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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 869 में से

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पृष्ठ 162

१४६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पुष्टि मिलते ही वह तीव्रगति से चिदाकाश में चढ़ने लगती है और हे पुरुषोत्तम! उस चिदाकाश के स्वयं
प्रकाशित चन्द्रमा तुम हो। हे मेघश्याम! तुम्हारी मूर्ति देखने के लिये साधकों को कितने प्रयास करने पड़ते हैं।
तुम्हारे उस श्रीचरण के आज प्रत्यक्ष दर्शन हुए। इतना कहकर सभी देवतागण उसे साक्षात दण्डवत करते हुए
स्तवन करने लगे।
स्यान्नस्तवाङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः क्षेमाय यो मुनिभिरार्द्रहृदोह्यमानः।
यः सात्वतैः समविभूतय आत्मवद्भिर्व्यूहेऽर्चितः सवनशः स्वरतिक्रमाय॥ १०॥
हे श्रीकृष्ण! हमारे समस्त पातकों का विनाश करने के लिये सारे त्रिभुवन में तुम्हारा एक चरणरूपी धूमकेतु
ही समर्थ है। पातकरूपी लकड़ियों की राशि में तुम्हारे चरणरूपी बड़वानल का स्पर्श होते ही वह अपने
देदीप्यमान तेज से उसके तिल-तिल टुकड़े कर सब कुछ स्वाहा कर देता है। हे अनंता! ऐसे पापियों को कँपाने
वाला तथा जो प्रेमयुक्त हैं उन्हें अभय देने वाले पैर को भक्तजन सदा अपने अंतःकरण में धारण करते हैं। वह
अंतःकरण भक्ति प्रेम रस से सिक्त रहता है, उसमें तुम्हारे चरण अत्यन्त उल्लासपूर्वक स्वेच्छा से धारण करके बैठ
जाते हैं। चरणों का ध्यान करते समय वे भूख और प्यास भी भूल जाते हैं उन्हें अभय प्रदान करने वाला एक
तुम्हारा चरणध्वज ही है। हे श्रीकृष्ण! तुम्हारे उसी चरण का दैवी ऐश्वर्य देखने के लिये भक्तों ने आज चतुर्व्यूह
मूर्ति का पूजन किया। वासुदेव, संकर्षण, अनिरुद्ध तथा प्रद्युम्न इस स्वरूप को 'चतुर्व्यूह' कहते हैं और यही भक्त
का पूजास्थान है। ये चार व्यक्ति भिन्न-भिन्न होते हुए भी उन चारों स्वरूपों में मूर्ति एक ही है, यही बात ध्यान में
रखकर भक्तों का उनकी पूजा करना 'व्यूहास्थिति' कहलाता है। 'सात्वत' कहलाने वाले भक्त जो भगवत्पद की
इच्छा करते हैं वे उसी 'पद' की ओर ध्यान रखकर इस चतुर्व्यूह रूप की पूजा करते हैं। यदि जन्म-मरण के
प्रवाह को रोकने की इच्छा है तो आत्मस्वरूप पहचानने वाले ज्ञानियों को इसी चतुर्मूर्ति की एकनिष्ठा से भक्ति
करनी चाहिये। जन्ममूलच्छेदन करने के लिये जो त्रिकाल यज्ञ तथा एकनिष्ठ भक्ति से त्रिकाल पूजा कर भजन
करते हैं वे कलिकाल पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। इसके अतिरिक्त तुम्हारे दूसरे भक्त विधि-विधान युक्त तथा
वेदोक्त पद्धति से यज्ञ द्वारा होम हवन कर तुम्हारा भजन करते हैं।
यश्चिन्त्यते प्रयतपाणिभिरध्वराग्नौ त्रय्या निरुक्तविधिनेश हविर्गृहीत्वा।
अध्यात्मयोग उत योगिभिरात्ममायां जिज्ञासुभिः परमभागवतैः परीष्टः॥ ११॥
दीक्षा ग्रहण करने में अत्यन्त आदर, यज्ञ के द्वारा भजन करने में उत्सुक, हाथ से केवल नियमित कियाएँ
करना, अन्य हस्त व्यापार बिलकुल न करना, त्रिविध वेदात्मक विधि ही जिनके लिये प्रमाण हैं बाहर त्रिगुणों की
त्रिमेखला, अंतर्यामी सर्वात्मा-चैतन्य के तेज से देदीप्यमान रहने वाला यज्ञपुरुष, वहाँ ओंकार, वषट्कार आदि
लक्षणों से युक्त मंत्रोच्चार कर अतिपवित्र अवदानों से अपार द्रव्य अर्पण करते हैं। तुम्हारे अन्य भक्त योगयुक्त
होते हैं, वे योगधारणा से तुम्हारा भजन करते हैं, आसन पर स्थिर होकर प्राणापान की समता लाते हैं। वज्रासन से
दृढ़ बन्ध साध कर षड्चक्रों का भेदन कर कुण्डलिनी का सुदृढ़ स्कन्ध थपथपाते हैं। इससे वह महाशक्ति उछल
कर अत्यन्त तीव्र गति से ऊर्ध्वगति से ऊपर जाने लगती है और वायु भक्षण कर योगस्थिति से गगन को ग्रास
बना लेती है। सहस्र दल के पार सोख कर लिंगदेह का विकट मार्ग पार कर वह बड़ी तेजी से ब्रह्मस्थान तक
पहुँचती है। वहाँ परमानन्द का भोग तथा शिव-शक्ति का संयोग होता है। इस प्रकार योग का अभ्यास करना यह
योगियों का भजनमार्ग है। कोई तुम्हारी माया को जानने के लिये तुम्हारे ही पैरों का भजन करने लगते हैं। किन्तु