में भी उन्होंने बात की। इसीलिये तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा है।
शंकर आदि देवता उत्कंठा से मेरे वैकुण्ठ जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
मया निष्पादितं ह्यत्र देवकार्यमशेषतः।
यदर्थमवतीर्णोऽहमंशेन ब्रह्मणार्थितः ॥ २ ॥
पूर्व में जिसके लिये ब्रह्मदेव ने प्रार्थना की थी, वह देवताओं का कार्य मैंने पूरा कर दिया है। मनुष्यरूप
धारण कर बलराम की वरिष्ठता का सम्मान किया। लेकिन हम दोनों में छोटे-बड़े की कोई भावना नहीं है।
कृष्ण और बलराम में एकात्मता ही थी।
सातवाँ अध्याय १६३
कुल वैशापनिर्दग्धमङ्क्ष्यत्यन्योन्यविग्रहात्।
समुद्रःसप्तमेऽन्ह्येतां पुरीं च प्लावयिष्यति ॥ ३ ॥
अब हमारा कुल शापाग्नि से दग्ध होकर रह गया है। वह भी परस्पर कलह से नष्ट हो जाएगा। मैंने समुद्र
से जमीन माँग कर द्वारिका बसायी। मेरे निजधाम जाते ही वह उसे सातवें दिन डुबो देगा।
यह्र्येवायं मया त्यक्तो लोकोऽयंनष्टमंगलः।
भविष्यत्यचिरात्साधो कलिनापि निराकृतः ॥४॥
हे उद्धव! तुम्हें हित की बात बताता हूँ, सुनो। मेरे इस संसार को छोड़ कर जाते ही धीरे-धीरे लोगों की
बुद्धि का विनाश होगा। चारों ओर अधर्म मच जायगा, लोकनाशक होगा अमंगल। उस अमंगलता का कारण
बताता हूँ, सुनो। जब तक मैं इस सृष्टि में विचर रहा हूँ तब तक कली को आँख खोल कर देखने का साहस नहीं
है लेकिन मेरे जाते ही वह खड़बड़ा कर उठ बैठेगा। बाली का दुर्धर प्राबल्य होते ही ब्राह्मण अपना स्वधर्म त्याग
देंगे, दानधर्म में किसी को श्रद्धा नहीं होगी क्रियाकर्म के नाम पर केवल ढोंग ही दिखायी देगा।
न वस्तव्यं त्वयैवेह मया त्यक्ते महीतले।
जनोऽधर्मरुचिर्भद्र भविष्यति कलौ युगे ॥५॥
मेरे पृथ्वी छोड़ते ही कलि अत्यन्त प्रबल होकर ताण्डव मचायेगा। इसलिये इससे पहले कि कलि पृथ्वी
का स्पर्श करे तब तक तुम यहाँ से जाने की तैयारी कर लो। जब कलि का संचार प्रारम्भ होगा तब लोगों में
अधर्म बढ़ेगा, कुविद्या फैलेगी और निन्दा का प्रसार होगा। एक कौड़ी का भी लाभ नहीं होगा लेकिन निन्दा के
पर्वत उभरेंगे ऐसी खराब बस्ती है, कलियुग की। इसलिये तुम क्षण भर के लिये भी यहाँ न रहो।
त्वं तु सर्व परित्यज्य स्नेह स्वजनबन्धुषु ।
मय्यावेश्य मनः सम्यक् समदृग्विचरस्व गाम् ॥ ६ ॥
इसलिये हे उद्धव! अपने कल्याण के लिये तुम भी यहाँ से अकेले चले जाओ। धन, धान्य, समृद्धि त्याग दो,
जो भी कोई इष्ट, मित्र आदि हों उन्हें छोड़ो, भाई, बहन, स्त्री, बच्चे आदि किसी की भी आशा न करो। घर गृहस्थी
में आशा रख कर यदि तुम केवल शरीर से हे बाहर निकलोगे तो वह त्याग बहुत कठिन और अनर्थकारी होगा।
पहले स्नेह को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहिये, फिर अभिमान का त्याग करना चाहिये, तदुपरान्त वासनारूपी
