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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

१४० श्रीमद् एकनाथी भागवत
ऐसा वह कर रही है। कृष्ण और उद्धव की मधुर कथायें सुनने का संयोग सचमुच कपिलाषष्ठी का योग है।
पर्वकाल की कसौटी बताने के लिये यह पंचाध्यायी तीव्रता से आयी है। उद्धव भवसागर सुरक्षित पार कर सके
इसलिये श्रीकृष्ण ने भागवत के रूप में यह सरज राह बना दी है। तैर कर जाने की अपेक्षा पैर से चल कर जाना
कभी भी अच्छा ही है। भागवतधर्म की राह अत्यन्त सरल है। वह मार्ग दिखाने के लिये पंचाध्यायी श्रीशूद्रों को
पुकार रही है। निरूपण का अगला भाग मधुर से मधुरतम होता जाएगा। उस कृष्ण वाक्यामृत की मिठास चखने
का यह पंचाध्यायी निमंत्रण दे रही है। कृष्णउद्धव संवाद में परब्रह्म का मानों अन्न छत्र ही शुरू हो जाएगा। वहाँ
स्वयं के सुख के लिये साधक तथा मुमुक्षुओं की भीड़ एकत्र होती जायगी। निश्चय ही परब्रह्म कृष्णरूप से
सशरीर उपस्थित हुआ है। उसका स्वरूप ज्ञानगौरव तथा मनोहर रूप का वैभव देखने के लिये स्वर्ग से देवतागण
आने वाले हैं। उन देवताओं द्वारा किया हुआ स्तोत्रपाठ, उसके साथ उद्धव का वैराग्य तथा कृष्ण उद्धव का
ज्ञानमय भाषण इन सबसे परमानन्द के सागर में उफान आने वाला है। उसकी रसीली कथा अगले अध्याय में
सुनायी जाएगी। तो अब श्रोतागण निजबोध की दृष्टि से ग्रथार्थ की ओर ध्यान दें। जिस प्रकार हम पतंग तैयार
करते हैं और स्वयं ही उड़ाकर जब वह अच्छी तरह उड़ने लगती है तो मन ही मन संतुष्ट होते हैं उसी प्रकार मेरे
नाम से कविता लिखकर सद्गुरु स्वयं ही वक्ता बन जाता है। इस प्रकार ग्रन्थ का अर्थ सुनाकर स्वयं ही श्रोता
के रूप आनन्दित होता है। अकेलेपन के बिना अकेलेपन से रहनेवाला एका (एकनाथ) और दूजापन के बिना
रहने वाला सखा जनार्दन वही ग्रन्थ का अगला भाग स्पष्ट रूप से बतला रहा है। दूजेपन का स्पर्श किये बिना
एकनाथ जनार्दन को शरणागत है। श्रोताओं के चरण पकड़ कर वही आगे का कथानक सुनाएगा। नाम दो होने
पर भी स्वरूप एक ही है। इसे जो जान लेगा वह स्वयं भी अत्यन्त सुख प्राप्त करेगा। एका जनार्दन के शरण में
होने के कारण उस पर उनकी पूरी कृपा है। उस जनार्दन की कृपा से ही पंचाध्यायी का यह निरूपण सम्भव
हुआ है।
इति श्रीभागवते महापुराणे एकादश स्कंधे वसुदेव नारद
संवादे एकाकारटीकाया पंचमोऽध्यायः ॥५॥

छठां अध्याय
हे ओंकारस्वरूप जनार्दन ! तुम्हें नमस्कार करता हूँ। भक्तिभाव से तुम्हारे चरणों में नमस्कार करने से जन के
साथ 'मैं' पन अपने आप नष्ट होता है। लिंगदोह का मर्दन इस का अर्थ जनों का अर्दन (नाश) है। इसीलिये तुम
'जनार्दन' इस नाम से प्रसिद्ध हो। हे जनार्दन ! तुम्हारा कर्म भी वैसा ही है। 'कर्म' अथवा 'कर्तापन' शेष रखे बिना
तुम भक्तों को जनता में सुख चैन से रखते हो। आनन्द से तुम्हारा नाम लेने पर तुम जीव का जीवभाव ही हरण कर
लेते हो और फिर भी कृपालु बने रहते हो। तुम्हारे नाम की शक्ति असीम है। उसके आगे कलिकाल भी सिर नहीं
उठा पाता और चारों युक्तियाँ दासी बन कर रहती हैं। नाम का दान ही जब इतना अपार है तो तुम्हारा साक्षात रूप
किसकी समझ में आयेगा ? इसलिये जानने और न जानने की बात छोड़कर शान्त बैठे रहना ही श्रेयस्कर है। यदि
तुम्हारे स्तुतिस्रोत गाने का विचार करें तो श्रुतिशास्त्रों ने भी हार मान ली है, उनके आगे मेरे टेढ़े-मेढ़े बोल किसे
अच्छे लगेंगे ? इसलिये हे कृष्णस्वरूप जनार्दन ! मौन ही तुम्हारा स्तुतिपाठ है तुम्हारे प्रति आकुलता ही तुम्हारा
कीर्तन है और कुछ भी न करना ही तुम्हारा अनुसंधान है। ऐसा होते हुए भी मुझे तुम्हारे प्रति व्याकुलता बढ़ रही है।
तो हे गुरुराया ! कृपा कर इस ओर ध्यान दें। जैसे जुगनूं चन्द्रमा को प्रकाशमान करने का विचार करे अथवा मक्खी
गरुड़ को अपने कन्धे पर उठाने की सोचे उसी प्रकार मैंने मूर्ख होते हुए एकादश स्कन्ध पर टीका लिखने का
विचार किया है। किन्तु हे गुरुनाथ, इस सम्बन्ध में आप मुझ पर पूर्ण कृपा करें और ग्रन्थ रचना में यथार्थ अर्थ साधं
कर मेरी मनोकामना को सार्थकता प्रदान करें। ऐसी विनती सुनते ही श्रीगुरु ने कृपा का वरदहस्त मस्तक पर रखा।
तभी यथार्थता के दीप से ग्रन्थ पर प्रकाश पड़ा। कृपा की करनी अगाध है क्योंकि उसके होते ही अर्थ चिन्तामणि
की खान ही खुल गयी और कवि के गुण तथा साहित्य बाहर आने लगा। तैयार आभूषण पहनने में हिचकिचाहट
किस बात की ? कठपुतली से ताल साधने में कठपुतली को किस बात का कष्ट है ? अपने ही पत्तल में से पकवान
लेकर बालक अपने पिता के मुँह में डालता है, जिससे बाप को सन्तोष और आनन्द प्राप्त होता.है। वैसी ही यह बात
है। ग्रन्थ भी तुम ही हो और कविता भी तुम ही हो तो फिर 'मैं कर्ता हूँ' यह अलंकार कौन उठाये ? गुरु ने 'अहंता'
तो नष्ट कर ही दी साथ ही 'सोहंता' भी शेष नहीं रहने दी। इसलिये मैं एक 'कवि' या 'कर्त्ता' हूँ यह भावना भी
मुझमें नहीं रही। लौकिक अहंकार का त्याग करते समय एक दूसरा अहंकार 'शिवोऽहं' पीछे लग गया। इसलिये
जो स्वयं को पागल कहता है वही सबसे बड़ा चतुर अर्थात् ज्ञाता है। इसलिये हे श्री गुरुनाथ ! आपके चरणों पर
मस्तक रखकर कहता हूँ कि 'कर्ता' तुम ही हो। अस्तु पाँचवें अध्याय के अन्त में नारद ने यही रहस्य बताया कि
श्रीहरि ही साक्षात परमात्मा है तथा वह 'लीलादेह' धारण कर आपके घर में अवतरित हुआ है। आपके घर में
रहकर वह अनेक अद्भुत लीलाएँ कर रहा है यह आपका अहोभाग्य है। यह श्रीकृष्ण ईश्वरों का भी ईश्वर है तथा
बैकुण्ठ का स्वामी है। यह साक्षात परमात्मा परेश तथा जगदीश है। नारद के इसी भाषण को प्रमाणस्वरूप मानकर
सारे देवतागण श्रीकृष्ण की प्रार्थना करने के लिये द्वारका में एकत्र हुए।
श्री शुक उवाच
अथ ब्रह्मात्मजैर्देवैः प्रजेशैरावृतोऽभ्यगात्।
भवश्च भूतभव्येशो ययौ भूतगणैर्वृतः ॥ १ ॥

१४२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
शुक्राचार्य बोले, हे राजा परीक्षित! श्रीकृष्ण की मूर्ति देखने के लिये स्वर्ग के समस्त देवता द्वारका में
एकत्र हुए और उन्होंने विचित्र स्तुति की। श्रीकृष्ण मूर्ति का कौतुक देखने के लिये चतुर्मुख ब्रह्मदेव, पंचमुख
शंकर तथा षण्मुख कार्तिकस्वामी पधारे। पहले प्रजा की उत्पत्ति करने के लिये प्रजापति नियुक्त थे। वे भी
कृष्ण की मूर्ति देखने के लिये द्वारका आये। आत्मस्वरूप में ही रममाण होकर जो सभी कर्मों से निवृत्त हो गये
हैं ऐसे निष्काम भक्त सनकादिक भी सकाम होकर साँवली घनश्याम मूर्ति को देखने आये। सर्वभूतनायक जो
रुद्र हैं वे ग्यारहों जन भूतगणों के साथ श्रीकृष्ण को देखने आये और तो और जो भूत भविष्य का त्रिकाल ज्ञाता
महादेव है वह भी अपने सारे गणों का समुदाय लेकर श्रीकृष्ण को देखने के लिये द्वारका में आये। श्रीकृष्ण को
देखने की आतुरता शंकर में इतनी अधिक हो गयी थी कि उसे देखने के लिये दौड़ कर आते समय उसकी
जटायें भी खुल गयी थीं।
इन्द्रो मरुद्भिर्भगवानादित्या वसवोऽश्विनौ ।
ऋभवोऽङ्गिरसो रुद्रा विश्वे साध्याश्च देवताः ॥ २ ॥
गन्धर्वाप्सरसो नागाः सिद्धचारणगुह्यकाः ।
ऋषयः पितरश्चैव सविद्याधरकिन्नराः ।
द्वारकामुपसंजग्मुः सर्वे कृष्णादिदृक्षवः ॥ ३ ॥
उनचास मरुद्गणों के साथ स्वयं इन्द्र भक्तिभाव से श्रीकृष्ण को देखने आया। सूर्यमण्डल छोड़कर बारह
आदित्यों का मेला कृष्ण की शोभा देखने के लिये तृषित होकर आया। आँखों में सूर्य की स्थापना होने के
कारण सारी चीजें दिखायी देती हैं, किन्तु सूर्य भी कृष्णदर्शन न होने के कारण अन्धा हो गया था। श्रीकृष्ण का
मुखकमल देखते ही सूर्य की आँखों पर का परदा हट गया फिर सूर्य स्वयं सर्वांगसुन्दर हो गया। तीनों अग्नि
(गर्दपत्य, दक्षिण तथा आह्वानीय) तेजःपुंज अवश्य है किन्तु धुएँ से उनका तेज ढँक गया था। कृष्ण को देखते
ही उन पर छाया हुआ धुँआ हट गया और वे अपने मूल तेज से चमकने लगे। आठों वसुओं का मेला भी
कृष्णलीला देखने आया था। श्रीकृष्ण को देखते ही उन्होंने कहा, यह तो साक्षात मदन का पुतला है। लेकिन
उन्हें वह कृष्ण की गोद में खेलता हुआ दिखायी दिया। अश्विनीकुमार स्वयं धन्वंतरी थे, लेकिन वह भवरोग से
अत्यन्त त्रस्त थे, कृष्णदर्शनामृत से वे भी क्षणमात्र में रोगमुक्त हो गये। ऋषभदेव, आंगिरस तथा असाधारण
धैर्य के स्वामी रुद्र भी आये। विश्वेदेव, साध्यदेव आदि अनेक देवताओं से आकाश भर गया था। अपनी गायन
कला के बारे में गन्धर्व को बड़ा घमण्ड था लेकिन कृष्ण की मुरली का गायन सुनकर वह चूर-चूर हो गया।
उन्हें दर्शन की उत्कंठा लगी हुई थी और वे क्षण प्रतिक्षण उसकी बाट जोह रहे थे। कृष्ण ने कृपादृष्टि से ही
उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता सरस गायन कला प्रदान की। अप्सरायें कह रही थीं, 'हमारी तरह कोई भी नृत्यकला
में पारंगत नहीं है।' लेकिन कालिया सर्प के फन पर नाचते हुए कृष्ण ने एक ही ताल में उन्हें लज्जित कर
दिया। वे अप्सराएँ इतना-सा मुँह लेकर दर्शन के लिये आयी थीं, उन नृत्यांगनाओं को भी नेत्र संकेत से ही
नृत्य में प्रवीण कर दिया। श्रीकृष्ण को देखने के लिए पाताल से नाग भी आये थे। इतना ही नहीं तो अनेक
सिद्ध, चारण, विद्याधरों के सभी समुदाय आये हुए थे। ऐसे विमानों के झुण्ड के झुण्ड द्वारका में सट कर खड़े
थे। इतने बड़े-बड़े देवतागण श्रीकृष्ण की मूर्ति देखने के लिए उल्लासपूर्वक आये हुए थे।

