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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 869 में से

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पृष्ठ 165

छठां अध्याय १४९
तुम ही हो। 'प्रकृति' और पुरुष ये दोनों तुम्हारी ही गोद में खेलते हैं। तुम माया से भी अधिक श्रेष्ठ हो, प्रकृति
पुरुषों से भिन्न हो, काल का दुर्धर काल तथा सभी संहारों का कर्ता तुम ही हो। हे मेघश्याम! हमारे उत्तम
निजसुख के लिए तुम्हारा चरण विस्तार ही कारणीभूत है। इसलिये हे पुरुषोत्तम! आपकी हमारे ऊपर सदा कृपा
रहे यही आप से प्रार्थना है।
अस्यासि हेतुरुदयस्थितिसंयमानांमव्यक्तजीवमहतामपि कालमाहुः।
सोऽयं त्रिणाभिरखिलापचये प्रवृत्तः कालो गभीरस्य उत्तमपूरुषस्त्वम्॥१५॥
हे श्रीपति! जगत की उत्पत्ति और स्थिति तुम से ही होती है और अंततः सबका संहार करने वाले निश्चित
रूप से तुम ही हो। तामस शक्ति का क्षोभ होने पर वह अन्त में सारी सृष्टि का प्रलय कर देती है। उस समय
समस्त जीव सूक्ष्मरूप से बीजरूप अव्यक्त में रहते हैं। जब उत्पत्ति का समय आता है तो यही सारे बीज अंकुरित
होते हैं और वे यथासमय पल्लवित होते हैं और उनमें पुष्प और फल लगते हैं। हे कृष्णनाथ! यदि आप यह कहें
कि यह तो गुण क्षोभ की अवस्था है, इसलिये मैं प्रलयकर्ता नहीं हूँ तो जिसे तुम्हारे स्वरूप का यथार्थ ज्ञान हो
जाता है उन भक्तों के लिये माया, महत्तत्त्व और जीव इन सभी भावों का विनाश होकर वे निजपद स्वरूप का
आनन्द भोगते हैं। हे कृष्णनाथ! तुम्हें उन सबका संहार करने में क्या कठिनाई है? इसलिए परिस्थिति के अनुसार
'महाकाल' यथार्थ में तुम ही हो। तुम संसार की स्थिति जानने नहीं देते। काल की गति तो तुमने अत्यन्त सूक्ष्म
बनाकर रख छोड़ी है। अंततः अपनी प्रकृति के विकारों का विनाश भी तुम ही करते हो। प्रलय का मूल आधार
लय, निमेष, घटिका, पल, अहोरात्र तथा त्रिकाल है जिसे 'त्रिनामी' कहते हैं। ऐसे प्रचण्ड मायामहत्तत्त्व का तुम
विनाश करते हो। इसलिये हे श्रीकृष्ण! हे ऋषीकेश! इस प्रकार तुम महाकाल हो।
त्वत्तः पुमान् समधिगम्य यथाऽस्थ वीर्यं धत्ते महान्तमिव गर्भममोघवीर्यः।
सोऽयं तयानुगत आत्मन आण्डकोशं हैमं ससर्ज बहिरावरणेरुपेतम्॥ १६॥
हे अनन्ता! कालान्तर में सृष्टि का निर्माणकर्ता भी तुम ही बन जाते हो और उस उत्पत्ति का पालनकर्त्ता
भी तुम-ही हो। तुम्हारी वीर्यशक्ति प्राप्त कर पुरुष को पुरुषत्व प्राप्त होता है इसीलिये वह प्रकृति को अंगीकार
कर उसमें गर्भादान करता है। उस समय वही प्रकृति महत्तत्त्व से गर्भवती होती है और पंचतत्त्वों को गर्भ में
धारण कर हिरण्यवर्ण के अण्डे को धारण करती है। वह वीर्य अमोघ तथा प्रबल होने के कारण वह प्रिया
विश्वाकार का बालक धारण करती है और उस अण्डे में सारा ब्रह्माण्ड रहता है। गर्भ को जिस प्रकार गर्भवेष्टन
होता है उसी प्रकार इस अण्डे को सात प्रकार का बाह्य आवरण रहता है। उसका परिमाण तुम ही निश्चित
करते हो। वे सप्त आवरण हैं, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, स्थूल अहंकार तथा अत्यन्त प्रबल क्रियासूत्र।
जिस प्रकार कठपुतली का एक सूत्रधार होता है उसी प्रकार उस गर्भ की सुरक्षा करने के लिये अंतरबाह्य तुम
ही रहते हो। ऐसे जगत की सृष्टि दो से ही हुई है। तीसरा कोई भी, कहीं भी नहीं दिखायी देता। सारी सृष्टि
दो ही वस्तुओं से भरी पूरी दिखायी देती है। दीपक जलाकर देखने पर भी तीसरा कोई नहीं दिखायी देता।
प्रकृति के बारे में सोचते हैं तो वह भी मिथ्या है। इस प्रकार किसी दूसरे के बिना अकेले तुम ही पूरा विश्व
बने बैठे हो। हे मल्लमर्दन श्रीकृष्ण! तुम अपनी कुशलता की चतुराई स्वयं प्रकट कर रहे हो। इस प्रकार तुम
अकेले ही कर्त्ता होने के कारण किसी में लिप्त नहीं होते। अब कर्म करते हुए भी तुम अकर्त्ता किस तरह हो
यह भी बताता हूँ, सुनो!