जटाओं का मुंडन करना चाहिये और तब आश्रम के बाहर पैर रखना चाहिये। अब यह स्नेह कैसे छूटेगा ? अभिमान
को दण्ड कैसे मिलेगा ? यदि तुम्हें इसमें कठिनाई मालूम होती हो तो उसका भी उपाय बताता हूँ। मेरा जो सर्वव्यापी
स्वरूप है उसमें ही चित्त को रखकर निश्चयपूर्वक और सावधानी से उस आत्मस्वरूप में ही निरन्तर रहना चाहिये।
उस व्यापक स्वरूप में निश्चयपूर्वक अवधारणा करने से उस निजभाव के कारण चित्त तन्मय होकर उसे तद्रूपता
प्राप्त होती है। भृंगी भारी होती है और कीट मूर्ख होता है, फिर भी दृढ़ ध्यान के कारण वह तद्रूप होती है। सारांश
यही कि अभ्यास करने से कुछ भी कठिन नहीं है। वह गूढ़ अभ्यास मैंने तुम्हें स्पष्ट रूप से बतला दिया। मेरा
स्वरूप तो ज्ञानधन ही है और ध्यान करने वाला जीव भी संज्ञान है। इसलिये इस प्रकार ध्यान करने से वह भी तद्रूप
हो जाता है। वहाँ सारी समदृष्टि होने के कारण चित्त को समाधान प्राप्त होता है, उस समभाव को ही बढ़ा कर
यथास्थिति रहना चाहिये। पहले गृहस्थाश्रम को छोड़ें और फिर मैं कहाँ रहूँ यह विचार मन में आना स्वाभाविक है,
१६४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तो उसके बारे में भी सुन लो। स्वरूपसाम्य से समदृष्टि होती है, उस समदृष्टि से ही तुम सृष्टि में विचरण करते
रहो। रहने के स्थान के सम्बन्ध में न चिन्ता करो और न कोई योजना बनाओ। कुछ काल के लिये भी एक स्थान पर
रहने से उस स्थान के प्रति अभिमान हो जाता है। इस प्रकार बस्ती का विचार गलत है इसलिये तुम स्थान का प्रयत्न
मत करना। जब तुम सब में सर्वगत हो जाओगे, सर्वाधार और सर्वदेशी बन जाओगे तब तुम तद्रूप होकर मुझे पा
सकोगे और बिना हाथ पैर हिलाये निजधाम आ जाओगे। मुझे निजधाम ले चलिये ऐसा उद्धव ने कहा था तो
श्रीकृष्ण ने उसे आत्मबोध का उपाय बताया। यदि यह उपाय नहीं किया तो मेरी प्राप्ति कभी नहीं होगी। फिर तुम
निजधाम किस तरह आओगे ? यदि कहोगे कि गरुड़ पर बिठा कर मुझे ले चलें तो यहाँ पंखों की गति न होने के
कारण गरुड़ का वहाँ जाना सम्भव नहीं है। इसलिए जो साधक हैं वे उभय पक्ष छोड़कर मद्रूप हो जाते हैं लेकिन
गरुड़ को पक्ष का अभिमान है इसलिये वह वहाँ नहीं जा सकता। अब तुम कहोगे कि मुझे कन्धे पर बिठा कर ले
चलिये तो मुझे वास्तव में कन्धा ही नहीं है। इसलिये अहंबुद्धि का त्याग किये बिना तुम वहाँ नहीं जा सकते। बिना
अहंभाव छोड़े कितने ही उपाय क्यों न करो लेकिन निजधाम में प्रवेश नहीं होगा। जो भी साकार तुम देख रहे हो
वह सब नाशवान है। इस बात का तुम निजबोध से निश्चय करो।
यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः ।
नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायामनोमयम् ॥ ७ ॥
दृष्टि से जो भी देखा जाय वह सब दृश्यत्व के कारण नष्ट हो जाता है, कान को जो मालूम होता है वह
सब शब्दत्व से विलीन हो जाता है, वाणी जो भी बोलती है, वह सब वितंडावाद में डूब जाता है इसलिये वेदों ने
बोलना छोड़ा और 'नेति' शब्द से ही वह लजा गया। मन के संकल्प ने जो आकलन किया था वह सारा कल्पित
हो गया जो अहंकार पर आधारित थे वे विषय विजातीय होने के कारण व्यर्थ हो गये। इन्द्रियों को जितना दिखाई
देता है वह सारा नश्वर रहता है। यह सब नित्य-अनित्य के विचार से निश्चित हुआ है। लेकिन यह नित्य
अनित्य विवेक भी मायावी है यह ध्यान में रखो। कुल मिलाकर यह सारा लोक मायामय है और माया संकल्प
सृष्टि का ही सृजन करती है। संसार के रूप में जो कुछ दिखाई पड़ता है वह सारा माया का संसार है, इसलिये
तुम धैर्य धारण कर उसे पहचानो। स्वप्न का राज-वैभव जिस प्रकार एक भ्रम रहता है उसी प्रकार यह सारा
सांसारिक वैभव माया है, इसे ध्यान में रखो।
पुंसोऽयुक्तस्य नानार्थो भ्रमः सगुणदोषभाक् ।
कर्माकर्मविकर्मेति गुणदोषधियो भिदा ॥ ८ ॥
परमात्मा से जो विभक्त रहता है उस पुरुष को 'अयुक्त' कहते हैं। अपने एकमेवाद्वितीय अद्वैत आत्मस्वरूप
का विस्मरण होने के कारण उसे अनेकत्व से भेद का भ्रम होने लगता है। उस विस्मृति के भ्रम में मिथ्या भेद का
सत्याभास होने लगता है और भेददृष्टि के आवेश में गुणदोष दिखाई देने लगते हैं। यथार्थ में जब भेद ही नहीं
है तो शुद्ध वस्तु में गुणदोष दिखाई देने का प्रश्न ही नहीं उठता। भेद के जोर से ही गुणदोषदृष्टि उत्पन्न होती है
और कर्माकर्म की त्रिपुटी भेददृष्टि के ही कारण दृढ़ होती है। भेद ने बहुत खराब काम किया है। वह कर्म,
अकर्म, विकर्म, जन्म-मरणादि धर्म और स्वकर्म प्रकाशित करता है। कर्म और विकर्म से नरक की यातनाएँ
भोगनी पड़ती हैं और काम्य कर्म से स्वर्ग प्राप्त होता है इसलिये कर्म करके कर्ममुक्त होकर समाधान प्राप्त करना
चाहिये। अब तुम पूछोगे कि कैसा कर्म ? अकर्म का क्या लक्षण है ? विकर्म का क्या गुण है ? तो वह सब भी
सातवाँ अध्याय १६५
सुनो। काया वाचा और मन से जो कुछ किया जाता है वह कर्म है और सूक्ष्म स्फूर्ति का भान है वह कर्म का मूल
है। मन, वाणी अथवा देह में कर्म का बीज न उत्पन्न होना ऐसा जो 'अकर्म' है वह देहाभिमान वाले में कभी नहीं
होगा। जो सभी दृष्टियों से कर्म से अलग है जिसे कर्म का स्पर्श नहीं हो पाता, जो कर्मठ के योग्य नहीं है वही
यथार्थ में 'अकर्म' है ऐसा समझो। विधिनिषेध की चिन्ता किये बिना जहाँ विशेष कर्म बढ़ता है उसे 'विकर्म'
कहते हैं। यह अत्यन्त संकट में डालने वाली चीज है। सर्वसाधारण कर्म जब विकृत होकर उसमें बड़े-बड़े
