श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
लिये प्रार्थना की थी। जैसी हमने प्रार्थना की थी उसके विचार से आपने अपनी लीला से कुछ अधिक ही
धर्मवृद्धि की थी। हे पुरुषोत्तम ! हे घनश्याम ! तुम सर्वेश्वर और सर्वात्मा·हो इसलिये जो काम हमारी समझ में
नहीं आता वह भी आपने कर डाला।
धर्मश्च स्थापितः सत्सु सत्यसंधेषु वै त्वया।
कीर्तिश्च दिक्षु विक्षिप्ता सर्वलोकमलापहा॥ २२॥
जो सत्यवादी और साधु थे, तुम्हारे ही चरणों के प्रति जिनका संकल्प था उनके लिये तुमने यथार्थ रूप में
धर्म स्थापना की और अपनी यह कीर्ति तुमने दसों दिशाओं में फैलायी। सचमुच उसके श्रवण से त्रिभुवन पावन
हो जायेगा।
अवतीर्य यदोर्वंशे बिभ्रद्रूपमनुत्तमम्।
कर्माण्युद्दामवृत्तानि हिताय जगतोऽकृथाः॥ २३॥
हे श्रीकृष्ण! पूर्ण पुरुष होते हुए तुमने यादवकुल में जन्म लिया। तुम्हारे स्वरूप की शोभा की तो कोई
सीमा नहीं है। सबमें सर्वोत्तम तुम हो। तुम्हें देखते ही विचलित चित्तवृत्ति शान्त हो जाती है। इस प्रकार लीला से
देह धारण करने वाले तुम्हें देखकर सभी को मनोरम लग रहा है। तुमने अत्यन्त अद्भुत कर्म किये। बायें हाथ से
गोवर्धन पर्वत उठाया, मुख से बडवाग्नि को निगलकर गोपालों का संरक्षण किया। मृत हुए गुरुपुत्र को वापस ले
आये। गत गर्भों से देवकी को मिलाया और स्वयं गोपाल वत्स बनकर ब्रह्मदेव को भी भ्रम में डाल दिया। हे
श्रीकृष्णनाथ ! अनंता ! इस प्रकार जगत के हित के लिये तुमने अनेक प्रकार के चरित्र खेले।
यानि ते चरितानीश मनुष्याः साधवः कलौ।
शृण्वन्तः कीर्तयन्तश्च तरिष्यन्त्यञ्जसा तमः॥ २४॥
आपने यह अवतार लेकर अत्यन्त पावन तथा विचित्र कथाओं की रचना की और नाना प्रकार के चरित्र
कर दिखाये। साधुजन कलियुग में इन चरित्रों का श्रवण-कीर्तन कर त्रिगुणों के साथ मायामोह से मुक्ति पा लेंगे।
यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरुषोत्तम।
शरच्छतं व्यतीताय पञ्चविंशाधिकं प्रभो॥ २५॥
हे पुरुषोत्तम ! हे ऋषीकेशी ! इस यदुवंश में आपने अवतार लिया। उस अवतार को लिये कितने वर्ष बीत
गये यह भी मैं आपसे बताता हूँ। हे गोविन्दा ! मृत्युलोक में मनुष्य की आयु सीमा सौ वर्ष निर्धारित है। उस
मर्यादा को समाप्त होकर भी पचीस वर्ष बीत गये।
नाधुना तेऽखिलाधार देवकार्यावशेषितम्।
कुलं च विप्रशापेन नष्टप्रायमभूदिदम्॥ २६॥
तिस पर भी भूतल पर कोई देवकार्य शेष नहीं रह गया है। यादवकुल तो वैसे भी नष्टप्राय हो गया है।
मरणप्राय हाथी या जिसका पंख उखड़ गया हो ऐसे पक्षी की तरह यादवों की सेना भूमि के लिये भारस्वरूप हो गयी
है। जैसे फूस की टूटी झोपड़ी हो या जैसे राजकुमार को क्षयरोग जड़ जाय अथवा अग्नि में अजगर झुलस जाय उसी
प्रकार यादववीरों की स्थिति हो गयी है। ब्राह्मणों का शाप महाभयंकर होता है इसलिये यादवों का वीर्य, शौर्य, प्रताप
तथा शिखर तथा पहुँचा हुआ उनका घमण्ड यह सब नष्ट होकर उन सब पर मुर्दैनी छा गयी है।