श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
तत्तस्थुषश्च जगतश्च भवानधीशो यन्माययोत्थगुणविक्रिययोपनीतान्।
अर्थाञ्जुषन्नपि हृषीकपते न लिप्तो येऽन्ये स्वतः परिहृतादपि बिभ्यति स्म॥ १७॥
चर और अचर, स्थावर तथा जंगम आदि सारे जगत के स्वामी तुम ही हो। अब यह स्वामित्व कैसे आता
है यह सचमुच ही पूछते हो तो उसके बारे में भी स्पष्ट रूप से सुन लो। माया के योग से तुम स्वयं अनेक प्रकार
के भोग करते हो लेकिन वे भोग तुम्हारे शरीर को स्पर्श नहीं करते। क्योंकि अकर्त्तात्म बोध के कारण तुम
अलिप्त रहते हो। हे हृषीकेश! वह अकर्त्तात्मक बोध ऐसा होता है कि वह वेदशास्त्रों के लिये भी अतर्क्य है।
भोग्य, भोग और भोक्ता इन तीनों को प्रकाशित करने वाले तुम ही हो। जिस प्रकार सूर्य घट में प्रतिबिम्बित होने
पर भी घट से स्वभावतः अलिप्त ही रहता है, घट, जल और प्रतिबिम्ब इन तीनों को ही सूर्य स्वयं प्रकाशित
करता है लेकिन तिस पर भी वह स्वयं उनसे अलिप्त रहता है, उसी प्रकार हे श्रीकृष्ण! तुम भी भोग भोगते हुए
उससे अलिप्त रहते हो। अथवा कर्म, कार्य और कर्त्ता इन तीनों में ही निजआत्मा रहती है फिर भी तुम उससे
अलिप्त रहते हो। जो दर्पण के प्रतिबिम्ब से ही विलास करने को प्रवृत्त हुआ है उस पर कोई व्यभिचार का
आरोप कैसे लगा सकता है? जो स्वयं ही सारा संसार बन कर रहता है उस निजात्मयोगयुक्त योगी को कौन से
भोगों की बाधा सताएगी? ऐसे बोध के सामर्थ्य से जो विषयोपभोग कर रहा है उसके विषयों के स्पर्श से उसका
आत्मज्ञान कैसे मलिन हो सकता है? वह लेन-देन का व्यवहार करता रहता है, देखने में व्यावहारिक लगता है,
घर में रहता है, गृहस्थी चलाता है लेकिन यथार्थ में वह उसमें नहीं रहता है। इस प्रकार आत्मबोध का मार्ग बिना
जाने योगियों ने भोगों का त्याग अवश्य किया किन्तु शरीर में वासना होने के कारण उनका सारा शरीर काँपता
रहता है। वे स्वप्न में विषय को देखते हैं और नींद खुलने पर प्रायश्चित्त करते हैं। इसका कारण यह है कि
उनका अहंकार समाप्त नहीं हुआ होता और वे सदा भयभीत रहते हैं। विषय भय से कम्पित ऐसे लोगों को
आत्मबोध नहीं हुआ रहता लेकिन तुम वैसे नहीं हो। तुम अत्यन्त धैर्यवान हो और तुम्हारा आत्मबोध स्पष्ट
दिखायी देता है।
स्मायावलोकलवदर्शितभावहारिभ्रूमण्डलप्रहितसौरतमन्त्रशौण्डैः।
पत्न्यस्तु षोडशसहस्रमनङ्गबाणैर्यस्येन्द्रियं विमथितुं करणैर्न विभव्यः ॥ १८॥
शायद तुम अब कहोगे कि मैं धैर्यवान हूँ, आत्मज्ञान से परिपूर्ण हूँ ऐसा कौन कहेगा? तो हे स्वामी! मैं
उसके लक्षण तथा उदाहरण भी बताता हूँ, सुनो। घर में सोलह हजार स्त्रियाँ और गोकुल की अन्य स्त्रियों के
अलावा मथुरा में कुब्जा आदि मिश्र जाति की कुमारियों का भोग किया। यज्ञोपवीत भी नहीं हुआ था उसके पहले
ही तुमने ग्वाले की विकलांग लड़की का भोग किया। राह चलती भी कितनी पकड़ी होंगी इसका कोई हिसाब ही
नहीं है। हे हरि। इस प्रकार तुमने कितनी ही लड़कियों का भोग किया लेकिन तुम्हारा आत्मबोध मलिन नहीं हो
पाया। अर्जुन का हाथ पकड़ स्वयं क्षीरसागर में चले गये। शेषशायी नारायण को भी तुम्हारे दर्शन की उत्कंठा लगी
हुई थी इसलिये उसने जान-बूझ कर ही ब्राह्मणों के वस्त्रों का हरण कर लिया था। जिस प्रकार अपने ही स्वरूप
को देखने के लिए दर्पण लेना पड़ता उसी प्रकार कृष्णार्जुन को देखने के लिये ही नारायण स्वयं उन बालकों को
ले आये। "तुम नारायण के अवतार हो, तुम्हारा दर्शन लेने के उद्देश्य से ही मैं स्वयं ब्राह्मणों के लड़के यहाँ ले
आया।" इस प्रकार नारायण के मुख से निकले हुए शब्द हमने स्वयं सुने हैं। इसीलिये कहता हूँ, हे श्रीकृष्ण!
तुम्हारा आत्मबोध अगाध है। कितने ही काल पूर्व मरे हुए ब्राह्मणों के बच्चे तुमने ला दिये। तुम्हारी ही ये सारी