सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

१३४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अत्यन्त प्रिय लगती है। इस प्रकार चारों मुक्तियाँ हरिकीर्तन के पास दासी होकर रहती हैं इसलिये भक्त हरिभजन
पर लुब्ध हो जाते हैं। वे मुक्ति नहीं चाहते। इस प्रकार हरिकीर्तन ने योग, याग, तप आदि साधनों को बिलकुल
अनाथ कर दिया है। कलियुग में नामस्मरण और हरिकीर्तन से ही जड़ तथा जीवों का उद्धार होता है।
कृतादिषु प्रजा राजन् कलाविच्छन्ति सम्भवम्।
कलौ खलु भविष्यन्ति नारायणपरायणाः ॥ ३८ ॥
कीर्तन के कारण चारों मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं इसलिये कलियुग में कीर्तन भक्ति ही प्रमुख है। इसलिये
इन्द्रादि देवतागण भी कलियुग में जन्म लेने की आकांक्षा रखते हैं। स्वर्ग भोग का स्थान नहीं बल्कि वह
विषयवासनाओं का बन्दीगृह है। इसलिये भाग्यशाली जीव कलियुग में जन्म लेकर हरि का कीर्तन करते हैं। जब
स्वर्ग के देवतागण भी कलियुग में जन्म लेने की इच्छा करते हैं तो कृतादि युग के उत्तम लोग कीर्तन धर्म रूप
भजन के लिये विशेष रूप से जन्म लेने की इच्छा करते हों तो इसमें कैसा आश्चर्य है। कृतयुग के भाग्यशाली
लोगों ने यज्ञयाग कर स्वर्ग की प्राप्ति की लेकिन वे भी कलियुग के जन्म की इच्छा करते हैं। कृत, त्रेता तथा
द्वापर इन तीनों युगों के श्रेष्ठ पुरुष भी कलियुग में जन्म लेकर आने की इच्छा करते हैं। उस काल के लोग
परस्पर बातें करते हैं कि कीर्तन से चारों पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं यही कलियुग की महिमा है और इसीलिये सृष्टि
में कलियुग धन्य है। जो सचमुच भाग्यवान होते हैं वही कलियुग में जन्म प्राप्त करते हैं। सारांश, कलियुग में
जन्म लेने के लिये देवतागण, मानव तथा नाग भी उत्कंठा रखते हैं। दीन दुबलों का उद्धार हो सके इसलिये
कलियुग में श्रीनारायण नामस्मरण से ही संसार बन्धन टूट जाता है। सारांश, हरिकीर्तन सभी को तारता है।
इसलिये हे राजा ! कलियुग में हरिकीर्तन में श्रद्धा रखने से लोग अनायास ही तर जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं है।
कलियुग में अनेक प्रकार के लोग नारायण की उपासना करेंगे और स्त्रियाँ तथा शूद्र की भक्ति की महिमा का
प्रसार करेंगे।
क्वचित् क्वचिन्महाराज द्रविडेषु च भूरिशः।
ताम्रपर्णी नदी यत्र कृतमाला पयस्विनी ॥ ३९ ॥
कावेरी च महापुण्या प्रतीची च महानदी।
ये पिबन्ति जलं तासां मनुजा मनुजेश्वर।
प्रायो भक्ता भविष्यन्ति वासुदेवोऽमलाशया ॥ ४० ॥
विशेष रूप से द्रविड देश में भक्ति अधिक बढ़ेगी। तिस पर भी जहाँ प्रसिद्ध तीर्थों के स्थान होंगे वहाँ स्त्री
भक्ति में उफान आयेगा। ताम्रपर्णी नदी के तट पर हरिभक्ति की महिमा बहुत अधिक है, कृतमाला के चारों ओर
के परिसर में तो हरिभक्ति का उल्हास प्रकट होता है। निर्मल जल से युक्त नदी, उसका जल प्राशन करने से
श्रीहरिचरण के प्रति प्रेम की वृद्धि होती है और भगवद्भजन करने की बुद्धि दृढ़ होती है। कावेरी नदी के दर्शन
मात्र से पापों की राशियाँ नष्ट हो जाती हैं। जिस कावेरी तट पर श्रीरंग प्रसन्नतापूर्वक निवास करता है, वहाँ भक्ति
का प्रवाह अखण्ड बहता रहता है। नदी में डुबकी लगाते ही तत्काल चित्तशुद्धि होने का अनुभव होता है और
भक्ति की स्पर्धा बढ़ते-बढ़ते उसकी पताका वैकुण्ठ तक पहुँचती है। हे राजराजेश्वर ! सुनो। इन पाँच नदियों के
तीर्थ में स्नान करने से अथवा उनका जल प्राशन करने से भगवद्भजन में बुद्धि स्थिर होती है। इन तीर्थों का दर्शन

करने से सहज ही कलिमलक्षालन होता है तथा स्नान अथवा जलप्राशन करने से भगवद्भजन करने में उत्साह
बढ़ता है। इन तीर्थों का दर्शन, स्पर्श अथवा स्नान करने से वासुदेव का शुद्ध भजन करने की इच्छा की वृद्धि
होती है। जो इस प्रकार के भक्त होते हैं वे देवतागण, ऋषि तथा पितर इन तीनों के ऋण से मुक्त होते हैं। वे कभी
भी देवतागण, ऋषि अथवा पितरों से बँधे हुए नहीं होते।
देवर्षिभूताप्तनृणां पितॄणां न किङ्करो नायमृणी च राजन्।
सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम्॥ ४१ ॥
शरणागत के लिये शरण अर्थात् आश्रय देने वाले या संरक्षक केवल श्रीमुकुंद के चरण ही हैं। असीम भाव
से उसकी शरण में जाने से जन्म-मरण का बन्धन नहीं रहता। फिर उसे देवता, ऋषि, आचार्य अथवा पितर इनके
ऋण की क्या चिन्ता है? वे भक्त भगवद्भजन से ही मुक्त हो जाते हैं। श्रद्धापूर्वक भगवद्भक्ति करने से समस्त
पितरों का उद्धार होता है। भगवद्भक्ति के आनन्द से 'ऋषि' नित्य ही तृप्त होते हैं। भगवद्भक्ति के आनन्द से
सभी 'प्राणी' सुखी होते हैं। पुत्र यदि भगवद्भक्ति करे तो उसके माता-पिता और सगे-सम्बन्धियों का भी उद्धार
होता है। समस्त देवताओं का नियंता जो श्रीहरि है उसका उल्लासपूर्वक भजन करने से 'देवऋण' की बाधा
भगवद्भक्त को कभी नहीं होती। जो अनन्यभाव से भजन करते हैं वे कभी भी कर्म के अधीन नहीं होते क्योंकि
कर्म जिसके अधीन रहता है उस हरि की ही शरण में वे रहते हैं। अनन्यशरण हरिभक्त कभी भी कर्म का सेवक
नहीं होता अथवा देवताओं का भी चाकर नहीं होता। जो हरि की शरण में आ गया वह किसी का आश्रित नहीं
है। वह कर्माकर्म से अलिप्त तथा ऋणत्रयी से मुक्त ही रहता है। समस्त प्राणियों में वासुदेव ही भरा हुआ है ऐसा
उसका दृढ़ विश्वास रहता है इसलिये वह सभी कर्मों से अलिप्त तथा सकल कर्मों से मुक्त होता है।
स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः।
विकर्म यच्चोत्पतितं कथंचिद् धुनोति सर्वं हृदि संनिविष्टः॥ ४२॥
देह का अभिमान छोड़कर तथा अन्य देवताओं का भजन त्याग कर जो हरिचरणों की ही शरण में जाते हैं
उन्हें कर्मों का बन्धन कभी स्पर्श नहीं करता। इस प्रकार जो अनन्यशरण होते हैं वही हरि के प्रिय होते हैं और
जो इस प्रकार हरि के भक्त होते हैं उन्हें स्वप्न में श्री कर्मबन्धन स्पर्श नहीं कर सकता। हे राजा! अब तुम यदि
कहोगे कि भगवद्भक्त विहित कर्माचरणों के कारण नित्यमुक्त रहते हैं, तो तुम्हें यह बता दूँ कि वे यदि
असत्कर्म भी करें तो भी उन्हें प्रायश्चित्त का बन्धन नहीं है। जिस प्रकार सिंह का छावा मत्त हाथी के वश में नहीं
आता उसी प्रकार हरि के भक्त यदि अकर्म भी करें तो भी वे यम के वश में नहीं आ सकते। हरि के भक्त केवल
नामस्मरण कर ले, भले ही वह महान पापी ही क्यों न हो, लेकिन यम आकर उसका वन्दन करेगा। तब जो हरि
के परम प्रिय भक्त हैं उन्हें यम अकर्म के लिये दण्ड कैसे देगा? (शंका) वेदाज्ञा अर्थात् साक्षात् विष्णु की ही
आज्ञा है, उसी देवता ने धर्म और अधर्म की व्याख्या की है, फिर यदि भक्त विकर्माचरण करें तो उन पर वेदाज्ञा
का प्रभाव क्यों नहीं होगा? (समाधान) जिस प्रकार राजा का प्रिय सेवक पहरे पर के सिपाही के अधीन नहीं
होता तो फिर राजा का प्रिय पुत्र उस द्वारपाल के अधीन कैसे होगा? उसी प्रकार जिसे केवल हरिनाम् का स्मरण
रहता है उसके चरणों को वेद प्रणाम करते हैं तो जो हरि को पूरी तरह प्रिय है उसे वेद का विधान कभी बाधक
नहीं होगा। वैसे भक्त के हाथों कभी निषिद्ध कर्म नहीं होगा किन्तु यदि दैवयोग से वैसा हो भी जाय तो अच्युत
स्मरण से ही उसकी उस कर्म से मुक्तता होती है। कर्माकर्म जिसे बाँध नहीं सकता ऐसा भागवतधर्म कौन-सा

१३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है? तो तुम्हें भक्तिमार्ग के उत्तम से उत्तम धर्म बताता हूँ, सुनो। देहाभिमान के आकर्षण को त्याग कर जिसकी
हरिभक्ति समस्त प्राणीमात्र में दृढ़ रहती है वह कर्माकर्म को पैरों तले रौंद देता है, मुक्ति अपने केशों से उसके
चरण झाड़ती है। वह जिसकी भी ओर कृपादृष्टि से देखता है उसका सांसारिक भय तत्काल नष्ट होता है और
वह जहाँ कहे वहाँ तत्काल हरि की भक्ति डेरा जमा कर बैठ जाती है। उसके अनुग्रह से दीनजनों के अंतःकरण
में भगवान प्रकट होते हैं और उसके कर्माकर्म का निस्तार स्वयं श्रीहरि करने लगते हैं। जिस प्रकार सूर्य के उदय
के साथ अन्धकार भाग जाता है उसी प्रकार हृदयमन्दिर में यम प्रकट होते ही कर्माकर्म सहज ही दूर हो जाते हैं।
हे राजश्रेष्ठ! भगवान के नाम की कीर्ति इसी का नाम परमभक्ति है। भक्ति के पास चारों मुक्तियाँ दासी की तरह
सेवारत रहती हैं। भक्ति की यह पूर्ण स्थिति सुनकर राजा के शरीर पर रोमांच उभर आये, आँखों से आनन्द के.
आँसू बहने लगे और वह प्रसन्नवृत्ति से डोलने लगा। जनकराजा की इस स्थिति का वर्णन करते समय नारद मन
ही मन सुखभरित हो गया और उसी अवस्था में उसने वसुदेव को उस इतिहास का समापन सुनाया।
नारद उवाच
धर्मान् भागवतान्नित्थं श्रुत्वाथ मिथिलेश्वरः।
जायन्तेयान् मुनीन् प्रीतः सोपाध्यायोह्यपूजयत् ॥ ४३ ॥
नारद इतिहास सुना रहे थे, साथ ही साथ डोल भी रहे थे। उसी मुदित अवस्था में उन्होंने भक्ति का रहस्य
बताया। (नारद ने कहा) इस प्रकार जयंत पुत्रों ने जनकराजा को परम प्रीति का अपने स्वानुभव के अनुसार
भगवान की श्रेष्ठ भक्ति का वर्णन किया। उनका भाषण सुनकर जनक राजा को अत्यन्त आनन्द हुआ। उसने
अत्यन्त प्रेमपूर्वक उन जयंती पुत्रों की पूजा की। श्रवण से समाधान हो जाने के कारण उसे पूजा करने में भी
अत्यन्त प्रेम का अनुभव हुआ। तब जनकराजा ने अत्यन्त भक्तिभाव से उनकी पूजा की। अहिल्या का पुत्र
शतानंद राजा का उपाध्याय था। उसने भी बड़े आदर के साथ पूजा करवायी और स्वयं भी की।
ततोऽन्तर्दधिरे सिद्धाः सर्वलोकस्य पश्यतः।
राजा धर्मानुपातिष्ठात्नवाप परमां गतिम्॥ ४४ ॥
इस प्रकार वे सभी नौ श्रेष्ठ भगवद्भक्त देखते-देखते आकाश मार्ग से ऊपर जाते-जाते अदृश्य हो गये।
उस भागवत धर्म का आचरण कर तथा उस प्रकार की भगवद्भक्ति कर उस जनकराजा ने भी उत्तम गति प्राप्त
की। सद्भाव से भक्ति करने से देह में रह कर भी विदेहस्थिति प्राप्त होती है। जनकराजा को वह प्राप्त होने के
कारण वह परम शान्तिमय स्थिति में पहुँच गया।
त्वमप्येतान् महाभाग धर्मान् भागवताञ्छुतान् ।
आस्थितः श्रद्धया युक्तो निःसङ्गो यास्यसेपरम् ॥ ४५ ॥
हे वसुदेव! जहाँ सारे भाग्य की पंक्तियाँ विश्राम करने आती हैं वह भाग्यस्थिति तुम्हारे घर खेलने लगी है।
वसुदेव! तुम्हारे ही नाम के कारण भगवान को 'वासुदेव' कहते हैं। 'वासुदेव' इस नाम के प्रभाव से सभी लोगों
के दोषों का विनाश होता है। हे वसुदेव! ऐसे भाग्य के भाग्यनिधि सचमुच तुम ही हो। तुमने भागवत धर्म के
विधि को श्रवण किया। श्रद्धापूर्वक परमात्मस्वरूप का श्रवण करने के बाद मनन करते हुए उसे धारण करना
चाहिये। ऐसा करने से तुम सभी बन्धनों से मुक्त होकर तत्काल निजधाम पहुँच जाओगे। वह ऐसा निजधाम है

