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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 869 में से

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पृष्ठ 178

सातवाँ अध्याय
हे ओंकारस्वरूप चतुराक्षर देव ! चतुरों के मन को आह्लाद प्रदान करने वाले हे प्रबोध चन्द्र ! हे इन्द्रों के भी
इन्द्र जनार्दन ! हे ज्ञाननरेन्द्र ! निजबोधरूप ! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारी बात करते ही तुम भीतर से और बाहर से प्रकट
होते हो। हृदय की गाँठ खोलकर दृष्टि के सामने खड़े हो जाते हो। हे जनार्दन ! विषय वासनाओं का संहार कर तुम
स्वयं प्रकट हो जाते हो और मन को संसार अथवा असंसार की भावना का स्पर्श नहीं होने देते। तुम्हारे चरणों का
स्पर्श होते हुए मन स्थिर हो जाता है और फिर हे आनन्दधन अच्युत ! तुम सहज समाधान प्रदान करते हो। अब हे
गुरुनाथ ! आपके चरणों पर एकात्मभाव से माथा टेकता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि अगली कथा में जिसमें साक्षात
श्रीकृष्ण का भाषण है उसे श्रवण करें। जब उद्धव ने विनती की तो श्रीकृष्ण के मन में कृपा उत्पन्न होकर वह रोमांच
भर आया और उसने बड़े कौशल से आत्मज्ञान का विशद वर्णन करना प्रारम्भ किया। कृष्ण के मन में भी यह बात
थी कि निजधाम जाने से पहले मैं अपना निजज्ञान किसे सौंपूँ? इतने में उद्धव की भी व्याकुल दृष्टि पड़ी और
श्रीकृष्ण को बड़ा संतोष हुआ इसलिये उसने वैराग्ययुक्त सम्पूर्ण आत्मज्ञान का उपदेश करना प्रारम्भ किया। उद्धव
को ब्रह्मशाप से बचाने के लिये ब्रह्मज्ञान का उपदेश करना आवश्यक था क्योंकि ब्रह्मवेत्ता पर शाप की बाधा नहीं
होती यह बात श्रीकृष्ण को मालूम थी। ब्रह्मज्ञान का उपदेश मन पर किस प्रकार अंकित किया जाय यह कला
श्रीकृष्ण को पूर्णरूप से ज्ञात थी। इसलिये जिस युक्ति से आत्मतत्व से ही भेंट हो जाय ऐसा वैराग्य वह देखते-
देखते उत्पन्न कर देता था। किसी अन्य अच्छी युक्ति से बताने से वैराग्य उत्पन्न नहीं होता यह बात कृष्ण को मालूम
थी इसलिये उसने वैराग्य का निरूपण बहुत सुन्दर रीति से किया। कृष्ण ने पहले उद्धव के भाषण का अनुमोदन
किया और तदुपरान्त उसी सन्दर्भ के साथ धीरे-धीरे ज्ञान वैराग्य के सम्बन्ध में बताने लगा।
श्रीभगवानुवाच
यदात्थ मां महाभाग तच्चिकीर्षितमेव मे।
ब्रह्मा भवो लोकपालाः स्वर्वास मेडभिकाङ्क्षिणः ॥ १ ॥
जो वेदों का वेदवक्ता तथा ज्ञानियों को दान प्रदान करने वाला है उस श्रीकृष्ण ने कहा- हे भाग्यवान भक्त
उद्धव, सुनो! तुमने जो भावपूर्ण भाषण किया वह त्रिवार सत्य है और सचमुच मेरा मन्तव्य भी वही है। शंकर
आदि देवताओं को मेरी कितनी उत्कंठा लगी हुई है, वे सब झुण्ड के झुण्ड यहाँ आकर मुझसे मिले भी और मेरे
मन में प्रयाण की जो इच्छा थी उसके सम्बन्ध में भी उन्होंने बात की। इसीलिये तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा है।
शंकर आदि देवता उत्कंठा से मेरे वैकुण्ठ जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
मया निष्पादितं ह्यत्र देवकार्यमशेषतः।
यदर्थमवतीर्णोऽहमंशेन ब्रह्मणार्थितः ॥ २ ॥
पूर्व में जिसके लिये ब्रह्मदेव ने प्रार्थना की थी, वह देवताओं का कार्य मैंने पूरा कर दिया है। मनुष्यरूप
धारण कर बलराम की वरिष्ठता का सम्मान किया। लेकिन हम दोनों में छोटे-बड़े की कोई भावना नहीं है।
कृष्ण और बलराम में एकात्मता ही थी।