श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 172, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें१५६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तन्निरीक्ष्योद्धवो राजन् श्रुत्वा भगवतोदितम्।
दृष्ट्वारिष्टानि घोराणि नित्यं कृष्णमनुव्रतः ॥ ४० ॥
बड़े-बड़े वीरों का जमघट, हाथियों और घोड़ों की घरघराहट, द्वारका में किसी को भी राह चलना कठिन
हो गया। प्रभास जाने की इतनी हड़बड़ी मच गयी। हे राजा परीक्षित ! सारी द्वारका ही जब खड़बड़ा कर निकल
पड़ी तो उद्धव के मन में वही बात आयी जो श्रीकृष्ण ने देवताओं से कही थी। शीघ्र ही कुल का विनाश करना
और आज से ही उसका मुहूर्त है ऐसा भगवान ने कहा था। उसी कार्य की आज भगवान ने शुरुआत कर दी ऐसा
उसने देखा। उद्धव हमेशा कृष्ण के साथ रहता था और कृष्ण की अनुमति से ही रहता था। स्वर्गस्थ देवताओं
तथा भगवान के बीच हुआ भाषण उसने सुना था। श्रीकृष्ण की उपस्थिति में जब यहाँ द्वारका में बड़े-बड़े उत्पात
हुए इसका अर्थ यही है कि यह सब श्रीकृष्ण की इच्छा से ही हुआ। यादवों को प्रभास ले जाकर यह क्षणार्ध में
उनका विनाश करा देगा क्योंकि श्रीकृष्ण अब निजधाम जाने के लिये उतावला हो गया है। लेकिन यदि उनका
विनाश ही करना था तो वह द्वारका में ही क्यों नहीं किया ? उन्हें इतनी दूर क्यों ले गये ? इसका कारण यह है
कि श्रीकृष्ण सर्वज्ञ था, उसे सब कुछ ज्ञात था और वह इस सबका सूत्रधार था। यादव वास्तव में देवांश थे और
द्वारका सातवीं मोक्षपुरी थी इसलिये यदि यहाँ उनका विनाश हुआ तो उन्हें सायुज्यमुक्ति प्राप्त होगी। यही सोच
कर श्रीकृष्ण ने यहाँ उनका विनाश नहीं किया क्योंकि उन्हें पदाभिमान है इसलिये उन्हें द्वारका में मृत्यु नहीं
आयेगी यह जानकर ही श्रीकृष्ण ने उन्हें प्रभास भेजा। ब्रह्मशाप का मूल कारण था वह मूसल जो प्रभास में उत्पन्न
हुआ था। यह बात श्रीकृष्ण जानते थे। इस प्रकार अपने कुल का विनाश कर श्रीकृष्ण निजधाम के लिये निकल
पड़ेंगे यह ध्यान में आते ही उद्धव के मन को बुरा लगा। उसका गला भर आया। आँखों से अश्रुधाराएँ बहने
लगीं। सारे शरीर से पसीना चुहचुहाने लगा और हिचकी आने लगी। कृष्ण वियोग यदि आधे क्षण का भी हो
जाता तो उसकी समझ में नहीं आता था कि क्या किया जाय ? वह कृष्ण के चेहरे की ओर एकटक देखता रह
गया। आने वाले वियोग के तीव्र घाव उसके हृदय में होने लगे। धैर्य के साथ-साथ उसकी बुद्धि भी स्तब्ध हो
गयी। मन बेचैन हो उठा। तब एकान्त है यह देखकर वह दौड़ कर श्रीकृष्ण के पास पहुँचा, उनके पैर पकड़
लिये और रोने लगा।
विविक्त उपसंगम्य जगतामीश्वरेश्वरम्।
प्रणम्य शिरसा पादौ प्राञ्जलिस्तमभाषत ॥ ४१ ॥
संसार का नियंता है काल और उसका नियंता जो श्रीकृष्ण है उसके चरणों पर मस्तक रखकर वह
विनयपूर्वक बोलने लगा।
उद्धव उवाच
देवदेवैश योगेश पुण्यश्रवणकीर्तन।
संहृत्यैतत्कुलं नूनं लोकं संत्यक्ष्यते भवान्।
विप्रशापं समर्थोऽपि प्रत्यहन्न यदीश्वरः ॥ ४२ ॥
उद्धव ने कहा "हे यादवेंद्र ! हे देवेंद्र के भी आदिन्द्र ! हे योगियों के ज्ञानचन्द्र ! तुम्हारा स्वरूप कलारहित
है। देवों में इन्द्र श्रेष्ठ है लेकिन तुम उस इन्द्र के भी इन्द्र हो। योगियों में शंकर श्रेष्ठ हैं लेकिन हे श्रीकृष्ण ! तुम