पंचम अध्याय १३७
जहाँ कार्य और कारण दोनों अनावश्यक हैं। उस परम पवित्र स्थान में तुम निजसुख का अनुभव लेकर
सुखस्वरूप होकर रहोगे।
युवयोः खलु दम्पत्योर्यशसा पूरितं जगत्।
पुत्रतामगमद्यद्वां भगवानीश्वरो हरिः ॥ ४६ ॥
तुम्हारे परिवार की कीर्ति से असीम यश की बाढ़ आ गयी है। तुम्हारे यश से त्रिभुवन भर उठा है। सारी
पृथ्वी परमानन्द से भर गयी है। जिसके लिये लोग यज्ञयाग करते हैं, जिसके लिये दानधर्म किया जाता है,
जिसके लिये तप किया जाता है, जिसके लिये योगसाधना की जाती है, वेद अथवा शेषनाग भी जिसका वर्णन
नहीं कर सकते, सनकादिक के लिये भी जो दुर्लभ है उस श्रीकृष्ण को आप अपनी गोद में खिलाते हैं, जो
कलिकाल का शासक है, ब्रह्मदेव आदि देवताओं का जो नियंता है, जो संहारकर्ता का भी संहारकर्ता है, जो
त्रिभुवन का पालनकर्ता है, जो सभी भाग्यों में श्रेष्ठ है, जो सभी शोभाओं की शोभा है, जो षड्गुणों का अधिष्ठान
है वह श्रीकृष्ण पुत्र के रूप में आपके शरीर पर खेल रहा है।
दर्शनालिंगनालापैः शयनासनभोजनैः ।
आत्मा वां पावितः कृष्णं पुत्रस्नेह प्रकुर्वतोः ॥ ४७ ॥
परब्रह्ममूर्ति श्रीकृष्ण का अवलोकन करने से दृष्टि पावन होती है, आँखों को सुख का अनुभव होता है,
कृष्ण के मुख से निकले शब्द कान से भीतर प्रवेश करते ही कर्णरन्ध्र पवित्र होते हैं। श्रीकृष्ण, हे कृष्णा इस
प्रकार पुकारते समय या कृष्ण के साथ बोलते समय आपकी वाणी शान्त और पुनीत हो जाती है। जिसके लिये
अनेक प्रकार के यज्ञयाग किये जाते हैं वहाँ भी जो यज्ञभाग नहीं लेता वही श्रीकृष्ण आपके साथ बैठकर खाता
है। जो योगयागों में भी नहीं मिलता वह श्रीकृष्ण घर में भोजन के लिये आपकी बाट जोहता रहता है। बाललीला
करते हुए अपने मुँह का ग्रास आपके मुँह में डालता है। संतप्तों का ताप शान्त करने वाला वह भगवान श्रीकृष्ण
आपके मुँह में ग्रास डालता है अर्थात् आप जैसा भाग्य संसार में किसी ने प्राप्त नहीं किया है। उस कृष्ण के
उच्छिष्टामृत से जहाँ जिह्वा अमृत के स्वाद से भी ऊब जाती है वहाँ अन्य रसों को कौन मधुर कहेगा ? अनेक
प्रकार की तपस्यायें तथा कष्ट करने पर भी जो अंतरशुद्धि नहीं प्राप्त होती वह श्रीकृष्ण रसावशेष से सहज ही
प्राप्त होती है। कृष्ण को चुम्बन देते समय उसके मुख के सुवास से घ्राणेन्द्रिय पावन हो जाते हैं और उसका
चुम्बन लेते समय मन शान्त होकर स्वानंदपूर्ण उल्लास से भर उठता है। आपको आसन पर बैठे देख कृष्ण तेजी
से दौड़ते हुए आपके पास आता है और गोद में बैठ कर अपना शरीर आपसे सटाकर आपको शान्ति प्रदान करता
है। उस श्रीकृष्ण के शरीर के स्पर्श से सभी इन्द्रियों का काम नष्ट हो जाता है जिससे कर्म अपने आप निष्कर्म हो
जाता है। प्रेमभाव से श्रीकृष्ण को कस कर आलिंगन देने से देह का देहपन समाप्त होकर 'मैं' और 'तू' का भाव
समाप्त हो जाता है। निद्रित अवस्था में सब गहरी मूढ़ स्थिति में व्याप्त रहते हैं लेकिन उस समय कृष्ण तुम्हारे
पास सद्रूप उपस्थित रहता है। योगी लोग अपने कर्म-कृष्णार्पण करने की कल्पना करते हैं। लेकिन कृष्ण स्वयं
ही आपके सारे कर्म अर्पण कर लेता है। पुत्र प्रेम के कारण श्रीकृष्ण स्वयं ही आपके सारे कर्मों को बड़े उल्लास
से स्वीकार कर रहा है। आपकी पवित्रता के सम्बन्ध में क्या कहा जाय ? श्रीकृष्ण का पुत्र भावना से पालन कर
आपने समस्त यदुवंश को पवित्र कर दिया तथा संसार का उद्धार करने का यश कमाया। 'वसुदेव पुत्र' तथा
'देवकीनंदन' इस प्रकार नामस्मरण करने से सांसारिक बन्धनों से मुक्ति मिलती है इतना आपका नाम पवित्र है।

१३८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
आप अनायास ही तर जायेंगे इसमें सन्देह नहीं है लेकिन जो पूरी तरह श्रीकृष्ण से द्वेष करते हैं वे वैरी भी
'विरोधभक्ति' के सहारे सहज ही तर जाते हैं।
वैरेण्य यं नृपतयः शिशुपालपौण्ड्रशाल्वादयो गतिविलासविलोकनाद्यैः ।
ध्यायन्त आकृतधियः शयनासनादौ तत्साम्यमापुरनुरक्तधियां पुनः किम् ॥ ४८ ॥
शिशुपाल, वक्रदंत, पौंड्रक, शाल्य आदि बड़े-बड़े वीरों ने कृष्ण से बैर किया जिससे उन सबका ध्यान
उन्हें बराबर लगा हुआ था, उनकी मूर्ति उन्हें रात दिन दिखायी दे रही थी। मेघ जैसी श्यामल कांतिवाला, कटि
पर पीताम्बर परिधान किया हुआ, चित्र विचित्र अलंकारों से सजा हुआ, गदा आदि अस्त्रों से सुसज्जित, वह
रणभूमि पर शत्रु की ओर देखता हुआ खड़ा रहता है। उत्कट वैरभाव के कारण वे श्रीकृष्ण की ओर अत्यन्त क्रोध
से देखते रहते थे। क्रोध और द्वेष के कारण ही क्यों न हो, उन्हें उसका अखण्ड ध्यान लगने के कारण वे तद्रूप
हो गये थे। कंस को परमभय के कारण श्रीकृष्ण का अखण्ड ध्यान लगा हुआ था। उस भय के कारण उसे
खाते-पीते, उठते-बैठते चारों ओर श्रीकृष्ण ही दिखायी देने लगा। कंसासुर महाभय के कारण तथा
शिशुपालादिक महान द्वेष के कारण अनायास ही मुक्ति पा गये। फिर श्रद्धालु लोगों को मोक्ष क्यों नहीं प्राप्त
होगा ? आप तो अत्यन्त प्रेमभाव से चित्त, वित्त, प्राण आदि श्रीकृष्ण पर न्योछावर कर रहे हैं इसलिये ब्रह्मप्राप्ति
तो आपके चरणों को स्पर्श कर रही है। पूर्ण प्राप्ति आपके पास ही है लेकिन वह आपको मालूम नहीं होती।
आप श्रीकृष्ण को अपना बालक समझते हैं और निजलाभ को ठुकरा रहे हैं।
माऽपत्यबुद्धिमकृथाः कृष्णे सर्वात्मनीश्वरे।
मायामनुष्यभावेन गूढैश्वर्ये परेऽव्यये ॥ ४९ ॥
आप श्रीकृष्ण को अपना पुत्र समझते हैं यह आपकी भावना अत्यन्त क्षुद्र है। वह परिपूर्ण निर्गुण परमात्मा
ही कृष्णस्वरूप में अवतरित हुआ है। आप उसे बालक न समझें, यह देवताओं का भी देवता है, यह श्रीकृष्ण
सबसे अधिक श्रेष्ठ, सर्वात्मा, सर्वेश्वर तथा योगियों में श्रेष्ठ योगी है। यह अविकारी, अविनाशी, परात्पर,
परमहंस, इन्द्रियनियंता ऋषिकेश तथा जगन्निवासी जगतात्मा है। भावात्मक हो जाने के कारण यह सबको मनुष्य
रूपधारी प्रतीत होता है, उसका ऐश्वर्य अत्यन्त गूढ़ है, वह गुणातीत है तथा त्रिभुवन में व्याप्त है।
भूभारासुरराजन्यहन्तवे गुप्तये सताम्।
अवतीर्णस्य निर्वृत्यै, यशो लोके वितन्यते ॥ ५० ॥
कालयवनादि असुर, जरासंधादि महावीर अथवा अधर्म करने वाले अन्य राजा जिनकी सेवा पृथ्वी के लिये
भारस्वरूप हो गयी है, पृथ्वी का वह भार कम करने के लिये, निर्विकार धर्म की वृद्धि करने के लिये तथा
साधुओं का संरक्षण करने के लिये आया श्रीकृष्ण भगवान का पूर्ण अवतार है। भक्तों का पालन करने तथा
साधुओं को सुख देने के लिये यदुवंश में भगवान श्रीकृष्ण रूप में अवतरित हुए हैं। असुररूपी हाथियों का संहार
करने वाला वह सिंह तथा सज्जनरूप वन पर आनन्द की वृष्टि करने वाला मेघ. आपके घर परिपूर्ण अंश से
अवतार लेकर आया है। जिसने त्रिभुवन का उद्धार करने के लिये अपार कीर्ति अर्जित कर ली है, उसके अवतार
की कीर्ति ब्रह्मदेवादि भी गा रहे हैं। अत्यन्त कठिन इस संसार सागर को पार करने के लिये जिसका यशगान
सुरवर गा रहे हैं और जिसके चरित्र का गायन बड़े-बड़े ऋषिगण भी सर्वकाल कर रहे हैं, जिसका नामस्मरण

