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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 869 में से

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पृष्ठ 169

छठां अध्याय १५३
ततः स्वधाम परमं विशस्व यदि मन्यसे।
सलोकाँल्लोकपालान्नः पाहि वैकुण्ठकिङ्करान् ॥ २७ ॥
इसलिये हे देवाधिदेव ! हे यादवराया ! हे श्रीकृष्ण ! हम सब तुम्हारे चरणों की बाट जो रहे हैं। कृपया
वैकुण्ठ चलने की तैयारी करें। हे देवकीनन्दन ! यदि आप चाहें तो इसी क्षण चलने की तैयारी करें। देवताओं की
सेना खड़े-खड़े आपकी प्रतीक्षा कर रही है। जो भी लोक या लोकपाल हैं उन पर आप कृपा करें। हम सब
आपके दास हैं इसलिये इन दासों की बात को सम्मान प्रदान करें। हे वैकुण्ठनाथ महाराज ! मुझे तथा शंकरादि
समस्त देवताओं को भी आपकी सेवा की उत्कंठा है।
श्रीभगवानुवाच
अवधारितमेतन्मे यदात्थ विबुधेश्वर।
कृतं वः कार्यमखिलं भूमेर्भारोऽवतारितः ॥ २८ ॥
ब्रह्मदेव का यह भाषण सुन कर योगज्ञानियों के मुकुटमणि श्रीकृष्ण ने अपनी मेघ गम्भीर वाणी से,
हास्यवदन होकर ब्रह्मदेव से बातें शुरू कीं। जैसे नादब्रह्म पूर्ण हो गया हो अथवा आत्मानन्द का फल पक गया
हो इस प्रकार श्रीकृष्ण ने बोलना प्रारम्भ किया। इससे कर्ण के भाग्य का उदय हो गया। उन्होंने गौरव के साथ
कहा, "ब्रह्मदेव! तुम्हारी भक्ति देखकर मैं अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ हूँ।" कहकर श्रीहरि उस समय पुत्रप्रेम से
आलिंगन देने के लिये उत्सुक हो गये और उन्होंने प्रेम से कहा, "हे देवेन्द्र ! तुम्हारा कहना सत्य है। हे
ब्राह्मणेन्द्र ! तुम्हारी विनती के अनुसार मैंने पृथ्वी का भार तो हल्का कर दिया। मैंने अपना कार्य पूर्ण किया है।
कुछ भी शेष नहीं रहा है। फिर भी एक बड़ा काम रह गया है और मेरे लिये वही समस्या है।"
तदिदं यादवकुलं वीर्यशौर्यश्रियोद्धतम्।
लोकं जिधृक्षद्रुद्ध मे वेलयेव महार्णवः ॥ २९ ॥
यद्यसंहृत्य दृप्तानां यदूनां विपुलं कुलम्।
गन्तास्म्यनेन लोकोऽयमुद्वेलेन विनङ्क्ष्यति ॥ ३० ॥
यहाँ हमारा जो यादवों का कुल है, वह वीर्य, शौर्य और वैभव से उन्मत्त हो गया है। अपने बल के घमण्ड
में वे धर्म का नाश करने पर तुल गये हैं। वे धर्म की जड़ें खोदना चाहते हैं लेकिन जिस प्रकार समुद्र को सीमाओं
ने नियन्त्रित कर रखा है, उसी प्रकार मैंने योगबल से उन्हें काबू में रखा है। उन्हें यदि इसी तरह यहाँ छोड़ कर
निजधाम के लिये चला जाऊँ तो ये अधर्म के लिए प्रवृत्त होंगे। उनका निस्तारण कौन करेगा ? समुद्र अपनी
मर्यादा तोड़कर उन्मत्त होने पर जब सारी चीजों को स्वाहा कर देता है तो उस पर कौन नियंत्रण कर पाता है ?
वैसी ही स्थिति होगी। ये अधर्मरत हो जाएँगे और आपके लिये संकट उत्पन्न करेंगे और तब आप ही उनकी
शिकायत लेकर मेरे पास आयेंगे। ये देवताओं के वश में नहीं आयेंगे, दैत्य अथवा दानवों से भी ये हार नहीं
मानेंगे और जब ये अधर्म का विद्रोह करेंगे उस समय आप ही शिकायत लेकर मेरे पास आयेंगे।
इदानीं नाश आरब्धः कुलस्य द्विजशापजः।
यास्यामि भवनं ब्रह्मन्नेतदन्ते तवानघ ॥ ३१ ॥
इसलिये हमारे इस यादव कुल का शीघ्र विनाश करने का निश्चय कर तथा उसको यथोचित बना कर