श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठां अध्याय १४५
भाग्यवान हैं ही, उनकी महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता। हे स्वामी! तुम्हारी कीर्ति की पवित्रता भी वैसी
ही है। कथा सुनाता हूँ, उसे ध्यान से सुनो। पहले से ही जिस अग्नि में ज्वालाएँ निकल रही हों उसमें और
लकड़ियाँ डालने से आग धधक उठती है, उसी प्रकार देहाभिमान के कारण आशा बढ़ती रहती है जो तुम्हारे
श्रवण कीर्तन से समाप्त होती है।
शुद्धिर्नृणां न तु तथेज्य दुराशयानां विद्याश्रुताध्ययनदानतपःक्रियाभिः ।
सत्त्वात्मनामृषभ ते यशशि प्रवृद्धसच्छ्रद्धया श्रवणसम्भृतया यथा स्यात् ॥ ९ ॥
कृष्ण का स्तवन करने से वह तर जाता है। उस स्तवन को सुनने वाले का भी उद्धार होता है। इसलिये
स्तवन के द्वारा तारने में समर्थ एक तुम ही हो। इसलिये तुम्हारी कीर्ति का श्रवण यही एक शुद्धि का साधन है
अन्य सभी साधन केवल कष्ट उत्पन्न करते हैं। हे देवाधिदेव ! सुनो, केवल तुम्हारे श्रवण की उत्कंठा ही
अंतःकरण के पातकों को धोकर चित्तवृत्ति निर्मल करती है। गुणानुवाद श्रवण करने से जो विमुख हो गये और
तपस्या करने लगे उनकी बुद्धि नाना प्रकार के साधनों के कारण कर्कश हो गयी। मंत्र विद्या तो ग्रहण कर ली
लेकिन मंत्रोच्चार अशुद्ध होने से पुण्य तो नहीं ही मिलता उलटे भयंकर पातक अवश्य लग जाता है। 'शास्त्र'
का श्रवण करने से अहंकार चौगुना बढ़ जाता है और ज्ञानी होने का अभिमान ब्रह्मदेव से भी नहीं छूटता। यदि
'वेदाध्ययन' शुरू करें तो उसमें का एक भी स्वरोच्चार गलत हुआ तो शुद्ध होना तो दूर, वृत्तासुर की तरह मृत्यु
अवश्यंभावी है। 'दान' देने वाला नहुष भी कुएँ में गिरगिट होकर गिर पड़ा। दान करने से लाभ होना तो दूर
उलटे नुकसान काफी हो गया। ऋष्यशृंग 'तप' करने लगा तो वह वेश्याओं के ही वश में हो गया। इससे श्रद्धा
से तुम्हारी कीर्ति श्रवण करने से अच्छी शुद्धि और किसी में नहीं है। यदि यथाशास्त्र कर्म करके रहा जाय तो
कर्म मार्ग बहुत कठिन है। 'प्राचीनवर्ही' राजा की कर्मासक्ति नारद ने उपदेश करके छुड़ायी। कर्माचरण करने से
पहले आचमन करना है तो उतना ही पानी लेना चाहिये जिसमें उड़द डूब जाय। यदि इसमें जरा भी कम
अधिक हुआ तो उससे सुरापान करने का दोष लगता है। सारांश यह कि जिसका हृदय दुष्ट अर्थात् अत्यन्त
मलिन है उसे श्रीकृष्ण की कीर्ति का श्रवण किये बिना तपादिक साधनों से शुद्धि नहीं मिल सकेगी। राजा
परीक्षित श्रवण करने से ही तर गया। श्रवण से ही क्रौंच का उद्धार हुआ। मत्स्य के उदर में श्रीकृष्ण की कीर्ति
सुनने को मिली इसलिये मत्स्येन्द्रिय सिद्ध पुरुष हो गया। तुम्हारी कीर्ति का श्रवण करने से दो बातों की सिद्धि
होती है। एक तो उससे चित्त की शुद्धि होती है और दूसरा उससे जीवब्रह्म में ऐक्य स्थापित होता है। इस प्रकार
दोनों का उद्धार होता है। प्रत्यक्ष काशी में भी ऐसा ही होता है। वहाँ श्रवण में तारक ब्रह्म का उपदेश होता है
इसलिये काशी मुक्तिक्षेत्र बन गयी है। वहाँ श्रवण से ही जीव का उद्धार होता है। तुम तो सदासर्वदा पूर्णकाम
ही हो। तुम निष्कामों का निजधाम हो। फिर भी भक्तों का श्रम दूर करने के लिये तुम्हें कर्म करना पड़ता है। हे
श्रीकृष्ण! इसीलिये तुमने अनेक प्रकार की लीलाएँ कीं और लोगों के लिए मोक्षमार्ग का सोपान बना दिया।
तुम्हारी यशगाथा का भक्तिभाव से श्रवण करना यही चित्तशुद्धि का उपाय है। वहाँ सात्विक श्रद्धा यही एक
उपाय है। मन में इच्छा कर जो भी कोई साधन किये जाते हैं वे सब उस इच्छा से ही व्यर्थ हो जाते हैं। जो
इच्छारहित होता है उसी का अन्तःकरण चोखा रहता है। वैसा अंतःकरण देखते-देखते परमार्थ में विलीन हो
जाता है। हृदय की गहराई में स्वधर्म का बीज अंकुरित होता है, उसमें ही श्रद्धा की बेल तैयार होकर बाहर
निकलती है। सच्छ्रवण के जल से वैराग्य की जड़ें गहराई तक पहुँचती है और मजबूत होती हैं। उन्हें श्रद्धा की