छठां अध्याय १४३
वपुषा येन भगवान्नरलोकमनोरमः ।
यशो वितेन लोकेषु सर्वलोकमलापहम् ॥ ४ ॥
श्रीकृष्ण ने जिस अवतार शरीर से अनेक प्रकार की युक्तियों से दुराचारी लोगों को संसार से तारने के लिए
अपनी कीर्ति का विस्तार किया, जिस कीर्ति को ध्यानपूर्वक सुनने से सचमुच ही चतुर्विद्ध प्रायश्चित्तों की गति ही
रुक जाती है, भक्तिभाव से जिसका नाम लेने से सभी पाप भस्म हो जाते हैं उस श्रीकृष्णरूपी पुरुषोत्तम ने सृष्टि
के विश्राम का स्थल देखा। जिसका सुरेखित शरीर, सुरनरों में अत्यन्त मनोरम दीखने वाला वह घनश्याम देखकर
सबके मन को समाधान हुआ। किरीटकुण्डल तथा मेखला पहिना हुआ, कटि में जरी का पीताम्बर परिधान किया
हुआ तथा गले में वनमाला होने के कारण वह घननील अत्यन्त शोभायमान लग रहा था। सौन्दर्य और गुणों का
वह मानों भण्डार ही था और अवतार मालिका का मुख्य रत्न श्रीकृष्ण उन्होंने देखा और उसका निवास स्थल
द्वारका भी सभी देवताओं ने देखी।
तस्यां विभ्राजमानायां समृद्ध्यायां महर्द्धिभिः ।
व्यचक्षतावितृप्ताक्षाः कृष्णमद्भुतदर्शनम् ॥ ५ ॥
कृष्ण ने जिस नगरी को बसाया था उसकी शोभा का क्या वर्णन किया जाय? उसमें सुवर्ण कलशों की
तो पंक्तियाँ दिखाई दे रही थीं और उनमें बड़े कौशल से रत्न जड़े हुए थे। उनका तेज आकाश में भी नहीं
समा रहा था। उस द्वारिका में कामधेनु प्रायः प्रत्येक घर में थी, कल्पवृक्षों की तो कतारें लगी हुई थीं और घर
की दीवारों पर चिन्तामणि के खिलौने लटक रहे थे। द्वारकावासियों के घरों में नवरत्नों के ढेर लगे हुए थे
और वहाँ श्रीकृष्ण का वास होने के कारण ऋद्धि-सिद्धि भी दासी होकर वहाँ रहती थीं। कृष्णरूप की
लालसा ने तो आँखों को मतवाला कर दिया तब वे बड़ी चाह से श्रीहरि के देह पर बैठकर मोरपंख जैसी
आँखों को देखने लगे। कृष्ण के सौन्दर्य का क्या वर्णन किया जाय? उसे चखने के लिए तो आँखों में जिह्वा
लग गयी। उपनिषद में वर्णन किया हुआ जो परब्रह्म है वही साकार रूप में आ जाने के कारण उसमें रसालता
तो अपूर्व थी। कृष्ण को देखने के लिये देवतागण उछलकूद मचाने लगे। आँखों को तो पलक झपकाने की
फुर्सत नहीं थी। कृष्णस्वरूप का कौतुक देखते समय आँखों की क्षुधा बढ़ रही थी, उनमें सुख लबालब भर
गया था, फिर भी वे अतृप्त थीं। श्रीकृष्ण को देखने वालों की भीड़ इतनी अधिक बढ़ रही थी कि देखने की
जल्दी में उनके शिरस्त्राण एक-दूसरे पर गिर रहे थे। श्रीकृष्ण को देखने वालों ने चारों ओर से उन्हें घेर
लिया। मानो सभी आँखों का भाग्योदय हो गया था। वे सम्पूर्ण पुरुष को देख रहे थे। श्रीकृष्ण गाढ़े मेघ की
तरह श्यामवर्ण था। उसकी ओर निजात्मभाव से देखते ही आँखें कृष्ण कला के प्रभाव से श्यामल हो गयीं।
जो वेदों की भी समझ में नहीं आता, योगियों के भी ध्यान में नहीं आता उस कृष्ण को वे साक्षात देख रहे
थे। उनके भाग्य को अपूर्व ही कहना चाहिये। ऐसे श्रीहरि को देखते ही देवताओं ने विमानों से पर्जन्यधाराओं
की तरह पुष्पवृष्टि की।
स्वर्गोद्यानोपगैर्माल्यैश्छादयन्तो यदूत्तमम्।
गीर्भिश्चित्रपदार्थाभिस्तुष्टुवुर्जगदीश्वरम् ॥ ६ ॥
मंदार, पारिजात, कल्पवृक्ष, हरिचन्दन आदि स्वर्गीय वृक्षों के सुगन्धित पुष्प सबने श्रीकृष्ण पर उछाले।
श्रीकृष्ण के चारों ओर उत्तमोत्तम पुष्पों का ढेर इकट्ठा हो गया था। फिर समस्त देवताओं ने सामने जाकर जय

१४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जयकार किया जिससे दसों दिशाएँ गूँज उठीं। उन्होंने अनेक प्रकार के रसीले पद, प्रबन्ध तथा विविध प्रकार की
गद्यपद्य रचनाओं से श्रीकृष्ण का स्तुति गायन शुरू किया।
देवा ऊचुः
नताः स्म ते नाथ पदारविन्दं बुद्धीन्द्रियप्राणमनोधचोभिः।
यच्चिन्त्यतेऽन्तर्हृदि भावयुक्तैर्मुमुक्षुभिः कर्ममयोरुपाशात् ॥ ७॥
देवताओं ने कहा, हे सच्चिदानंद श्रीकृष्ण! काया, वाचा तथा मन से विवेक युक्त प्राणधारणा से तुम्हारे
चरणों को प्रणाम करता हूँ। इन्द्रिय शान्त हो इसलिये विषयवासना छोड़कर दसों इन्द्रिय तुम्हारी ओर प्रवृत्त कर हे
श्रीकृष्ण! भक्तिभाव से तुम्हें नमस्कार कर रहे हैं। विषयों के प्रति उदासीन होकर, संसार की आशा त्याग कर,
कर्मपाश तोड़ने के लिये तपस्वी लोग तुम्हारे चरणों का चिन्तनं करते हैं। मुक्ति की आशा से मुमुक्षु लोग तुम्हारे
चरणों का ध्यान करते हैं लेकिन वे कैसी भी दृढ़ भावना क्यों न रखें लेकिन क्षण भर के लिये भी तुम उनके
ध्यान में नहीं आते। तुम्हारे उन चरणों का प्रत्यक्ष दर्शन हमें आज हुआ, इस प्रकार देवतागण परस्पर अपने भाग्य
का वर्णन करने लगे। "इस सगुण स्वरूप को देखकर उसकी इतनी स्तुति क्यों करते हैं? क्योंकि जो आकार ले
लेता है वह सचमुच ही माया से युक्त होता है। जैसे आप शरीरधारी हैं, वैसे ही मैं भी शरीरधारी हूँ। तो मेरे दर्शन
से आप कैसे तर पायेंगे?" यदि आप ऐसा कहें तो मैं कहूँगा, हे अनन्ता! आप ऐसा न कहें। आप स्वयं माया के
नियन्ता हैं यह भी हमें मालूम हुआ है। वह समग्र कथा सुनें।
त्वं मायया त्रिगुणयाऽऽत्मनि दुर्विभाव्यं व्यक्तं सृजस्यवसि लुम्पसि तद्गुणस्थः।
नैतैर्भवानजित कर्मभिरज्यते वै यत्स्वे सुखेऽव्यवहितेऽभिरतोऽनवद्यः ॥ ८॥
नींद लगने पर वह नहीं दिखायी देती, जागने पर तो वह बिलकुल ही नहीं दिखायी देती। उसी प्रकार देह
में माया अतर्क्य स्थिति में है। वह सुरनरों को भी नहीं मालूम होती। हे देवाधिदेव श्रीकृष्ण! तुम्हारी माया तो वैसे
भी अतर्क्य है, तिस पर गुणों का क्षोभ होने के कारण वह ब्रह्मदेव आदि के भी समझ में नहीं आती। तुम ही देवी
माया का सहारा लेकर ब्रह्मादिकों को उत्पन्न करते हो, उनका पालन करते हो और तुम ही उनका संहार भी करते
हो। लेकिन उस कर्म से तुम अलिप्त रहते हो। कोई स्वप्न में सृष्टि उत्पन्न करता है, उसका प्रतिपाल कर संहार
भी करता है लेकिन वह क्रिया कर्ता पर लागू नहीं होती। उसी प्रकार तुमने भी अलिप्त रह कर ही सृष्टि उत्पन्न
की है। सूर्य अपनी ही किरणों से मृगजल भरता है और अस्त के समय उसका शोषण कर उसे ले जाता है। उसी
प्रकार तुम सब कुछ करके अलिप्त रहते हो। धर्म की बाढ़ समूल नष्ट हो जाती है, अधर्म की सीमा टूट जाती है
तब हमारा संकट दूर करने के लिये तुम्हें अवतार धारण करना पड़ता है। अधर्म का नाश कर तुम धर्म की पूर्ण
वृद्धि करते हो और देवताओं को अपने-अपने पद पर स्थापित करते हो। फिर भी हे श्रीकृष्ण तुम कर्मातीत हो।
आत्मसुख के अनुसन्धान का तुम्हें हमेशा ध्यान रहता है जो हमें क्षण भर भी नहीं रहता इसलिये हम सदा
दीनवदन रहते हैं। जिसे निरन्तर आत्मसुख रहता है वह देहधारी होते हुए भी अवतारी पुरुष रहता है। उसके
चरण गंगासागर जैसे तीर्थों को भी पवित्र करनेवाले होते हैं। भले ही वह गुणों में विचरण कर रहा हो लेकिन वह
गुणातीत रहता है। उसके चरण का एक रजःकण भी त्रैलोक्य के महापातकों का विनाश कर देगा। यह तो तुम्हारे
दासों की कथा है। फिर हम तो प्रत्यक्ष तुम्हारे चरणों का ही वन्दन कर रहे हैं। यह तो तुम्हारे चरणों की कथा है
लेकिन तुम्हारी कीर्ति श्रवण करने से भी वैसा ही आत्मलाभ होता है। जो तुम्हारे चरणों का दर्शन करते हैं वे तो

