श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
आज से ही उसका शुभमुहूर्त किया है। हे सखा ब्रह्मदेव! सुनो। एक बार इस कुल का नाश हो जाय तो फिर मैं
सचमुच ही निजधाम आऊँगा और वह भी तुम्हारे लोक के रास्ते से। श्रीकृष्ण ने कही हुई यह बात शंकर और
ब्रह्मदेव ने भी सुनी। समस्त देवताओं का समुदाय भी आनन्दित होकर आनन्द का घोष करने लगे। सब ने जोर-
जोर से जय-जयकार कर करतल ध्वनि की और श्रीकृष्ण के चरणों का वन्दन कर उन पर पुष्पांजलि अर्पित की।
श्रीशुक उवाच
इत्युक्तौ लोकनाथेन स्वयम्भूः प्रणिपत्य तम्।
सह देवगणैर्देवः स्वधाम समपद्यत ॥ ३२॥
शुक्राचार्य कहते हैं, हे राजा परीक्षित्! कृष्ण का यह भाषण सुनकर सुरवरों के मन में अत्यन्त आनन्द
उत्पन्न होकर उन्होंने उन्हें नमस्कार किया। ब्रह्मदेव, सूर्य, शंकर आदि देवताओं ने मिलकर कृष्ण को दण्डवत
किया और चरणस्पर्श कर वे चले गये।
अथ तस्यां महोत्पातान् द्वारवत्यां समुत्थितान्।
विलोक्य भगवानाह यदुवृद्धान् समागतान्॥ ३३॥
उधर श्रीकृष्ण को कुल का विनाश जल्द से जल्द करने का निश्चय करने की ही देर थी कि इधर द्वारका
में भयंकर उपद्रव होने लगे। आकाश में तिधारी केतु, धूमकेतु, दण्डकेतु आदि दिखायी देने लगे। शिखायुक्त
पुच्छलतारा भी आकाश में दिखायी देने लगा। भरी दुपहरिया में भूकम्प के धक्के लगने लगे, दिन में उल्कापात
होने लगे भूत नग्न होकर आकाश में नाचने लगे और क्रन्दन करने लगे। सियार नगर में घुस कर दिन दहाड़े
चौराहों पर चिल्लाने लगे। शहर में चारों ओर सियारों के चिल्लाने की आवाज सुनायी पड़ने लगी। उसे सुनकर
लोग भय से काँपने लगे। गाँव के अन्दर और बाहर श्वानों ने रोना शुरू किया। मार्जारों के कोलाहल का स्वर तो
गाँव के प्रत्येक घर में सुनाई पड़ रहा था। गायें मध्यरात्रि में गुहारने लगीं। बच्चे खेलते समय मारपीट करने लगे,
गिद्ध लोगों पर झपट्टे मारने लगे। उल्लू घर-घर बोलने लगे। लोगों की वाग्देवी क्षुब्ध हो उठी। वह कहने लगी,
अरे यम की सवारी आ गयी, क्यों व्यर्थ ही जल्दी-जल्दी दौड़ कर आग में कूद रहे हैं। ज्वालामुखी के विस्फोट
हुए, भूचाल के धक्के लगने लगे, धूप तो आग की तरह तपने लगी। हवा भी कम्प उत्पन्न करने लगी। ऊष्ण वायु
के झोंकों से शरीर झुलसने लगे। नगर में चारों ओर धूल उड़ने लगी और आँखों में भरने लगी। स्त्री-पुरुषों में
आँख खोलने की शक्ति नहीं रह गयी। चारों दिशाओं में जैसे धुंध छा गयी। शहर में रक्त की वर्षा होने लगी।
यह सब देखकर समस्त यादवगण भय से दिग्मूढ़ हो गये। उनमें जो वृद्ध थे उन्होंने विचार किया कि ये अनिष्ट
के संकेत हैं। किसी बड़े संकट की आशंका दिखायी देती है। यह सोच कर वे कृष्ण के पास आये और उन्होंने
कृष्ण को सारा वृत्तांत सुनाया। सभी यादवों को उद्विग्न हुआ देख श्रीकृष्ण ने बोलना प्रारम्भ किया।
श्री भगवानुवाच
एते वै सुमहोत्पाता ह्युत्तिष्ठन्तीह सर्वतः।
शापश्च नः कुलस्यासीद् ब्राह्मणेभ्योदुरत्ययः ॥ ३४॥
श्रीकृष्ण यादवों से कहने लगे कि ये जो दिन में पृथ्वी और आकाश में बड़े उपद्रव हो रहे हैं वे सब जगह
समान हैं। ये अशुभ चिह्न देखकर मुझे भी स्मरण हो आया कि हमारे यादवकुल को ब्राह्मण का शाप है। ये चिह्न