श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तव विक्रीडितं कृष्ण नॄणां परममङ्गलम्।
कर्णपीयूषमास्वाद्य त्यजत्यन्यस्पृहा जनः ॥ ४४॥
तुम्हारी नाना प्रकार की क्रीडाएँ तथा खेल जीवों को परम मंगलदायक होने के कारण लोग उस प्रिय तथा
निर्मल लीला का आस्वाद कर्णद्वार से करते हैं। तुम्हारी कीर्तिश्रवणामृत की मधुरता का आस्वाद कर्णों ने आधी
घड़ी के लिये ही लिया था कि उन्हें वह इतना मधुर लगा कि उसके आगे अमृत का माधुर्य भी फीका लगने
लगा। तुम्हारी ऐसी कीर्ति सुनते ही वासनाओं के साथ इच्छा समाप्त हो जाती है, इसलिये जो तुम्हारे भक्त हैं वे
तुम्हारी कीर्ति की सदा हृदय में धारण करते हैं। ऐसे श्रीकृष्ण का वियोग मुझे सहन नहीं होगा। आपके स्वामित्व
और आपके अच्छेपन का हमें व्यसन ही लग गया है।
शय्यासनाटनस्थानस्नानक्रीडाशनादिषु ।
कथं त्वां प्रियमात्मानं वयं भक्तास्त्यजेमहि ॥ ४५ ॥
सच पूछो तो तुम हमारे स्वामी हो लेकिन तुम मुझे अपने आसन पर बिठाते थे। हे श्रीकृष्ण! कोई मन की बात
कहनी होती थी तो मेरे सिवा तुम्हारा और कोई नहीं था। कोई कठिन कार्य करना होता तो उस समय तुम मेरी ही
राय लेते थे और जो राय मैं देता था वह तुम्हें उचित लगती थी। तुम भोजन करने जाते तो मेरी थाली अपने साथ
लगवाते थे और खाना खाते समय नाना प्रकार का विनोद करते हुए अपने थाली में की चीज मुझे खिलाते थे।
ब्रह्मदेवादि देवताओं को भी तुम्हारी पंगत का लाभ दुर्लभ था किन्तु मैं तुम्हारे साथ खाना खाने बैठता था और
तुम्हारी थाली में बचा हुआ खाना तो तुम स्वयं मुझे हिस्सेदार बना कर खिलाते थे। मेरा हाथ पकड़ कर तो तुम
अकेले एकान्त में बैठा करते थे। ब्रह्मदेव आदि देवताओं की कोई विनती होती तो उसे मैं तुम्हें सुनाता था। बिना
किसी के जाने तुमने रासक्रीडा की लेकिन वह गोपनीय बात मुझे बताकर तुमने मुझे गोकुल भेज दिया था। पलंग
पर सोयी हुई रुक्मिणी को जगा कर तुम मुझे अपने पास सुलाते थे। उस निद्रा के सुख के आगे बेचारी समाधि क्या
चीज है ? इस प्रकार तुम्हारी संगति में कितनी रातें काटीं उसकी कोई गिनती नहीं है। हे श्रीकृष्ण, फिर भी मुझे
छोड़कर तुम जा रहे हो ? हे कृष्ण ! जब तुम्हारा समय नहीं बीतता था तो तुम रुक्मिणी को भेजकर मुझे बुलवा लेते
थे और फिर हम दोनों बैठकर चौपड़ खेला करते थे। तुम जंगल में घूमने जाते थे तो रथ में मुझे बिठा लेते थे और
फिर हम दोनों साथ-साथ घूमते थे। क्या अब तुम मेरी संगति से ऊब गये? पानी में जलक्रीड़ा करते समय या
गोपियों के साथ हँसी-ठट्ठा करते समय भी मैं तुम्हारे साथ रहता था। स्नान करते समय तो मैं हमेशा तुम्हारे सामने
खड़ा रहता था। ऐसी कितनी बातें तुम्हें बताऊँ? हे श्रीपति ! रात को भी मैं तुमसे कभी अलग नहीं हुआ, फिर अन्त
समय में तुम्हारा साथ कैसे छोड़ूँ? तुम हमारे स्वामी, हमारे सखा, सारे जीवों का प्राण हो। हे पुरुषोत्तम ! हे
मेघश्याम ! तुम्हारा वियोग हमें कैसे सहन होगा? तुम्हारे श्रीचरण ही हमारा प्राण है। ऐसे इन चरणों के वियोग का
दुःख सहने का सामर्थ्य मुझमें नहीं है। तुम्हारे चरणों का सान्निध्य मुझमें नहीं है। तुम्हारे चरणों का सान्निध्य यही
हमारा सर्वस्व है, प्राण भी चले जाएँ तो भी उनका वियोग हमें सहन नहीं होगा। शरीर चाहे रहे या जाये लेकिन
तुम्हारे चरणों का वियोग हमें बिलकुल सहन नहीं होगा। तुम्हारा मोह अत्यन्त कठिन है। ब्रह्मदेव भी उस पर
नियंत्रण नहीं कर सकते। लेकिन हे श्रीकृष्ण! तुम्हारे शेषग्रहण के कारण मैंने उसे भी सुगमता से पार कर लिया।
त्वयोपभुक्तस्रग्गन्धवासोऽलंकारचर्चिताः।
उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव मायां जयेमहि ॥ ४६ ॥