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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 869 में से

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पृष्ठ 160

१४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जयकार किया जिससे दसों दिशाएँ गूँज उठीं। उन्होंने अनेक प्रकार के रसीले पद, प्रबन्ध तथा विविध प्रकार की
गद्यपद्य रचनाओं से श्रीकृष्ण का स्तुति गायन शुरू किया।
देवा ऊचुः
नताः स्म ते नाथ पदारविन्दं बुद्धीन्द्रियप्राणमनोधचोभिः।
यच्चिन्त्यतेऽन्तर्हृदि भावयुक्तैर्मुमुक्षुभिः कर्ममयोरुपाशात् ॥ ७॥
देवताओं ने कहा, हे सच्चिदानंद श्रीकृष्ण! काया, वाचा तथा मन से विवेक युक्त प्राणधारणा से तुम्हारे
चरणों को प्रणाम करता हूँ। इन्द्रिय शान्त हो इसलिये विषयवासना छोड़कर दसों इन्द्रिय तुम्हारी ओर प्रवृत्त कर हे
श्रीकृष्ण! भक्तिभाव से तुम्हें नमस्कार कर रहे हैं। विषयों के प्रति उदासीन होकर, संसार की आशा त्याग कर,
कर्मपाश तोड़ने के लिये तपस्वी लोग तुम्हारे चरणों का चिन्तनं करते हैं। मुक्ति की आशा से मुमुक्षु लोग तुम्हारे
चरणों का ध्यान करते हैं लेकिन वे कैसी भी दृढ़ भावना क्यों न रखें लेकिन क्षण भर के लिये भी तुम उनके
ध्यान में नहीं आते। तुम्हारे उन चरणों का प्रत्यक्ष दर्शन हमें आज हुआ, इस प्रकार देवतागण परस्पर अपने भाग्य
का वर्णन करने लगे। "इस सगुण स्वरूप को देखकर उसकी इतनी स्तुति क्यों करते हैं? क्योंकि जो आकार ले
लेता है वह सचमुच ही माया से युक्त होता है। जैसे आप शरीरधारी हैं, वैसे ही मैं भी शरीरधारी हूँ। तो मेरे दर्शन
से आप कैसे तर पायेंगे?" यदि आप ऐसा कहें तो मैं कहूँगा, हे अनन्ता! आप ऐसा न कहें। आप स्वयं माया के
नियन्ता हैं यह भी हमें मालूम हुआ है। वह समग्र कथा सुनें।
त्वं मायया त्रिगुणयाऽऽत्मनि दुर्विभाव्यं व्यक्तं सृजस्यवसि लुम्पसि तद्गुणस्थः।
नैतैर्भवानजित कर्मभिरज्यते वै यत्स्वे सुखेऽव्यवहितेऽभिरतोऽनवद्यः ॥ ८॥
नींद लगने पर वह नहीं दिखायी देती, जागने पर तो वह बिलकुल ही नहीं दिखायी देती। उसी प्रकार देह
में माया अतर्क्य स्थिति में है। वह सुरनरों को भी नहीं मालूम होती। हे देवाधिदेव श्रीकृष्ण! तुम्हारी माया तो वैसे
भी अतर्क्य है, तिस पर गुणों का क्षोभ होने के कारण वह ब्रह्मदेव आदि के भी समझ में नहीं आती। तुम ही देवी
माया का सहारा लेकर ब्रह्मादिकों को उत्पन्न करते हो, उनका पालन करते हो और तुम ही उनका संहार भी करते
हो। लेकिन उस कर्म से तुम अलिप्त रहते हो। कोई स्वप्न में सृष्टि उत्पन्न करता है, उसका प्रतिपाल कर संहार
भी करता है लेकिन वह क्रिया कर्ता पर लागू नहीं होती। उसी प्रकार तुमने भी अलिप्त रह कर ही सृष्टि उत्पन्न
की है। सूर्य अपनी ही किरणों से मृगजल भरता है और अस्त के समय उसका शोषण कर उसे ले जाता है। उसी
प्रकार तुम सब कुछ करके अलिप्त रहते हो। धर्म की बाढ़ समूल नष्ट हो जाती है, अधर्म की सीमा टूट जाती है
तब हमारा संकट दूर करने के लिये तुम्हें अवतार धारण करना पड़ता है। अधर्म का नाश कर तुम धर्म की पूर्ण
वृद्धि करते हो और देवताओं को अपने-अपने पद पर स्थापित करते हो। फिर भी हे श्रीकृष्ण तुम कर्मातीत हो।
आत्मसुख के अनुसन्धान का तुम्हें हमेशा ध्यान रहता है जो हमें क्षण भर भी नहीं रहता इसलिये हम सदा
दीनवदन रहते हैं। जिसे निरन्तर आत्मसुख रहता है वह देहधारी होते हुए भी अवतारी पुरुष रहता है। उसके
चरण गंगासागर जैसे तीर्थों को भी पवित्र करनेवाले होते हैं। भले ही वह गुणों में विचरण कर रहा हो लेकिन वह
गुणातीत रहता है। उसके चरण का एक रजःकण भी त्रैलोक्य के महापातकों का विनाश कर देगा। यह तो तुम्हारे
दासों की कथा है। फिर हम तो प्रत्यक्ष तुम्हारे चरणों का ही वन्दन कर रहे हैं। यह तो तुम्हारे चरणों की कथा है
लेकिन तुम्हारी कीर्ति श्रवण करने से भी वैसा ही आत्मलाभ होता है। जो तुम्हारे चरणों का दर्शन करते हैं वे तो