सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 177

छठां अध्याय १६१
श्रीकृष्ण पूरे संसार को शान्त कर देगा। घर में मेहमानों के लिये अनेक पकवान तैयार होते हैं, वे बच्चों को बिना
माँगे मिल जाते हैं। बच्चे वह पकवान नहीं खा सकते फिर भी माँ जबर्दस्ती उनके मुँह में ढूँसती है उसी प्रकार
जनार्दन ने हमारे साथ किया। अपना शेष प्रसाद हमें दे दिया। कैसी अपूर्व कृपा की कि कृष्ण ने उद्धव को जो
उपदेश किया उसका हमारी देशी भाषा में अर्थ करके हमें बताया। एका जनार्दन कहता है कि अब श्रोताओं को
सावधान हो जाना चाहिये। लेकिन मैं यह अब किस मुँह से कहूँ? वास्तव में अब उन्हें मुझे सावधान करना
चाहिये। निजभक्त ने ही प्रार्थना की है इसलिए वह भक्तपति अब आत्मज्ञान सुनाएगा। इसलिए अब उस बोध की
ओर ध्यान लगाइए। क्योंकि युक्तों की पसन्द तथा मुमुक्षुओं की इच्छा जिससे तृप्त होगी ऐसी कथा आगे आने
वाली है। उसे सुनने के लिये श्रवणरूप द्वार सहज ही खुलेगा। उद्धव ने यह श्रीकृष्ण को की हुई विनती नहीं
बल्कि भगवान कृष्ण अब आत्मज्ञान की वृष्टि करने के लिये तैयार हुए हैं, उसका लाभ उठाने के लिये लोग
आयें इसलिये उद्धव नगाड़ा पीट रहा है। अर्थतृषा से तृषित मोक्षमार्ग के प्रवासियों के लिये उद्धव ने यह बोध का
मानों पौसरा ही खोल दिया है। मेरी भक्तिरूपी माँ मुझे गोद में लेकर वहाँ ले गयी, जिसके कारण मुझे
जनार्दनरूप परमामृत प्राप्त हुआ। भगवान्! आपकी इस भक्ति का लाभ हमें सदा मिलता रहे। तुम्हारे पास मुक्ति
की माँग करना तो मूर्खता ही होगी क्योंकि यदि वास्तव में बद्धता हो तब तो मुक्तता की माँग करना उचित होगा
लेकिन जब वास्तव में बन्धन है नहीं तो मुक्तता की माँग करने से मूर्खता ही हाथ आयेगी। 'मैं' और 'तुम' के
अतिरिक्त तुम्हारी जो अभेद 'सहज स्थिति' है उसी का लाभ हमें होने दो। संतों के पास भी सदा-सर्वदा यही
माँगना है। अब कृष्णनाथ उद्धव से गुह्यज्ञान का उपदेश करेंगे। तो एका (एकनाथ) जनार्दन से विनती करता है
कि श्रवण करने के लिये मुझे दत्तचित्त करें।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादश स्कंधे एकाकार टीकायां
देवस्तुत्युद्धव विज्ञापनं नाम षष्ठोध्यायः ॥ ६ ॥