पंचम अध्याय १३९
करने से भक्त कलिकाल से मुक्त होते हैं, वह श्रीकृष्ण अवतार आपके यहाँ प्रकट हुआ है। श्रीकृष्ण
एकमेवाद्वितीय परब्रह्म की निधि हैं उसे बालक मत समझिये। इतने से ही आप संसार सागर तर गये ऐसा समझ
लीजिये। श्रीकृष्णावतार की यह कथा नारद ने वसुदेव को सुनायी। शुक बोले, हे परीक्षित राजा ! इससे सबको
बड़ा आश्चर्य हुआ।
शुक उवाच
एतच्छ्रुत्वा महाभागो वसुदेवोऽतिविस्मितः ।
देवकी च महाभागा जहतुर्मोहमात्मनः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार जनक तथा नवयोगी का पुराना इतिहास तथा कृष्ण परमात्मा पूर्ण ब्रह्म है आदि वृत्तांत नारद ने
आनन्दपूर्वक सुनाया। शुक कहते हैं, हे राजा परीक्षित ! नारद का वह भाषण सुनकर वसुदेव तथा देवकी ये दोनों मन
ही मन आश्चर्य से चकित हो गये। कृष्ण परमात्मा है यह नारद का वचन सुनकर देवकी वसुदेव मन ही मन
विस्मित हो कर स्तब्ध रह गये। वे दोनों ही बड़े भाग्यवान थे इसलिये श्रीकृष्ण हमारा पुत्र है यह भावना उन्होंने
तत्काल छोड़ दी और कृष्ण साक्षात परब्रह्म स्वरूप हैं, ऐसी भावना निश्चित की। अहा! उस अपूर्व भाग्य का क्या
वर्णन किया जाय ? श्रीकृष्ण के प्रति ब्रह्मभावना धारण करते ही हृदय का सारा मोह और स्नेह झट निकल गया।
इतिहासमिमं पुण्यं धारयेद्यः समाहितः ।
स विधूयेह शमलं ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५२ ॥
नारद ने जो यह निमि-जायंत संवाद वसुदेव को सुनाया वह इतिहास अत्यन्त पवित्र तथा जीव-शिव का
भेद मिटाने वाला है। यह इतिहास कथा जो सचमुच ही ध्यान देकर तथा तल्लीन होकर भक्ति भाव से श्रवण
करेगा वह इस प्रकार दिन-रात श्रवण मात्र से ही समस्त पुण्यों की राशि एकत्र कर लेता है। ऐसा वह पुरुष
ब्रह्मपात्रि के लिये अवश्य पात्र होता है। अर्थ के साथ यदि इसका एक-एक शब्द भी सुना जाय तो उससे
अंतःकरण शुद्ध होता है और इस प्रकार परमानंदानुभव रूप ब्रह्म की प्राप्ति होती है। इसे 'पंचाध्यायी' कहते हैं।
शंकर के ये पाँच मुख ही हैं। एकादश स्कन्ध के गूढ़ ज्ञान का वर्णन करने के लिए मानो यह पताका ही फहरायी
गयी है। यह केवल पंचाध्यायी नहीं बल्कि एकादश स्कंध के ये पंचप्राण ही मानों शुद्ध ज्ञान का उपदेश करने के
लिये अपने भक्तों के सामने प्रस्तुत हुए हैं। यह केवल पंचाध्याय नहीं अपितु शुक्राचार्य रूपी कोकिला का पंचम
स्वर में किया हुआ गायन है। एकादश स्कन्ध यह 'वसन्त ऋतु' है और वह भक्त रूप भ्रमरों की गूँज है या फिर
यह मिश्री का पंचकोनी टुकड़ा ज्ञानगम्भीर निजभक्तों को चखने के लिये दिया गया है। वास्तव में यह पंचाध्यायी
भी नहीं बल्कि एकादश स्कन्ध के पंच-गन्धों की गंधाक्षत ही है जो भक्तों को निमंत्रण देने के लिये गाजे-बाजे
के साथ भेजी गयी है। निजभक्तों के प्रति अत्यन्त कृपालु भगवान ने एकादश स्कन्ध का आगे का ज्ञान गम्भीर
भाग सुनने के लिये उपस्थित होने के लिये प्रसन्नतापूर्वक यह पालकी भेजी है। एकादश स्कन्ध यह
कृष्णउद्धवरूपी अर्धमात्रा है, अर्धोदय पर्व की महायात्रा है, इस यात्रा में साधकों को बुलाने के लिये पंचाध्यायी
की यह मुनादी बुला रही है। श्रीकृष्ण उद्धव के मेले के इस सोज्वल ब्रह्मसुख को देखकर पंचाध्यायी व्याकुल
होकर कहने के लिये भक्तों के पास आयी है। अहंकार का डेरा-डंडा श्रीकृष्णनाथ ने उखाड़ दिया और अपने
अभय हस्त से आत्मस्वरूपी तीर्थ उद्धव को स्नान करने के लिये सुलभ कर दिया। उस मुक्ततीर्थ की बड़ाई
करने पंचाध्यायी आगे आयी है। जो भी कोई संसार में श्रांत हो गया हो वह विश्राम करने के लिये यहाँ आयें

१४० श्रीमद् एकनाथी भागवत
ऐसा वह कर रही है। कृष्ण और उद्धव की मधुर कथायें सुनने का संयोग सचमुच कपिलाषष्ठी का योग है।
पर्वकाल की कसौटी बताने के लिये यह पंचाध्यायी तीव्रता से आयी है। उद्धव भवसागर सुरक्षित पार कर सके
इसलिये श्रीकृष्ण ने भागवत के रूप में यह सरज राह बना दी है। तैर कर जाने की अपेक्षा पैर से चल कर जाना
कभी भी अच्छा ही है। भागवतधर्म की राह अत्यन्त सरल है। वह मार्ग दिखाने के लिये पंचाध्यायी श्रीशूद्रों को
पुकार रही है। निरूपण का अगला भाग मधुर से मधुरतम होता जाएगा। उस कृष्ण वाक्यामृत की मिठास चखने
का यह पंचाध्यायी निमंत्रण दे रही है। कृष्णउद्धव संवाद में परब्रह्म का मानों अन्न छत्र ही शुरू हो जाएगा। वहाँ
स्वयं के सुख के लिये साधक तथा मुमुक्षुओं की भीड़ एकत्र होती जायगी। निश्चय ही परब्रह्म कृष्णरूप से
सशरीर उपस्थित हुआ है। उसका स्वरूप ज्ञानगौरव तथा मनोहर रूप का वैभव देखने के लिये स्वर्ग से देवतागण
आने वाले हैं। उन देवताओं द्वारा किया हुआ स्तोत्रपाठ, उसके साथ उद्धव का वैराग्य तथा कृष्ण उद्धव का
ज्ञानमय भाषण इन सबसे परमानन्द के सागर में उफान आने वाला है। उसकी रसीली कथा अगले अध्याय में
सुनायी जाएगी। तो अब श्रोतागण निजबोध की दृष्टि से ग्रथार्थ की ओर ध्यान दें। जिस प्रकार हम पतंग तैयार
करते हैं और स्वयं ही उड़ाकर जब वह अच्छी तरह उड़ने लगती है तो मन ही मन संतुष्ट होते हैं उसी प्रकार मेरे
नाम से कविता लिखकर सद्गुरु स्वयं ही वक्ता बन जाता है। इस प्रकार ग्रन्थ का अर्थ सुनाकर स्वयं ही श्रोता
के रूप आनन्दित होता है। अकेलेपन के बिना अकेलेपन से रहनेवाला एका (एकनाथ) और दूजापन के बिना
रहने वाला सखा जनार्दन वही ग्रन्थ का अगला भाग स्पष्ट रूप से बतला रहा है। दूजेपन का स्पर्श किये बिना
एकनाथ जनार्दन को शरणागत है। श्रोताओं के चरण पकड़ कर वही आगे का कथानक सुनाएगा। नाम दो होने
पर भी स्वरूप एक ही है। इसे जो जान लेगा वह स्वयं भी अत्यन्त सुख प्राप्त करेगा। एका जनार्दन के शरण में
होने के कारण उस पर उनकी पूरी कृपा है। उस जनार्दन की कृपा से ही पंचाध्यायी का यह निरूपण सम्भव
हुआ है।
इति श्रीभागवते महापुराणे एकादश स्कंधे वसुदेव नारद
संवादे एकाकारटीकाया पंचमोऽध्यायः ॥५॥

छठां अध्याय
हे ओंकारस्वरूप जनार्दन ! तुम्हें नमस्कार करता हूँ। भक्तिभाव से तुम्हारे चरणों में नमस्कार करने से जन के
साथ 'मैं' पन अपने आप नष्ट होता है। लिंगदोह का मर्दन इस का अर्थ जनों का अर्दन (नाश) है। इसीलिये तुम
'जनार्दन' इस नाम से प्रसिद्ध हो। हे जनार्दन ! तुम्हारा कर्म भी वैसा ही है। 'कर्म' अथवा 'कर्तापन' शेष रखे बिना
तुम भक्तों को जनता में सुख चैन से रखते हो। आनन्द से तुम्हारा नाम लेने पर तुम जीव का जीवभाव ही हरण कर
लेते हो और फिर भी कृपालु बने रहते हो। तुम्हारे नाम की शक्ति असीम है। उसके आगे कलिकाल भी सिर नहीं
उठा पाता और चारों युक्तियाँ दासी बन कर रहती हैं। नाम का दान ही जब इतना अपार है तो तुम्हारा साक्षात रूप
किसकी समझ में आयेगा ? इसलिये जानने और न जानने की बात छोड़कर शान्त बैठे रहना ही श्रेयस्कर है। यदि
तुम्हारे स्तुतिस्रोत गाने का विचार करें तो श्रुतिशास्त्रों ने भी हार मान ली है, उनके आगे मेरे टेढ़े-मेढ़े बोल किसे
अच्छे लगेंगे ? इसलिये हे कृष्णस्वरूप जनार्दन ! मौन ही तुम्हारा स्तुतिपाठ है तुम्हारे प्रति आकुलता ही तुम्हारा
कीर्तन है और कुछ भी न करना ही तुम्हारा अनुसंधान है। ऐसा होते हुए भी मुझे तुम्हारे प्रति व्याकुलता बढ़ रही है।
तो हे गुरुराया ! कृपा कर इस ओर ध्यान दें। जैसे जुगनूं चन्द्रमा को प्रकाशमान करने का विचार करे अथवा मक्खी
गरुड़ को अपने कन्धे पर उठाने की सोचे उसी प्रकार मैंने मूर्ख होते हुए एकादश स्कन्ध पर टीका लिखने का
विचार किया है। किन्तु हे गुरुनाथ, इस सम्बन्ध में आप मुझ पर पूर्ण कृपा करें और ग्रन्थ रचना में यथार्थ अर्थ साधं
कर मेरी मनोकामना को सार्थकता प्रदान करें। ऐसी विनती सुनते ही श्रीगुरु ने कृपा का वरदहस्त मस्तक पर रखा।
तभी यथार्थता के दीप से ग्रन्थ पर प्रकाश पड़ा। कृपा की करनी अगाध है क्योंकि उसके होते ही अर्थ चिन्तामणि
की खान ही खुल गयी और कवि के गुण तथा साहित्य बाहर आने लगा। तैयार आभूषण पहनने में हिचकिचाहट
किस बात की ? कठपुतली से ताल साधने में कठपुतली को किस बात का कष्ट है ? अपने ही पत्तल में से पकवान
लेकर बालक अपने पिता के मुँह में डालता है, जिससे बाप को सन्तोष और आनन्द प्राप्त होता.है। वैसी ही यह बात
है। ग्रन्थ भी तुम ही हो और कविता भी तुम ही हो तो फिर 'मैं कर्ता हूँ' यह अलंकार कौन उठाये ? गुरु ने 'अहंता'
तो नष्ट कर ही दी साथ ही 'सोहंता' भी शेष नहीं रहने दी। इसलिये मैं एक 'कवि' या 'कर्त्ता' हूँ यह भावना भी
मुझमें नहीं रही। लौकिक अहंकार का त्याग करते समय एक दूसरा अहंकार 'शिवोऽहं' पीछे लग गया। इसलिये
जो स्वयं को पागल कहता है वही सबसे बड़ा चतुर अर्थात् ज्ञाता है। इसलिये हे श्री गुरुनाथ ! आपके चरणों पर
मस्तक रखकर कहता हूँ कि 'कर्ता' तुम ही हो। अस्तु पाँचवें अध्याय के अन्त में नारद ने यही रहस्य बताया कि
श्रीहरि ही साक्षात परमात्मा है तथा वह 'लीलादेह' धारण कर आपके घर में अवतरित हुआ है। आपके घर में
रहकर वह अनेक अद्भुत लीलाएँ कर रहा है यह आपका अहोभाग्य है। यह श्रीकृष्ण ईश्वरों का भी ईश्वर है तथा
बैकुण्ठ का स्वामी है। यह साक्षात परमात्मा परेश तथा जगदीश है। नारद के इसी भाषण को प्रमाणस्वरूप मानकर
सारे देवतागण श्रीकृष्ण की प्रार्थना करने के लिये द्वारका में एकत्र हुए।
श्री शुक उवाच
अथ ब्रह्मात्मजैर्देवैः प्रजेशैरावृतोऽभ्यगात्।
भवश्च भूतभव्येशो ययौ भूतगणैर्वृतः ॥ १ ॥