छठां अध्याय १४५

भाग्यवान हैं ही, उनकी महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता। हे स्वामी! तुम्हारी कीर्ति की पवित्रता भी वैसी
ही है। कथा सुनाता हूँ, उसे ध्यान से सुनो। पहले से ही जिस अग्नि में ज्वालाएँ निकल रही हों उसमें और
लकड़ियाँ डालने से आग धधक उठती है, उसी प्रकार देहाभिमान के कारण आशा बढ़ती रहती है जो तुम्हारे
श्रवण कीर्तन से समाप्त होती है।
शुद्धिर्नृणां न तु तथेज्य दुराशयानां विद्याश्रुताध्ययनदानतपःक्रियाभिः ।
सत्त्वात्मनामृषभ ते यशशि प्रवृद्धसच्छ्रद्धया श्रवणसम्भृतया यथा स्यात् ॥ ९ ॥
कृष्ण का स्तवन करने से वह तर जाता है। उस स्तवन को सुनने वाले का भी उद्धार होता है। इसलिये
स्तवन के द्वारा तारने में समर्थ एक तुम ही हो। इसलिये तुम्हारी कीर्ति का श्रवण यही एक शुद्धि का साधन है
अन्य सभी साधन केवल कष्ट उत्पन्न करते हैं। हे देवाधिदेव ! सुनो, केवल तुम्हारे श्रवण की उत्कंठा ही
अंतःकरण के पातकों को धोकर चित्तवृत्ति निर्मल करती है। गुणानुवाद श्रवण करने से जो विमुख हो गये और
तपस्या करने लगे उनकी बुद्धि नाना प्रकार के साधनों के कारण कर्कश हो गयी। मंत्र विद्या तो ग्रहण कर ली
लेकिन मंत्रोच्चार अशुद्ध होने से पुण्य तो नहीं ही मिलता उलटे भयंकर पातक अवश्य लग जाता है। 'शास्त्र'
का श्रवण करने से अहंकार चौगुना बढ़ जाता है और ज्ञानी होने का अभिमान ब्रह्मदेव से भी नहीं छूटता। यदि
'वेदाध्ययन' शुरू करें तो उसमें का एक भी स्वरोच्चार गलत हुआ तो शुद्ध होना तो दूर, वृत्तासुर की तरह मृत्यु
अवश्यंभावी है। 'दान' देने वाला नहुष भी कुएँ में गिरगिट होकर गिर पड़ा। दान करने से लाभ होना तो दूर
उलटे नुकसान काफी हो गया। ऋष्यशृंग 'तप' करने लगा तो वह वेश्याओं के ही वश में हो गया। इससे श्रद्धा
से तुम्हारी कीर्ति श्रवण करने से अच्छी शुद्धि और किसी में नहीं है। यदि यथाशास्त्र कर्म करके रहा जाय तो
कर्म मार्ग बहुत कठिन है। 'प्राचीनवर्ही' राजा की कर्मासक्ति नारद ने उपदेश करके छुड़ायी। कर्माचरण करने से
पहले आचमन करना है तो उतना ही पानी लेना चाहिये जिसमें उड़द डूब जाय। यदि इसमें जरा भी कम
अधिक हुआ तो उससे सुरापान करने का दोष लगता है। सारांश यह कि जिसका हृदय दुष्ट अर्थात् अत्यन्त
मलिन है उसे श्रीकृष्ण की कीर्ति का श्रवण किये बिना तपादिक साधनों से शुद्धि नहीं मिल सकेगी। राजा
परीक्षित श्रवण करने से ही तर गया। श्रवण से ही क्रौंच का उद्धार हुआ। मत्स्य के उदर में श्रीकृष्ण की कीर्ति
सुनने को मिली इसलिये मत्स्येन्द्रिय सिद्ध पुरुष हो गया। तुम्हारी कीर्ति का श्रवण करने से दो बातों की सिद्धि
होती है। एक तो उससे चित्त की शुद्धि होती है और दूसरा उससे जीवब्रह्म में ऐक्य स्थापित होता है। इस प्रकार
दोनों का उद्धार होता है। प्रत्यक्ष काशी में भी ऐसा ही होता है। वहाँ श्रवण में तारक ब्रह्म का उपदेश होता है
इसलिये काशी मुक्तिक्षेत्र बन गयी है। वहाँ श्रवण से ही जीव का उद्धार होता है। तुम तो सदासर्वदा पूर्णकाम
ही हो। तुम निष्कामों का निजधाम हो। फिर भी भक्तों का श्रम दूर करने के लिये तुम्हें कर्म करना पड़ता है। हे
श्रीकृष्ण! इसीलिये तुमने अनेक प्रकार की लीलाएँ कीं और लोगों के लिए मोक्षमार्ग का सोपान बना दिया।
तुम्हारी यशगाथा का भक्तिभाव से श्रवण करना यही चित्तशुद्धि का उपाय है। वहाँ सात्विक श्रद्धा यही एक
उपाय है। मन में इच्छा कर जो भी कोई साधन किये जाते हैं वे सब उस इच्छा से ही व्यर्थ हो जाते हैं। जो
इच्छारहित होता है उसी का अन्तःकरण चोखा रहता है। वैसा अंतःकरण देखते-देखते परमार्थ में विलीन हो
जाता है। हृदय की गहराई में स्वधर्म का बीज अंकुरित होता है, उसमें ही श्रद्धा की बेल तैयार होकर बाहर
निकलती है। सच्छ्रवण के जल से वैराग्य की जड़ें गहराई तक पहुँचती है और मजबूत होती हैं। उन्हें श्रद्धा की

१४६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पुष्टि मिलते ही वह तीव्रगति से चिदाकाश में चढ़ने लगती है और हे पुरुषोत्तम! उस चिदाकाश के स्वयं
प्रकाशित चन्द्रमा तुम हो। हे मेघश्याम! तुम्हारी मूर्ति देखने के लिये साधकों को कितने प्रयास करने पड़ते हैं।
तुम्हारे उस श्रीचरण के आज प्रत्यक्ष दर्शन हुए। इतना कहकर सभी देवतागण उसे साक्षात दण्डवत करते हुए
स्तवन करने लगे।
स्यान्नस्तवाङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः क्षेमाय यो मुनिभिरार्द्रहृदोह्यमानः।
यः सात्वतैः समविभूतय आत्मवद्भिर्व्यूहेऽर्चितः सवनशः स्वरतिक्रमाय॥ १०॥
हे श्रीकृष्ण! हमारे समस्त पातकों का विनाश करने के लिये सारे त्रिभुवन में तुम्हारा एक चरणरूपी धूमकेतु
ही समर्थ है। पातकरूपी लकड़ियों की राशि में तुम्हारे चरणरूपी बड़वानल का स्पर्श होते ही वह अपने
देदीप्यमान तेज से उसके तिल-तिल टुकड़े कर सब कुछ स्वाहा कर देता है। हे अनंता! ऐसे पापियों को कँपाने
वाला तथा जो प्रेमयुक्त हैं उन्हें अभय देने वाले पैर को भक्तजन सदा अपने अंतःकरण में धारण करते हैं। वह
अंतःकरण भक्ति प्रेम रस से सिक्त रहता है, उसमें तुम्हारे चरण अत्यन्त उल्लासपूर्वक स्वेच्छा से धारण करके बैठ
जाते हैं। चरणों का ध्यान करते समय वे भूख और प्यास भी भूल जाते हैं उन्हें अभय प्रदान करने वाला एक
तुम्हारा चरणध्वज ही है। हे श्रीकृष्ण! तुम्हारे उसी चरण का दैवी ऐश्वर्य देखने के लिये भक्तों ने आज चतुर्व्यूह
मूर्ति का पूजन किया। वासुदेव, संकर्षण, अनिरुद्ध तथा प्रद्युम्न इस स्वरूप को 'चतुर्व्यूह' कहते हैं और यही भक्त
का पूजास्थान है। ये चार व्यक्ति भिन्न-भिन्न होते हुए भी उन चारों स्वरूपों में मूर्ति एक ही है, यही बात ध्यान में
रखकर भक्तों का उनकी पूजा करना 'व्यूहास्थिति' कहलाता है। 'सात्वत' कहलाने वाले भक्त जो भगवत्पद की
इच्छा करते हैं वे उसी 'पद' की ओर ध्यान रखकर इस चतुर्व्यूह रूप की पूजा करते हैं। यदि जन्म-मरण के
प्रवाह को रोकने की इच्छा है तो आत्मस्वरूप पहचानने वाले ज्ञानियों को इसी चतुर्मूर्ति की एकनिष्ठा से भक्ति
करनी चाहिये। जन्ममूलच्छेदन करने के लिये जो त्रिकाल यज्ञ तथा एकनिष्ठ भक्ति से त्रिकाल पूजा कर भजन
करते हैं वे कलिकाल पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। इसके अतिरिक्त तुम्हारे दूसरे भक्त विधि-विधान युक्त तथा
वेदोक्त पद्धति से यज्ञ द्वारा होम हवन कर तुम्हारा भजन करते हैं।
यश्चिन्त्यते प्रयतपाणिभिरध्वराग्नौ त्रय्या निरुक्तविधिनेश हविर्गृहीत्वा।
अध्यात्मयोग उत योगिभिरात्ममायां जिज्ञासुभिः परमभागवतैः परीष्टः॥ ११॥
दीक्षा ग्रहण करने में अत्यन्त आदर, यज्ञ के द्वारा भजन करने में उत्सुक, हाथ से केवल नियमित कियाएँ
करना, अन्य हस्त व्यापार बिलकुल न करना, त्रिविध वेदात्मक विधि ही जिनके लिये प्रमाण हैं बाहर त्रिगुणों की
त्रिमेखला, अंतर्यामी सर्वात्मा-चैतन्य के तेज से देदीप्यमान रहने वाला यज्ञपुरुष, वहाँ ओंकार, वषट्कार आदि
लक्षणों से युक्त मंत्रोच्चार कर अतिपवित्र अवदानों से अपार द्रव्य अर्पण करते हैं। तुम्हारे अन्य भक्त योगयुक्त
होते हैं, वे योगधारणा से तुम्हारा भजन करते हैं, आसन पर स्थिर होकर प्राणापान की समता लाते हैं। वज्रासन से
दृढ़ बन्ध साध कर षड्चक्रों का भेदन कर कुण्डलिनी का सुदृढ़ स्कन्ध थपथपाते हैं। इससे वह महाशक्ति उछल
कर अत्यन्त तीव्र गति से ऊर्ध्वगति से ऊपर जाने लगती है और वायु भक्षण कर योगस्थिति से गगन को ग्रास
बना लेती है। सहस्र दल के पार सोख कर लिंगदेह का विकट मार्ग पार कर वह बड़ी तेजी से ब्रह्मस्थान तक
पहुँचती है। वहाँ परमानन्द का भोग तथा शिव-शक्ति का संयोग होता है। इस प्रकार योग का अभ्यास करना यह
योगियों का भजनमार्ग है। कोई तुम्हारी माया को जानने के लिये तुम्हारे ही पैरों का भजन करने लगते हैं। किन्तु