विधिनिषेध उत्पन्न हो जाते हैं तो उसे 'विकर्म' कहते हैं। जो विधि के अनुसार नहीं होते वे 'निषेध' की ओर
मुड़ते हैं यह तो स्पष्ट ही है। जिसका आचरण करते समय त्रुटि होती है अथवा बाधा आती है अथवा जिसमें
आकुलता उत्पन्न होती है वह कर्म भी वास्तव में 'निषिद्ध' ही है। ऐसे विकारयुक्त कर्म का 'विकर्म' के रूप में
स्वरूप दिखलाया। इस प्रकार कर्माकर्म के विभाग तुम्हें स्पष्टरूप से दिखलाये। जीव की उत्पत्ति ही पहले
अविद्या के कारण होने से उसके कर्म भी अविद्यात्मक ही होते हैं। अब श्रीधरस्वामी ने किये हुए व्याख्यान की
विशेषता बताता हूँ, सुनो। 'जीव' परम अविद्यायुक्त है। नित्यक्रिया यही उसका 'कर्म', नित्यकर्म न करना यह
'अकर्म' और निषिद्ध कर्म 'विकर्म' है। ऐसे भेदयुक्त कर्माकर्मविकर्म की त्रिपुटी जब सृष्टि में बढ़ती रहती है
तभी गुणदोष बुद्धि के गर्भ में भेददृष्टि भी प्रबल होती है। जिसके कारण गुणदोषों में ही दृष्टि रह जाती है और
विधि निषेधजन्य गाँठें पड़ जाती हैं, वहाँ अभेद में भेद कैसे उत्पन्न होता है ? तो उसके बारे में भी सुनो। पुरुष एक
अकेला ही होता है लेकिन जब वह मनोरथ की महापूजा पर बैठता है तब वह ध्येय, ध्याता और ध्यान के बहाने
भेद का पागलपन शुरू करता है। वहाँ वह नाना प्रकार के उपचार, पूजा साहित्य आदि के बारे में सोचता रहता है।
इस प्रकार वह अकेलेपन में भी मनस्वी भेद बढ़ाता है। 'ध्येय' को उत्तम कहता है और जो ध्याता है उसे 'नीच'
मानता है इसलिये ध्यान गौण हो जाता है और गुणदोषों की वृद्धि करता है। ध्यान में विचित्र प्रकार के गुणदोष हैं,
ध्येय को वह 'परम पवित्र' कहता है और आचरण पवित्र नहीं है इसलिये वह स्वयं अपवित्र हो जाता है। इस
प्रकार ध्यान की दृष्टि से वह स्वयं ही अपने आप में गुणदोषों की त्रिपुटी और भेददृष्टि बनता है। वास्तव में स्वयं
ही ध्येय, ध्याता और ध्यान होते हुए उसे छोड़कर गुणदोषों का स्वरूप अवश्य ही बढ़ाता जाता है। उद्धव ! यह
सारी सृष्टि भेददृष्टि के कारण बढ़ी हुई है और उस भेद के कारण ही कर्म की त्रिपुटी बढ़ गयी है। भेद के प्रति
अनुराग जैसे-जैसे बढ़ता है, जैसे-जैसे विषय का प्रेम बढ़ता जाता है या इन्द्रियों का लाड़-प्यार किया जाता है
वैसे-वैसे यह संसार बढ़ता ही जाता है। साँप को अमृत पिलाया जाय तो जैसे उसका विष ही बनता है, उसी
प्रकार इन्द्रियों को सन्तुष्ट करने से दुःख बढ़ता जाता है।
तस्माद्युक्तेन्द्रियग्रामो युक्तचित्त इदं जगत्।
आत्मनीक्षस्व विततमात्मानं मय्यधीश्वरे ॥ ९ ॥
इसलिये बुद्धिमान पुरुष को इन्द्रियों के द्वार में विषय का प्रवेश ही नहीं होने देना चाहिये। जिस प्रकार विष
