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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 869 में से

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पृष्ठ 154

१३८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
आप अनायास ही तर जायेंगे इसमें सन्देह नहीं है लेकिन जो पूरी तरह श्रीकृष्ण से द्वेष करते हैं वे वैरी भी
'विरोधभक्ति' के सहारे सहज ही तर जाते हैं।
वैरेण्य यं नृपतयः शिशुपालपौण्ड्रशाल्वादयो गतिविलासविलोकनाद्यैः ।
ध्यायन्त आकृतधियः शयनासनादौ तत्साम्यमापुरनुरक्तधियां पुनः किम् ॥ ४८ ॥
शिशुपाल, वक्रदंत, पौंड्रक, शाल्य आदि बड़े-बड़े वीरों ने कृष्ण से बैर किया जिससे उन सबका ध्यान
उन्हें बराबर लगा हुआ था, उनकी मूर्ति उन्हें रात दिन दिखायी दे रही थी। मेघ जैसी श्यामल कांतिवाला, कटि
पर पीताम्बर परिधान किया हुआ, चित्र विचित्र अलंकारों से सजा हुआ, गदा आदि अस्त्रों से सुसज्जित, वह
रणभूमि पर शत्रु की ओर देखता हुआ खड़ा रहता है। उत्कट वैरभाव के कारण वे श्रीकृष्ण की ओर अत्यन्त क्रोध
से देखते रहते थे। क्रोध और द्वेष के कारण ही क्यों न हो, उन्हें उसका अखण्ड ध्यान लगने के कारण वे तद्रूप
हो गये थे। कंस को परमभय के कारण श्रीकृष्ण का अखण्ड ध्यान लगा हुआ था। उस भय के कारण उसे
खाते-पीते, उठते-बैठते चारों ओर श्रीकृष्ण ही दिखायी देने लगा। कंसासुर महाभय के कारण तथा
शिशुपालादिक महान द्वेष के कारण अनायास ही मुक्ति पा गये। फिर श्रद्धालु लोगों को मोक्ष क्यों नहीं प्राप्त
होगा ? आप तो अत्यन्त प्रेमभाव से चित्त, वित्त, प्राण आदि श्रीकृष्ण पर न्योछावर कर रहे हैं इसलिये ब्रह्मप्राप्ति
तो आपके चरणों को स्पर्श कर रही है। पूर्ण प्राप्ति आपके पास ही है लेकिन वह आपको मालूम नहीं होती।
आप श्रीकृष्ण को अपना बालक समझते हैं और निजलाभ को ठुकरा रहे हैं।
माऽपत्यबुद्धिमकृथाः कृष्णे सर्वात्मनीश्वरे।
मायामनुष्यभावेन गूढैश्वर्ये परेऽव्यये ॥ ४९ ॥
आप श्रीकृष्ण को अपना पुत्र समझते हैं यह आपकी भावना अत्यन्त क्षुद्र है। वह परिपूर्ण निर्गुण परमात्मा
ही कृष्णस्वरूप में अवतरित हुआ है। आप उसे बालक न समझें, यह देवताओं का भी देवता है, यह श्रीकृष्ण
सबसे अधिक श्रेष्ठ, सर्वात्मा, सर्वेश्वर तथा योगियों में श्रेष्ठ योगी है। यह अविकारी, अविनाशी, परात्पर,
परमहंस, इन्द्रियनियंता ऋषिकेश तथा जगन्निवासी जगतात्मा है। भावात्मक हो जाने के कारण यह सबको मनुष्य
रूपधारी प्रतीत होता है, उसका ऐश्वर्य अत्यन्त गूढ़ है, वह गुणातीत है तथा त्रिभुवन में व्याप्त है।
भूभारासुरराजन्यहन्तवे गुप्तये सताम्।
अवतीर्णस्य निर्वृत्यै, यशो लोके वितन्यते ॥ ५० ॥
कालयवनादि असुर, जरासंधादि महावीर अथवा अधर्म करने वाले अन्य राजा जिनकी सेवा पृथ्वी के लिये
भारस्वरूप हो गयी है, पृथ्वी का वह भार कम करने के लिये, निर्विकार धर्म की वृद्धि करने के लिये तथा
साधुओं का संरक्षण करने के लिये आया श्रीकृष्ण भगवान का पूर्ण अवतार है। भक्तों का पालन करने तथा
साधुओं को सुख देने के लिये यदुवंश में भगवान श्रीकृष्ण रूप में अवतरित हुए हैं। असुररूपी हाथियों का संहार
करने वाला वह सिंह तथा सज्जनरूप वन पर आनन्द की वृष्टि करने वाला मेघ. आपके घर परिपूर्ण अंश से
अवतार लेकर आया है। जिसने त्रिभुवन का उद्धार करने के लिये अपार कीर्ति अर्जित कर ली है, उसके अवतार
की कीर्ति ब्रह्मदेवादि भी गा रहे हैं। अत्यन्त कठिन इस संसार सागर को पार करने के लिये जिसका यशगान
सुरवर गा रहे हैं और जिसके चरित्र का गायन बड़े-बड़े ऋषिगण भी सर्वकाल कर रहे हैं, जिसका नामस्मरण