श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचम अध्याय १३९
करने से भक्त कलिकाल से मुक्त होते हैं, वह श्रीकृष्ण अवतार आपके यहाँ प्रकट हुआ है। श्रीकृष्ण
एकमेवाद्वितीय परब्रह्म की निधि हैं उसे बालक मत समझिये। इतने से ही आप संसार सागर तर गये ऐसा समझ
लीजिये। श्रीकृष्णावतार की यह कथा नारद ने वसुदेव को सुनायी। शुक बोले, हे परीक्षित राजा ! इससे सबको
बड़ा आश्चर्य हुआ।
शुक उवाच
एतच्छ्रुत्वा महाभागो वसुदेवोऽतिविस्मितः ।
देवकी च महाभागा जहतुर्मोहमात्मनः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार जनक तथा नवयोगी का पुराना इतिहास तथा कृष्ण परमात्मा पूर्ण ब्रह्म है आदि वृत्तांत नारद ने
आनन्दपूर्वक सुनाया। शुक कहते हैं, हे राजा परीक्षित ! नारद का वह भाषण सुनकर वसुदेव तथा देवकी ये दोनों मन
ही मन आश्चर्य से चकित हो गये। कृष्ण परमात्मा है यह नारद का वचन सुनकर देवकी वसुदेव मन ही मन
विस्मित हो कर स्तब्ध रह गये। वे दोनों ही बड़े भाग्यवान थे इसलिये श्रीकृष्ण हमारा पुत्र है यह भावना उन्होंने
तत्काल छोड़ दी और कृष्ण साक्षात परब्रह्म स्वरूप हैं, ऐसी भावना निश्चित की। अहा! उस अपूर्व भाग्य का क्या
वर्णन किया जाय ? श्रीकृष्ण के प्रति ब्रह्मभावना धारण करते ही हृदय का सारा मोह और स्नेह झट निकल गया।
इतिहासमिमं पुण्यं धारयेद्यः समाहितः ।
स विधूयेह शमलं ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५२ ॥
नारद ने जो यह निमि-जायंत संवाद वसुदेव को सुनाया वह इतिहास अत्यन्त पवित्र तथा जीव-शिव का
भेद मिटाने वाला है। यह इतिहास कथा जो सचमुच ही ध्यान देकर तथा तल्लीन होकर भक्ति भाव से श्रवण
करेगा वह इस प्रकार दिन-रात श्रवण मात्र से ही समस्त पुण्यों की राशि एकत्र कर लेता है। ऐसा वह पुरुष
ब्रह्मपात्रि के लिये अवश्य पात्र होता है। अर्थ के साथ यदि इसका एक-एक शब्द भी सुना जाय तो उससे
अंतःकरण शुद्ध होता है और इस प्रकार परमानंदानुभव रूप ब्रह्म की प्राप्ति होती है। इसे 'पंचाध्यायी' कहते हैं।
शंकर के ये पाँच मुख ही हैं। एकादश स्कन्ध के गूढ़ ज्ञान का वर्णन करने के लिए मानो यह पताका ही फहरायी
गयी है। यह केवल पंचाध्यायी नहीं बल्कि एकादश स्कंध के ये पंचप्राण ही मानों शुद्ध ज्ञान का उपदेश करने के
लिये अपने भक्तों के सामने प्रस्तुत हुए हैं। यह केवल पंचाध्याय नहीं अपितु शुक्राचार्य रूपी कोकिला का पंचम
स्वर में किया हुआ गायन है। एकादश स्कन्ध यह 'वसन्त ऋतु' है और वह भक्त रूप भ्रमरों की गूँज है या फिर
यह मिश्री का पंचकोनी टुकड़ा ज्ञानगम्भीर निजभक्तों को चखने के लिये दिया गया है। वास्तव में यह पंचाध्यायी
भी नहीं बल्कि एकादश स्कन्ध के पंच-गन्धों की गंधाक्षत ही है जो भक्तों को निमंत्रण देने के लिये गाजे-बाजे
के साथ भेजी गयी है। निजभक्तों के प्रति अत्यन्त कृपालु भगवान ने एकादश स्कन्ध का आगे का ज्ञान गम्भीर
भाग सुनने के लिये उपस्थित होने के लिये प्रसन्नतापूर्वक यह पालकी भेजी है। एकादश स्कन्ध यह
कृष्णउद्धवरूपी अर्धमात्रा है, अर्धोदय पर्व की महायात्रा है, इस यात्रा में साधकों को बुलाने के लिये पंचाध्यायी
की यह मुनादी बुला रही है। श्रीकृष्ण उद्धव के मेले के इस सोज्वल ब्रह्मसुख को देखकर पंचाध्यायी व्याकुल
होकर कहने के लिये भक्तों के पास आयी है। अहंकार का डेरा-डंडा श्रीकृष्णनाथ ने उखाड़ दिया और अपने
अभय हस्त से आत्मस्वरूपी तीर्थ उद्धव को स्नान करने के लिये सुलभ कर दिया। उस मुक्ततीर्थ की बड़ाई
करने पंचाध्यायी आगे आयी है। जो भी कोई संसार में श्रांत हो गया हो वह विश्राम करने के लिये यहाँ आयें