श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 163, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठवां अध्याय १४७
हे श्रीकृष्ण ! देवाधिदेव ! तुम्हारी माया सर्वथा अतर्क्य है। देखने जाओ तो वह दिखायी नहीं देती, इतना ही नहीं
बल्कि उसी माया का चित्त को मोह हो जाता है और तब वे वास्तव में सिद्धि के ही लिये भगवान के चरणों की
पूजा करते हैं। एक और पक्ष है 'मुमुक्षु' लोगों का। ये लोग अध्यात्म में पारंगत रहते हैं। आत्ममाया का विनाश
करने के लिए जिज्ञासुओं को अपने आत्मज्ञान के योग से मन में पूजा करने के प्रति अत्यन्त उल्लास रहता है।
उनके मन में निरन्तर विवेक की ही भावना होने के कारण वे नित्य क्या है और अनित्य क्या है इसका विचार
मंथन कर जब अपना निश्चय करते हैं तो उन्हें चारों ओर तुम ही तुम दिखायी देते हो। अनित्य होने के कारण
जिसका त्याग किया वह मायिक होने के कारण मिथ्या हो गया। फिर शुद्ध निजात्मरूप ही शेष रहता है। इस
प्रकार चारों ओर देखने पर तुम्हारा ही स्वरूप दिखायी देने लगता है। फिर वे अपनी पसन्द से तुम्हारी ही पूजा
करने लगते हैं। जहाँ भी वे देखते हैं वहाँ तुम्हारे सिवा और कुछ नहीं रहता। इस प्रकार तुम्हारे ही चरणों की
पूजा होती है।
पर्युष्टया तव विभो वनमालयेयं संस्पर्धिनी भगवती प्रतिपत्निवच्छ्रीः।
यः सुप्रणीतममुयाऽर्हणमाददन्नो भूयात् सदाङ्घ्रिशुभाशयधूमकेतुः ॥ १२ ॥
इस प्रकार चारों ओर तुम्हारे जो भक्त हैं वे तुम्हारे अत्यन्त प्रिय हो जाते हैं और हे श्रीपति ! उनकी पूजा भी
तुम अत्यन्त प्रेम से स्वीकार करते हो। भक्त जब जंगली फूलों की माला ले आये तो तुम उतावले होकर लक्ष्मी
को छोड़ कर उसकी ही ओर आकृष्ट हो गये। वह वनमाला भक्तों ने अत्यन्त प्रेम से अर्पण की थी इसलिये
उसका आकर्षण विशेष रूप से था। बासी हो जाने पर भी तुम उसे क्षण भर के लिये भी नहीं उतारते। भक्तों ने
उसे भावार्थ से अर्पण किया और भगवान ने उसे सर्वांग पर धारण किया इसलिये वनमाला सूखना भूल कर सदा
ताजा रहने लगी। उसकी सुगन्ध मिलते ही भगवान भक्ति में भूल गया इसलिये लक्ष्मी ने उससे सौतिया डाह
शुरू कर दिया। प्रभु के पास मैं आयी उससे पहले भक्तों ने उसे कब अर्पण किया यह मेरी समझ में नहीं आता।
मैं युवा होते हुए भी मुझे छोड़ कर उस अधेड़ को ही गले लगाता है। उसे भोग का लक्षण शायद नहीं मालूम।
वह बुढ़िया है और मैं युवा हूँ लेकिन फिर भी वह उसके ही मोहपाश में फँसा हुआ है। वैसे यह ठीक भी है
क्योंकि वैसे भी यह निर्गुण है, इसे गुण और अवगुण का क्या पता ? मेरे भाग्य में चरणसेवा है और वह भी
कभी-कभी और यह जब देखो तब गले से लगी हुई। इस वनमाला ने प्रेम के मामले में सचमुच ही मुझे मात दे
दी है। मुझे एक ओर ढकेलकर स्वयं दोनों अंगों पर बैठ गयी है। श्रीकृष्ण इससे सदैव बातें करता रहता है। मैं
कुछ कहने जाती हूँ तो मेरी ओर ध्यान नहीं देता। मुझे पैर दबाने के लिये रखा है इसलिये इसका डाह मैं कब
तक सहूँ ? इसने श्रीकृष्ण को पैरों तक जकड़ रखा है और मेरी सेवा मुझसे छीन ली है। कुछ भी हो लेकिन मैं
क्षीरसागर की कुलवती कन्या हूँ और यह जंगली है, लेकिन भक्तों के प्रेम के कारण भगवान के कन्धे पर बैठी
है। भक्ति के बल पर यह कन्धे पर बैठी है और कभी नीचे नहीं उतरेगी इसलिये लक्ष्मी उससे डाह करने के
बजाय उसे नमस्कार करने लगी। हे भगवान ! तुम्हें भक्तों की पूजा अच्छी लगती है इसलिए विनम्र होकर सारी
भक्ति भावनाएँ तुम्हें अर्पण की हैं। तुम्हारा वह चरणरूप धूमकेतु हमारे सारे पापों का विनाश करे। हे श्रीकृष्ण !
बार-बार एकत्र होने वाले पापों का भी विनाश करो। इस प्रकार देवताओं ने श्रीकृष्ण के चरणों का वर्णन किया
लेकिन उनका मन तृप्त नहीं हुआ। इसलिए उनके चरणों का वर्णन करते-करते वे उसके ध्वजचिह्न का वर्णन
करने लगे।