श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
शुक्राचार्य बोले, हे राजा परीक्षित! श्रीकृष्ण की मूर्ति देखने के लिये स्वर्ग के समस्त देवता द्वारका में
एकत्र हुए और उन्होंने विचित्र स्तुति की। श्रीकृष्ण मूर्ति का कौतुक देखने के लिये चतुर्मुख ब्रह्मदेव, पंचमुख
शंकर तथा षण्मुख कार्तिकस्वामी पधारे। पहले प्रजा की उत्पत्ति करने के लिये प्रजापति नियुक्त थे। वे भी
कृष्ण की मूर्ति देखने के लिये द्वारका आये। आत्मस्वरूप में ही रममाण होकर जो सभी कर्मों से निवृत्त हो गये
हैं ऐसे निष्काम भक्त सनकादिक भी सकाम होकर साँवली घनश्याम मूर्ति को देखने आये। सर्वभूतनायक जो
रुद्र हैं वे ग्यारहों जन भूतगणों के साथ श्रीकृष्ण को देखने आये और तो और जो भूत भविष्य का त्रिकाल ज्ञाता
महादेव है वह भी अपने सारे गणों का समुदाय लेकर श्रीकृष्ण को देखने के लिये द्वारका में आये। श्रीकृष्ण को
देखने की आतुरता शंकर में इतनी अधिक हो गयी थी कि उसे देखने के लिये दौड़ कर आते समय उसकी
जटायें भी खुल गयी थीं।
इन्द्रो मरुद्भिर्भगवानादित्या वसवोऽश्विनौ ।
ऋभवोऽङ्गिरसो रुद्रा विश्वे साध्याश्च देवताः ॥ २ ॥
गन्धर्वाप्सरसो नागाः सिद्धचारणगुह्यकाः ।
ऋषयः पितरश्चैव सविद्याधरकिन्नराः ।
द्वारकामुपसंजग्मुः सर्वे कृष्णादिदृक्षवः ॥ ३ ॥
उनचास मरुद्गणों के साथ स्वयं इन्द्र भक्तिभाव से श्रीकृष्ण को देखने आया। सूर्यमण्डल छोड़कर बारह
आदित्यों का मेला कृष्ण की शोभा देखने के लिये तृषित होकर आया। आँखों में सूर्य की स्थापना होने के
कारण सारी चीजें दिखायी देती हैं, किन्तु सूर्य भी कृष्णदर्शन न होने के कारण अन्धा हो गया था। श्रीकृष्ण का
मुखकमल देखते ही सूर्य की आँखों पर का परदा हट गया फिर सूर्य स्वयं सर्वांगसुन्दर हो गया। तीनों अग्नि
(गर्दपत्य, दक्षिण तथा आह्वानीय) तेजःपुंज अवश्य है किन्तु धुएँ से उनका तेज ढँक गया था। कृष्ण को देखते
ही उन पर छाया हुआ धुँआ हट गया और वे अपने मूल तेज से चमकने लगे। आठों वसुओं का मेला भी
कृष्णलीला देखने आया था। श्रीकृष्ण को देखते ही उन्होंने कहा, यह तो साक्षात मदन का पुतला है। लेकिन
उन्हें वह कृष्ण की गोद में खेलता हुआ दिखायी दिया। अश्विनीकुमार स्वयं धन्वंतरी थे, लेकिन वह भवरोग से
अत्यन्त त्रस्त थे, कृष्णदर्शनामृत से वे भी क्षणमात्र में रोगमुक्त हो गये। ऋषभदेव, आंगिरस तथा असाधारण
धैर्य के स्वामी रुद्र भी आये। विश्वेदेव, साध्यदेव आदि अनेक देवताओं से आकाश भर गया था। अपनी गायन
कला के बारे में गन्धर्व को बड़ा घमण्ड था लेकिन कृष्ण की मुरली का गायन सुनकर वह चूर-चूर हो गया।
उन्हें दर्शन की उत्कंठा लगी हुई थी और वे क्षण प्रतिक्षण उसकी बाट जोह रहे थे। कृष्ण ने कृपादृष्टि से ही
उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता सरस गायन कला प्रदान की। अप्सरायें कह रही थीं, 'हमारी तरह कोई भी नृत्यकला
में पारंगत नहीं है।' लेकिन कालिया सर्प के फन पर नाचते हुए कृष्ण ने एक ही ताल में उन्हें लज्जित कर
दिया। वे अप्सराएँ इतना-सा मुँह लेकर दर्शन के लिये आयी थीं, उन नृत्यांगनाओं को भी नेत्र संकेत से ही
नृत्य में प्रवीण कर दिया। श्रीकृष्ण को देखने के लिए पाताल से नाग भी आये थे। इतना ही नहीं तो अनेक
सिद्ध, चारण, विद्याधरों के सभी समुदाय आये हुए थे। ऐसे विमानों के झुण्ड के झुण्ड द्वारका में सट कर खड़े
थे। इतने बड़े-बड़े देवतागण श्रीकृष्ण की मूर्ति देखने के लिए उल्लासपूर्वक आये हुए थे।