१४२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
शुक्राचार्य बोले, हे राजा परीक्षित! श्रीकृष्ण की मूर्ति देखने के लिये स्वर्ग के समस्त देवता द्वारका में
एकत्र हुए और उन्होंने विचित्र स्तुति की। श्रीकृष्ण मूर्ति का कौतुक देखने के लिये चतुर्मुख ब्रह्मदेव, पंचमुख
शंकर तथा षण्मुख कार्तिकस्वामी पधारे। पहले प्रजा की उत्पत्ति करने के लिये प्रजापति नियुक्त थे। वे भी
कृष्ण की मूर्ति देखने के लिये द्वारका आये। आत्मस्वरूप में ही रममाण होकर जो सभी कर्मों से निवृत्त हो गये
हैं ऐसे निष्काम भक्त सनकादिक भी सकाम होकर साँवली घनश्याम मूर्ति को देखने आये। सर्वभूतनायक जो
रुद्र हैं वे ग्यारहों जन भूतगणों के साथ श्रीकृष्ण को देखने आये और तो और जो भूत भविष्य का त्रिकाल ज्ञाता
महादेव है वह भी अपने सारे गणों का समुदाय लेकर श्रीकृष्ण को देखने के लिये द्वारका में आये। श्रीकृष्ण को
देखने की आतुरता शंकर में इतनी अधिक हो गयी थी कि उसे देखने के लिये दौड़ कर आते समय उसकी
जटायें भी खुल गयी थीं।
इन्द्रो मरुद्भिर्भगवानादित्या वसवोऽश्विनौ ।
ऋभवोऽङ्गिरसो रुद्रा विश्वे साध्याश्च देवताः ॥ २ ॥
गन्धर्वाप्सरसो नागाः सिद्धचारणगुह्यकाः ।
ऋषयः पितरश्चैव सविद्याधरकिन्नराः ।
द्वारकामुपसंजग्मुः सर्वे कृष्णादिदृक्षवः ॥ ३ ॥
उनचास मरुद्गणों के साथ स्वयं इन्द्र भक्तिभाव से श्रीकृष्ण को देखने आया। सूर्यमण्डल छोड़कर बारह
आदित्यों का मेला कृष्ण की शोभा देखने के लिये तृषित होकर आया। आँखों में सूर्य की स्थापना होने के
कारण सारी चीजें दिखायी देती हैं, किन्तु सूर्य भी कृष्णदर्शन न होने के कारण अन्धा हो गया था। श्रीकृष्ण का
मुखकमल देखते ही सूर्य की आँखों पर का परदा हट गया फिर सूर्य स्वयं सर्वांगसुन्दर हो गया। तीनों अग्नि
(गर्दपत्य, दक्षिण तथा आह्वानीय) तेजःपुंज अवश्य है किन्तु धुएँ से उनका तेज ढँक गया था। कृष्ण को देखते
ही उन पर छाया हुआ धुँआ हट गया और वे अपने मूल तेज से चमकने लगे। आठों वसुओं का मेला भी
कृष्णलीला देखने आया था। श्रीकृष्ण को देखते ही उन्होंने कहा, यह तो साक्षात मदन का पुतला है। लेकिन
उन्हें वह कृष्ण की गोद में खेलता हुआ दिखायी दिया। अश्विनीकुमार स्वयं धन्वंतरी थे, लेकिन वह भवरोग से
अत्यन्त त्रस्त थे, कृष्णदर्शनामृत से वे भी क्षणमात्र में रोगमुक्त हो गये। ऋषभदेव, आंगिरस तथा असाधारण
धैर्य के स्वामी रुद्र भी आये। विश्वेदेव, साध्यदेव आदि अनेक देवताओं से आकाश भर गया था। अपनी गायन
कला के बारे में गन्धर्व को बड़ा घमण्ड था लेकिन कृष्ण की मुरली का गायन सुनकर वह चूर-चूर हो गया।
उन्हें दर्शन की उत्कंठा लगी हुई थी और वे क्षण प्रतिक्षण उसकी बाट जोह रहे थे। कृष्ण ने कृपादृष्टि से ही
उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता सरस गायन कला प्रदान की। अप्सरायें कह रही थीं, 'हमारी तरह कोई भी नृत्यकला
में पारंगत नहीं है।' लेकिन कालिया सर्प के फन पर नाचते हुए कृष्ण ने एक ही ताल में उन्हें लज्जित कर
दिया। वे अप्सराएँ इतना-सा मुँह लेकर दर्शन के लिये आयी थीं, उन नृत्यांगनाओं को भी नेत्र संकेत से ही
नृत्य में प्रवीण कर दिया। श्रीकृष्ण को देखने के लिए पाताल से नाग भी आये थे। इतना ही नहीं तो अनेक
सिद्ध, चारण, विद्याधरों के सभी समुदाय आये हुए थे। ऐसे विमानों के झुण्ड के झुण्ड द्वारका में सट कर खड़े
थे। इतने बड़े-बड़े देवतागण श्रीकृष्ण की मूर्ति देखने के लिए उल्लासपूर्वक आये हुए थे।

छठां अध्याय १४३
वपुषा येन भगवान्नरलोकमनोरमः ।
यशो वितेन लोकेषु सर्वलोकमलापहम् ॥ ४ ॥
श्रीकृष्ण ने जिस अवतार शरीर से अनेक प्रकार की युक्तियों से दुराचारी लोगों को संसार से तारने के लिए
अपनी कीर्ति का विस्तार किया, जिस कीर्ति को ध्यानपूर्वक सुनने से सचमुच ही चतुर्विद्ध प्रायश्चित्तों की गति ही
रुक जाती है, भक्तिभाव से जिसका नाम लेने से सभी पाप भस्म हो जाते हैं उस श्रीकृष्णरूपी पुरुषोत्तम ने सृष्टि
के विश्राम का स्थल देखा। जिसका सुरेखित शरीर, सुरनरों में अत्यन्त मनोरम दीखने वाला वह घनश्याम देखकर
सबके मन को समाधान हुआ। किरीटकुण्डल तथा मेखला पहिना हुआ, कटि में जरी का पीताम्बर परिधान किया
हुआ तथा गले में वनमाला होने के कारण वह घननील अत्यन्त शोभायमान लग रहा था। सौन्दर्य और गुणों का
वह मानों भण्डार ही था और अवतार मालिका का मुख्य रत्न श्रीकृष्ण उन्होंने देखा और उसका निवास स्थल
द्वारका भी सभी देवताओं ने देखी।
तस्यां विभ्राजमानायां समृद्ध्यायां महर्द्धिभिः ।
व्यचक्षतावितृप्ताक्षाः कृष्णमद्भुतदर्शनम् ॥ ५ ॥
कृष्ण ने जिस नगरी को बसाया था उसकी शोभा का क्या वर्णन किया जाय? उसमें सुवर्ण कलशों की
तो पंक्तियाँ दिखाई दे रही थीं और उनमें बड़े कौशल से रत्न जड़े हुए थे। उनका तेज आकाश में भी नहीं
समा रहा था। उस द्वारिका में कामधेनु प्रायः प्रत्येक घर में थी, कल्पवृक्षों की तो कतारें लगी हुई थीं और घर
की दीवारों पर चिन्तामणि के खिलौने लटक रहे थे। द्वारकावासियों के घरों में नवरत्नों के ढेर लगे हुए थे
और वहाँ श्रीकृष्ण का वास होने के कारण ऋद्धि-सिद्धि भी दासी होकर वहाँ रहती थीं। कृष्णरूप की
लालसा ने तो आँखों को मतवाला कर दिया तब वे बड़ी चाह से श्रीहरि के देह पर बैठकर मोरपंख जैसी
आँखों को देखने लगे। कृष्ण के सौन्दर्य का क्या वर्णन किया जाय? उसे चखने के लिए तो आँखों में जिह्वा
लग गयी। उपनिषद में वर्णन किया हुआ जो परब्रह्म है वही साकार रूप में आ जाने के कारण उसमें रसालता
तो अपूर्व थी। कृष्ण को देखने के लिये देवतागण उछलकूद मचाने लगे। आँखों को तो पलक झपकाने की
फुर्सत नहीं थी। कृष्णस्वरूप का कौतुक देखते समय आँखों की क्षुधा बढ़ रही थी, उनमें सुख लबालब भर
गया था, फिर भी वे अतृप्त थीं। श्रीकृष्ण को देखने वालों की भीड़ इतनी अधिक बढ़ रही थी कि देखने की
जल्दी में उनके शिरस्त्राण एक-दूसरे पर गिर रहे थे। श्रीकृष्ण को देखने वालों ने चारों ओर से उन्हें घेर
लिया। मानो सभी आँखों का भाग्योदय हो गया था। वे सम्पूर्ण पुरुष को देख रहे थे। श्रीकृष्ण गाढ़े मेघ की
तरह श्यामवर्ण था। उसकी ओर निजात्मभाव से देखते ही आँखें कृष्ण कला के प्रभाव से श्यामल हो गयीं।
जो वेदों की भी समझ में नहीं आता, योगियों के भी ध्यान में नहीं आता उस कृष्ण को वे साक्षात देख रहे
थे। उनके भाग्य को अपूर्व ही कहना चाहिये। ऐसे श्रीहरि को देखते ही देवताओं ने विमानों से पर्जन्यधाराओं
की तरह पुष्पवृष्टि की।
स्वर्गोद्यानोपगैर्माल्यैश्छादयन्तो यदूत्तमम्।
गीर्भिश्चित्रपदार्थाभिस्तुष्टुवुर्जगदीश्वरम् ॥ ६ ॥
मंदार, पारिजात, कल्पवृक्ष, हरिचन्दन आदि स्वर्गीय वृक्षों के सुगन्धित पुष्प सबने श्रीकृष्ण पर उछाले।
श्रीकृष्ण के चारों ओर उत्तमोत्तम पुष्पों का ढेर इकट्ठा हो गया था। फिर समस्त देवताओं ने सामने जाकर जय

