श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० श्रीमद् एकनाथी भागवत
कीर्तन लाभ के लिये सहज ही पात्र हो जाते हैं। सहज कीर्तन करने से जब सचमुच इतना लाभ होता है तो
तुम्हारे मुख की कथाओं का गायन करने से तो तुम स्वयं को अर्पण कर दोगे। गोकुल में चलते समय तुम्हारे
कदमों की जो छाप पड़ी हुई है उसका जो आनन्दपूर्वक वर्णन करते हैं उन्हें तुम कन्धे पर बिठाकर निजबोध से
तथा कीर्तन के छंद से नाचते हो। हे गोपाल ! तुमने जो लीला की है उसका प्रेमपूर्वक गायन करने से उन सेवकों
के साथ तुम्हारी निकटता हो जाती है। तुम्हारे हास्यवदन का जो वर्णन करते हैं उन भक्तों का तुम ध्यान करते हो
और उनकी बातों से तुम स्त्री शूद्रों को समाधान देते हो। दृष्टि से तुम्हारा दर्शन सचमुच दृश्यातीत का दर्शन है,
तुम्हारी सर्वत्र दिखायी देने वाली सुन्दरता का जो कीर्तन में वर्णन करते हैं उनके पग-पग पर तुम अपने सर्वांग
को न्योछावर करते हो और अपना बड़प्पन त्याग कर उनके पास सर्वकाल रहते हो। हे ज्ञानश्रेष्ठ ! अपनी गुह्य
ज्ञानमुद्रा भी तुम उन्हें अर्पण करते हो और हे प्रबोधचन्द्र आत्मबोध देकर तुम उनका कल्याण करते हो।
रासक्रीडादि नाना प्रकार की लीलाएँ अथवा 'अंगनामंगनादि' प्रबन्ध में वर्णित तुम्हारी कीर्ति का जो गायन करते
हैं अथवा हे श्रीकृष्ण ! ब्रह्मदेव को ठग कर तुम ही गोपाल और बछड़ा कैसे बने थे उनका वर्णन जो भक्त गाता
है, उन्हें सभी भूतों में निजात्मता है यह प्रतीत कराकर तुम अपनी ही सत्ता उसे सौंप देते हो और हे कृष्णनाथ !
उनके कहने के अनुसार तुम आचरण करते हो। मनुष्य रूप धारण कर तुमने जो जो लीलाएँ कीं उन्हें प्रेम से गाते
हुए और सुनते हुए तुम्हारे भक्त तर गये। मैंने जब भी किसी चीज के लिए हठ किया उसे तुमने पूरा किया। ऐसा
होते हुए भी हे कृष्ण ! अब अन्त समय में तुम मेरी उपेक्षा कर क्यों जा रहे हो ?
श्रीशुक उवाच
एवं विज्ञापितो राजन् भगवान् देवकीसुतः ।
एकान्तिनं प्रियं भृत्यमुद्धवं समभाषत ॥ ५० ॥
श्री शुक्राचार्य कहते हैं—इस प्रकार देवकी के पुत्र अर्थात् पूर्णांश में पूर्ण भगवान श्रीकृष्णनाथ से उसके ही
सेवक उद्धव ने विनती की। उद्धव को श्रीकृष्ण का 'व्यक्तिगत सेवक' इसीलिये कहा क्योंकि श्रीकृष्ण अपने मन
की कोई भी गुप्त बात उससे कहते थे। रुक्मिणी की भी जहाँ पहुँच नहीं है, वसुदेव अथवा देवकी को भी जहाँ
स्थान नहीं है, प्रद्युम्न, बलिभद्र अथवा अनिरुद्ध को भी जहाँ जाने की मनाही है वहाँ कृष्ण के पास उद्धव हमेशा
रहता था। इसीलिये ज्ञानी लोग उसे 'एकांती' अर्थात् 'एकान्तभक्त' कहते हैं। श्रीकृष्ण के लिये जो चीज प्राणों से
भी प्यारी थी, उसे वह उद्धव को देता था इतना उस भक्त का असीम प्रेम था। अगर उद्धव उस चीज को लेने से
मना करता तो वह उसे मनाने के लिए उसके गले लग जाता था या पैर भी पड़ता था। भक्तों के प्रेम के आगे भक्त
इतना असहाय हो जाता है। इसलिए कृष्ण का अत्यन्त प्रिय भक्त उद्धव ही था। इसीलिये 'प्रिय', 'सेवक',
'एकांती' आदि उपाधियाँ उद्धव पर ही भली लगती हैं। इसीलिये उसने अपने स्वामी से यह विनती की। उद्धव
का भाषण सुनकर जिस प्रकार चातक के लिये मेघ द्रवित होता है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण प्रेम से प्रसन्न हो उठा।
चातक की प्यास होती ही कितनी है ? उसे तृप्त कर जिस प्रकार मेघ सारी पृथ्वी को हरियाली से भर देता है,
उसी प्रकार श्रीकृष्ण अब उद्धव के बहाने सारे त्रिभुवन को सन्तुष्ट कर देगा। उद्धव का भाषण सुनकर श्रीकृष्ण
डोलने लगा। भक्त का भाग्य श्रेष्ठ था इसलिये प्रेम की आर्द्रता उत्पन्न हुई। अब उस भक्तरूपी गीली भूमि में
श्रीकृष्ण आत्मबीज बोयेंगे और उसकी फसल सारे संसार के लिये पर्याप्त होगी। मुमुक्षुओं के लिये तो मानों
मुक्ति की राशि ही मिल गयी। गाय बछड़े के बहाने पूरे घर को दूध पिलाती है उसी प्रकार उद्धव के बहाने