छठवां अध्याय १४७
हे श्रीकृष्ण ! देवाधिदेव ! तुम्हारी माया सर्वथा अतर्क्य है। देखने जाओ तो वह दिखायी नहीं देती, इतना ही नहीं
बल्कि उसी माया का चित्त को मोह हो जाता है और तब वे वास्तव में सिद्धि के ही लिये भगवान के चरणों की
पूजा करते हैं। एक और पक्ष है 'मुमुक्षु' लोगों का। ये लोग अध्यात्म में पारंगत रहते हैं। आत्ममाया का विनाश
करने के लिए जिज्ञासुओं को अपने आत्मज्ञान के योग से मन में पूजा करने के प्रति अत्यन्त उल्लास रहता है।
उनके मन में निरन्तर विवेक की ही भावना होने के कारण वे नित्य क्या है और अनित्य क्या है इसका विचार
मंथन कर जब अपना निश्चय करते हैं तो उन्हें चारों ओर तुम ही तुम दिखायी देते हो। अनित्य होने के कारण
जिसका त्याग किया वह मायिक होने के कारण मिथ्या हो गया। फिर शुद्ध निजात्मरूप ही शेष रहता है। इस
प्रकार चारों ओर देखने पर तुम्हारा ही स्वरूप दिखायी देने लगता है। फिर वे अपनी पसन्द से तुम्हारी ही पूजा
करने लगते हैं। जहाँ भी वे देखते हैं वहाँ तुम्हारे सिवा और कुछ नहीं रहता। इस प्रकार तुम्हारे ही चरणों की
पूजा होती है।
पर्युष्टया तव विभो वनमालयेयं संस्पर्धिनी भगवती प्रतिपत्निवच्छ्रीः।
यः सुप्रणीतममुयाऽर्हणमाददन्नो भूयात् सदाङ्घ्रिशुभाशयधूमकेतुः ॥ १२ ॥
इस प्रकार चारों ओर तुम्हारे जो भक्त हैं वे तुम्हारे अत्यन्त प्रिय हो जाते हैं और हे श्रीपति ! उनकी पूजा भी
तुम अत्यन्त प्रेम से स्वीकार करते हो। भक्त जब जंगली फूलों की माला ले आये तो तुम उतावले होकर लक्ष्मी
को छोड़ कर उसकी ही ओर आकृष्ट हो गये। वह वनमाला भक्तों ने अत्यन्त प्रेम से अर्पण की थी इसलिये
उसका आकर्षण विशेष रूप से था। बासी हो जाने पर भी तुम उसे क्षण भर के लिये भी नहीं उतारते। भक्तों ने
उसे भावार्थ से अर्पण किया और भगवान ने उसे सर्वांग पर धारण किया इसलिये वनमाला सूखना भूल कर सदा
ताजा रहने लगी। उसकी सुगन्ध मिलते ही भगवान भक्ति में भूल गया इसलिये लक्ष्मी ने उससे सौतिया डाह
शुरू कर दिया। प्रभु के पास मैं आयी उससे पहले भक्तों ने उसे कब अर्पण किया यह मेरी समझ में नहीं आता।
मैं युवा होते हुए भी मुझे छोड़ कर उस अधेड़ को ही गले लगाता है। उसे भोग का लक्षण शायद नहीं मालूम।
वह बुढ़िया है और मैं युवा हूँ लेकिन फिर भी वह उसके ही मोहपाश में फँसा हुआ है। वैसे यह ठीक भी है
क्योंकि वैसे भी यह निर्गुण है, इसे गुण और अवगुण का क्या पता ? मेरे भाग्य में चरणसेवा है और वह भी
कभी-कभी और यह जब देखो तब गले से लगी हुई। इस वनमाला ने प्रेम के मामले में सचमुच ही मुझे मात दे
दी है। मुझे एक ओर ढकेलकर स्वयं दोनों अंगों पर बैठ गयी है। श्रीकृष्ण इससे सदैव बातें करता रहता है। मैं
कुछ कहने जाती हूँ तो मेरी ओर ध्यान नहीं देता। मुझे पैर दबाने के लिये रखा है इसलिये इसका डाह मैं कब
तक सहूँ ? इसने श्रीकृष्ण को पैरों तक जकड़ रखा है और मेरी सेवा मुझसे छीन ली है। कुछ भी हो लेकिन मैं
क्षीरसागर की कुलवती कन्या हूँ और यह जंगली है, लेकिन भक्तों के प्रेम के कारण भगवान के कन्धे पर बैठी
है। भक्ति के बल पर यह कन्धे पर बैठी है और कभी नीचे नहीं उतरेगी इसलिये लक्ष्मी उससे डाह करने के
बजाय उसे नमस्कार करने लगी। हे भगवान ! तुम्हें भक्तों की पूजा अच्छी लगती है इसलिए विनम्र होकर सारी
भक्ति भावनाएँ तुम्हें अर्पण की हैं। तुम्हारा वह चरणरूप धूमकेतु हमारे सारे पापों का विनाश करे। हे श्रीकृष्ण !
बार-बार एकत्र होने वाले पापों का भी विनाश करो। इस प्रकार देवताओं ने श्रीकृष्ण के चरणों का वर्णन किया
लेकिन उनका मन तृप्त नहीं हुआ। इसलिए उनके चरणों का वर्णन करते-करते वे उसके ध्वजचिह्न का वर्णन
करने लगे।

१४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
केतुस्त्रिविक्रमयुतस्त्रिपतत्पताको यस्ते भयायभयकरोऽसुरदेवचम्वोः।
स्वर्गाय साधुषु खलेष्वितराय भूमन् पादः पुनातु भगवान् भजतामघं नः॥ १३॥
हे अनंता! बलिबंधन के समय जब वामन ने अपना चरण आगे बढ़ाया था तो उस समय तुम्हारे चरण
सत्यलोक के ऊपर झलकते दिखायी दे रहे थे। सबसे ऊपर जो चरण बढ़ा उसे ही ज्ञानी लोक 'केतु' कहते हैं।
उस समय तुम्हारी ही आत्मस्वरूप जो गंगा है वह पताका के रूप में झलकने लगी। बलिबंधन के समय
आवेश के साथ कदम उठाने के कारण उसके नखों से आवरण कोश फूट कर अपार जल बहने लगा। हे
भगवान्! उस समय आपके चरण स्पर्श से ही उस जल को पवित्रता प्राप्त हुई इसलिये उस जल को ब्रह्मदेव ने
कमण्डल में भर लिया और शंकर ने उसे मस्तक पर धारण किया। चरण की ध्वजा में पताका वही गंगा है।
वही त्रिवाहिनी भी है और त्रिपथगा भी। श्रीकृष्ण की ऐसी चरण शोभा देखने के लिये नयनरूप भृंगों को बड़ा
उल्हास होता है। केतु अर्थात् ध्वज जब फड़कने लगते हैं तो आसुरी सेना के हृदय में कम्पन्न शुरू हो जाता है
और दैवी सम्पत्ति में हर्षोल्लास बढ़ने लगता है। इन चरणों की एक विशेषता यह है कि ये देवताओं को स्वर्ग
सुख देने वाले हैं और वही चरण अधर्मियों को नरक में भेजते हैं। कोई चरणों की पूजा करके तर गये तो कोई
चरणों का ध्यान करके तर गये लेकिन जो इन चरणों की उपेक्षा करते हैं वे अधःपतन की ओर जाते हैं। चरणों
का वन्दन करने वाले तथा निन्दा करने वाले ये दोनों ही निजपद को प्राप्त करते हैं। लेकिन जो सर्वथा उनकी
उपेक्षा करते हैं, उन्हें अधोगति प्राप्त होती है। चरणों का वन्दन करने वाली शिला तर गयी और निन्दा करने
वाले शिशुपाल का तुमने उद्धार किया लेकिन चरणकमलों की जिसने उपेक्षा ही की उसे रौरव नरक में जाना
पड़ता है। हे सर्वव्यापी सर्वेश्वर! सुनो, इस प्रकार तुम्हारा चरण उत्तम है और वह हमारे सभी पातकों का
क्षणार्थ में उद्धार करेगा। पापों का जब उद्धार होता है तब सहज ही दुराचार नष्ट हो जाता है। तुम्हारा चरण इस
संसार का सच्चा तारक है।
नस्योतगाव इव यस्य वशे भवन्ति ब्रह्मादयस्तनुभृतो मिथुरद्यमानाः।
कालस्य ते प्रकृतिपूरुषयोः परस्य शं नस्तनोतु चरणः पुरुषोत्तमस्य ॥ १४॥
हे अच्युत! तुम्हारा चरण आत्मसुख का विस्तार करने वाला है तथा कालकर्मादिकों का नियंता है। उसी
प्रकार वह देवताओं की आत्मा तथा शास्त्र है। काल के वास्तविक नियंता तुम ही हो इसलिये वह असमय अपना
शासन नहीं कर सकता। देवताओं को अधिकारपद पर स्थापित करने वाले तुम ही हो इसलिए उनके नियंता भी
तुम ही हो। हे कृष्णनाथ ! कर्मों का स्वामी भी तुम हो क्योंकि तुम्हारे बिना इन्द्रियों की कोई भी क्रिया कोई नहीं
कर सकता। इसलिये हे श्रीहरि! कर्मों का नियंता भी तुम हो। हे श्रीहरि ! ब्रह्मदेवादि सभी शरीरधारी देवता तुम्हारे
ही अधीन हैं। जिस प्रकार जुते हुए बैलों की सहायता से किसान खेत जोतता है अथवा उनमें जो काम नहीं
करता उन्हें चाबुक से मारता है उसी प्रकार तुम्हारी ही आज्ञा के अनुसार कलिकाल में सब आचरण करते हैं।
संसाररूपी खेत में तुम्हीं सबको काम पर जोत कर आत्मकर्म से, अपनी आज्ञा से उनसे सारा काम करवा लेते
हो। अहंकार की मेढ़ बनाकर, महत्तत्त्वों का खलिहान झाड़ कर, तीन गुणों की डोर से जीवरूपी पशुओं को
कसकर बाँध कर रखते हो। भोर से रात तक अपने कर्मों का फेरा पूरा करते समय जो कंधा बचा कर भागना
चाहता है उसे ही तुम सजा देते हो। यदि तुम कहो कि यह बातें व्यर्थ हैं सृष्टि को बनाने वाली तथा धारण करने
वाली माया है तो हे देवाधिदेव ! ऐसा न कहो। क्योंकि माया को तुम्हारा ही आश्रय है। इसलिये 'परम कारण'

छठां अध्याय १४९
तुम ही हो। 'प्रकृति' और पुरुष ये दोनों तुम्हारी ही गोद में खेलते हैं। तुम माया से भी अधिक श्रेष्ठ हो, प्रकृति
पुरुषों से भिन्न हो, काल का दुर्धर काल तथा सभी संहारों का कर्ता तुम ही हो। हे मेघश्याम! हमारे उत्तम
निजसुख के लिए तुम्हारा चरण विस्तार ही कारणीभूत है। इसलिये हे पुरुषोत्तम! आपकी हमारे ऊपर सदा कृपा
रहे यही आप से प्रार्थना है।
अस्यासि हेतुरुदयस्थितिसंयमानांमव्यक्तजीवमहतामपि कालमाहुः।
सोऽयं त्रिणाभिरखिलापचये प्रवृत्तः कालो गभीरस्य उत्तमपूरुषस्त्वम्॥१५॥
हे श्रीपति! जगत की उत्पत्ति और स्थिति तुम से ही होती है और अंततः सबका संहार करने वाले निश्चित
रूप से तुम ही हो। तामस शक्ति का क्षोभ होने पर वह अन्त में सारी सृष्टि का प्रलय कर देती है। उस समय
समस्त जीव सूक्ष्मरूप से बीजरूप अव्यक्त में रहते हैं। जब उत्पत्ति का समय आता है तो यही सारे बीज अंकुरित
होते हैं और वे यथासमय पल्लवित होते हैं और उनमें पुष्प और फल लगते हैं। हे कृष्णनाथ! यदि आप यह कहें
कि यह तो गुण क्षोभ की अवस्था है, इसलिये मैं प्रलयकर्ता नहीं हूँ तो जिसे तुम्हारे स्वरूप का यथार्थ ज्ञान हो
जाता है उन भक्तों के लिये माया, महत्तत्त्व और जीव इन सभी भावों का विनाश होकर वे निजपद स्वरूप का
आनन्द भोगते हैं। हे कृष्णनाथ! तुम्हें उन सबका संहार करने में क्या कठिनाई है? इसलिए परिस्थिति के अनुसार
'महाकाल' यथार्थ में तुम ही हो। तुम संसार की स्थिति जानने नहीं देते। काल की गति तो तुमने अत्यन्त सूक्ष्म
बनाकर रख छोड़ी है। अंततः अपनी प्रकृति के विकारों का विनाश भी तुम ही करते हो। प्रलय का मूल आधार
लय, निमेष, घटिका, पल, अहोरात्र तथा त्रिकाल है जिसे 'त्रिनामी' कहते हैं। ऐसे प्रचण्ड मायामहत्तत्त्व का तुम
विनाश करते हो। इसलिये हे श्रीकृष्ण! हे ऋषीकेश! इस प्रकार तुम महाकाल हो।
त्वत्तः पुमान् समधिगम्य यथाऽस्थ वीर्यं धत्ते महान्तमिव गर्भममोघवीर्यः।
सोऽयं तयानुगत आत्मन आण्डकोशं हैमं ससर्ज बहिरावरणेरुपेतम्॥ १६॥
हे अनन्ता! कालान्तर में सृष्टि का निर्माणकर्ता भी तुम ही बन जाते हो और उस उत्पत्ति का पालनकर्त्ता
भी तुम-ही हो। तुम्हारी वीर्यशक्ति प्राप्त कर पुरुष को पुरुषत्व प्राप्त होता है इसीलिये वह प्रकृति को अंगीकार
कर उसमें गर्भादान करता है। उस समय वही प्रकृति महत्तत्त्व से गर्भवती होती है और पंचतत्त्वों को गर्भ में
धारण कर हिरण्यवर्ण के अण्डे को धारण करती है। वह वीर्य अमोघ तथा प्रबल होने के कारण वह प्रिया
विश्वाकार का बालक धारण करती है और उस अण्डे में सारा ब्रह्माण्ड रहता है। गर्भ को जिस प्रकार गर्भवेष्टन
होता है उसी प्रकार इस अण्डे को सात प्रकार का बाह्य आवरण रहता है। उसका परिमाण तुम ही निश्चित
करते हो। वे सप्त आवरण हैं, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, स्थूल अहंकार तथा अत्यन्त प्रबल क्रियासूत्र।
जिस प्रकार कठपुतली का एक सूत्रधार होता है उसी प्रकार उस गर्भ की सुरक्षा करने के लिये अंतरबाह्य तुम
ही रहते हो। ऐसे जगत की सृष्टि दो से ही हुई है। तीसरा कोई भी, कहीं भी नहीं दिखायी देता। सारी सृष्टि
दो ही वस्तुओं से भरी पूरी दिखायी देती है। दीपक जलाकर देखने पर भी तीसरा कोई नहीं दिखायी देता।
प्रकृति के बारे में सोचते हैं तो वह भी मिथ्या है। इस प्रकार किसी दूसरे के बिना अकेले तुम ही पूरा विश्व
बने बैठे हो। हे मल्लमर्दन श्रीकृष्ण! तुम अपनी कुशलता की चतुराई स्वयं प्रकट कर रहे हो। इस प्रकार तुम
अकेले ही कर्त्ता होने के कारण किसी में लिप्त नहीं होते। अब कर्म करते हुए भी तुम अकर्त्ता किस तरह हो
यह भी बताता हूँ, सुनो!