में पकायी हुई खीर को मुँह में डाले बिना फेंक देना चाहिये अथवा रस से भरे अमृत फल पर यदि सर्प ने अपना
विष फैला दिया हो तो उसे कौवे भी नहीं खाते क्योंकि वे जानते हैं कि ऐसा करने में उन्हें खतरा है, उसी प्रकार
विषयों का सेवन करते समय मुमुक्षुओं को भला अच्छा कैसे लगेगा ? रात-दिन, पग-पग पर उसमें आत्मघात के
चिह्न उन्हें दिखायी पड़ते हैं। जिन्हें उसमें आत्मघात नहीं दिखायी देता, ऐसे ही लोग विषयों का सेवन करते हैं।
जिस प्रकार उल्लू भरी दोपहरी को भी आधी रात समझता है, उसी प्रकार विषय सेवन से मुमुक्षु की अवस्था
होती है। क्योंकि उससे जन्म-मरण का भोग तो नहीं ही टलता, उल्टे उसका आत्मपतन अवश्य होता है। यदि
१६६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तुम कहोगे कि प्राणियों का जीवन तो विषयों पर ही निर्भर रहता है, उसका त्याग करके वे किस प्रकार जीवित
रहेंगे तो उसका भी सुगम मार्ग बताता हूँ, सुनो। विधिनियमों के अनुसार इन्द्रियों का निग्रह करने से चित्त शान्त
होता है, उसी प्रकार यदि इन्द्रिय और मन इन दोनों का निग्रह किया जाय तो यह त्याग उत्तम और सरल हो जाता
है। इन्द्रिय भले ही विषय की ओर प्रेरित हों लेकिन मन को उसमें प्रवेश नहीं करने देना चाहिये, यह भी एक
प्रकार का त्याग ही है। यदि यह शंका करोगे कि मन को विषय का बल होने के कारण वह विषय की आसक्ति
से चंचल हो जाता है और वह निश्चल कभी नहीं होगा, तो उसका भी उपाय सुनो। मेरा स्वरूप सर्वव्यापी है,
वह मन के अन्दर भी रहता है और बाहर भी। जहाँ-जहाँ मन जाएगा वहाँ-वहाँ वह भी रहेगा ही। चित्त को रहने
के लिये मेरा सिवा कोई स्थान नहीं है। वह स्वदेश में हो या परदेस में, रात-दिन मेरे अन्दर ही रहता है। इस
प्रकार निरन्तर आत्मस्वरूप को ही देखते रहने से वही चित्त सर्वव्यापक हो जायेगा। फिर इस चित्त में ही, तुम्हें
सारा जगत आदि से लेकर अन्त तक दिखने लगेगा। या फिर तुम्हारा जीवस्वरूप भी उत्तम है, उसमें ही यदि तुम
इस जगत को देखने लगोगे तो यह जगत ही तुम्हारा निर्व्यंग अंग बन कर रहेगा। चर तथा अचर, क्षुद्र और महान
आदि जो कुछ भी है उसे अपने जीवरूप में ही देखो। तुम कहोगे कि जीव तो एकदेशी है उसमें सारे जगत को
कैसे देखा जाय? सुवर्ण और अलंकार ये जिस प्रकार एकरूप हैं, उसी प्रकार जीव की मेरे साथ एकता करो।
चिन्तन से कीटक भ्रमर हो जाता है। उसी प्रकार आत्मदृष्टि से तुम भी तत्काल आत्मतत्त्व बन जाओगे। अरे!
नमक का टुकड़ा समुद्र में मिल जाने पर समुद्र की ही तरह बड़ा हो जाता है, उसी प्रकार तुम भी तत्काल मद्रूप
हो जाओगे। उस समय 'मैं' और 'तुम' का भेद अपने आप समाप्त हो जाएगा। उस समय तुम परमानन्दरूप
शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और सिद्ध बन जाओगे।
