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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 869 में से

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पृष्ठ 171

छठां अध्याय १५५
इसी बात के सूचक हैं। ब्राह्मणों का शाप तो सच ही होकर रहता है। हरिहर भी उससे मुक्त नहीं हैं। इसलिये
आप इसी क्षण इस सम्बन्ध में विचार करें। पहले सबको गाँव के बाहर निकालिये।
न वस्तव्यमिहास्माभिर्जिजीविषुभिरार्यकाः।
प्रभासं सुमहत्पुण्यं यास्यामोऽद्यैव माचिरम्॥ ३५॥
यदि प्राणों की आशा हो तो हमें आज ही द्वारका छोड़कर प्रभास की ओर चलना पड़ेगा। सोच क्या
रहे हैं? शीघ्रता कीजिये। आज ही निकल चलिये। घर बार की आशा छोड़िये। अब यहाँ एक क्षण के लिये भी
न रुकिये।
यत्र स्नात्वा दक्षशापद्गृहीतो यक्ष्मणोडुराट्।
विमुक्तः किल्बिषात् सद्यो भेजे भूयः कलोदयम्॥ ३६॥
समस्त यादवश्रेष्ठ! सुनिये। प्रभासतीर्थ एक अत्यन्त पवित्र स्थान है। यहाँ स्नान करने से नक्षत्राधिपति
चन्द्रमा क्षय रोग से मुक्त हुआ। यक्ष ने अपनी सत्ताईस कन्याएँ चन्द्र को दी थीं। अन्य सबको छोड़कर वह
केवल एक रोहिणी के साथ रममाण हुआ। इसलिये दक्ष ने चन्द्रमा को शाप दिया जिसके कारण उसे क्षयरोग ने
ग्रस लिया। तब उसने यहाँ आकर स्नानादि कर्म किया। स्नान करते ही तत्काल उसका क्षयरोग दूर हो गया और
उसकी सारी कलाएँ उसे प्राप्त होकर वह अपने मूल तेज से प्रकाशित होने लगा।
वयं च तस्मिन्नाप्लुत्य तर्पयित्वा पितॄन्सुरान्।
भोजयित्वोशिजो विप्रान्नानागुणवतान्धसा ॥ ३७॥
हम भी वहीं पर स्नान, दान, पितृतर्पण करें तथा वेदशास्त्र सम्पन्न ब्राह्मणों का पूजन करें। नाना प्रकार के
पकवान तैयार कर उन्हें देवब्राह्मणों को समर्पित करें और यथाविधि दान-दक्षिणा दें।
तेषु दानानि पात्रेषु श्रद्धयोप्त्वा महान्ति वै।
वृजिनानि तरिष्यामो दानैर्नौभिरिवार्णवम् ॥ ३८॥
जिस प्रकार गीली भूमि में बीज बोया जाता है उसी प्रकार दान देने के लिये उत्तम ब्राह्मण देखकर उसे
श्रद्धापूर्वक उत्तमोत्तम दान देते रहना चाहिये। ब्राह्मण का मुख ही खेती लायक भूमि है। वह जड़ तथा पत्तियों से
विहीन होने पर भी पवित्र है। ऐसा उत्तम खेत देखकर ही उसमें चित्रविचित दानों की बोआई कीजिये। विनय की
उत्तम आर्द्रता, श्रद्धायुक्त निर्मल चाह, उसमें शमदमादि मजबूत बैलों से जुताई कर देनी चाहिये। इस प्रकार खेत
में बीज बोने से फसल लहलहाएगी और चारों पुरुषार्थ प्राप्त होंगे। जिस प्रकार नौका के बल से समुद्र के जल में
से तैर कर जाया जा सकता है, उसी प्रकार उस फसल के बल से हम सब पातकों को पार कर लेंगे।
श्रीशुक उवाच
एवं भगवताऽऽदिष्टा यादवाः कुलनन्दन।
गन्तुं कृतधियस्तीर्थं स्यन्दनान् समयूयुजन्॥ ३९॥
शुक कहते हैं, हे सुजान परीक्षित! सुनो। इस प्रकार प्रभास जाकर तीर्थ विधि करने के लिये श्रीकृष्ण ने
अनुज्ञा दी। तब यादवों का झुण्ड एक साथ निकल पड़ा। उन्होंने अपने घोड़े तैयार किये और एक के पीछे एक
दौड़ने लगे चारों ओर गड़बड़ी मच गयी।