१५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
तत्तस्थुषश्च जगतश्च भवानधीशो यन्माययोत्थगुणविक्रिययोपनीतान्।
अर्थाञ्जुषन्नपि हृषीकपते न लिप्तो येऽन्ये स्वतः परिहृतादपि बिभ्यति स्म॥ १७॥
चर और अचर, स्थावर तथा जंगम आदि सारे जगत के स्वामी तुम ही हो। अब यह स्वामित्व कैसे आता
है यह सचमुच ही पूछते हो तो उसके बारे में भी स्पष्ट रूप से सुन लो। माया के योग से तुम स्वयं अनेक प्रकार
के भोग करते हो लेकिन वे भोग तुम्हारे शरीर को स्पर्श नहीं करते। क्योंकि अकर्त्तात्म बोध के कारण तुम
अलिप्त रहते हो। हे हृषीकेश! वह अकर्त्तात्मक बोध ऐसा होता है कि वह वेदशास्त्रों के लिये भी अतर्क्य है।
भोग्य, भोग और भोक्ता इन तीनों को प्रकाशित करने वाले तुम ही हो। जिस प्रकार सूर्य घट में प्रतिबिम्बित होने
पर भी घट से स्वभावतः अलिप्त ही रहता है, घट, जल और प्रतिबिम्ब इन तीनों को ही सूर्य स्वयं प्रकाशित
करता है लेकिन तिस पर भी वह स्वयं उनसे अलिप्त रहता है, उसी प्रकार हे श्रीकृष्ण! तुम भी भोग भोगते हुए
उससे अलिप्त रहते हो। अथवा कर्म, कार्य और कर्त्ता इन तीनों में ही निजआत्मा रहती है फिर भी तुम उससे
अलिप्त रहते हो। जो दर्पण के प्रतिबिम्ब से ही विलास करने को प्रवृत्त हुआ है उस पर कोई व्यभिचार का
आरोप कैसे लगा सकता है? जो स्वयं ही सारा संसार बन कर रहता है उस निजात्मयोगयुक्त योगी को कौन से
भोगों की बाधा सताएगी? ऐसे बोध के सामर्थ्य से जो विषयोपभोग कर रहा है उसके विषयों के स्पर्श से उसका
आत्मज्ञान कैसे मलिन हो सकता है? वह लेन-देन का व्यवहार करता रहता है, देखने में व्यावहारिक लगता है,
घर में रहता है, गृहस्थी चलाता है लेकिन यथार्थ में वह उसमें नहीं रहता है। इस प्रकार आत्मबोध का मार्ग बिना
जाने योगियों ने भोगों का त्याग अवश्य किया किन्तु शरीर में वासना होने के कारण उनका सारा शरीर काँपता
रहता है। वे स्वप्न में विषय को देखते हैं और नींद खुलने पर प्रायश्चित्त करते हैं। इसका कारण यह है कि
उनका अहंकार समाप्त नहीं हुआ होता और वे सदा भयभीत रहते हैं। विषय भय से कम्पित ऐसे लोगों को
आत्मबोध नहीं हुआ रहता लेकिन तुम वैसे नहीं हो। तुम अत्यन्त धैर्यवान हो और तुम्हारा आत्मबोध स्पष्ट
दिखायी देता है।
स्मायावलोकलवदर्शितभावहारिभ्रूमण्डलप्रहितसौरतमन्त्रशौण्डैः।
पत्न्यस्तु षोडशसहस्रमनङ्गबाणैर्यस्येन्द्रियं विमथितुं करणैर्न विभव्यः ॥ १८॥
शायद तुम अब कहोगे कि मैं धैर्यवान हूँ, आत्मज्ञान से परिपूर्ण हूँ ऐसा कौन कहेगा? तो हे स्वामी! मैं
उसके लक्षण तथा उदाहरण भी बताता हूँ, सुनो। घर में सोलह हजार स्त्रियाँ और गोकुल की अन्य स्त्रियों के
अलावा मथुरा में कुब्जा आदि मिश्र जाति की कुमारियों का भोग किया। यज्ञोपवीत भी नहीं हुआ था उसके पहले
ही तुमने ग्वाले की विकलांग लड़की का भोग किया। राह चलती भी कितनी पकड़ी होंगी इसका कोई हिसाब ही
नहीं है। हे हरि। इस प्रकार तुमने कितनी ही लड़कियों का भोग किया लेकिन तुम्हारा आत्मबोध मलिन नहीं हो
पाया। अर्जुन का हाथ पकड़ स्वयं क्षीरसागर में चले गये। शेषशायी नारायण को भी तुम्हारे दर्शन की उत्कंठा लगी
हुई थी इसलिये उसने जान-बूझ कर ही ब्राह्मणों के वस्त्रों का हरण कर लिया था। जिस प्रकार अपने ही स्वरूप
को देखने के लिए दर्पण लेना पड़ता उसी प्रकार कृष्णार्जुन को देखने के लिये ही नारायण स्वयं उन बालकों को
ले आये। "तुम नारायण के अवतार हो, तुम्हारा दर्शन लेने के उद्देश्य से ही मैं स्वयं ब्राह्मणों के लड़के यहाँ ले
आया।" इस प्रकार नारायण के मुख से निकले हुए शब्द हमने स्वयं सुने हैं। इसीलिये कहता हूँ, हे श्रीकृष्ण!
तुम्हारा आत्मबोध अगाध है। कितने ही काल पूर्व मरे हुए ब्राह्मणों के बच्चे तुमने ला दिये। तुम्हारी ही ये सारी

छठां अध्याय १५१
लीलायें हमने प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देखी हैं। जब नारायण को ही तुम्हारे प्रति इतना आदर है तो हमारी क्या
कथा है ? हे अच्युत ! गुणातीत श्रीकृष्ण ! तुम्हारा आरपार किसी की समझ में नहीं आयेगा। पहले भी आपने अनेक
अवतार लिये थे लेकिन उस समय ऐसे चरित्र नहीं दिखलाये। वेदविधि भी लज्जित हो गयी और आपने व्यभिचार
करने वालों को भी आत्मपद दे दिया। अगर तुम यह कहोगे श्रीकृष्ण कि मैंने उदासीन होकर उन स्त्रियों का भोग
किया, उससे आत्मज्ञान में कोई बाधा नहीं आयी। लेकिन श्रीकृष्ण! वैसा कुछ भी नहीं हुआ। वे स्त्रियाँ भी
साधारण नहीं थी। वे विलास में चतुर थीं और शृंगारयुक्त हावभाव करती थीं। नखरे के साथ शरीर की कमनीयता
का भी प्रदर्शन करती थीं और तुम्हें, पुरुषोत्तम को देखकर कामबाणों की भी वर्षा करती थीं। जिन बाणों के प्रहार
से इन्द्र के शरीर में भी हजार छेद हो गये, जिन प्रचण्ड बाणों ने शंकर को भी मोहिनी के जाल में फँसा दिया,
जिन बाणों की बौछार से तपस्वी लोग घबरा उठते हैं और वे घरबार छोड़कर भाग उठते हैं, ऐसे सोलह हजार
कामबाणों का प्रहार होते हुए भी तुम्हारा आत्मबोध नहीं ढला। तुम्हारा यह कैसा सामर्थ्य है। घर की सोलह हजार
तथा गोकुल की और मथुरा की स्त्रियाँ। लेकिन इतनी सारी स्त्रियाँ भी तुम्हें लंपट बनाने में समर्थ नहीं थीं। वे तो
तुम्हें लंपट नहीं बना सकीं, उल्टे तुमने ही उन्हें विषयरहित बना दिया। हे श्रीकृष्ण ! इस प्रकार तुम त्रैलोक्य के
स्वामी अर्थात् श्रेष्ठ हो। तुम्हारी ऐसी कीर्ति सुनने से या तुम्हारा चरणोदक लेने से संसार पवित्र हो उठता है।
विभ्व्यस्तवामृतकथौदवहास्त्रिलोक्याः पादावनेजसरितः शमलानि हन्तुम्।
आनुश्रवं श्रुतिभिरङ्घ्रिमङ्गसङ्गैस्तीर्थद्वय शुचिषदस्त उपस्पृशन्ति॥ १९॥
तुम्हारी कीर्ति का श्रवण करने से अंतःकरण के पातकों का क्षालन होता है और वृत्ति अत्यन्त प्रवृत्त हो
जाती है। उसी प्रकार तुम्हारे चरणों से निकली हुई गंगा समस्त पातकों का विनाश करती है। हे श्रीरंग ! आपका
चरणतीर्थ सारे जगत को पवित्र कर देता है। इसीलिये साधुजन इन दोनों तीर्थों का अखण्ड सेवन करते हैं जिसके
कारण वे परम पवित्र होकर समाधानपूर्वक निजात्मवृत्ति में लीन रहते हैं। हे श्रीपति ! अवतार के अन्त समय में
तुमने इन दो तीर्थों को प्रसिद्ध कर रखा है ताकि तुम्हारे दासों का तरना सम्भव हो सके।
बादरायणिरुवाच
इत्यभिष्टूय विबुधैः सेशः शतधृतिर्हरिम्।
अभ्यभाषत गोविन्दं प्रणम्याम्बरमाश्रितः ॥ २० ॥
शुक्राचार्य कहते हैं, हे राजा परीक्षित ! इस प्रकार सभी देवताओं ने भक्तिभाव से तथा आनन्दपूर्वक श्रीकृष्ण
का स्तवन किया। इस प्रकार स्तुतिस्रोत गाकर उन्होंने श्रीकृष्ण को सन्तुष्ट किया। समस्त देवताओं को अत्यन्त
कौतुक और प्रसन्नता हुई। यह स्तुति करने के लिए ब्रह्मदेव और शंकर सबके आगे आये थे, उन्होंने जय-जयकार
करते हुए दण्डवत किया। शेष सारे देवतागण विमान में हाथ जोड़कर बैठे थे। उन सबकी ओर से पुनः विनती
करते हुए ब्रह्मदेव आगे कहने लगे।
ब्रह्मोवाच
भूमेर्भारावताराय पुरा विज्ञापितः प्रभो।
त्वमस्माभिरशेषात्मंस्तत्तथैवोपपादितम् ॥ २१ ॥
हे यादवश्रेष्ठ ! श्रीधर ! पहले हमने आपसे सुरवरों को अभय देने के लिये पृथ्वी का भार कम करने के