ज्ञानविज्ञानसंयुक्त आत्माभूतः शरीरिणाम्।
आत्मानुभवतुष्टात्मा नान्तरायैर्विहन्यसे ॥ १०॥
शास्त्र के श्रवण से ज्ञान दृढ़ होता है, मनन के अभ्यास से ज्ञान का विज्ञान होता है, इन दोनों का स्वरूप
ध्यान में लेने से तुम ब्रह्मस्वरूप हो जाओगे। अगर तुम पूछोगे कि स्वहित के लिये तुम्हारे चरणों का अखण्ड
भजन करते रहें और अगर उसमें विघ्न आ जाये तो क्या करें ? तो सुनो। दंभ और लौकिक बातों का विचार कर
जो भक्त फल की इच्छा का त्याग कर भजन करता है उसके विघ्न किस प्रकार आयेगा ? उसके मार्ग में विघ्नों
का नाश करने के लिये मैं यह धारदार चक्र लेकर उसके आगे-पीछे सदैव खड़ा रहता हूँ। उद्धव ! इस प्रकार जो
निजभाव से मेरा भजन करता है उसे बाधा पहुँचाने का साहस देवताओं में भी नहीं है। सारांश यह कि
ब्रह्मस्वरूप हो जाने के बाद चराचर की आत्मा तुम स्वयं हो जाओगे। चाहे स्थावर हो चाहे जंगम हो चाहे देव हो
या दानव हो सब जगह तुम ही तुम रहोगे। तुम्हारे अतिरिक्त अणुमात्र के लिये भी कुछ नहीं रहेगा। इसलिये
तुम्हारे लिये विघ्न किस प्रकार की बाधा उत्पन्न करेगा ? ब्रह्मादिक को ग्रसित करने वाला जो काल है उसकी भी
तुम आत्मा बनकर रहोगे। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने उद्धव की पीठ थपथपाते हुए यह बात कही। इस प्रकार बाह्य
बाधकता अपने आप नष्ट हो जाती है, संकल्प कल्पना बन्द हो जाती है, ब्रह्मानन्द की भोर होती है और कर्म का
रास्ता बन्द हो जाता है। ऐसा जो ब्रह्मानुभवी है उसके सामने कर्म दरिद्र अर्थात् निःसत्व हो जाता है, वेद उसके
सेवक बन जाते हैं और विधिविवेक कर्मचारी हो जाते हैं। यही बात मैं तुम्हें कितनी बार और कैसे समझाऊँ ? मैं
भी उसका आज्ञाधारक बन जाता हूँ। ऐसे भक्त जहाँ कहीं भी मेरी प्रतिष्ठा करते हैं वहाँ मुझे प्रकट होना पड़ता
सातवाँ अध्याय १६७
है। भक्त का वचन निभाने के लिये मुझे नरसिंहावतार में सूखी लकड़ियों में प्रकट होना पड़ा, दुर्वासा को मैं पीठ
पर लाद कर ले गया था। यह तो तुमने देखा ही था। अब यदि तुम कहोगे कि भगवान जिसका आज्ञाधारी बन
गया, उसका कर्म तो किंकर हो ही जायगा, फिर ज्ञाता विषय के नाम पर सहज ही स्वेच्छाचार करते रहेंगे। ज्ञाता
स्वेच्छा से विषयाचरण नहीं करते, उसका कारण भी सुनो। जिसका अभिमान दग्ध हुए वस्त्र की तरह रहता है
उसका प्रपंच का ध्यान मिथ्या हो जाता है और उसे विषयों का दर्शन भी मिथ्या लगता है। जिसे प्रपंच की चाह
रहती है विषयों से प्रेम रहता है, मनचाहे आचरण के प्रति आसक्ति रहती है वही संसार बन्धन के संकट में
फँसता है। किन्तु ज्ञाता को विषय के प्रति सत्यनिष्ठा नहीं रहती, इसलिये वह विषय भोग में कैसे लब्ध होगा?
