श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठां अध्याय १५७
उनके भी ईश हो। तुम्हारा श्रवण और कीर्तन पुण्य को भी पावन करता है। कीर्तन से संसार भवबन्धन टूटकर
समाधान प्राप्त होता है अपने कुल का विनाश कर तथा यह लोक छोड़ कर, हे श्रीकृष्ण तुमने निश्चय ही
निजधाम जाने का विचार किया है ?"
नाहं तवाङ्घ्रिकमलं क्षणार्धमपि केशव।
त्यक्तुं समुत्सहे नाथ स्वधाम नय मामपि॥ ४३॥
ब्राह्मण का शाप झूठ साबित करने की सामर्थ्य तुझमें होते हुए भी केवल निजधाम जाने के लिये ही तुम
अपने कुल का संहार कर रहे हो न? यह कहते समय उसे रुलाई आ गयी। उसे रोक न पाने के कारण वह जोर-
जोर से सुबकने लगा। आँसुओं से उसकी आँखें भर आयीं। ऐसी स्थिति में ही उसने दौड़कर श्रीकृष्ण के पैर
पकड़ लिये। चरणों पर मस्तक रखकर उसने कहा, हे श्रीहरि! तुम मेरे सखा हो, मेरे मालिक हो ऐसा होते हुए
तुम हमें छोड़कर कैसे जा रहे हो? हे अच्युत! तुम जा रहे हो यह सुनते ही मन में दुःख का जो कोलाहल मचा
है वह रुकता ही नहीं है। इसलिये मैं चाहता हूँ कि ऐसा वियोग न हो। जिस प्रकार पानी के बिना मछली
छटपटाती है, उसी प्रकार मेरे प्राण छटपटा रहे हैं। तो हे कृष्ण! आखिर अंतकाल में तुम मेरे प्रति इतने निष्ठुर हो
ही गये न? तुम्हारे जाने के बाद मैं दीन हीन हो जाऊँगा। फिर मीठी-मीठी बातें किसके साथ करूँगा? अब देह
में प्राण भी नहीं रह गया है। आत्मा निकल जाने पर देह केवल प्रेतरूप रह जाता है उसी प्रकार तुम्हारे निजधाम
जाने के बाद हमारी गति होगी। हमारा माता-पिता तू ही है ऐसा हमारा दृढ़ विश्वास है। ऐसा होते हुए, देखता हूँ
तुम हमें छोड़ कर कैसे जाते हो? इतना कहकर वह उनके कदमों पर लौट गया। तुम तो निजधाम के लिये चल
पड़े हो हो और हमें किसके हाथ सौंप रहे हो? हे पुरुषोत्तम! तुम मुझ पर क्यों रूठे हो? यह हमारे ही कर्मों का
फल है। तुम क्या करोगे? गूंगे बालक को जमीन पर रख कर जिस प्रकार माँ सती जाने के लिये निकल पड़ती
है और उस समय बालक जिस प्रकार व्याकुल हो जाता है वैसी ही अवस्था उद्धव की हुई। बंसी में लगा हुआ
स्वादिष्ट मांस का टुकड़ा मछली निगल भी नहीं पाती कि तब तक मछुआरा बंसी को झटका देकर उसे ऊपर
खींच लेता है, उसी प्रकार प्रेमविकृत उद्धव व्याकुल हो उठा। भगवान! आपके जाने के बाद मैं सेवा किसकी
करूँ? हे श्रीकृष्ण! तुम यथार्थ में ही हमारा भाग्य हो। ऐसा होते हुए तुम हम पर क्यों रूठ गये? कोई अन्धा
व्यक्ति अपने साथी को छोड़कर किसी गलत रास्ते से कँटीले जंगल में फँसकर असह्य हो उठता है, वैसी ही
उद्धव की अवस्था हुई। वह बार-बार दौड़ कर पैरों पर गिरने लगा। जोर-जोर से रोने लगा। कहने लगा मुझे
छोड़कर कहाँ जा रहे हो? मैं इन चरणों से दूर नहीं रह पाऊँगा। ये चरणकमल मैं एक क्षण के लिये भी नहीं
छोड़ पाऊँगा। हे गोपाल! तुम्हारा प्रयाण वास्तव में मेरे अन्तकाल का काल है। मुझे तुम्हारे संग की आदत लग
गयी है। इसलिये मुझे भी अपने साथ ले चलो। मेरी आपसे यही प्रार्थना है। श्रीकृष्ण मुझ पर इतनी कृपा करें।
तुम जब गरुड़ पर बैठोगे तो मुझे भी पीछे बिठा लो। लेकिन मुझे छोड़कर न जाओ। मुझे अपने निजधाम ले
चलो। जीवनभर मुझे साथ दिया और अब अन्त समय में क्यों मुझे दूर कर रहे हो? हे कृपासागर कृष्ण! इतनी
कृपा करो। अब तुम कहोगे कि मैं अपने ही कुल का काल बन गया हूँ, तुम्हारे लिये दयालु कैसे बना रहूँ?
लेकिन तुम कृपया ऐसा न कहो क्योंकि तुम दीनों के प्रति दयालु तथा भक्तों के प्रति स्नेहपूर्ण हो। भक्त पर
तुम्हारी कृपा है इसीलिये मैं तुमसे इतनी निकटता कर रहा हूँ। लेकिन हे श्रीहरि! मेरा उद्धार करो। मेरी विनय न
ठुकराओ।