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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 869 में से

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पृष्ठ 159

छठां अध्याय १४३
वपुषा येन भगवान्नरलोकमनोरमः ।
यशो वितेन लोकेषु सर्वलोकमलापहम् ॥ ४ ॥
श्रीकृष्ण ने जिस अवतार शरीर से अनेक प्रकार की युक्तियों से दुराचारी लोगों को संसार से तारने के लिए
अपनी कीर्ति का विस्तार किया, जिस कीर्ति को ध्यानपूर्वक सुनने से सचमुच ही चतुर्विद्ध प्रायश्चित्तों की गति ही
रुक जाती है, भक्तिभाव से जिसका नाम लेने से सभी पाप भस्म हो जाते हैं उस श्रीकृष्णरूपी पुरुषोत्तम ने सृष्टि
के विश्राम का स्थल देखा। जिसका सुरेखित शरीर, सुरनरों में अत्यन्त मनोरम दीखने वाला वह घनश्याम देखकर
सबके मन को समाधान हुआ। किरीटकुण्डल तथा मेखला पहिना हुआ, कटि में जरी का पीताम्बर परिधान किया
हुआ तथा गले में वनमाला होने के कारण वह घननील अत्यन्त शोभायमान लग रहा था। सौन्दर्य और गुणों का
वह मानों भण्डार ही था और अवतार मालिका का मुख्य रत्न श्रीकृष्ण उन्होंने देखा और उसका निवास स्थल
द्वारका भी सभी देवताओं ने देखी।
तस्यां विभ्राजमानायां समृद्ध्यायां महर्द्धिभिः ।
व्यचक्षतावितृप्ताक्षाः कृष्णमद्भुतदर्शनम् ॥ ५ ॥
कृष्ण ने जिस नगरी को बसाया था उसकी शोभा का क्या वर्णन किया जाय? उसमें सुवर्ण कलशों की
तो पंक्तियाँ दिखाई दे रही थीं और उनमें बड़े कौशल से रत्न जड़े हुए थे। उनका तेज आकाश में भी नहीं
समा रहा था। उस द्वारिका में कामधेनु प्रायः प्रत्येक घर में थी, कल्पवृक्षों की तो कतारें लगी हुई थीं और घर
की दीवारों पर चिन्तामणि के खिलौने लटक रहे थे। द्वारकावासियों के घरों में नवरत्नों के ढेर लगे हुए थे
और वहाँ श्रीकृष्ण का वास होने के कारण ऋद्धि-सिद्धि भी दासी होकर वहाँ रहती थीं। कृष्णरूप की
लालसा ने तो आँखों को मतवाला कर दिया तब वे बड़ी चाह से श्रीहरि के देह पर बैठकर मोरपंख जैसी
आँखों को देखने लगे। कृष्ण के सौन्दर्य का क्या वर्णन किया जाय? उसे चखने के लिए तो आँखों में जिह्वा
लग गयी। उपनिषद में वर्णन किया हुआ जो परब्रह्म है वही साकार रूप में आ जाने के कारण उसमें रसालता
तो अपूर्व थी। कृष्ण को देखने के लिये देवतागण उछलकूद मचाने लगे। आँखों को तो पलक झपकाने की
फुर्सत नहीं थी। कृष्णस्वरूप का कौतुक देखते समय आँखों की क्षुधा बढ़ रही थी, उनमें सुख लबालब भर
गया था, फिर भी वे अतृप्त थीं। श्रीकृष्ण को देखने वालों की भीड़ इतनी अधिक बढ़ रही थी कि देखने की
जल्दी में उनके शिरस्त्राण एक-दूसरे पर गिर रहे थे। श्रीकृष्ण को देखने वालों ने चारों ओर से उन्हें घेर
लिया। मानो सभी आँखों का भाग्योदय हो गया था। वे सम्पूर्ण पुरुष को देख रहे थे। श्रीकृष्ण गाढ़े मेघ की
तरह श्यामवर्ण था। उसकी ओर निजात्मभाव से देखते ही आँखें कृष्ण कला के प्रभाव से श्यामल हो गयीं।
जो वेदों की भी समझ में नहीं आता, योगियों के भी ध्यान में नहीं आता उस कृष्ण को वे साक्षात देख रहे
थे। उनके भाग्य को अपूर्व ही कहना चाहिये। ऐसे श्रीहरि को देखते ही देवताओं ने विमानों से पर्जन्यधाराओं
की तरह पुष्पवृष्टि की।
स्वर्गोद्यानोपगैर्माल्यैश्छादयन्तो यदूत्तमम्।
गीर्भिश्चित्रपदार्थाभिस्तुष्टुवुर्जगदीश्वरम् ॥ ६ ॥
मंदार, पारिजात, कल्पवृक्ष, हरिचन्दन आदि स्वर्गीय वृक्षों के सुगन्धित पुष्प सबने श्रीकृष्ण पर उछाले।
श्रीकृष्ण के चारों ओर उत्तमोत्तम पुष्पों का ढेर इकट्ठा हो गया था। फिर समस्त देवताओं ने सामने जाकर जय