१५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
लिये प्रार्थना की थी। जैसी हमने प्रार्थना की थी उसके विचार से आपने अपनी लीला से कुछ अधिक ही
धर्मवृद्धि की थी। हे पुरुषोत्तम ! हे घनश्याम ! तुम सर्वेश्वर और सर्वात्मा·हो इसलिये जो काम हमारी समझ में
नहीं आता वह भी आपने कर डाला।
धर्मश्च स्थापितः सत्सु सत्यसंधेषु वै त्वया।
कीर्तिश्च दिक्षु विक्षिप्ता सर्वलोकमलापहा॥ २२॥
जो सत्यवादी और साधु थे, तुम्हारे ही चरणों के प्रति जिनका संकल्प था उनके लिये तुमने यथार्थ रूप में
धर्म स्थापना की और अपनी यह कीर्ति तुमने दसों दिशाओं में फैलायी। सचमुच उसके श्रवण से त्रिभुवन पावन
हो जायेगा।
अवतीर्य यदोर्वंशे बिभ्रद्रूपमनुत्तमम्।
कर्माण्युद्दामवृत्तानि हिताय जगतोऽकृथाः॥ २३॥
हे श्रीकृष्ण! पूर्ण पुरुष होते हुए तुमने यादवकुल में जन्म लिया। तुम्हारे स्वरूप की शोभा की तो कोई
सीमा नहीं है। सबमें सर्वोत्तम तुम हो। तुम्हें देखते ही विचलित चित्तवृत्ति शान्त हो जाती है। इस प्रकार लीला से
देह धारण करने वाले तुम्हें देखकर सभी को मनोरम लग रहा है। तुमने अत्यन्त अद्भुत कर्म किये। बायें हाथ से
गोवर्धन पर्वत उठाया, मुख से बडवाग्नि को निगलकर गोपालों का संरक्षण किया। मृत हुए गुरुपुत्र को वापस ले
आये। गत गर्भों से देवकी को मिलाया और स्वयं गोपाल वत्स बनकर ब्रह्मदेव को भी भ्रम में डाल दिया। हे
श्रीकृष्णनाथ ! अनंता ! इस प्रकार जगत के हित के लिये तुमने अनेक प्रकार के चरित्र खेले।
यानि ते चरितानीश मनुष्याः साधवः कलौ।
शृण्वन्तः कीर्तयन्तश्च तरिष्यन्त्यञ्जसा तमः॥ २४॥
आपने यह अवतार लेकर अत्यन्त पावन तथा विचित्र कथाओं की रचना की और नाना प्रकार के चरित्र
कर दिखाये। साधुजन कलियुग में इन चरित्रों का श्रवण-कीर्तन कर त्रिगुणों के साथ मायामोह से मुक्ति पा लेंगे।
यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरुषोत्तम।
शरच्छतं व्यतीताय पञ्चविंशाधिकं प्रभो॥ २५॥
हे पुरुषोत्तम ! हे ऋषीकेशी ! इस यदुवंश में आपने अवतार लिया। उस अवतार को लिये कितने वर्ष बीत
गये यह भी मैं आपसे बताता हूँ। हे गोविन्दा ! मृत्युलोक में मनुष्य की आयु सीमा सौ वर्ष निर्धारित है। उस
मर्यादा को समाप्त होकर भी पचीस वर्ष बीत गये।
नाधुना तेऽखिलाधार देवकार्यावशेषितम्।
कुलं च विप्रशापेन नष्टप्रायमभूदिदम्॥ २६॥
तिस पर भी भूतल पर कोई देवकार्य शेष नहीं रह गया है। यादवकुल तो वैसे भी नष्टप्राय हो गया है।
मरणप्राय हाथी या जिसका पंख उखड़ गया हो ऐसे पक्षी की तरह यादवों की सेना भूमि के लिये भारस्वरूप हो गयी
है। जैसे फूस की टूटी झोपड़ी हो या जैसे राजकुमार को क्षयरोग जड़ जाय अथवा अग्नि में अजगर झुलस जाय उसी
प्रकार यादववीरों की स्थिति हो गयी है। ब्राह्मणों का शाप महाभयंकर होता है इसलिये यादवों का वीर्य, शौर्य, प्रताप
तथा शिखर तथा पहुँचा हुआ उनका घमण्ड यह सब नष्ट होकर उन सब पर मुर्दैनी छा गयी है।

छठां अध्याय १५३
ततः स्वधाम परमं विशस्व यदि मन्यसे।
सलोकाँल्लोकपालान्नः पाहि वैकुण्ठकिङ्करान् ॥ २७ ॥
इसलिये हे देवाधिदेव ! हे यादवराया ! हे श्रीकृष्ण ! हम सब तुम्हारे चरणों की बाट जो रहे हैं। कृपया
वैकुण्ठ चलने की तैयारी करें। हे देवकीनन्दन ! यदि आप चाहें तो इसी क्षण चलने की तैयारी करें। देवताओं की
सेना खड़े-खड़े आपकी प्रतीक्षा कर रही है। जो भी लोक या लोकपाल हैं उन पर आप कृपा करें। हम सब
आपके दास हैं इसलिये इन दासों की बात को सम्मान प्रदान करें। हे वैकुण्ठनाथ महाराज ! मुझे तथा शंकरादि
समस्त देवताओं को भी आपकी सेवा की उत्कंठा है।
श्रीभगवानुवाच
अवधारितमेतन्मे यदात्थ विबुधेश्वर।
कृतं वः कार्यमखिलं भूमेर्भारोऽवतारितः ॥ २८ ॥
ब्रह्मदेव का यह भाषण सुन कर योगज्ञानियों के मुकुटमणि श्रीकृष्ण ने अपनी मेघ गम्भीर वाणी से,
हास्यवदन होकर ब्रह्मदेव से बातें शुरू कीं। जैसे नादब्रह्म पूर्ण हो गया हो अथवा आत्मानन्द का फल पक गया
हो इस प्रकार श्रीकृष्ण ने बोलना प्रारम्भ किया। इससे कर्ण के भाग्य का उदय हो गया। उन्होंने गौरव के साथ
कहा, "ब्रह्मदेव! तुम्हारी भक्ति देखकर मैं अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ हूँ।" कहकर श्रीहरि उस समय पुत्रप्रेम से
आलिंगन देने के लिये उत्सुक हो गये और उन्होंने प्रेम से कहा, "हे देवेन्द्र ! तुम्हारा कहना सत्य है। हे
ब्राह्मणेन्द्र ! तुम्हारी विनती के अनुसार मैंने पृथ्वी का भार तो हल्का कर दिया। मैंने अपना कार्य पूर्ण किया है।
कुछ भी शेष नहीं रहा है। फिर भी एक बड़ा काम रह गया है और मेरे लिये वही समस्या है।"
तदिदं यादवकुलं वीर्यशौर्यश्रियोद्धतम्।
लोकं जिधृक्षद्रुद्ध मे वेलयेव महार्णवः ॥ २९ ॥
यद्यसंहृत्य दृप्तानां यदूनां विपुलं कुलम्।
गन्तास्म्यनेन लोकोऽयमुद्वेलेन विनङ्क्ष्यति ॥ ३० ॥
यहाँ हमारा जो यादवों का कुल है, वह वीर्य, शौर्य और वैभव से उन्मत्त हो गया है। अपने बल के घमण्ड
में वे धर्म का नाश करने पर तुल गये हैं। वे धर्म की जड़ें खोदना चाहते हैं लेकिन जिस प्रकार समुद्र को सीमाओं
ने नियन्त्रित कर रखा है, उसी प्रकार मैंने योगबल से उन्हें काबू में रखा है। उन्हें यदि इसी तरह यहाँ छोड़ कर
निजधाम के लिये चला जाऊँ तो ये अधर्म के लिए प्रवृत्त होंगे। उनका निस्तारण कौन करेगा ? समुद्र अपनी
मर्यादा तोड़कर उन्मत्त होने पर जब सारी चीजों को स्वाहा कर देता है तो उस पर कौन नियंत्रण कर पाता है ?
वैसी ही स्थिति होगी। ये अधर्मरत हो जाएँगे और आपके लिये संकट उत्पन्न करेंगे और तब आप ही उनकी
शिकायत लेकर मेरे पास आयेंगे। ये देवताओं के वश में नहीं आयेंगे, दैत्य अथवा दानवों से भी ये हार नहीं
मानेंगे और जब ये अधर्म का विद्रोह करेंगे उस समय आप ही शिकायत लेकर मेरे पास आयेंगे।
इदानीं नाश आरब्धः कुलस्य द्विजशापजः।
यास्यामि भवनं ब्रह्मन्नेतदन्ते तवानघ ॥ ३१ ॥
इसलिये हमारे इस यादव कुल का शीघ्र विनाश करने का निश्चय कर तथा उसको यथोचित बना कर

१५४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
आज से ही उसका शुभमुहूर्त किया है। हे सखा ब्रह्मदेव! सुनो। एक बार इस कुल का नाश हो जाय तो फिर मैं
सचमुच ही निजधाम आऊँगा और वह भी तुम्हारे लोक के रास्ते से। श्रीकृष्ण ने कही हुई यह बात शंकर और
ब्रह्मदेव ने भी सुनी। समस्त देवताओं का समुदाय भी आनन्दित होकर आनन्द का घोष करने लगे। सब ने जोर-
जोर से जय-जयकार कर करतल ध्वनि की और श्रीकृष्ण के चरणों का वन्दन कर उन पर पुष्पांजलि अर्पित की।
श्रीशुक उवाच
इत्युक्तौ लोकनाथेन स्वयम्भूः प्रणिपत्य तम्।
सह देवगणैर्देवः स्वधाम समपद्यत ॥ ३२॥
शुक्राचार्य कहते हैं, हे राजा परीक्षित्! कृष्ण का यह भाषण सुनकर सुरवरों के मन में अत्यन्त आनन्द
उत्पन्न होकर उन्होंने उन्हें नमस्कार किया। ब्रह्मदेव, सूर्य, शंकर आदि देवताओं ने मिलकर कृष्ण को दण्डवत
किया और चरणस्पर्श कर वे चले गये।
अथ तस्यां महोत्पातान् द्वारवत्यां समुत्थितान्।
विलोक्य भगवानाह यदुवृद्धान् समागतान्॥ ३३॥
उधर श्रीकृष्ण को कुल का विनाश जल्द से जल्द करने का निश्चय करने की ही देर थी कि इधर द्वारका
में भयंकर उपद्रव होने लगे। आकाश में तिधारी केतु, धूमकेतु, दण्डकेतु आदि दिखायी देने लगे। शिखायुक्त
पुच्छलतारा भी आकाश में दिखायी देने लगा। भरी दुपहरिया में भूकम्प के धक्के लगने लगे, दिन में उल्कापात
होने लगे भूत नग्न होकर आकाश में नाचने लगे और क्रन्दन करने लगे। सियार नगर में घुस कर दिन दहाड़े
चौराहों पर चिल्लाने लगे। शहर में चारों ओर सियारों के चिल्लाने की आवाज सुनायी पड़ने लगी। उसे सुनकर
लोग भय से काँपने लगे। गाँव के अन्दर और बाहर श्वानों ने रोना शुरू किया। मार्जारों के कोलाहल का स्वर तो
गाँव के प्रत्येक घर में सुनाई पड़ रहा था। गायें मध्यरात्रि में गुहारने लगीं। बच्चे खेलते समय मारपीट करने लगे,
गिद्ध लोगों पर झपट्टे मारने लगे। उल्लू घर-घर बोलने लगे। लोगों की वाग्देवी क्षुब्ध हो उठी। वह कहने लगी,
अरे यम की सवारी आ गयी, क्यों व्यर्थ ही जल्दी-जल्दी दौड़ कर आग में कूद रहे हैं। ज्वालामुखी के विस्फोट
हुए, भूचाल के धक्के लगने लगे, धूप तो आग की तरह तपने लगी। हवा भी कम्प उत्पन्न करने लगी। ऊष्ण वायु
के झोंकों से शरीर झुलसने लगे। नगर में चारों ओर धूल उड़ने लगी और आँखों में भरने लगी। स्त्री-पुरुषों में
आँख खोलने की शक्ति नहीं रह गयी। चारों दिशाओं में जैसे धुंध छा गयी। शहर में रक्त की वर्षा होने लगी।
यह सब देखकर समस्त यादवगण भय से दिग्मूढ़ हो गये। उनमें जो वृद्ध थे उन्होंने विचार किया कि ये अनिष्ट
के संकेत हैं। किसी बड़े संकट की आशंका दिखायी देती है। यह सोच कर वे कृष्ण के पास आये और उन्होंने
कृष्ण को सारा वृत्तांत सुनाया। सभी यादवों को उद्विग्न हुआ देख श्रीकृष्ण ने बोलना प्रारम्भ किया।
श्री भगवानुवाच
एते वै सुमहोत्पाता ह्युत्तिष्ठन्तीह सर्वतः।
शापश्च नः कुलस्यासीद् ब्राह्मणेभ्योदुरत्ययः ॥ ३४॥
श्रीकृष्ण यादवों से कहने लगे कि ये जो दिन में पृथ्वी और आकाश में बड़े उपद्रव हो रहे हैं वे सब जगह
समान हैं। ये अशुभ चिह्न देखकर मुझे भी स्मरण हो आया कि हमारे यादवकुल को ब्राह्मण का शाप है। ये चिह्न