अब ज्ञाता के कर्म का मर्म बताता हूँ, सुनो। ज्ञाता मनोधर्म को स्पर्श किये बिना ही सारी क्रियाओं और सारे धर्मों
का आचरण करते रहते हैं।
दोषबुद्धयोभयातीतो निषेधान्न निवर्तते।
गुणबुद्धया च विहितं न करोति यथार्भकः ॥ ११॥
श्लोक ११—गुणदोषातीत ज्ञाता मनमाने ढंग से कभी आचरण नहीं करता लेकिन वह स्वभाव से भीरू भी
नहीं होता। वह विहित कर्म करता है, लेकिन यह मैंने अच्छा किया है ऐसा अहंभाव भी नहीं रखता। कुम्हार के
चाक की तरह वह भाग्य के अनुसार चलता रहता है। न तो वृत्ति में संकल्प न मन में हेतु स्फुरता है ऐस कर्म ज्ञाता
केवल शरीर धर्म से ही करता है। इसलिये सत्कर्म करने से सिद्धि प्राप्त हुई यह घमण्ड उसे छू नहीं पाता अथवा
कर्म बीच में ही रुक गया तो इसके लिये उसके मन में बेचैनी नहीं होती। जिस प्रकार सोये हुए पुरुष के पीछे बाघ
बैठ जाये या सामने स्वर्ग का भोग विलास आ जाय तो उसे न उसका भय लगता है न प्रीति उत्पन्न होती है। उसी
प्रकार ज्ञाताओं की स्थिति रहती है। गुण अथवा दोष का विचार न कर जिस प्रकार बच्चे सहज रूप में खेलते रहते
हैं, उसी प्रकार ज्ञाताओं की स्थिति रहती है। कर्मप्राप्ति अभिमान के कारण घटती है, वह अभिमान ही जब वे त्याग
देते हैं तो फिर उसके बिना वे कैसे विचरण करते हैं? कर्म तो उनके हाथ से होने वाला नहीं है। ऐसा विकल्प यदि
तुम मन में लाओगे तो मैं तुम्हें बताता हूँ कि यह स्थिति दूसरों की समझ में आने लायक नहीं है, निरभिमानता यह
स्वानुभव है, दूसरों की समझ में वह कैसे आयेगा? भाग्य के अनुसार देह सहज रीति से सारी हलचल करता है
लेकिन अज्ञान के जोर से अभिमान की वृद्धि होती है और वह 'मैं कर्ता हूँ' ऐसी बातें करने लगता है। उस समय
गुरुवचनों के अनुसार ज्ञाताजन उचित अभ्यास के साथ अज्ञान के कारण उपजे अभिमान को समाप्त कर देते हैं।
उस समय शेष प्रारब्ध के अनुसार, निरभिमान से उनका देह आचरण करता रहता है अर्थात् ज्ञानसम्पन्न लोगों के सारे
कार्य केवल शरीर धर्म से ही होते रहते हैं। उन्हें 'अहेतुक' कहते हैं। बालक की उपमा देकर इस स्थिति का वर्णन
बताया। कृष्ण ने उद्धव से कहा, "अब निरभिमान के लक्षण बताता हूँ सुनो।" तब उद्धव मन ही मन आनन्दित
हुआ और ध्यान देकर सुनने लगा।
सर्वभूतसुहृच्छान्तो ज्ञानविज्ञाननिश्चयः।
पश्यन्मदात्मकं विश्वं न विपद्येत वै पुनः ॥ १२ ॥
पहले शास्त्रश्रवण से ज्ञान उत्पन्न होता है, तदुपरान्त उस ज्ञान के अनुभव से 'विज्ञान' प्राप्त होता है, ऐसे
ज्ञानविज्ञान से सम्पन्न होने पर वह निरभिमान होता है। इस प्रकार सचमुच की निरभिमानता हाथ आने पर उसमें
'शान्ति' का उल्लास उत्पन्न होता है। जबर्दस्ती चित्त को निश्चल करने का प्रयत्न करना अथवा दाँत पीसकर
१६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
परोपकार सहन करना इसे शान्ति कौन कहेगा ? आक्रोश से सहनशीलता लाने का प्रयास करना शान्ति नहीं है।
शान्ति क्षुब्ध न होने वाले समुद्र की तरह होती है। वह न कभी घटता है, न कभी बढ़ता है। सैकड़ों नदियाँ अपना
मटमैला जल समुद्र में डालती रहती हैं लेकिन समुद्र का जल मैला नहीं होता। उसी प्रकार स्वार्थ का विरोध करने
वाली अनेक विषमताओं का प्रहार होने पर भी उसके चित्त में जरा भी परिवर्तन नहीं होता। वही सच्ची 'शान्ति'
