श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० श्रीमद् एकनाथी भागवत
ऐसा वह कर रही है। कृष्ण और उद्धव की मधुर कथायें सुनने का संयोग सचमुच कपिलाषष्ठी का योग है।
पर्वकाल की कसौटी बताने के लिये यह पंचाध्यायी तीव्रता से आयी है। उद्धव भवसागर सुरक्षित पार कर सके
इसलिये श्रीकृष्ण ने भागवत के रूप में यह सरज राह बना दी है। तैर कर जाने की अपेक्षा पैर से चल कर जाना
कभी भी अच्छा ही है। भागवतधर्म की राह अत्यन्त सरल है। वह मार्ग दिखाने के लिये पंचाध्यायी श्रीशूद्रों को
पुकार रही है। निरूपण का अगला भाग मधुर से मधुरतम होता जाएगा। उस कृष्ण वाक्यामृत की मिठास चखने
का यह पंचाध्यायी निमंत्रण दे रही है। कृष्णउद्धव संवाद में परब्रह्म का मानों अन्न छत्र ही शुरू हो जाएगा। वहाँ
स्वयं के सुख के लिये साधक तथा मुमुक्षुओं की भीड़ एकत्र होती जायगी। निश्चय ही परब्रह्म कृष्णरूप से
सशरीर उपस्थित हुआ है। उसका स्वरूप ज्ञानगौरव तथा मनोहर रूप का वैभव देखने के लिये स्वर्ग से देवतागण
आने वाले हैं। उन देवताओं द्वारा किया हुआ स्तोत्रपाठ, उसके साथ उद्धव का वैराग्य तथा कृष्ण उद्धव का
ज्ञानमय भाषण इन सबसे परमानन्द के सागर में उफान आने वाला है। उसकी रसीली कथा अगले अध्याय में
सुनायी जाएगी। तो अब श्रोतागण निजबोध की दृष्टि से ग्रथार्थ की ओर ध्यान दें। जिस प्रकार हम पतंग तैयार
करते हैं और स्वयं ही उड़ाकर जब वह अच्छी तरह उड़ने लगती है तो मन ही मन संतुष्ट होते हैं उसी प्रकार मेरे
नाम से कविता लिखकर सद्गुरु स्वयं ही वक्ता बन जाता है। इस प्रकार ग्रन्थ का अर्थ सुनाकर स्वयं ही श्रोता
के रूप आनन्दित होता है। अकेलेपन के बिना अकेलेपन से रहनेवाला एका (एकनाथ) और दूजापन के बिना
रहने वाला सखा जनार्दन वही ग्रन्थ का अगला भाग स्पष्ट रूप से बतला रहा है। दूजेपन का स्पर्श किये बिना
एकनाथ जनार्दन को शरणागत है। श्रोताओं के चरण पकड़ कर वही आगे का कथानक सुनाएगा। नाम दो होने
पर भी स्वरूप एक ही है। इसे जो जान लेगा वह स्वयं भी अत्यन्त सुख प्राप्त करेगा। एका जनार्दन के शरण में
होने के कारण उस पर उनकी पूरी कृपा है। उस जनार्दन की कृपा से ही पंचाध्यायी का यह निरूपण सम्भव
हुआ है।
इति श्रीभागवते महापुराणे एकादश स्कंधे वसुदेव नारद
संवादे एकाकारटीकाया पंचमोऽध्यायः ॥५॥