१४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जयकार किया जिससे दसों दिशाएँ गूँज उठीं। उन्होंने अनेक प्रकार के रसीले पद, प्रबन्ध तथा विविध प्रकार की
गद्यपद्य रचनाओं से श्रीकृष्ण का स्तुति गायन शुरू किया।
देवा ऊचुः
नताः स्म ते नाथ पदारविन्दं बुद्धीन्द्रियप्राणमनोधचोभिः।
यच्चिन्त्यतेऽन्तर्हृदि भावयुक्तैर्मुमुक्षुभिः कर्ममयोरुपाशात् ॥ ७॥
देवताओं ने कहा, हे सच्चिदानंद श्रीकृष्ण! काया, वाचा तथा मन से विवेक युक्त प्राणधारणा से तुम्हारे
चरणों को प्रणाम करता हूँ। इन्द्रिय शान्त हो इसलिये विषयवासना छोड़कर दसों इन्द्रिय तुम्हारी ओर प्रवृत्त कर हे
श्रीकृष्ण! भक्तिभाव से तुम्हें नमस्कार कर रहे हैं। विषयों के प्रति उदासीन होकर, संसार की आशा त्याग कर,
कर्मपाश तोड़ने के लिये तपस्वी लोग तुम्हारे चरणों का चिन्तनं करते हैं। मुक्ति की आशा से मुमुक्षु लोग तुम्हारे
चरणों का ध्यान करते हैं लेकिन वे कैसी भी दृढ़ भावना क्यों न रखें लेकिन क्षण भर के लिये भी तुम उनके
ध्यान में नहीं आते। तुम्हारे उन चरणों का प्रत्यक्ष दर्शन हमें आज हुआ, इस प्रकार देवतागण परस्पर अपने भाग्य
का वर्णन करने लगे। "इस सगुण स्वरूप को देखकर उसकी इतनी स्तुति क्यों करते हैं? क्योंकि जो आकार ले
लेता है वह सचमुच ही माया से युक्त होता है। जैसे आप शरीरधारी हैं, वैसे ही मैं भी शरीरधारी हूँ। तो मेरे दर्शन
से आप कैसे तर पायेंगे?" यदि आप ऐसा कहें तो मैं कहूँगा, हे अनन्ता! आप ऐसा न कहें। आप स्वयं माया के
नियन्ता हैं यह भी हमें मालूम हुआ है। वह समग्र कथा सुनें।
त्वं मायया त्रिगुणयाऽऽत्मनि दुर्विभाव्यं व्यक्तं सृजस्यवसि लुम्पसि तद्गुणस्थः।
नैतैर्भवानजित कर्मभिरज्यते वै यत्स्वे सुखेऽव्यवहितेऽभिरतोऽनवद्यः ॥ ८॥
नींद लगने पर वह नहीं दिखायी देती, जागने पर तो वह बिलकुल ही नहीं दिखायी देती। उसी प्रकार देह
में माया अतर्क्य स्थिति में है। वह सुरनरों को भी नहीं मालूम होती। हे देवाधिदेव श्रीकृष्ण! तुम्हारी माया तो वैसे
भी अतर्क्य है, तिस पर गुणों का क्षोभ होने के कारण वह ब्रह्मदेव आदि के भी समझ में नहीं आती। तुम ही देवी
माया का सहारा लेकर ब्रह्मादिकों को उत्पन्न करते हो, उनका पालन करते हो और तुम ही उनका संहार भी करते
हो। लेकिन उस कर्म से तुम अलिप्त रहते हो। कोई स्वप्न में सृष्टि उत्पन्न करता है, उसका प्रतिपाल कर संहार
भी करता है लेकिन वह क्रिया कर्ता पर लागू नहीं होती। उसी प्रकार तुमने भी अलिप्त रह कर ही सृष्टि उत्पन्न
की है। सूर्य अपनी ही किरणों से मृगजल भरता है और अस्त के समय उसका शोषण कर उसे ले जाता है। उसी
प्रकार तुम सब कुछ करके अलिप्त रहते हो। धर्म की बाढ़ समूल नष्ट हो जाती है, अधर्म की सीमा टूट जाती है
तब हमारा संकट दूर करने के लिये तुम्हें अवतार धारण करना पड़ता है। अधर्म का नाश कर तुम धर्म की पूर्ण
वृद्धि करते हो और देवताओं को अपने-अपने पद पर स्थापित करते हो। फिर भी हे श्रीकृष्ण तुम कर्मातीत हो।
आत्मसुख के अनुसन्धान का तुम्हें हमेशा ध्यान रहता है जो हमें क्षण भर भी नहीं रहता इसलिये हम सदा
दीनवदन रहते हैं। जिसे निरन्तर आत्मसुख रहता है वह देहधारी होते हुए भी अवतारी पुरुष रहता है। उसके
चरण गंगासागर जैसे तीर्थों को भी पवित्र करनेवाले होते हैं। भले ही वह गुणों में विचरण कर रहा हो लेकिन वह
गुणातीत रहता है। उसके चरण का एक रजःकण भी त्रैलोक्य के महापातकों का विनाश कर देगा। यह तो तुम्हारे
दासों की कथा है। फिर हम तो प्रत्यक्ष तुम्हारे चरणों का ही वन्दन कर रहे हैं। यह तो तुम्हारे चरणों की कथा है
लेकिन तुम्हारी कीर्ति श्रवण करने से भी वैसा ही आत्मलाभ होता है। जो तुम्हारे चरणों का दर्शन करते हैं वे तो

छठां अध्याय १४५

भाग्यवान हैं ही, उनकी महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता। हे स्वामी! तुम्हारी कीर्ति की पवित्रता भी वैसी
ही है। कथा सुनाता हूँ, उसे ध्यान से सुनो। पहले से ही जिस अग्नि में ज्वालाएँ निकल रही हों उसमें और
लकड़ियाँ डालने से आग धधक उठती है, उसी प्रकार देहाभिमान के कारण आशा बढ़ती रहती है जो तुम्हारे
श्रवण कीर्तन से समाप्त होती है।
शुद्धिर्नृणां न तु तथेज्य दुराशयानां विद्याश्रुताध्ययनदानतपःक्रियाभिः ।
सत्त्वात्मनामृषभ ते यशशि प्रवृद्धसच्छ्रद्धया श्रवणसम्भृतया यथा स्यात् ॥ ९ ॥
कृष्ण का स्तवन करने से वह तर जाता है। उस स्तवन को सुनने वाले का भी उद्धार होता है। इसलिये
स्तवन के द्वारा तारने में समर्थ एक तुम ही हो। इसलिये तुम्हारी कीर्ति का श्रवण यही एक शुद्धि का साधन है
अन्य सभी साधन केवल कष्ट उत्पन्न करते हैं। हे देवाधिदेव ! सुनो, केवल तुम्हारे श्रवण की उत्कंठा ही
अंतःकरण के पातकों को धोकर चित्तवृत्ति निर्मल करती है। गुणानुवाद श्रवण करने से जो विमुख हो गये और
तपस्या करने लगे उनकी बुद्धि नाना प्रकार के साधनों के कारण कर्कश हो गयी। मंत्र विद्या तो ग्रहण कर ली
लेकिन मंत्रोच्चार अशुद्ध होने से पुण्य तो नहीं ही मिलता उलटे भयंकर पातक अवश्य लग जाता है। 'शास्त्र'
का श्रवण करने से अहंकार चौगुना बढ़ जाता है और ज्ञानी होने का अभिमान ब्रह्मदेव से भी नहीं छूटता। यदि
'वेदाध्ययन' शुरू करें तो उसमें का एक भी स्वरोच्चार गलत हुआ तो शुद्ध होना तो दूर, वृत्तासुर की तरह मृत्यु
अवश्यंभावी है। 'दान' देने वाला नहुष भी कुएँ में गिरगिट होकर गिर पड़ा। दान करने से लाभ होना तो दूर
उलटे नुकसान काफी हो गया। ऋष्यशृंग 'तप' करने लगा तो वह वेश्याओं के ही वश में हो गया। इससे श्रद्धा
से तुम्हारी कीर्ति श्रवण करने से अच्छी शुद्धि और किसी में नहीं है। यदि यथाशास्त्र कर्म करके रहा जाय तो
कर्म मार्ग बहुत कठिन है। 'प्राचीनवर्ही' राजा की कर्मासक्ति नारद ने उपदेश करके छुड़ायी। कर्माचरण करने से
पहले आचमन करना है तो उतना ही पानी लेना चाहिये जिसमें उड़द डूब जाय। यदि इसमें जरा भी कम
अधिक हुआ तो उससे सुरापान करने का दोष लगता है। सारांश यह कि जिसका हृदय दुष्ट अर्थात् अत्यन्त
मलिन है उसे श्रीकृष्ण की कीर्ति का श्रवण किये बिना तपादिक साधनों से शुद्धि नहीं मिल सकेगी। राजा
परीक्षित श्रवण करने से ही तर गया। श्रवण से ही क्रौंच का उद्धार हुआ। मत्स्य के उदर में श्रीकृष्ण की कीर्ति
सुनने को मिली इसलिये मत्स्येन्द्रिय सिद्ध पुरुष हो गया। तुम्हारी कीर्ति का श्रवण करने से दो बातों की सिद्धि
होती है। एक तो उससे चित्त की शुद्धि होती है और दूसरा उससे जीवब्रह्म में ऐक्य स्थापित होता है। इस प्रकार
दोनों का उद्धार होता है। प्रत्यक्ष काशी में भी ऐसा ही होता है। वहाँ श्रवण में तारक ब्रह्म का उपदेश होता है
इसलिये काशी मुक्तिक्षेत्र बन गयी है। वहाँ श्रवण से ही जीव का उद्धार होता है। तुम तो सदासर्वदा पूर्णकाम
ही हो। तुम निष्कामों का निजधाम हो। फिर भी भक्तों का श्रम दूर करने के लिये तुम्हें कर्म करना पड़ता है। हे
श्रीकृष्ण! इसीलिये तुमने अनेक प्रकार की लीलाएँ कीं और लोगों के लिए मोक्षमार्ग का सोपान बना दिया।
तुम्हारी यशगाथा का भक्तिभाव से श्रवण करना यही चित्तशुद्धि का उपाय है। वहाँ सात्विक श्रद्धा यही एक
उपाय है। मन में इच्छा कर जो भी कोई साधन किये जाते हैं वे सब उस इच्छा से ही व्यर्थ हो जाते हैं। जो
इच्छारहित होता है उसी का अन्तःकरण चोखा रहता है। वैसा अंतःकरण देखते-देखते परमार्थ में विलीन हो
जाता है। हृदय की गहराई में स्वधर्म का बीज अंकुरित होता है, उसमें ही श्रद्धा की बेल तैयार होकर बाहर
निकलती है। सच्छ्रवण के जल से वैराग्य की जड़ें गहराई तक पहुँचती है और मजबूत होती हैं। उन्हें श्रद्धा की

१४६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पुष्टि मिलते ही वह तीव्रगति से चिदाकाश में चढ़ने लगती है और हे पुरुषोत्तम! उस चिदाकाश के स्वयं
प्रकाशित चन्द्रमा तुम हो। हे मेघश्याम! तुम्हारी मूर्ति देखने के लिये साधकों को कितने प्रयास करने पड़ते हैं।
तुम्हारे उस श्रीचरण के आज प्रत्यक्ष दर्शन हुए। इतना कहकर सभी देवतागण उसे साक्षात दण्डवत करते हुए
स्तवन करने लगे।
स्यान्नस्तवाङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः क्षेमाय यो मुनिभिरार्द्रहृदोह्यमानः।
यः सात्वतैः समविभूतय आत्मवद्भिर्व्यूहेऽर्चितः सवनशः स्वरतिक्रमाय॥ १०॥
हे श्रीकृष्ण! हमारे समस्त पातकों का विनाश करने के लिये सारे त्रिभुवन में तुम्हारा एक चरणरूपी धूमकेतु
ही समर्थ है। पातकरूपी लकड़ियों की राशि में तुम्हारे चरणरूपी बड़वानल का स्पर्श होते ही वह अपने
देदीप्यमान तेज से उसके तिल-तिल टुकड़े कर सब कुछ स्वाहा कर देता है। हे अनंता! ऐसे पापियों को कँपाने
वाला तथा जो प्रेमयुक्त हैं उन्हें अभय देने वाले पैर को भक्तजन सदा अपने अंतःकरण में धारण करते हैं। वह
अंतःकरण भक्ति प्रेम रस से सिक्त रहता है, उसमें तुम्हारे चरण अत्यन्त उल्लासपूर्वक स्वेच्छा से धारण करके बैठ
जाते हैं। चरणों का ध्यान करते समय वे भूख और प्यास भी भूल जाते हैं उन्हें अभय प्रदान करने वाला एक
तुम्हारा चरणध्वज ही है। हे श्रीकृष्ण! तुम्हारे उसी चरण का दैवी ऐश्वर्य देखने के लिये भक्तों ने आज चतुर्व्यूह
मूर्ति का पूजन किया। वासुदेव, संकर्षण, अनिरुद्ध तथा प्रद्युम्न इस स्वरूप को 'चतुर्व्यूह' कहते हैं और यही भक्त
का पूजास्थान है। ये चार व्यक्ति भिन्न-भिन्न होते हुए भी उन चारों स्वरूपों में मूर्ति एक ही है, यही बात ध्यान में
रखकर भक्तों का उनकी पूजा करना 'व्यूहास्थिति' कहलाता है। 'सात्वत' कहलाने वाले भक्त जो भगवत्पद की
इच्छा करते हैं वे उसी 'पद' की ओर ध्यान रखकर इस चतुर्व्यूह रूप की पूजा करते हैं। यदि जन्म-मरण के
प्रवाह को रोकने की इच्छा है तो आत्मस्वरूप पहचानने वाले ज्ञानियों को इसी चतुर्मूर्ति की एकनिष्ठा से भक्ति
करनी चाहिये। जन्ममूलच्छेदन करने के लिये जो त्रिकाल यज्ञ तथा एकनिष्ठ भक्ति से त्रिकाल पूजा कर भजन
करते हैं वे कलिकाल पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। इसके अतिरिक्त तुम्हारे दूसरे भक्त विधि-विधान युक्त तथा
वेदोक्त पद्धति से यज्ञ द्वारा होम हवन कर तुम्हारा भजन करते हैं।
यश्चिन्त्यते प्रयतपाणिभिरध्वराग्नौ त्रय्या निरुक्तविधिनेश हविर्गृहीत्वा।
अध्यात्मयोग उत योगिभिरात्ममायां जिज्ञासुभिः परमभागवतैः परीष्टः॥ ११॥
दीक्षा ग्रहण करने में अत्यन्त आदर, यज्ञ के द्वारा भजन करने में उत्सुक, हाथ से केवल नियमित कियाएँ
करना, अन्य हस्त व्यापार बिलकुल न करना, त्रिविध वेदात्मक विधि ही जिनके लिये प्रमाण हैं बाहर त्रिगुणों की
त्रिमेखला, अंतर्यामी सर्वात्मा-चैतन्य के तेज से देदीप्यमान रहने वाला यज्ञपुरुष, वहाँ ओंकार, वषट्कार आदि
लक्षणों से युक्त मंत्रोच्चार कर अतिपवित्र अवदानों से अपार द्रव्य अर्पण करते हैं। तुम्हारे अन्य भक्त योगयुक्त
होते हैं, वे योगधारणा से तुम्हारा भजन करते हैं, आसन पर स्थिर होकर प्राणापान की समता लाते हैं। वज्रासन से
दृढ़ बन्ध साध कर षड्चक्रों का भेदन कर कुण्डलिनी का सुदृढ़ स्कन्ध थपथपाते हैं। इससे वह महाशक्ति उछल
कर अत्यन्त तीव्र गति से ऊर्ध्वगति से ऊपर जाने लगती है और वायु भक्षण कर योगस्थिति से गगन को ग्रास
बना लेती है। सहस्र दल के पार सोख कर लिंगदेह का विकट मार्ग पार कर वह बड़ी तेजी से ब्रह्मस्थान तक
पहुँचती है। वहाँ परमानन्द का भोग तथा शिव-शक्ति का संयोग होता है। इस प्रकार योग का अभ्यास करना यह
योगियों का भजनमार्ग है। कोई तुम्हारी माया को जानने के लिये तुम्हारे ही पैरों का भजन करने लगते हैं। किन्तु

