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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 869 में से

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पृष्ठ 153

पंचम अध्याय १३७
जहाँ कार्य और कारण दोनों अनावश्यक हैं। उस परम पवित्र स्थान में तुम निजसुख का अनुभव लेकर
सुखस्वरूप होकर रहोगे।
युवयोः खलु दम्पत्योर्यशसा पूरितं जगत्।
पुत्रतामगमद्यद्वां भगवानीश्वरो हरिः ॥ ४६ ॥
तुम्हारे परिवार की कीर्ति से असीम यश की बाढ़ आ गयी है। तुम्हारे यश से त्रिभुवन भर उठा है। सारी
पृथ्वी परमानन्द से भर गयी है। जिसके लिये लोग यज्ञयाग करते हैं, जिसके लिये दानधर्म किया जाता है,
जिसके लिये तप किया जाता है, जिसके लिये योगसाधना की जाती है, वेद अथवा शेषनाग भी जिसका वर्णन
नहीं कर सकते, सनकादिक के लिये भी जो दुर्लभ है उस श्रीकृष्ण को आप अपनी गोद में खिलाते हैं, जो
कलिकाल का शासक है, ब्रह्मदेव आदि देवताओं का जो नियंता है, जो संहारकर्ता का भी संहारकर्ता है, जो
त्रिभुवन का पालनकर्ता है, जो सभी भाग्यों में श्रेष्ठ है, जो सभी शोभाओं की शोभा है, जो षड्गुणों का अधिष्ठान
है वह श्रीकृष्ण पुत्र के रूप में आपके शरीर पर खेल रहा है।
दर्शनालिंगनालापैः शयनासनभोजनैः ।
आत्मा वां पावितः कृष्णं पुत्रस्नेह प्रकुर्वतोः ॥ ४७ ॥
परब्रह्ममूर्ति श्रीकृष्ण का अवलोकन करने से दृष्टि पावन होती है, आँखों को सुख का अनुभव होता है,
कृष्ण के मुख से निकले शब्द कान से भीतर प्रवेश करते ही कर्णरन्ध्र पवित्र होते हैं। श्रीकृष्ण, हे कृष्णा इस
प्रकार पुकारते समय या कृष्ण के साथ बोलते समय आपकी वाणी शान्त और पुनीत हो जाती है। जिसके लिये
अनेक प्रकार के यज्ञयाग किये जाते हैं वहाँ भी जो यज्ञभाग नहीं लेता वही श्रीकृष्ण आपके साथ बैठकर खाता
है। जो योगयागों में भी नहीं मिलता वह श्रीकृष्ण घर में भोजन के लिये आपकी बाट जोहता रहता है। बाललीला
करते हुए अपने मुँह का ग्रास आपके मुँह में डालता है। संतप्तों का ताप शान्त करने वाला वह भगवान श्रीकृष्ण
आपके मुँह में ग्रास डालता है अर्थात् आप जैसा भाग्य संसार में किसी ने प्राप्त नहीं किया है। उस कृष्ण के
उच्छिष्टामृत से जहाँ जिह्वा अमृत के स्वाद से भी ऊब जाती है वहाँ अन्य रसों को कौन मधुर कहेगा ? अनेक
प्रकार की तपस्यायें तथा कष्ट करने पर भी जो अंतरशुद्धि नहीं प्राप्त होती वह श्रीकृष्ण रसावशेष से सहज ही
प्राप्त होती है। कृष्ण को चुम्बन देते समय उसके मुख के सुवास से घ्राणेन्द्रिय पावन हो जाते हैं और उसका
चुम्बन लेते समय मन शान्त होकर स्वानंदपूर्ण उल्लास से भर उठता है। आपको आसन पर बैठे देख कृष्ण तेजी
से दौड़ते हुए आपके पास आता है और गोद में बैठ कर अपना शरीर आपसे सटाकर आपको शान्ति प्रदान करता
है। उस श्रीकृष्ण के शरीर के स्पर्श से सभी इन्द्रियों का काम नष्ट हो जाता है जिससे कर्म अपने आप निष्कर्म हो
जाता है। प्रेमभाव से श्रीकृष्ण को कस कर आलिंगन देने से देह का देहपन समाप्त होकर 'मैं' और 'तू' का भाव
समाप्त हो जाता है। निद्रित अवस्था में सब गहरी मूढ़ स्थिति में व्याप्त रहते हैं लेकिन उस समय कृष्ण तुम्हारे
पास सद्रूप उपस्थित रहता है। योगी लोग अपने कर्म-कृष्णार्पण करने की कल्पना करते हैं। लेकिन कृष्ण स्वयं
ही आपके सारे कर्म अर्पण कर लेता है। पुत्र प्रेम के कारण श्रीकृष्ण स्वयं ही आपके सारे कर्मों को बड़े उल्लास
से स्वीकार कर रहा है। आपकी पवित्रता के सम्बन्ध में क्या कहा जाय ? श्रीकृष्ण का पुत्र भावना से पालन कर
आपने समस्त यदुवंश को पवित्र कर दिया तथा संसार का उद्धार करने का यश कमाया। 'वसुदेव पुत्र' तथा
'देवकीनंदन' इस प्रकार नामस्मरण करने से सांसारिक बन्धनों से मुक्ति मिलती है इतना आपका नाम पवित्र है।