श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
केतुस्त्रिविक्रमयुतस्त्रिपतत्पताको यस्ते भयायभयकरोऽसुरदेवचम्वोः।
स्वर्गाय साधुषु खलेष्वितराय भूमन् पादः पुनातु भगवान् भजतामघं नः॥ १३॥
हे अनंता! बलिबंधन के समय जब वामन ने अपना चरण आगे बढ़ाया था तो उस समय तुम्हारे चरण
सत्यलोक के ऊपर झलकते दिखायी दे रहे थे। सबसे ऊपर जो चरण बढ़ा उसे ही ज्ञानी लोक 'केतु' कहते हैं।
उस समय तुम्हारी ही आत्मस्वरूप जो गंगा है वह पताका के रूप में झलकने लगी। बलिबंधन के समय
आवेश के साथ कदम उठाने के कारण उसके नखों से आवरण कोश फूट कर अपार जल बहने लगा। हे
भगवान्! उस समय आपके चरण स्पर्श से ही उस जल को पवित्रता प्राप्त हुई इसलिये उस जल को ब्रह्मदेव ने
कमण्डल में भर लिया और शंकर ने उसे मस्तक पर धारण किया। चरण की ध्वजा में पताका वही गंगा है।
वही त्रिवाहिनी भी है और त्रिपथगा भी। श्रीकृष्ण की ऐसी चरण शोभा देखने के लिये नयनरूप भृंगों को बड़ा
उल्हास होता है। केतु अर्थात् ध्वज जब फड़कने लगते हैं तो आसुरी सेना के हृदय में कम्पन्न शुरू हो जाता है
और दैवी सम्पत्ति में हर्षोल्लास बढ़ने लगता है। इन चरणों की एक विशेषता यह है कि ये देवताओं को स्वर्ग
सुख देने वाले हैं और वही चरण अधर्मियों को नरक में भेजते हैं। कोई चरणों की पूजा करके तर गये तो कोई
चरणों का ध्यान करके तर गये लेकिन जो इन चरणों की उपेक्षा करते हैं वे अधःपतन की ओर जाते हैं। चरणों
का वन्दन करने वाले तथा निन्दा करने वाले ये दोनों ही निजपद को प्राप्त करते हैं। लेकिन जो सर्वथा उनकी
उपेक्षा करते हैं, उन्हें अधोगति प्राप्त होती है। चरणों का वन्दन करने वाली शिला तर गयी और निन्दा करने
वाले शिशुपाल का तुमने उद्धार किया लेकिन चरणकमलों की जिसने उपेक्षा ही की उसे रौरव नरक में जाना
पड़ता है। हे सर्वव्यापी सर्वेश्वर! सुनो, इस प्रकार तुम्हारा चरण उत्तम है और वह हमारे सभी पातकों का
क्षणार्थ में उद्धार करेगा। पापों का जब उद्धार होता है तब सहज ही दुराचार नष्ट हो जाता है। तुम्हारा चरण इस
संसार का सच्चा तारक है।
नस्योतगाव इव यस्य वशे भवन्ति ब्रह्मादयस्तनुभृतो मिथुरद्यमानाः।
कालस्य ते प्रकृतिपूरुषयोः परस्य शं नस्तनोतु चरणः पुरुषोत्तमस्य ॥ १४॥
हे अच्युत! तुम्हारा चरण आत्मसुख का विस्तार करने वाला है तथा कालकर्मादिकों का नियंता है। उसी
प्रकार वह देवताओं की आत्मा तथा शास्त्र है। काल के वास्तविक नियंता तुम ही हो इसलिये वह असमय अपना
शासन नहीं कर सकता। देवताओं को अधिकारपद पर स्थापित करने वाले तुम ही हो इसलिए उनके नियंता भी
तुम ही हो। हे कृष्णनाथ ! कर्मों का स्वामी भी तुम हो क्योंकि तुम्हारे बिना इन्द्रियों की कोई भी क्रिया कोई नहीं
कर सकता। इसलिये हे श्रीहरि! कर्मों का नियंता भी तुम हो। हे श्रीहरि ! ब्रह्मदेवादि सभी शरीरधारी देवता तुम्हारे
ही अधीन हैं। जिस प्रकार जुते हुए बैलों की सहायता से किसान खेत जोतता है अथवा उनमें जो काम नहीं
करता उन्हें चाबुक से मारता है उसी प्रकार तुम्हारी ही आज्ञा के अनुसार कलिकाल में सब आचरण करते हैं।
संसाररूपी खेत में तुम्हीं सबको काम पर जोत कर आत्मकर्म से, अपनी आज्ञा से उनसे सारा काम करवा लेते
हो। अहंकार की मेढ़ बनाकर, महत्तत्त्वों का खलिहान झाड़ कर, तीन गुणों की डोर से जीवरूपी पशुओं को
कसकर बाँध कर रखते हो। भोर से रात तक अपने कर्मों का फेरा पूरा करते समय जो कंधा बचा कर भागना
चाहता है उसे ही तुम सजा देते हो। यदि तुम कहो कि यह बातें व्यर्थ हैं सृष्टि को बनाने वाली तथा धारण करने
वाली माया है तो हे देवाधिदेव ! ऐसा न कहो। क्योंकि माया को तुम्हारा ही आश्रय है। इसलिये 'परम कारण'