छठवां अध्याय १४७
हे श्रीकृष्ण ! देवाधिदेव ! तुम्हारी माया सर्वथा अतर्क्य है। देखने जाओ तो वह दिखायी नहीं देती, इतना ही नहीं
बल्कि उसी माया का चित्त को मोह हो जाता है और तब वे वास्तव में सिद्धि के ही लिये भगवान के चरणों की
पूजा करते हैं। एक और पक्ष है 'मुमुक्षु' लोगों का। ये लोग अध्यात्म में पारंगत रहते हैं। आत्ममाया का विनाश
करने के लिए जिज्ञासुओं को अपने आत्मज्ञान के योग से मन में पूजा करने के प्रति अत्यन्त उल्लास रहता है।
उनके मन में निरन्तर विवेक की ही भावना होने के कारण वे नित्य क्या है और अनित्य क्या है इसका विचार
मंथन कर जब अपना निश्चय करते हैं तो उन्हें चारों ओर तुम ही तुम दिखायी देते हो। अनित्य होने के कारण
जिसका त्याग किया वह मायिक होने के कारण मिथ्या हो गया। फिर शुद्ध निजात्मरूप ही शेष रहता है। इस
प्रकार चारों ओर देखने पर तुम्हारा ही स्वरूप दिखायी देने लगता है। फिर वे अपनी पसन्द से तुम्हारी ही पूजा
करने लगते हैं। जहाँ भी वे देखते हैं वहाँ तुम्हारे सिवा और कुछ नहीं रहता। इस प्रकार तुम्हारे ही चरणों की
पूजा होती है।
पर्युष्टया तव विभो वनमालयेयं संस्पर्धिनी भगवती प्रतिपत्निवच्छ्रीः।
यः सुप्रणीतममुयाऽर्हणमाददन्नो भूयात् सदाङ्घ्रिशुभाशयधूमकेतुः ॥ १२ ॥
इस प्रकार चारों ओर तुम्हारे जो भक्त हैं वे तुम्हारे अत्यन्त प्रिय हो जाते हैं और हे श्रीपति ! उनकी पूजा भी
तुम अत्यन्त प्रेम से स्वीकार करते हो। भक्त जब जंगली फूलों की माला ले आये तो तुम उतावले होकर लक्ष्मी
को छोड़ कर उसकी ही ओर आकृष्ट हो गये। वह वनमाला भक्तों ने अत्यन्त प्रेम से अर्पण की थी इसलिये
उसका आकर्षण विशेष रूप से था। बासी हो जाने पर भी तुम उसे क्षण भर के लिये भी नहीं उतारते। भक्तों ने
उसे भावार्थ से अर्पण किया और भगवान ने उसे सर्वांग पर धारण किया इसलिये वनमाला सूखना भूल कर सदा
ताजा रहने लगी। उसकी सुगन्ध मिलते ही भगवान भक्ति में भूल गया इसलिये लक्ष्मी ने उससे सौतिया डाह
शुरू कर दिया। प्रभु के पास मैं आयी उससे पहले भक्तों ने उसे कब अर्पण किया यह मेरी समझ में नहीं आता।
मैं युवा होते हुए भी मुझे छोड़ कर उस अधेड़ को ही गले लगाता है। उसे भोग का लक्षण शायद नहीं मालूम।
वह बुढ़िया है और मैं युवा हूँ लेकिन फिर भी वह उसके ही मोहपाश में फँसा हुआ है। वैसे यह ठीक भी है
क्योंकि वैसे भी यह निर्गुण है, इसे गुण और अवगुण का क्या पता ? मेरे भाग्य में चरणसेवा है और वह भी
कभी-कभी और यह जब देखो तब गले से लगी हुई। इस वनमाला ने प्रेम के मामले में सचमुच ही मुझे मात दे
दी है। मुझे एक ओर ढकेलकर स्वयं दोनों अंगों पर बैठ गयी है। श्रीकृष्ण इससे सदैव बातें करता रहता है। मैं
कुछ कहने जाती हूँ तो मेरी ओर ध्यान नहीं देता। मुझे पैर दबाने के लिये रखा है इसलिये इसका डाह मैं कब
तक सहूँ ? इसने श्रीकृष्ण को पैरों तक जकड़ रखा है और मेरी सेवा मुझसे छीन ली है। कुछ भी हो लेकिन मैं
क्षीरसागर की कुलवती कन्या हूँ और यह जंगली है, लेकिन भक्तों के प्रेम के कारण भगवान के कन्धे पर बैठी
है। भक्ति के बल पर यह कन्धे पर बैठी है और कभी नीचे नहीं उतरेगी इसलिये लक्ष्मी उससे डाह करने के
बजाय उसे नमस्कार करने लगी। हे भगवान ! तुम्हें भक्तों की पूजा अच्छी लगती है इसलिए विनम्र होकर सारी
भक्ति भावनाएँ तुम्हें अर्पण की हैं। तुम्हारा वह चरणरूप धूमकेतु हमारे सारे पापों का विनाश करे। हे श्रीकृष्ण !
बार-बार एकत्र होने वाले पापों का भी विनाश करो। इस प्रकार देवताओं ने श्रीकृष्ण के चरणों का वर्णन किया
लेकिन उनका मन तृप्त नहीं हुआ। इसलिए उनके चरणों का वर्णन करते-करते वे उसके ध्वजचिह्न का वर्णन
करने लगे।

१४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
केतुस्त्रिविक्रमयुतस्त्रिपतत्पताको यस्ते भयायभयकरोऽसुरदेवचम्वोः।
स्वर्गाय साधुषु खलेष्वितराय भूमन् पादः पुनातु भगवान् भजतामघं नः॥ १३॥
हे अनंता! बलिबंधन के समय जब वामन ने अपना चरण आगे बढ़ाया था तो उस समय तुम्हारे चरण
सत्यलोक के ऊपर झलकते दिखायी दे रहे थे। सबसे ऊपर जो चरण बढ़ा उसे ही ज्ञानी लोक 'केतु' कहते हैं।
उस समय तुम्हारी ही आत्मस्वरूप जो गंगा है वह पताका के रूप में झलकने लगी। बलिबंधन के समय
आवेश के साथ कदम उठाने के कारण उसके नखों से आवरण कोश फूट कर अपार जल बहने लगा। हे
भगवान्! उस समय आपके चरण स्पर्श से ही उस जल को पवित्रता प्राप्त हुई इसलिये उस जल को ब्रह्मदेव ने
कमण्डल में भर लिया और शंकर ने उसे मस्तक पर धारण किया। चरण की ध्वजा में पताका वही गंगा है।
वही त्रिवाहिनी भी है और त्रिपथगा भी। श्रीकृष्ण की ऐसी चरण शोभा देखने के लिये नयनरूप भृंगों को बड़ा
उल्हास होता है। केतु अर्थात् ध्वज जब फड़कने लगते हैं तो आसुरी सेना के हृदय में कम्पन्न शुरू हो जाता है
और दैवी सम्पत्ति में हर्षोल्लास बढ़ने लगता है। इन चरणों की एक विशेषता यह है कि ये देवताओं को स्वर्ग
सुख देने वाले हैं और वही चरण अधर्मियों को नरक में भेजते हैं। कोई चरणों की पूजा करके तर गये तो कोई
चरणों का ध्यान करके तर गये लेकिन जो इन चरणों की उपेक्षा करते हैं वे अधःपतन की ओर जाते हैं। चरणों
का वन्दन करने वाले तथा निन्दा करने वाले ये दोनों ही निजपद को प्राप्त करते हैं। लेकिन जो सर्वथा उनकी
उपेक्षा करते हैं, उन्हें अधोगति प्राप्त होती है। चरणों का वन्दन करने वाली शिला तर गयी और निन्दा करने
वाले शिशुपाल का तुमने उद्धार किया लेकिन चरणकमलों की जिसने उपेक्षा ही की उसे रौरव नरक में जाना
पड़ता है। हे सर्वव्यापी सर्वेश्वर! सुनो, इस प्रकार तुम्हारा चरण उत्तम है और वह हमारे सभी पातकों का
क्षणार्थ में उद्धार करेगा। पापों का जब उद्धार होता है तब सहज ही दुराचार नष्ट हो जाता है। तुम्हारा चरण इस
संसार का सच्चा तारक है।
नस्योतगाव इव यस्य वशे भवन्ति ब्रह्मादयस्तनुभृतो मिथुरद्यमानाः।
कालस्य ते प्रकृतिपूरुषयोः परस्य शं नस्तनोतु चरणः पुरुषोत्तमस्य ॥ १४॥
हे अच्युत! तुम्हारा चरण आत्मसुख का विस्तार करने वाला है तथा कालकर्मादिकों का नियंता है। उसी
प्रकार वह देवताओं की आत्मा तथा शास्त्र है। काल के वास्तविक नियंता तुम ही हो इसलिये वह असमय अपना
शासन नहीं कर सकता। देवताओं को अधिकारपद पर स्थापित करने वाले तुम ही हो इसलिए उनके नियंता भी
तुम ही हो। हे कृष्णनाथ ! कर्मों का स्वामी भी तुम हो क्योंकि तुम्हारे बिना इन्द्रियों की कोई भी क्रिया कोई नहीं
कर सकता। इसलिये हे श्रीहरि! कर्मों का नियंता भी तुम हो। हे श्रीहरि ! ब्रह्मदेवादि सभी शरीरधारी देवता तुम्हारे
ही अधीन हैं। जिस प्रकार जुते हुए बैलों की सहायता से किसान खेत जोतता है अथवा उनमें जो काम नहीं
करता उन्हें चाबुक से मारता है उसी प्रकार तुम्हारी ही आज्ञा के अनुसार कलिकाल में सब आचरण करते हैं।
संसाररूपी खेत में तुम्हीं सबको काम पर जोत कर आत्मकर्म से, अपनी आज्ञा से उनसे सारा काम करवा लेते
हो। अहंकार की मेढ़ बनाकर, महत्तत्त्वों का खलिहान झाड़ कर, तीन गुणों की डोर से जीवरूपी पशुओं को
कसकर बाँध कर रखते हो। भोर से रात तक अपने कर्मों का फेरा पूरा करते समय जो कंधा बचा कर भागना
चाहता है उसे ही तुम सजा देते हो। यदि तुम कहो कि यह बातें व्यर्थ हैं सृष्टि को बनाने वाली तथा धारण करने
वाली माया है तो हे देवाधिदेव ! ऐसा न कहो। क्योंकि माया को तुम्हारा ही आश्रय है। इसलिये 'परम कारण'

