श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 175, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठां अध्याय १५९
हे गोपाल ! मैं तुम्हारा दास होने के कारण, तुम्हारे चन्दन में से बचा हुआ चन्दन अपने ललाट पर लगाने में
तथा तुम्हारी माला अपने गले में डालने से कलिकाल भी मेरे सामने दीन-हीन हो जाता है। तुम्हारी कमर का
पीला पीताम्बर मेरी कमर में लग गया तभी मैंने काम को जीत लिया और वह दृढ़ होकर मेरी कमर से लग
गया। तुमने अपने हृदय पर लगा पदचिह्न मुझे दिया तभी माया मुझसे दूर चली गयी। वह तुम्हारे दासों के सामने
खड़ी भी नहीं हो सकेगी। सच तो यह है कि यदि माया का कोई चेहरा होता तो वह सामने खड़ी होती। लेकिन
वह तो स्वयं ही मिथ्या है। लेकिन लोग व्यर्थ ही परिश्रम कर रहे हैं। देखो। तुम्हारा उच्छिष्ट खाने के आगे
समाधि का सुख भी शरमा जाता है और आत्मानन्द परिपक्व हो जाता है। इस प्रकार तुम्हारी सेवा करके ही मैं
इतनी ऊँचाई तक पहुँचा हूँ। तुम्हारे ही अवशिष्ट का सेवन कर, मैं उस माया को भी तर गया हूँ जिसने योगियों
को भी भयाक्रान्त किया है।
वातरशना य ऋषयः श्रमणा ऊर्ध्वमन्थिनः।
ब्रह्माख्यं धाम ते यान्ति शान्ताः संन्यासिनोऽमलाः ॥ ४७ ॥
मिथ्या माया के भय से योगी गिरिकन्दराओं में छिप कर बैठ गये, लंगोटी भी छोड़ दी। फिर भी मन में
भय तो है ही। वे स्वस्तिकादि आसन लगाकर प्राणायाम करने के लिये मूलबन्ध से गात्रों का अवरोध कर दृढ़
धारणा करते हैं। नाक से निकलने वाली वायु को नियंत्रित करने के लिये अभ्यास करते हुए शरीर को कष्ट देते
हैं। भूख से ही भूख को खाते हैं, प्यास से ही प्यास का शमन करते हैं, इस प्रकार अत्यन्त निश्चयपूर्वक सुख
और दुःख पर विजय प्राप्त करते हैं। सद्बुद्धि को हाथ में लेकर इन्द्रिय वृत्तियों को नियंत्रण में रख तथा वैराग्य
की ख्याति सम्पादित कर ऊर्ध्व गति से चलने लगते हैं। मणिकर्णिका की ड्योढ़ी लाँघ कर ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश कर
फिर ब्रह्मगिरी पर विजय की दुंदुभि बजाते हैं। वहाँ उनके सर्वांग में शान्ति सुख का संचार होता है। सभी
संकल्पों का त्याग हो जाने के कारण वे स्वयं चिद्ब्रह्म ही हो जाते हैं। इस प्रकार योगी लोग योगबल से माया पर
विजय प्राप्त करते हैं। लेकिन उस माया को जीतने के लिये तुमने हमें उससे भी आसान रास्ता खोल दिया है।
वयं त्विह महायोगिन् भ्रमन्तः कर्मवर्त्मसु।
त्वद्वार्तया तरिष्यामस्तावकैर्दुस्तरं तमः ॥ ४८ ॥
हे कृष्ण! तुम्हारे भक्तों का भजन करें, तुम्हारी कथावार्ता सुनें, बस इतने से ही मैंने तुम्हारी माया को पार
कर लिया है। कर्ममार्ग पर चलने वाले हम कर्मठ लोगों पर तुमने बहुत बड़ा उपकार किया है। तुम्हारी कथा के
श्रवण मनन से ही मोक्ष का द्वार खुलता है। मोक्ष की बात दूर ही रखें, हमें उसकी जरा भी इच्छा नहीं है क्योंकि
तुम्हारे भक्त जब तुम्हारी कथा श्रवण करते हैं तो उन्हें सांसारिक बाधाएँ नहीं सतातीं। तुम्हारी अभेद भक्ति प्रिय
होने के कारण हमें संसार में रहना ही अच्छा लगता है। जो भक्त होते हैं वे त्रिगुणों का भी सामना कर अत्यन्त
प्रेम के साथ भजन करते हैं।
स्मरन्तः कीर्तयन्तस्ते कृतानि गदितानि च।
गत्युत्स्मितेक्षणक्ष्वेलि यन्नृलोकविडम्बनम् ॥ ४९ ॥
प्रेमपूर्वक तुम्हारे चरित्र का श्रवण और कीर्तन करने से तुम स्वयं ही उनके संसार बन्धन का विच्छेद करते
हो। संसारभाव को दूर कर तुम उन्हें आत्मपद के निकट स्थान देते हो। इस प्रकार हम तुम्हारे भक्त तुम्हारे श्रवण-