है। ऐसी शान्ति जिसे प्राप्त होती है वही समस्त प्राणिमात्र का सखा है, सबका चहेता वही है और सब का सुहृद
भी वही है। उसका सखाभाव भी बड़ा विचित्र है। वह अपनी मैत्री के लिये सर्वस्व अर्पण करता है, अपना स्वार्थ
सिद्ध करने के लिये वह किसी को फँसाता नहीं है जो कृपापात्र होता है उसी को उपदेश करता है। उसकी दृष्टि
अतर्क्य होती है, उसे सारी सृष्टि मद्रूप ही दिखाई देती है। उसने अपनी दृष्टि से जगत की और मेरी गाँठ बाँधी
रहती है। फिर वह जिधर भी देखता है उधर उसे मैं ही दिखाई देता हूँ। वह यदि मुझे नहीं देखता तो उसका वह
न देखना भी मैं ही होता हूँ। उसकी देखने की दृष्टि मैं स्वयं हो जाता हूँ और सारी सृष्टि के साथ-साथ मेरी और
उसकी दोस्ती जम जाती है। सारी सृष्टि ही जब मैं हो जाता हूँ तो 'वह और मैं' ये शब्द ही व्यर्थ हो जाते हैं। इस
प्रकार वह सर्वत्र समदृष्टि के योग से एकात्म होकर मुझमें ही वास करता है। इस प्रकार मनोधर्म ही छोड़ देने के
कारण जिसके लिये मैं सुगम हो जाता हूँ उसे वह जन्म कैसे मिलेगा जिसके कारण उसे दुर्धर दुःख भोगना पड़ता
है। माता की उदररूपी गुफा में रजस्वला के रुधिर में पिता के रेत द्वारा गर्भधारणा होकर संसार का प्रारम्भ होता
है। माँ के पेट में स्थित जीव जन्तु उसके नाक में, मुँह में, छाती में और मस्तक में प्रवेश करते हैं और वह प्राणी
नौ महीने तक विष्ठामूत्र में लिपटा पड़ा रहता है। जठराग्नि के दावानल में गर्भ का गोल पिण्ड तैयार होता है और
फिर उसमें से एक-एक अवयव तैयार होता है। हे नारायण ! वह गर्भ की वेदना और वहाँ की नाना प्रकार की
यातनाएँ तो असह्य होती हैं। उसके बारे में सुनकर ही घृणा होती है और फिर सबके अन्त में जो प्रसूति वायु उठती
है उससे तो सारे शरीर में बिच्छू के डंक जैसी वेदनाएँ होती हैं और बड़े संकट से योनि में से शरीर का जन्म होता
है। ऐसा अपवित्र जन्म उन उत्तम पुरुषों को कभी प्राप्त नहीं होता जिन्होंने निजधाम प्राप्त कर लिया है। वे
समदृष्टि के कारण स्वयं ही पुरुषोत्तमस्वरूप हो जाते हैं। उनके आगे पीछे मैं ही होने के कारण उनके लिये जन्म
का प्रश्न ही नहीं उठता। वे कलिकाल की परवाह न कर सीधे मत्स्वरूप हो जाते हैं। जहाँ जन्म ही नहीं रहता
वहाँ मृत्यु भी खाली हाथ लौट जाती है। इस प्रकार मेरे भक्त मेरा भजन कर उसके बल से ही मुझे प्राप्त करते हैं।
इतना कह कर कृष्ण ने उद्धव की पीठ थपथपायी और कहा, “चलो उठो, शीघ्रता करो, यही युक्ति साध्य करो
ताकि जीवन का कष्ट समाप्त हो जाय। मेघ के मुख से निकला हुआ जल चातक जिस प्रकार ऊपर ही ऊपर
ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार कृष्ण के भाषण का भी उद्धव ने आकंठ पान किया। चकोर जिस प्रकार
चन्द्रकिरण के लिए आतुर हो उठता है उसी प्रकार हरि के भाषण के लिये उद्धव उतावला हो गया। पक्षिणी के
बच्चे माँ के आने का समय होते ही जिस प्रकार नीड में आगे सरक कर प्रतीक्षा करते हैं। उसी प्रकार कृष्ण का
मुख देखकर उद्धव को अत्यन्त आनन्द हुआ और वह कानरूपी मुख से कृष्णामृत प्राशन करने लगा। "
श्रीशुक उवाच
इत्यादिष्टो भगवता महाभागवतो नृप।
उद्धवः प्रणिपत्याह तत्वजिज्ञासुरच्युतम् ॥ १३ ॥
शुक्राचार्य कहते हैं, हे परीक्षित् ! भगवान के हृदय में कृपा उत्पन्न हुई इसलिये उसने अपने महान भक्त को