छठां अध्याय १४९
तुम ही हो। 'प्रकृति' और पुरुष ये दोनों तुम्हारी ही गोद में खेलते हैं। तुम माया से भी अधिक श्रेष्ठ हो, प्रकृति
पुरुषों से भिन्न हो, काल का दुर्धर काल तथा सभी संहारों का कर्ता तुम ही हो। हे मेघश्याम! हमारे उत्तम
निजसुख के लिए तुम्हारा चरण विस्तार ही कारणीभूत है। इसलिये हे पुरुषोत्तम! आपकी हमारे ऊपर सदा कृपा
रहे यही आप से प्रार्थना है।
अस्यासि हेतुरुदयस्थितिसंयमानांमव्यक्तजीवमहतामपि कालमाहुः।
सोऽयं त्रिणाभिरखिलापचये प्रवृत्तः कालो गभीरस्य उत्तमपूरुषस्त्वम्॥१५॥
हे श्रीपति! जगत की उत्पत्ति और स्थिति तुम से ही होती है और अंततः सबका संहार करने वाले निश्चित
रूप से तुम ही हो। तामस शक्ति का क्षोभ होने पर वह अन्त में सारी सृष्टि का प्रलय कर देती है। उस समय
समस्त जीव सूक्ष्मरूप से बीजरूप अव्यक्त में रहते हैं। जब उत्पत्ति का समय आता है तो यही सारे बीज अंकुरित
होते हैं और वे यथासमय पल्लवित होते हैं और उनमें पुष्प और फल लगते हैं। हे कृष्णनाथ! यदि आप यह कहें
कि यह तो गुण क्षोभ की अवस्था है, इसलिये मैं प्रलयकर्ता नहीं हूँ तो जिसे तुम्हारे स्वरूप का यथार्थ ज्ञान हो
जाता है उन भक्तों के लिये माया, महत्तत्त्व और जीव इन सभी भावों का विनाश होकर वे निजपद स्वरूप का
आनन्द भोगते हैं। हे कृष्णनाथ! तुम्हें उन सबका संहार करने में क्या कठिनाई है? इसलिए परिस्थिति के अनुसार
'महाकाल' यथार्थ में तुम ही हो। तुम संसार की स्थिति जानने नहीं देते। काल की गति तो तुमने अत्यन्त सूक्ष्म
बनाकर रख छोड़ी है। अंततः अपनी प्रकृति के विकारों का विनाश भी तुम ही करते हो। प्रलय का मूल आधार
लय, निमेष, घटिका, पल, अहोरात्र तथा त्रिकाल है जिसे 'त्रिनामी' कहते हैं। ऐसे प्रचण्ड मायामहत्तत्त्व का तुम
विनाश करते हो। इसलिये हे श्रीकृष्ण! हे ऋषीकेश! इस प्रकार तुम महाकाल हो।
त्वत्तः पुमान् समधिगम्य यथाऽस्थ वीर्यं धत्ते महान्तमिव गर्भममोघवीर्यः।
सोऽयं तयानुगत आत्मन आण्डकोशं हैमं ससर्ज बहिरावरणेरुपेतम्॥ १६॥
हे अनन्ता! कालान्तर में सृष्टि का निर्माणकर्ता भी तुम ही बन जाते हो और उस उत्पत्ति का पालनकर्त्ता
भी तुम-ही हो। तुम्हारी वीर्यशक्ति प्राप्त कर पुरुष को पुरुषत्व प्राप्त होता है इसीलिये वह प्रकृति को अंगीकार
कर उसमें गर्भादान करता है। उस समय वही प्रकृति महत्तत्त्व से गर्भवती होती है और पंचतत्त्वों को गर्भ में
धारण कर हिरण्यवर्ण के अण्डे को धारण करती है। वह वीर्य अमोघ तथा प्रबल होने के कारण वह प्रिया
विश्वाकार का बालक धारण करती है और उस अण्डे में सारा ब्रह्माण्ड रहता है। गर्भ को जिस प्रकार गर्भवेष्टन
होता है उसी प्रकार इस अण्डे को सात प्रकार का बाह्य आवरण रहता है। उसका परिमाण तुम ही निश्चित
करते हो। वे सप्त आवरण हैं, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, स्थूल अहंकार तथा अत्यन्त प्रबल क्रियासूत्र।
जिस प्रकार कठपुतली का एक सूत्रधार होता है उसी प्रकार उस गर्भ की सुरक्षा करने के लिये अंतरबाह्य तुम
ही रहते हो। ऐसे जगत की सृष्टि दो से ही हुई है। तीसरा कोई भी, कहीं भी नहीं दिखायी देता। सारी सृष्टि
दो ही वस्तुओं से भरी पूरी दिखायी देती है। दीपक जलाकर देखने पर भी तीसरा कोई नहीं दिखायी देता।
प्रकृति के बारे में सोचते हैं तो वह भी मिथ्या है। इस प्रकार किसी दूसरे के बिना अकेले तुम ही पूरा विश्व
बने बैठे हो। हे मल्लमर्दन श्रीकृष्ण! तुम अपनी कुशलता की चतुराई स्वयं प्रकट कर रहे हो। इस प्रकार तुम
अकेले ही कर्त्ता होने के कारण किसी में लिप्त नहीं होते। अब कर्म करते हुए भी तुम अकर्त्ता किस तरह हो
यह भी बताता हूँ, सुनो!

१५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
तत्तस्थुषश्च जगतश्च भवानधीशो यन्माययोत्थगुणविक्रिययोपनीतान्।
अर्थाञ्जुषन्नपि हृषीकपते न लिप्तो येऽन्ये स्वतः परिहृतादपि बिभ्यति स्म॥ १७॥
चर और अचर, स्थावर तथा जंगम आदि सारे जगत के स्वामी तुम ही हो। अब यह स्वामित्व कैसे आता
है यह सचमुच ही पूछते हो तो उसके बारे में भी स्पष्ट रूप से सुन लो। माया के योग से तुम स्वयं अनेक प्रकार
के भोग करते हो लेकिन वे भोग तुम्हारे शरीर को स्पर्श नहीं करते। क्योंकि अकर्त्तात्म बोध के कारण तुम
अलिप्त रहते हो। हे हृषीकेश! वह अकर्त्तात्मक बोध ऐसा होता है कि वह वेदशास्त्रों के लिये भी अतर्क्य है।
भोग्य, भोग और भोक्ता इन तीनों को प्रकाशित करने वाले तुम ही हो। जिस प्रकार सूर्य घट में प्रतिबिम्बित होने
पर भी घट से स्वभावतः अलिप्त ही रहता है, घट, जल और प्रतिबिम्ब इन तीनों को ही सूर्य स्वयं प्रकाशित
करता है लेकिन तिस पर भी वह स्वयं उनसे अलिप्त रहता है, उसी प्रकार हे श्रीकृष्ण! तुम भी भोग भोगते हुए
उससे अलिप्त रहते हो। अथवा कर्म, कार्य और कर्त्ता इन तीनों में ही निजआत्मा रहती है फिर भी तुम उससे
अलिप्त रहते हो। जो दर्पण के प्रतिबिम्ब से ही विलास करने को प्रवृत्त हुआ है उस पर कोई व्यभिचार का
आरोप कैसे लगा सकता है? जो स्वयं ही सारा संसार बन कर रहता है उस निजात्मयोगयुक्त योगी को कौन से
भोगों की बाधा सताएगी? ऐसे बोध के सामर्थ्य से जो विषयोपभोग कर रहा है उसके विषयों के स्पर्श से उसका
आत्मज्ञान कैसे मलिन हो सकता है? वह लेन-देन का व्यवहार करता रहता है, देखने में व्यावहारिक लगता है,
घर में रहता है, गृहस्थी चलाता है लेकिन यथार्थ में वह उसमें नहीं रहता है। इस प्रकार आत्मबोध का मार्ग बिना
जाने योगियों ने भोगों का त्याग अवश्य किया किन्तु शरीर में वासना होने के कारण उनका सारा शरीर काँपता
रहता है। वे स्वप्न में विषय को देखते हैं और नींद खुलने पर प्रायश्चित्त करते हैं। इसका कारण यह है कि
उनका अहंकार समाप्त नहीं हुआ होता और वे सदा भयभीत रहते हैं। विषय भय से कम्पित ऐसे लोगों को
आत्मबोध नहीं हुआ रहता लेकिन तुम वैसे नहीं हो। तुम अत्यन्त धैर्यवान हो और तुम्हारा आत्मबोध स्पष्ट
दिखायी देता है।
स्मायावलोकलवदर्शितभावहारिभ्रूमण्डलप्रहितसौरतमन्त्रशौण्डैः।
पत्न्यस्तु षोडशसहस्रमनङ्गबाणैर्यस्येन्द्रियं विमथितुं करणैर्न विभव्यः ॥ १८॥
शायद तुम अब कहोगे कि मैं धैर्यवान हूँ, आत्मज्ञान से परिपूर्ण हूँ ऐसा कौन कहेगा? तो हे स्वामी! मैं
उसके लक्षण तथा उदाहरण भी बताता हूँ, सुनो। घर में सोलह हजार स्त्रियाँ और गोकुल की अन्य स्त्रियों के
अलावा मथुरा में कुब्जा आदि मिश्र जाति की कुमारियों का भोग किया। यज्ञोपवीत भी नहीं हुआ था उसके पहले
ही तुमने ग्वाले की विकलांग लड़की का भोग किया। राह चलती भी कितनी पकड़ी होंगी इसका कोई हिसाब ही
नहीं है। हे हरि। इस प्रकार तुमने कितनी ही लड़कियों का भोग किया लेकिन तुम्हारा आत्मबोध मलिन नहीं हो
पाया। अर्जुन का हाथ पकड़ स्वयं क्षीरसागर में चले गये। शेषशायी नारायण को भी तुम्हारे दर्शन की उत्कंठा लगी
हुई थी इसलिये उसने जान-बूझ कर ही ब्राह्मणों के वस्त्रों का हरण कर लिया था। जिस प्रकार अपने ही स्वरूप
को देखने के लिए दर्पण लेना पड़ता उसी प्रकार कृष्णार्जुन को देखने के लिये ही नारायण स्वयं उन बालकों को
ले आये। "तुम नारायण के अवतार हो, तुम्हारा दर्शन लेने के उद्देश्य से ही मैं स्वयं ब्राह्मणों के लड़के यहाँ ले
आया।" इस प्रकार नारायण के मुख से निकले हुए शब्द हमने स्वयं सुने हैं। इसीलिये कहता हूँ, हे श्रीकृष्ण!
तुम्हारा आत्मबोध अगाध है। कितने ही काल पूर्व मरे हुए ब्राह्मणों के बच्चे तुमने ला दिये। तुम्हारी ही ये सारी

