श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठां अध्याय १५१
लीलायें हमने प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देखी हैं। जब नारायण को ही तुम्हारे प्रति इतना आदर है तो हमारी क्या
कथा है ? हे अच्युत ! गुणातीत श्रीकृष्ण ! तुम्हारा आरपार किसी की समझ में नहीं आयेगा। पहले भी आपने अनेक
अवतार लिये थे लेकिन उस समय ऐसे चरित्र नहीं दिखलाये। वेदविधि भी लज्जित हो गयी और आपने व्यभिचार
करने वालों को भी आत्मपद दे दिया। अगर तुम यह कहोगे श्रीकृष्ण कि मैंने उदासीन होकर उन स्त्रियों का भोग
किया, उससे आत्मज्ञान में कोई बाधा नहीं आयी। लेकिन श्रीकृष्ण! वैसा कुछ भी नहीं हुआ। वे स्त्रियाँ भी
साधारण नहीं थी। वे विलास में चतुर थीं और शृंगारयुक्त हावभाव करती थीं। नखरे के साथ शरीर की कमनीयता
का भी प्रदर्शन करती थीं और तुम्हें, पुरुषोत्तम को देखकर कामबाणों की भी वर्षा करती थीं। जिन बाणों के प्रहार
से इन्द्र के शरीर में भी हजार छेद हो गये, जिन प्रचण्ड बाणों ने शंकर को भी मोहिनी के जाल में फँसा दिया,
जिन बाणों की बौछार से तपस्वी लोग घबरा उठते हैं और वे घरबार छोड़कर भाग उठते हैं, ऐसे सोलह हजार
कामबाणों का प्रहार होते हुए भी तुम्हारा आत्मबोध नहीं ढला। तुम्हारा यह कैसा सामर्थ्य है। घर की सोलह हजार
तथा गोकुल की और मथुरा की स्त्रियाँ। लेकिन इतनी सारी स्त्रियाँ भी तुम्हें लंपट बनाने में समर्थ नहीं थीं। वे तो
तुम्हें लंपट नहीं बना सकीं, उल्टे तुमने ही उन्हें विषयरहित बना दिया। हे श्रीकृष्ण ! इस प्रकार तुम त्रैलोक्य के
स्वामी अर्थात् श्रेष्ठ हो। तुम्हारी ऐसी कीर्ति सुनने से या तुम्हारा चरणोदक लेने से संसार पवित्र हो उठता है।
विभ्व्यस्तवामृतकथौदवहास्त्रिलोक्याः पादावनेजसरितः शमलानि हन्तुम्।
आनुश्रवं श्रुतिभिरङ्घ्रिमङ्गसङ्गैस्तीर्थद्वय शुचिषदस्त उपस्पृशन्ति॥ १९॥
तुम्हारी कीर्ति का श्रवण करने से अंतःकरण के पातकों का क्षालन होता है और वृत्ति अत्यन्त प्रवृत्त हो
जाती है। उसी प्रकार तुम्हारे चरणों से निकली हुई गंगा समस्त पातकों का विनाश करती है। हे श्रीरंग ! आपका
चरणतीर्थ सारे जगत को पवित्र कर देता है। इसीलिये साधुजन इन दोनों तीर्थों का अखण्ड सेवन करते हैं जिसके
कारण वे परम पवित्र होकर समाधानपूर्वक निजात्मवृत्ति में लीन रहते हैं। हे श्रीपति ! अवतार के अन्त समय में
तुमने इन दो तीर्थों को प्रसिद्ध कर रखा है ताकि तुम्हारे दासों का तरना सम्भव हो सके।
बादरायणिरुवाच
इत्यभिष्टूय विबुधैः सेशः शतधृतिर्हरिम्।
अभ्यभाषत गोविन्दं प्रणम्याम्बरमाश्रितः ॥ २० ॥
शुक्राचार्य कहते हैं, हे राजा परीक्षित ! इस प्रकार सभी देवताओं ने भक्तिभाव से तथा आनन्दपूर्वक श्रीकृष्ण
का स्तवन किया। इस प्रकार स्तुतिस्रोत गाकर उन्होंने श्रीकृष्ण को सन्तुष्ट किया। समस्त देवताओं को अत्यन्त
कौतुक और प्रसन्नता हुई। यह स्तुति करने के लिए ब्रह्मदेव और शंकर सबके आगे आये थे, उन्होंने जय-जयकार
करते हुए दण्डवत किया। शेष सारे देवतागण विमान में हाथ जोड़कर बैठे थे। उन सबकी ओर से पुनः विनती
करते हुए ब्रह्मदेव आगे कहने लगे।
ब्रह्मोवाच
भूमेर्भारावताराय पुरा विज्ञापितः प्रभो।
त्वमस्माभिरशेषात्मंस्तत्तथैवोपपादितम् ॥ २१ ॥
हे यादवश्रेष्ठ ! श्रीधर ! पहले हमने आपसे सुरवरों को अभय देने के लिये पृथ्वी का भार कम करने के