श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है? तो तुम्हें भक्तिमार्ग के उत्तम से उत्तम धर्म बताता हूँ, सुनो। देहाभिमान के आकर्षण को त्याग कर जिसकी
हरिभक्ति समस्त प्राणीमात्र में दृढ़ रहती है वह कर्माकर्म को पैरों तले रौंद देता है, मुक्ति अपने केशों से उसके
चरण झाड़ती है। वह जिसकी भी ओर कृपादृष्टि से देखता है उसका सांसारिक भय तत्काल नष्ट होता है और
वह जहाँ कहे वहाँ तत्काल हरि की भक्ति डेरा जमा कर बैठ जाती है। उसके अनुग्रह से दीनजनों के अंतःकरण
में भगवान प्रकट होते हैं और उसके कर्माकर्म का निस्तार स्वयं श्रीहरि करने लगते हैं। जिस प्रकार सूर्य के उदय
के साथ अन्धकार भाग जाता है उसी प्रकार हृदयमन्दिर में यम प्रकट होते ही कर्माकर्म सहज ही दूर हो जाते हैं।
हे राजश्रेष्ठ! भगवान के नाम की कीर्ति इसी का नाम परमभक्ति है। भक्ति के पास चारों मुक्तियाँ दासी की तरह
सेवारत रहती हैं। भक्ति की यह पूर्ण स्थिति सुनकर राजा के शरीर पर रोमांच उभर आये, आँखों से आनन्द के.
आँसू बहने लगे और वह प्रसन्नवृत्ति से डोलने लगा। जनकराजा की इस स्थिति का वर्णन करते समय नारद मन
ही मन सुखभरित हो गया और उसी अवस्था में उसने वसुदेव को उस इतिहास का समापन सुनाया।
नारद उवाच
धर्मान् भागवतान्नित्थं श्रुत्वाथ मिथिलेश्वरः।
जायन्तेयान् मुनीन् प्रीतः सोपाध्यायोह्यपूजयत् ॥ ४३ ॥
नारद इतिहास सुना रहे थे, साथ ही साथ डोल भी रहे थे। उसी मुदित अवस्था में उन्होंने भक्ति का रहस्य
बताया। (नारद ने कहा) इस प्रकार जयंत पुत्रों ने जनकराजा को परम प्रीति का अपने स्वानुभव के अनुसार
भगवान की श्रेष्ठ भक्ति का वर्णन किया। उनका भाषण सुनकर जनक राजा को अत्यन्त आनन्द हुआ। उसने
अत्यन्त प्रेमपूर्वक उन जयंती पुत्रों की पूजा की। श्रवण से समाधान हो जाने के कारण उसे पूजा करने में भी
अत्यन्त प्रेम का अनुभव हुआ। तब जनकराजा ने अत्यन्त भक्तिभाव से उनकी पूजा की। अहिल्या का पुत्र
शतानंद राजा का उपाध्याय था। उसने भी बड़े आदर के साथ पूजा करवायी और स्वयं भी की।
ततोऽन्तर्दधिरे सिद्धाः सर्वलोकस्य पश्यतः।
राजा धर्मानुपातिष्ठात्नवाप परमां गतिम्॥ ४४ ॥
इस प्रकार वे सभी नौ श्रेष्ठ भगवद्भक्त देखते-देखते आकाश मार्ग से ऊपर जाते-जाते अदृश्य हो गये।
उस भागवत धर्म का आचरण कर तथा उस प्रकार की भगवद्भक्ति कर उस जनकराजा ने भी उत्तम गति प्राप्त
की। सद्भाव से भक्ति करने से देह में रह कर भी विदेहस्थिति प्राप्त होती है। जनकराजा को वह प्राप्त होने के
कारण वह परम शान्तिमय स्थिति में पहुँच गया।
त्वमप्येतान् महाभाग धर्मान् भागवताञ्छुतान् ।
आस्थितः श्रद्धया युक्तो निःसङ्गो यास्यसेपरम् ॥ ४५ ॥
हे वसुदेव! जहाँ सारे भाग्य की पंक्तियाँ विश्राम करने आती हैं वह भाग्यस्थिति तुम्हारे घर खेलने लगी है।
वसुदेव! तुम्हारे ही नाम के कारण भगवान को 'वासुदेव' कहते हैं। 'वासुदेव' इस नाम के प्रभाव से सभी लोगों
के दोषों का विनाश होता है। हे वसुदेव! ऐसे भाग्य के भाग्यनिधि सचमुच तुम ही हो। तुमने भागवत धर्म के
विधि को श्रवण किया। श्रद्धापूर्वक परमात्मस्वरूप का श्रवण करने के बाद मनन करते हुए उसे धारण करना
चाहिये। ऐसा करने से तुम सभी बन्धनों से मुक्त होकर तत्काल निजधाम पहुँच जाओगे। वह ऐसा निजधाम है