छठां अध्याय १५१
लीलायें हमने प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देखी हैं। जब नारायण को ही तुम्हारे प्रति इतना आदर है तो हमारी क्या
कथा है ? हे अच्युत ! गुणातीत श्रीकृष्ण ! तुम्हारा आरपार किसी की समझ में नहीं आयेगा। पहले भी आपने अनेक
अवतार लिये थे लेकिन उस समय ऐसे चरित्र नहीं दिखलाये। वेदविधि भी लज्जित हो गयी और आपने व्यभिचार
करने वालों को भी आत्मपद दे दिया। अगर तुम यह कहोगे श्रीकृष्ण कि मैंने उदासीन होकर उन स्त्रियों का भोग
किया, उससे आत्मज्ञान में कोई बाधा नहीं आयी। लेकिन श्रीकृष्ण! वैसा कुछ भी नहीं हुआ। वे स्त्रियाँ भी
साधारण नहीं थी। वे विलास में चतुर थीं और शृंगारयुक्त हावभाव करती थीं। नखरे के साथ शरीर की कमनीयता
का भी प्रदर्शन करती थीं और तुम्हें, पुरुषोत्तम को देखकर कामबाणों की भी वर्षा करती थीं। जिन बाणों के प्रहार
से इन्द्र के शरीर में भी हजार छेद हो गये, जिन प्रचण्ड बाणों ने शंकर को भी मोहिनी के जाल में फँसा दिया,
जिन बाणों की बौछार से तपस्वी लोग घबरा उठते हैं और वे घरबार छोड़कर भाग उठते हैं, ऐसे सोलह हजार
कामबाणों का प्रहार होते हुए भी तुम्हारा आत्मबोध नहीं ढला। तुम्हारा यह कैसा सामर्थ्य है। घर की सोलह हजार
तथा गोकुल की और मथुरा की स्त्रियाँ। लेकिन इतनी सारी स्त्रियाँ भी तुम्हें लंपट बनाने में समर्थ नहीं थीं। वे तो
तुम्हें लंपट नहीं बना सकीं, उल्टे तुमने ही उन्हें विषयरहित बना दिया। हे श्रीकृष्ण ! इस प्रकार तुम त्रैलोक्य के
स्वामी अर्थात् श्रेष्ठ हो। तुम्हारी ऐसी कीर्ति सुनने से या तुम्हारा चरणोदक लेने से संसार पवित्र हो उठता है।
विभ्व्यस्तवामृतकथौदवहास्त्रिलोक्याः पादावनेजसरितः शमलानि हन्तुम्।
आनुश्रवं श्रुतिभिरङ्घ्रिमङ्गसङ्गैस्तीर्थद्वय शुचिषदस्त उपस्पृशन्ति॥ १९॥
तुम्हारी कीर्ति का श्रवण करने से अंतःकरण के पातकों का क्षालन होता है और वृत्ति अत्यन्त प्रवृत्त हो
जाती है। उसी प्रकार तुम्हारे चरणों से निकली हुई गंगा समस्त पातकों का विनाश करती है। हे श्रीरंग ! आपका
चरणतीर्थ सारे जगत को पवित्र कर देता है। इसीलिये साधुजन इन दोनों तीर्थों का अखण्ड सेवन करते हैं जिसके
कारण वे परम पवित्र होकर समाधानपूर्वक निजात्मवृत्ति में लीन रहते हैं। हे श्रीपति ! अवतार के अन्त समय में
तुमने इन दो तीर्थों को प्रसिद्ध कर रखा है ताकि तुम्हारे दासों का तरना सम्भव हो सके।
बादरायणिरुवाच
इत्यभिष्टूय विबुधैः सेशः शतधृतिर्हरिम्।
अभ्यभाषत गोविन्दं प्रणम्याम्बरमाश्रितः ॥ २० ॥
शुक्राचार्य कहते हैं, हे राजा परीक्षित ! इस प्रकार सभी देवताओं ने भक्तिभाव से तथा आनन्दपूर्वक श्रीकृष्ण
का स्तवन किया। इस प्रकार स्तुतिस्रोत गाकर उन्होंने श्रीकृष्ण को सन्तुष्ट किया। समस्त देवताओं को अत्यन्त
कौतुक और प्रसन्नता हुई। यह स्तुति करने के लिए ब्रह्मदेव और शंकर सबके आगे आये थे, उन्होंने जय-जयकार
करते हुए दण्डवत किया। शेष सारे देवतागण विमान में हाथ जोड़कर बैठे थे। उन सबकी ओर से पुनः विनती
करते हुए ब्रह्मदेव आगे कहने लगे।
ब्रह्मोवाच
भूमेर्भारावताराय पुरा विज्ञापितः प्रभो।
त्वमस्माभिरशेषात्मंस्तत्तथैवोपपादितम् ॥ २१ ॥
हे यादवश्रेष्ठ ! श्रीधर ! पहले हमने आपसे सुरवरों को अभय देने के लिये पृथ्वी का भार कम करने के

१५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
लिये प्रार्थना की थी। जैसी हमने प्रार्थना की थी उसके विचार से आपने अपनी लीला से कुछ अधिक ही
धर्मवृद्धि की थी। हे पुरुषोत्तम ! हे घनश्याम ! तुम सर्वेश्वर और सर्वात्मा·हो इसलिये जो काम हमारी समझ में
नहीं आता वह भी आपने कर डाला।
धर्मश्च स्थापितः सत्सु सत्यसंधेषु वै त्वया।
कीर्तिश्च दिक्षु विक्षिप्ता सर्वलोकमलापहा॥ २२॥
जो सत्यवादी और साधु थे, तुम्हारे ही चरणों के प्रति जिनका संकल्प था उनके लिये तुमने यथार्थ रूप में
धर्म स्थापना की और अपनी यह कीर्ति तुमने दसों दिशाओं में फैलायी। सचमुच उसके श्रवण से त्रिभुवन पावन
हो जायेगा।
अवतीर्य यदोर्वंशे बिभ्रद्रूपमनुत्तमम्।
कर्माण्युद्दामवृत्तानि हिताय जगतोऽकृथाः॥ २३॥
हे श्रीकृष्ण! पूर्ण पुरुष होते हुए तुमने यादवकुल में जन्म लिया। तुम्हारे स्वरूप की शोभा की तो कोई
सीमा नहीं है। सबमें सर्वोत्तम तुम हो। तुम्हें देखते ही विचलित चित्तवृत्ति शान्त हो जाती है। इस प्रकार लीला से
देह धारण करने वाले तुम्हें देखकर सभी को मनोरम लग रहा है। तुमने अत्यन्त अद्भुत कर्म किये। बायें हाथ से
गोवर्धन पर्वत उठाया, मुख से बडवाग्नि को निगलकर गोपालों का संरक्षण किया। मृत हुए गुरुपुत्र को वापस ले
आये। गत गर्भों से देवकी को मिलाया और स्वयं गोपाल वत्स बनकर ब्रह्मदेव को भी भ्रम में डाल दिया। हे
श्रीकृष्णनाथ ! अनंता ! इस प्रकार जगत के हित के लिये तुमने अनेक प्रकार के चरित्र खेले।
यानि ते चरितानीश मनुष्याः साधवः कलौ।
शृण्वन्तः कीर्तयन्तश्च तरिष्यन्त्यञ्जसा तमः॥ २४॥
आपने यह अवतार लेकर अत्यन्त पावन तथा विचित्र कथाओं की रचना की और नाना प्रकार के चरित्र
कर दिखाये। साधुजन कलियुग में इन चरित्रों का श्रवण-कीर्तन कर त्रिगुणों के साथ मायामोह से मुक्ति पा लेंगे।
यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरुषोत्तम।
शरच्छतं व्यतीताय पञ्चविंशाधिकं प्रभो॥ २५॥
हे पुरुषोत्तम ! हे ऋषीकेशी ! इस यदुवंश में आपने अवतार लिया। उस अवतार को लिये कितने वर्ष बीत
गये यह भी मैं आपसे बताता हूँ। हे गोविन्दा ! मृत्युलोक में मनुष्य की आयु सीमा सौ वर्ष निर्धारित है। उस
मर्यादा को समाप्त होकर भी पचीस वर्ष बीत गये।
नाधुना तेऽखिलाधार देवकार्यावशेषितम्।
कुलं च विप्रशापेन नष्टप्रायमभूदिदम्॥ २६॥
तिस पर भी भूतल पर कोई देवकार्य शेष नहीं रह गया है। यादवकुल तो वैसे भी नष्टप्राय हो गया है।
मरणप्राय हाथी या जिसका पंख उखड़ गया हो ऐसे पक्षी की तरह यादवों की सेना भूमि के लिये भारस्वरूप हो गयी
है। जैसे फूस की टूटी झोपड़ी हो या जैसे राजकुमार को क्षयरोग जड़ जाय अथवा अग्नि में अजगर झुलस जाय उसी
प्रकार यादववीरों की स्थिति हो गयी है। ब्राह्मणों का शाप महाभयंकर होता है इसलिये यादवों का वीर्य, शौर्य, प्रताप
तथा शिखर तथा पहुँचा हुआ उनका घमण्ड यह सब नष्ट होकर उन सब पर मुर्दैनी छा गयी है।

छठां अध्याय १५३
ततः स्वधाम परमं विशस्व यदि मन्यसे।
सलोकाँल्लोकपालान्नः पाहि वैकुण्ठकिङ्करान् ॥ २७ ॥
इसलिये हे देवाधिदेव ! हे यादवराया ! हे श्रीकृष्ण ! हम सब तुम्हारे चरणों की बाट जो रहे हैं। कृपया
वैकुण्ठ चलने की तैयारी करें। हे देवकीनन्दन ! यदि आप चाहें तो इसी क्षण चलने की तैयारी करें। देवताओं की
सेना खड़े-खड़े आपकी प्रतीक्षा कर रही है। जो भी लोक या लोकपाल हैं उन पर आप कृपा करें। हम सब
आपके दास हैं इसलिये इन दासों की बात को सम्मान प्रदान करें। हे वैकुण्ठनाथ महाराज ! मुझे तथा शंकरादि
समस्त देवताओं को भी आपकी सेवा की उत्कंठा है।
श्रीभगवानुवाच
अवधारितमेतन्मे यदात्थ विबुधेश्वर।
कृतं वः कार्यमखिलं भूमेर्भारोऽवतारितः ॥ २८ ॥
ब्रह्मदेव का यह भाषण सुन कर योगज्ञानियों के मुकुटमणि श्रीकृष्ण ने अपनी मेघ गम्भीर वाणी से,
हास्यवदन होकर ब्रह्मदेव से बातें शुरू कीं। जैसे नादब्रह्म पूर्ण हो गया हो अथवा आत्मानन्द का फल पक गया
हो इस प्रकार श्रीकृष्ण ने बोलना प्रारम्भ किया। इससे कर्ण के भाग्य का उदय हो गया। उन्होंने गौरव के साथ
कहा, "ब्रह्मदेव! तुम्हारी भक्ति देखकर मैं अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ हूँ।" कहकर श्रीहरि उस समय पुत्रप्रेम से
आलिंगन देने के लिये उत्सुक हो गये और उन्होंने प्रेम से कहा, "हे देवेन्द्र ! तुम्हारा कहना सत्य है। हे
ब्राह्मणेन्द्र ! तुम्हारी विनती के अनुसार मैंने पृथ्वी का भार तो हल्का कर दिया। मैंने अपना कार्य पूर्ण किया है।
कुछ भी शेष नहीं रहा है। फिर भी एक बड़ा काम रह गया है और मेरे लिये वही समस्या है।"
तदिदं यादवकुलं वीर्यशौर्यश्रियोद्धतम्।
लोकं जिधृक्षद्रुद्ध मे वेलयेव महार्णवः ॥ २९ ॥
यद्यसंहृत्य दृप्तानां यदूनां विपुलं कुलम्।
गन्तास्म्यनेन लोकोऽयमुद्वेलेन विनङ्क्ष्यति ॥ ३० ॥
यहाँ हमारा जो यादवों का कुल है, वह वीर्य, शौर्य और वैभव से उन्मत्त हो गया है। अपने बल के घमण्ड
में वे धर्म का नाश करने पर तुल गये हैं। वे धर्म की जड़ें खोदना चाहते हैं लेकिन जिस प्रकार समुद्र को सीमाओं
ने नियन्त्रित कर रखा है, उसी प्रकार मैंने योगबल से उन्हें काबू में रखा है। उन्हें यदि इसी तरह यहाँ छोड़ कर
निजधाम के लिये चला जाऊँ तो ये अधर्म के लिए प्रवृत्त होंगे। उनका निस्तारण कौन करेगा ? समुद्र अपनी
मर्यादा तोड़कर उन्मत्त होने पर जब सारी चीजों को स्वाहा कर देता है तो उस पर कौन नियंत्रण कर पाता है ?
वैसी ही स्थिति होगी। ये अधर्मरत हो जाएँगे और आपके लिये संकट उत्पन्न करेंगे और तब आप ही उनकी
शिकायत लेकर मेरे पास आयेंगे। ये देवताओं के वश में नहीं आयेंगे, दैत्य अथवा दानवों से भी ये हार नहीं
मानेंगे और जब ये अधर्म का विद्रोह करेंगे उस समय आप ही शिकायत लेकर मेरे पास आयेंगे।
इदानीं नाश आरब्धः कुलस्य द्विजशापजः।
यास्यामि भवनं ब्रह्मन्नेतदन्ते तवानघ ॥ ३१ ॥
इसलिये हमारे इस यादव कुल का शीघ्र विनाश करने का निश्चय कर तथा उसको यथोचित बना कर