श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अत्यन्त प्रिय लगती है। इस प्रकार चारों मुक्तियाँ हरिकीर्तन के पास दासी होकर रहती हैं इसलिये भक्त हरिभजन
पर लुब्ध हो जाते हैं। वे मुक्ति नहीं चाहते। इस प्रकार हरिकीर्तन ने योग, याग, तप आदि साधनों को बिलकुल
अनाथ कर दिया है। कलियुग में नामस्मरण और हरिकीर्तन से ही जड़ तथा जीवों का उद्धार होता है।
कृतादिषु प्रजा राजन् कलाविच्छन्ति सम्भवम्।
कलौ खलु भविष्यन्ति नारायणपरायणाः ॥ ३८ ॥
कीर्तन के कारण चारों मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं इसलिये कलियुग में कीर्तन भक्ति ही प्रमुख है। इसलिये
इन्द्रादि देवतागण भी कलियुग में जन्म लेने की आकांक्षा रखते हैं। स्वर्ग भोग का स्थान नहीं बल्कि वह
विषयवासनाओं का बन्दीगृह है। इसलिये भाग्यशाली जीव कलियुग में जन्म लेकर हरि का कीर्तन करते हैं। जब
स्वर्ग के देवतागण भी कलियुग में जन्म लेने की इच्छा करते हैं तो कृतादि युग के उत्तम लोग कीर्तन धर्म रूप
भजन के लिये विशेष रूप से जन्म लेने की इच्छा करते हों तो इसमें कैसा आश्चर्य है। कृतयुग के भाग्यशाली
लोगों ने यज्ञयाग कर स्वर्ग की प्राप्ति की लेकिन वे भी कलियुग के जन्म की इच्छा करते हैं। कृत, त्रेता तथा
द्वापर इन तीनों युगों के श्रेष्ठ पुरुष भी कलियुग में जन्म लेकर आने की इच्छा करते हैं। उस काल के लोग
परस्पर बातें करते हैं कि कीर्तन से चारों पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं यही कलियुग की महिमा है और इसीलिये सृष्टि
में कलियुग धन्य है। जो सचमुच भाग्यवान होते हैं वही कलियुग में जन्म प्राप्त करते हैं। सारांश, कलियुग में
जन्म लेने के लिये देवतागण, मानव तथा नाग भी उत्कंठा रखते हैं। दीन दुबलों का उद्धार हो सके इसलिये
कलियुग में श्रीनारायण नामस्मरण से ही संसार बन्धन टूट जाता है। सारांश, हरिकीर्तन सभी को तारता है।
इसलिये हे राजा ! कलियुग में हरिकीर्तन में श्रद्धा रखने से लोग अनायास ही तर जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं है।
कलियुग में अनेक प्रकार के लोग नारायण की उपासना करेंगे और स्त्रियाँ तथा शूद्र की भक्ति की महिमा का
प्रसार करेंगे।
क्वचित् क्वचिन्महाराज द्रविडेषु च भूरिशः।
ताम्रपर्णी नदी यत्र कृतमाला पयस्विनी ॥ ३९ ॥
कावेरी च महापुण्या प्रतीची च महानदी।
ये पिबन्ति जलं तासां मनुजा मनुजेश्वर।
प्रायो भक्ता भविष्यन्ति वासुदेवोऽमलाशया ॥ ४० ॥
विशेष रूप से द्रविड देश में भक्ति अधिक बढ़ेगी। तिस पर भी जहाँ प्रसिद्ध तीर्थों के स्थान होंगे वहाँ स्त्री
भक्ति में उफान आयेगा। ताम्रपर्णी नदी के तट पर हरिभक्ति की महिमा बहुत अधिक है, कृतमाला के चारों ओर
के परिसर में तो हरिभक्ति का उल्हास प्रकट होता है। निर्मल जल से युक्त नदी, उसका जल प्राशन करने से
श्रीहरिचरण के प्रति प्रेम की वृद्धि होती है और भगवद्भजन करने की बुद्धि दृढ़ होती है। कावेरी नदी के दर्शन
मात्र से पापों की राशियाँ नष्ट हो जाती हैं। जिस कावेरी तट पर श्रीरंग प्रसन्नतापूर्वक निवास करता है, वहाँ भक्ति
का प्रवाह अखण्ड बहता रहता है। नदी में डुबकी लगाते ही तत्काल चित्तशुद्धि होने का अनुभव होता है और
भक्ति की स्पर्धा बढ़ते-बढ़ते उसकी पताका वैकुण्ठ तक पहुँचती है। हे राजराजेश्वर ! सुनो। इन पाँच नदियों के
तीर्थ में स्नान करने से अथवा उनका जल प्राशन करने से भगवद्भजन में बुद्धि स्थिर होती है। इन तीर्थों का दर्शन