छठां अध्याय १५५
इसी बात के सूचक हैं। ब्राह्मणों का शाप तो सच ही होकर रहता है। हरिहर भी उससे मुक्त नहीं हैं। इसलिये
आप इसी क्षण इस सम्बन्ध में विचार करें। पहले सबको गाँव के बाहर निकालिये।
न वस्तव्यमिहास्माभिर्जिजीविषुभिरार्यकाः।
प्रभासं सुमहत्पुण्यं यास्यामोऽद्यैव माचिरम्॥ ३५॥
यदि प्राणों की आशा हो तो हमें आज ही द्वारका छोड़कर प्रभास की ओर चलना पड़ेगा। सोच क्या
रहे हैं? शीघ्रता कीजिये। आज ही निकल चलिये। घर बार की आशा छोड़िये। अब यहाँ एक क्षण के लिये भी
न रुकिये।
यत्र स्नात्वा दक्षशापद्गृहीतो यक्ष्मणोडुराट्।
विमुक्तः किल्बिषात् सद्यो भेजे भूयः कलोदयम्॥ ३६॥
समस्त यादवश्रेष्ठ! सुनिये। प्रभासतीर्थ एक अत्यन्त पवित्र स्थान है। यहाँ स्नान करने से नक्षत्राधिपति
चन्द्रमा क्षय रोग से मुक्त हुआ। यक्ष ने अपनी सत्ताईस कन्याएँ चन्द्र को दी थीं। अन्य सबको छोड़कर वह
केवल एक रोहिणी के साथ रममाण हुआ। इसलिये दक्ष ने चन्द्रमा को शाप दिया जिसके कारण उसे क्षयरोग ने
ग्रस लिया। तब उसने यहाँ आकर स्नानादि कर्म किया। स्नान करते ही तत्काल उसका क्षयरोग दूर हो गया और
उसकी सारी कलाएँ उसे प्राप्त होकर वह अपने मूल तेज से प्रकाशित होने लगा।
वयं च तस्मिन्नाप्लुत्य तर्पयित्वा पितॄन्सुरान्।
भोजयित्वोशिजो विप्रान्नानागुणवतान्धसा ॥ ३७॥
हम भी वहीं पर स्नान, दान, पितृतर्पण करें तथा वेदशास्त्र सम्पन्न ब्राह्मणों का पूजन करें। नाना प्रकार के
पकवान तैयार कर उन्हें देवब्राह्मणों को समर्पित करें और यथाविधि दान-दक्षिणा दें।
तेषु दानानि पात्रेषु श्रद्धयोप्त्वा महान्ति वै।
वृजिनानि तरिष्यामो दानैर्नौभिरिवार्णवम् ॥ ३८॥
जिस प्रकार गीली भूमि में बीज बोया जाता है उसी प्रकार दान देने के लिये उत्तम ब्राह्मण देखकर उसे
श्रद्धापूर्वक उत्तमोत्तम दान देते रहना चाहिये। ब्राह्मण का मुख ही खेती लायक भूमि है। वह जड़ तथा पत्तियों से
विहीन होने पर भी पवित्र है। ऐसा उत्तम खेत देखकर ही उसमें चित्रविचित दानों की बोआई कीजिये। विनय की
उत्तम आर्द्रता, श्रद्धायुक्त निर्मल चाह, उसमें शमदमादि मजबूत बैलों से जुताई कर देनी चाहिये। इस प्रकार खेत
में बीज बोने से फसल लहलहाएगी और चारों पुरुषार्थ प्राप्त होंगे। जिस प्रकार नौका के बल से समुद्र के जल में
से तैर कर जाया जा सकता है, उसी प्रकार उस फसल के बल से हम सब पातकों को पार कर लेंगे।
श्रीशुक उवाच
एवं भगवताऽऽदिष्टा यादवाः कुलनन्दन।
गन्तुं कृतधियस्तीर्थं स्यन्दनान् समयूयुजन्॥ ३९॥
शुक कहते हैं, हे सुजान परीक्षित! सुनो। इस प्रकार प्रभास जाकर तीर्थ विधि करने के लिये श्रीकृष्ण ने
अनुज्ञा दी। तब यादवों का झुण्ड एक साथ निकल पड़ा। उन्होंने अपने घोड़े तैयार किये और एक के पीछे एक
दौड़ने लगे चारों ओर गड़बड़ी मच गयी।

१५६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तन्निरीक्ष्योद्धवो राजन् श्रुत्वा भगवतोदितम्।
दृष्ट्वारिष्टानि घोराणि नित्यं कृष्णमनुव्रतः ॥ ४० ॥
बड़े-बड़े वीरों का जमघट, हाथियों और घोड़ों की घरघराहट, द्वारका में किसी को भी राह चलना कठिन
हो गया। प्रभास जाने की इतनी हड़बड़ी मच गयी। हे राजा परीक्षित ! सारी द्वारका ही जब खड़बड़ा कर निकल
पड़ी तो उद्धव के मन में वही बात आयी जो श्रीकृष्ण ने देवताओं से कही थी। शीघ्र ही कुल का विनाश करना
और आज से ही उसका मुहूर्त है ऐसा भगवान ने कहा था। उसी कार्य की आज भगवान ने शुरुआत कर दी ऐसा
उसने देखा। उद्धव हमेशा कृष्ण के साथ रहता था और कृष्ण की अनुमति से ही रहता था। स्वर्गस्थ देवताओं
तथा भगवान के बीच हुआ भाषण उसने सुना था। श्रीकृष्ण की उपस्थिति में जब यहाँ द्वारका में बड़े-बड़े उत्पात
हुए इसका अर्थ यही है कि यह सब श्रीकृष्ण की इच्छा से ही हुआ। यादवों को प्रभास ले जाकर यह क्षणार्ध में
उनका विनाश करा देगा क्योंकि श्रीकृष्ण अब निजधाम जाने के लिये उतावला हो गया है। लेकिन यदि उनका
विनाश ही करना था तो वह द्वारका में ही क्यों नहीं किया ? उन्हें इतनी दूर क्यों ले गये ? इसका कारण यह है
कि श्रीकृष्ण सर्वज्ञ था, उसे सब कुछ ज्ञात था और वह इस सबका सूत्रधार था। यादव वास्तव में देवांश थे और
द्वारका सातवीं मोक्षपुरी थी इसलिये यदि यहाँ उनका विनाश हुआ तो उन्हें सायुज्यमुक्ति प्राप्त होगी। यही सोच
कर श्रीकृष्ण ने यहाँ उनका विनाश नहीं किया क्योंकि उन्हें पदाभिमान है इसलिये उन्हें द्वारका में मृत्यु नहीं
आयेगी यह जानकर ही श्रीकृष्ण ने उन्हें प्रभास भेजा। ब्रह्मशाप का मूल कारण था वह मूसल जो प्रभास में उत्पन्न
हुआ था। यह बात श्रीकृष्ण जानते थे। इस प्रकार अपने कुल का विनाश कर श्रीकृष्ण निजधाम के लिये निकल
पड़ेंगे यह ध्यान में आते ही उद्धव के मन को बुरा लगा। उसका गला भर आया। आँखों से अश्रुधाराएँ बहने
लगीं। सारे शरीर से पसीना चुहचुहाने लगा और हिचकी आने लगी। कृष्ण वियोग यदि आधे क्षण का भी हो
जाता तो उसकी समझ में नहीं आता था कि क्या किया जाय ? वह कृष्ण के चेहरे की ओर एकटक देखता रह
गया। आने वाले वियोग के तीव्र घाव उसके हृदय में होने लगे। धैर्य के साथ-साथ उसकी बुद्धि भी स्तब्ध हो
गयी। मन बेचैन हो उठा। तब एकान्त है यह देखकर वह दौड़ कर श्रीकृष्ण के पास पहुँचा, उनके पैर पकड़
लिये और रोने लगा।
विविक्त उपसंगम्य जगतामीश्वरेश्वरम्।
प्रणम्य शिरसा पादौ प्राञ्जलिस्तमभाषत ॥ ४१ ॥
संसार का नियंता है काल और उसका नियंता जो श्रीकृष्ण है उसके चरणों पर मस्तक रखकर वह
विनयपूर्वक बोलने लगा।
उद्धव उवाच
देवदेवैश योगेश पुण्यश्रवणकीर्तन।
संहृत्यैतत्कुलं नूनं लोकं संत्यक्ष्यते भवान्।
विप्रशापं समर्थोऽपि प्रत्यहन्न यदीश्वरः ॥ ४२ ॥
उद्धव ने कहा "हे यादवेंद्र ! हे देवेंद्र के भी आदिन्द्र ! हे योगियों के ज्ञानचन्द्र ! तुम्हारा स्वरूप कलारहित
है। देवों में इन्द्र श्रेष्ठ है लेकिन तुम उस इन्द्र के भी इन्द्र हो। योगियों में शंकर श्रेष्ठ हैं लेकिन हे श्रीकृष्ण ! तुम

छठां अध्याय १५७
उनके भी ईश हो। तुम्हारा श्रवण और कीर्तन पुण्य को भी पावन करता है। कीर्तन से संसार भवबन्धन टूटकर
समाधान प्राप्त होता है अपने कुल का विनाश कर तथा यह लोक छोड़ कर, हे श्रीकृष्ण तुमने निश्चय ही
निजधाम जाने का विचार किया है ?"
नाहं तवाङ्घ्रिकमलं क्षणार्धमपि केशव।
त्यक्तुं समुत्सहे नाथ स्वधाम नय मामपि॥ ४३॥
ब्राह्मण का शाप झूठ साबित करने की सामर्थ्य तुझमें होते हुए भी केवल निजधाम जाने के लिये ही तुम
अपने कुल का संहार कर रहे हो न? यह कहते समय उसे रुलाई आ गयी। उसे रोक न पाने के कारण वह जोर-
जोर से सुबकने लगा। आँसुओं से उसकी आँखें भर आयीं। ऐसी स्थिति में ही उसने दौड़कर श्रीकृष्ण के पैर
पकड़ लिये। चरणों पर मस्तक रखकर उसने कहा, हे श्रीहरि! तुम मेरे सखा हो, मेरे मालिक हो ऐसा होते हुए
तुम हमें छोड़कर कैसे जा रहे हो? हे अच्युत! तुम जा रहे हो यह सुनते ही मन में दुःख का जो कोलाहल मचा
है वह रुकता ही नहीं है। इसलिये मैं चाहता हूँ कि ऐसा वियोग न हो। जिस प्रकार पानी के बिना मछली
छटपटाती है, उसी प्रकार मेरे प्राण छटपटा रहे हैं। तो हे कृष्ण! आखिर अंतकाल में तुम मेरे प्रति इतने निष्ठुर हो
ही गये न? तुम्हारे जाने के बाद मैं दीन हीन हो जाऊँगा। फिर मीठी-मीठी बातें किसके साथ करूँगा? अब देह
में प्राण भी नहीं रह गया है। आत्मा निकल जाने पर देह केवल प्रेतरूप रह जाता है उसी प्रकार तुम्हारे निजधाम
जाने के बाद हमारी गति होगी। हमारा माता-पिता तू ही है ऐसा हमारा दृढ़ विश्वास है। ऐसा होते हुए, देखता हूँ
तुम हमें छोड़ कर कैसे जाते हो? इतना कहकर वह उनके कदमों पर लौट गया। तुम तो निजधाम के लिये चल
पड़े हो हो और हमें किसके हाथ सौंप रहे हो? हे पुरुषोत्तम! तुम मुझ पर क्यों रूठे हो? यह हमारे ही कर्मों का
फल है। तुम क्या करोगे? गूंगे बालक को जमीन पर रख कर जिस प्रकार माँ सती जाने के लिये निकल पड़ती
है और उस समय बालक जिस प्रकार व्याकुल हो जाता है वैसी ही अवस्था उद्धव की हुई। बंसी में लगा हुआ
स्वादिष्ट मांस का टुकड़ा मछली निगल भी नहीं पाती कि तब तक मछुआरा बंसी को झटका देकर उसे ऊपर
खींच लेता है, उसी प्रकार प्रेमविकृत उद्धव व्याकुल हो उठा। भगवान! आपके जाने के बाद मैं सेवा किसकी
करूँ? हे श्रीकृष्ण! तुम यथार्थ में ही हमारा भाग्य हो। ऐसा होते हुए तुम हम पर क्यों रूठ गये? कोई अन्धा
व्यक्ति अपने साथी को छोड़कर किसी गलत रास्ते से कँटीले जंगल में फँसकर असह्य हो उठता है, वैसी ही
उद्धव की अवस्था हुई। वह बार-बार दौड़ कर पैरों पर गिरने लगा। जोर-जोर से रोने लगा। कहने लगा मुझे
छोड़कर कहाँ जा रहे हो? मैं इन चरणों से दूर नहीं रह पाऊँगा। ये चरणकमल मैं एक क्षण के लिये भी नहीं
छोड़ पाऊँगा। हे गोपाल! तुम्हारा प्रयाण वास्तव में मेरे अन्तकाल का काल है। मुझे तुम्हारे संग की आदत लग
गयी है। इसलिये मुझे भी अपने साथ ले चलो। मेरी आपसे यही प्रार्थना है। श्रीकृष्ण मुझ पर इतनी कृपा करें।
तुम जब गरुड़ पर बैठोगे तो मुझे भी पीछे बिठा लो। लेकिन मुझे छोड़कर न जाओ। मुझे अपने निजधाम ले
चलो। जीवनभर मुझे साथ दिया और अब अन्त समय में क्यों मुझे दूर कर रहे हो? हे कृपासागर कृष्ण! इतनी
कृपा करो। अब तुम कहोगे कि मैं अपने ही कुल का काल बन गया हूँ, तुम्हारे लिये दयालु कैसे बना रहूँ?
लेकिन तुम कृपया ऐसा न कहो क्योंकि तुम दीनों के प्रति दयालु तथा भक्तों के प्रति स्नेहपूर्ण हो। भक्त पर
तुम्हारी कृपा है इसीलिये मैं तुमसे इतनी निकटता कर रहा हूँ। लेकिन हे श्रीहरि! मेरा उद्धार करो। मेरी विनय न
ठुकराओ।

