श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 157, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठां अध्याय
हे ओंकारस्वरूप जनार्दन ! तुम्हें नमस्कार करता हूँ। भक्तिभाव से तुम्हारे चरणों में नमस्कार करने से जन के
साथ 'मैं' पन अपने आप नष्ट होता है। लिंगदोह का मर्दन इस का अर्थ जनों का अर्दन (नाश) है। इसीलिये तुम
'जनार्दन' इस नाम से प्रसिद्ध हो। हे जनार्दन ! तुम्हारा कर्म भी वैसा ही है। 'कर्म' अथवा 'कर्तापन' शेष रखे बिना
तुम भक्तों को जनता में सुख चैन से रखते हो। आनन्द से तुम्हारा नाम लेने पर तुम जीव का जीवभाव ही हरण कर
लेते हो और फिर भी कृपालु बने रहते हो। तुम्हारे नाम की शक्ति असीम है। उसके आगे कलिकाल भी सिर नहीं
उठा पाता और चारों युक्तियाँ दासी बन कर रहती हैं। नाम का दान ही जब इतना अपार है तो तुम्हारा साक्षात रूप
किसकी समझ में आयेगा ? इसलिये जानने और न जानने की बात छोड़कर शान्त बैठे रहना ही श्रेयस्कर है। यदि
तुम्हारे स्तुतिस्रोत गाने का विचार करें तो श्रुतिशास्त्रों ने भी हार मान ली है, उनके आगे मेरे टेढ़े-मेढ़े बोल किसे
अच्छे लगेंगे ? इसलिये हे कृष्णस्वरूप जनार्दन ! मौन ही तुम्हारा स्तुतिपाठ है तुम्हारे प्रति आकुलता ही तुम्हारा
कीर्तन है और कुछ भी न करना ही तुम्हारा अनुसंधान है। ऐसा होते हुए भी मुझे तुम्हारे प्रति व्याकुलता बढ़ रही है।
तो हे गुरुराया ! कृपा कर इस ओर ध्यान दें। जैसे जुगनूं चन्द्रमा को प्रकाशमान करने का विचार करे अथवा मक्खी
गरुड़ को अपने कन्धे पर उठाने की सोचे उसी प्रकार मैंने मूर्ख होते हुए एकादश स्कन्ध पर टीका लिखने का
विचार किया है। किन्तु हे गुरुनाथ, इस सम्बन्ध में आप मुझ पर पूर्ण कृपा करें और ग्रन्थ रचना में यथार्थ अर्थ साधं
कर मेरी मनोकामना को सार्थकता प्रदान करें। ऐसी विनती सुनते ही श्रीगुरु ने कृपा का वरदहस्त मस्तक पर रखा।
तभी यथार्थता के दीप से ग्रन्थ पर प्रकाश पड़ा। कृपा की करनी अगाध है क्योंकि उसके होते ही अर्थ चिन्तामणि
की खान ही खुल गयी और कवि के गुण तथा साहित्य बाहर आने लगा। तैयार आभूषण पहनने में हिचकिचाहट
किस बात की ? कठपुतली से ताल साधने में कठपुतली को किस बात का कष्ट है ? अपने ही पत्तल में से पकवान
लेकर बालक अपने पिता के मुँह में डालता है, जिससे बाप को सन्तोष और आनन्द प्राप्त होता.है। वैसी ही यह बात
है। ग्रन्थ भी तुम ही हो और कविता भी तुम ही हो तो फिर 'मैं कर्ता हूँ' यह अलंकार कौन उठाये ? गुरु ने 'अहंता'
तो नष्ट कर ही दी साथ ही 'सोहंता' भी शेष नहीं रहने दी। इसलिये मैं एक 'कवि' या 'कर्त्ता' हूँ यह भावना भी
मुझमें नहीं रही। लौकिक अहंकार का त्याग करते समय एक दूसरा अहंकार 'शिवोऽहं' पीछे लग गया। इसलिये
जो स्वयं को पागल कहता है वही सबसे बड़ा चतुर अर्थात् ज्ञाता है। इसलिये हे श्री गुरुनाथ ! आपके चरणों पर
मस्तक रखकर कहता हूँ कि 'कर्ता' तुम ही हो। अस्तु पाँचवें अध्याय के अन्त में नारद ने यही रहस्य बताया कि
श्रीहरि ही साक्षात परमात्मा है तथा वह 'लीलादेह' धारण कर आपके घर में अवतरित हुआ है। आपके घर में
रहकर वह अनेक अद्भुत लीलाएँ कर रहा है यह आपका अहोभाग्य है। यह श्रीकृष्ण ईश्वरों का भी ईश्वर है तथा
बैकुण्ठ का स्वामी है। यह साक्षात परमात्मा परेश तथा जगदीश है। नारद के इसी भाषण को प्रमाणस्वरूप मानकर
सारे देवतागण श्रीकृष्ण की प्रार्थना करने के लिये द्वारका में एकत्र हुए।
श्री शुक उवाच
अथ ब्रह्मात्मजैर्देवैः प्रजेशैरावृतोऽभ्यगात्।
भवश्च भूतभव्येशो ययौ भूतगणैर्वृतः ॥ १ ॥