१५८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तव विक्रीडितं कृष्ण नॄणां परममङ्गलम्।
कर्णपीयूषमास्वाद्य त्यजत्यन्यस्पृहा जनः ॥ ४४॥
तुम्हारी नाना प्रकार की क्रीडाएँ तथा खेल जीवों को परम मंगलदायक होने के कारण लोग उस प्रिय तथा
निर्मल लीला का आस्वाद कर्णद्वार से करते हैं। तुम्हारी कीर्तिश्रवणामृत की मधुरता का आस्वाद कर्णों ने आधी
घड़ी के लिये ही लिया था कि उन्हें वह इतना मधुर लगा कि उसके आगे अमृत का माधुर्य भी फीका लगने
लगा। तुम्हारी ऐसी कीर्ति सुनते ही वासनाओं के साथ इच्छा समाप्त हो जाती है, इसलिये जो तुम्हारे भक्त हैं वे
तुम्हारी कीर्ति की सदा हृदय में धारण करते हैं। ऐसे श्रीकृष्ण का वियोग मुझे सहन नहीं होगा। आपके स्वामित्व
और आपके अच्छेपन का हमें व्यसन ही लग गया है।
शय्यासनाटनस्थानस्नानक्रीडाशनादिषु ।
कथं त्वां प्रियमात्मानं वयं भक्तास्त्यजेमहि ॥ ४५ ॥
सच पूछो तो तुम हमारे स्वामी हो लेकिन तुम मुझे अपने आसन पर बिठाते थे। हे श्रीकृष्ण! कोई मन की बात
कहनी होती थी तो मेरे सिवा तुम्हारा और कोई नहीं था। कोई कठिन कार्य करना होता तो उस समय तुम मेरी ही
राय लेते थे और जो राय मैं देता था वह तुम्हें उचित लगती थी। तुम भोजन करने जाते तो मेरी थाली अपने साथ
लगवाते थे और खाना खाते समय नाना प्रकार का विनोद करते हुए अपने थाली में की चीज मुझे खिलाते थे।
ब्रह्मदेवादि देवताओं को भी तुम्हारी पंगत का लाभ दुर्लभ था किन्तु मैं तुम्हारे साथ खाना खाने बैठता था और
तुम्हारी थाली में बचा हुआ खाना तो तुम स्वयं मुझे हिस्सेदार बना कर खिलाते थे। मेरा हाथ पकड़ कर तो तुम
अकेले एकान्त में बैठा करते थे। ब्रह्मदेव आदि देवताओं की कोई विनती होती तो उसे मैं तुम्हें सुनाता था। बिना
किसी के जाने तुमने रासक्रीडा की लेकिन वह गोपनीय बात मुझे बताकर तुमने मुझे गोकुल भेज दिया था। पलंग
पर सोयी हुई रुक्मिणी को जगा कर तुम मुझे अपने पास सुलाते थे। उस निद्रा के सुख के आगे बेचारी समाधि क्या
चीज है ? इस प्रकार तुम्हारी संगति में कितनी रातें काटीं उसकी कोई गिनती नहीं है। हे श्रीकृष्ण, फिर भी मुझे
छोड़कर तुम जा रहे हो ? हे कृष्ण ! जब तुम्हारा समय नहीं बीतता था तो तुम रुक्मिणी को भेजकर मुझे बुलवा लेते
थे और फिर हम दोनों बैठकर चौपड़ खेला करते थे। तुम जंगल में घूमने जाते थे तो रथ में मुझे बिठा लेते थे और
फिर हम दोनों साथ-साथ घूमते थे। क्या अब तुम मेरी संगति से ऊब गये? पानी में जलक्रीड़ा करते समय या
गोपियों के साथ हँसी-ठट्ठा करते समय भी मैं तुम्हारे साथ रहता था। स्नान करते समय तो मैं हमेशा तुम्हारे सामने
खड़ा रहता था। ऐसी कितनी बातें तुम्हें बताऊँ? हे श्रीपति ! रात को भी मैं तुमसे कभी अलग नहीं हुआ, फिर अन्त
समय में तुम्हारा साथ कैसे छोड़ूँ? तुम हमारे स्वामी, हमारे सखा, सारे जीवों का प्राण हो। हे पुरुषोत्तम ! हे
मेघश्याम ! तुम्हारा वियोग हमें कैसे सहन होगा? तुम्हारे श्रीचरण ही हमारा प्राण है। ऐसे इन चरणों के वियोग का
दुःख सहने का सामर्थ्य मुझमें नहीं है। तुम्हारे चरणों का सान्निध्य मुझमें नहीं है। तुम्हारे चरणों का सान्निध्य यही
हमारा सर्वस्व है, प्राण भी चले जाएँ तो भी उनका वियोग हमें सहन नहीं होगा। शरीर चाहे रहे या जाये लेकिन
तुम्हारे चरणों का वियोग हमें बिलकुल सहन नहीं होगा। तुम्हारा मोह अत्यन्त कठिन है। ब्रह्मदेव भी उस पर
नियंत्रण नहीं कर सकते। लेकिन हे श्रीकृष्ण! तुम्हारे शेषग्रहण के कारण मैंने उसे भी सुगमता से पार कर लिया।
त्वयोपभुक्तस्रग्गन्धवासोऽलंकारचर्चिताः।
उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव मायां जयेमहि ॥ ४६ ॥

छठां अध्याय १५९
हे गोपाल ! मैं तुम्हारा दास होने के कारण, तुम्हारे चन्दन में से बचा हुआ चन्दन अपने ललाट पर लगाने में
तथा तुम्हारी माला अपने गले में डालने से कलिकाल भी मेरे सामने दीन-हीन हो जाता है। तुम्हारी कमर का
पीला पीताम्बर मेरी कमर में लग गया तभी मैंने काम को जीत लिया और वह दृढ़ होकर मेरी कमर से लग
गया। तुमने अपने हृदय पर लगा पदचिह्न मुझे दिया तभी माया मुझसे दूर चली गयी। वह तुम्हारे दासों के सामने
खड़ी भी नहीं हो सकेगी। सच तो यह है कि यदि माया का कोई चेहरा होता तो वह सामने खड़ी होती। लेकिन
वह तो स्वयं ही मिथ्या है। लेकिन लोग व्यर्थ ही परिश्रम कर रहे हैं। देखो। तुम्हारा उच्छिष्ट खाने के आगे
समाधि का सुख भी शरमा जाता है और आत्मानन्द परिपक्व हो जाता है। इस प्रकार तुम्हारी सेवा करके ही मैं
इतनी ऊँचाई तक पहुँचा हूँ। तुम्हारे ही अवशिष्ट का सेवन कर, मैं उस माया को भी तर गया हूँ जिसने योगियों
को भी भयाक्रान्त किया है।
वातरशना य ऋषयः श्रमणा ऊर्ध्वमन्थिनः।
ब्रह्माख्यं धाम ते यान्ति शान्ताः संन्यासिनोऽमलाः ॥ ४७ ॥
मिथ्या माया के भय से योगी गिरिकन्दराओं में छिप कर बैठ गये, लंगोटी भी छोड़ दी। फिर भी मन में
भय तो है ही। वे स्वस्तिकादि आसन लगाकर प्राणायाम करने के लिये मूलबन्ध से गात्रों का अवरोध कर दृढ़
धारणा करते हैं। नाक से निकलने वाली वायु को नियंत्रित करने के लिये अभ्यास करते हुए शरीर को कष्ट देते
हैं। भूख से ही भूख को खाते हैं, प्यास से ही प्यास का शमन करते हैं, इस प्रकार अत्यन्त निश्चयपूर्वक सुख
और दुःख पर विजय प्राप्त करते हैं। सद्बुद्धि को हाथ में लेकर इन्द्रिय वृत्तियों को नियंत्रण में रख तथा वैराग्य
की ख्याति सम्पादित कर ऊर्ध्व गति से चलने लगते हैं। मणिकर्णिका की ड्योढ़ी लाँघ कर ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश कर
फिर ब्रह्मगिरी पर विजय की दुंदुभि बजाते हैं। वहाँ उनके सर्वांग में शान्ति सुख का संचार होता है। सभी
संकल्पों का त्याग हो जाने के कारण वे स्वयं चिद्ब्रह्म ही हो जाते हैं। इस प्रकार योगी लोग योगबल से माया पर
विजय प्राप्त करते हैं। लेकिन उस माया को जीतने के लिये तुमने हमें उससे भी आसान रास्ता खोल दिया है।
वयं त्विह महायोगिन् भ्रमन्तः कर्मवर्त्मसु।
त्वद्वार्तया तरिष्यामस्तावकैर्दुस्तरं तमः ॥ ४८ ॥
हे कृष्ण! तुम्हारे भक्तों का भजन करें, तुम्हारी कथावार्ता सुनें, बस इतने से ही मैंने तुम्हारी माया को पार
कर लिया है। कर्ममार्ग पर चलने वाले हम कर्मठ लोगों पर तुमने बहुत बड़ा उपकार किया है। तुम्हारी कथा के
श्रवण मनन से ही मोक्ष का द्वार खुलता है। मोक्ष की बात दूर ही रखें, हमें उसकी जरा भी इच्छा नहीं है क्योंकि
तुम्हारे भक्त जब तुम्हारी कथा श्रवण करते हैं तो उन्हें सांसारिक बाधाएँ नहीं सतातीं। तुम्हारी अभेद भक्ति प्रिय
होने के कारण हमें संसार में रहना ही अच्छा लगता है। जो भक्त होते हैं वे त्रिगुणों का भी सामना कर अत्यन्त
प्रेम के साथ भजन करते हैं।
स्मरन्तः कीर्तयन्तस्ते कृतानि गदितानि च।
गत्युत्स्मितेक्षणक्ष्वेलि यन्नृलोकविडम्बनम् ॥ ४९ ॥
प्रेमपूर्वक तुम्हारे चरित्र का श्रवण और कीर्तन करने से तुम स्वयं ही उनके संसार बन्धन का विच्छेद करते
हो। संसारभाव को दूर कर तुम उन्हें आत्मपद के निकट स्थान देते हो। इस प्रकार हम तुम्हारे भक्त तुम्हारे श्रवण-