श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 151, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरने से सहज ही कलिमलक्षालन होता है तथा स्नान अथवा जलप्राशन करने से भगवद्भजन करने में उत्साह
बढ़ता है। इन तीर्थों का दर्शन, स्पर्श अथवा स्नान करने से वासुदेव का शुद्ध भजन करने की इच्छा की वृद्धि
होती है। जो इस प्रकार के भक्त होते हैं वे देवतागण, ऋषि तथा पितर इन तीनों के ऋण से मुक्त होते हैं। वे कभी
भी देवतागण, ऋषि अथवा पितरों से बँधे हुए नहीं होते।
देवर्षिभूताप्तनृणां पितॄणां न किङ्करो नायमृणी च राजन्।
सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम्॥ ४१ ॥
शरणागत के लिये शरण अर्थात् आश्रय देने वाले या संरक्षक केवल श्रीमुकुंद के चरण ही हैं। असीम भाव
से उसकी शरण में जाने से जन्म-मरण का बन्धन नहीं रहता। फिर उसे देवता, ऋषि, आचार्य अथवा पितर इनके
ऋण की क्या चिन्ता है? वे भक्त भगवद्भजन से ही मुक्त हो जाते हैं। श्रद्धापूर्वक भगवद्भक्ति करने से समस्त
पितरों का उद्धार होता है। भगवद्भक्ति के आनन्द से 'ऋषि' नित्य ही तृप्त होते हैं। भगवद्भक्ति के आनन्द से
सभी 'प्राणी' सुखी होते हैं। पुत्र यदि भगवद्भक्ति करे तो उसके माता-पिता और सगे-सम्बन्धियों का भी उद्धार
होता है। समस्त देवताओं का नियंता जो श्रीहरि है उसका उल्लासपूर्वक भजन करने से 'देवऋण' की बाधा
भगवद्भक्त को कभी नहीं होती। जो अनन्यभाव से भजन करते हैं वे कभी भी कर्म के अधीन नहीं होते क्योंकि
कर्म जिसके अधीन रहता है उस हरि की ही शरण में वे रहते हैं। अनन्यशरण हरिभक्त कभी भी कर्म का सेवक
नहीं होता अथवा देवताओं का भी चाकर नहीं होता। जो हरि की शरण में आ गया वह किसी का आश्रित नहीं
है। वह कर्माकर्म से अलिप्त तथा ऋणत्रयी से मुक्त ही रहता है। समस्त प्राणियों में वासुदेव ही भरा हुआ है ऐसा
उसका दृढ़ विश्वास रहता है इसलिये वह सभी कर्मों से अलिप्त तथा सकल कर्मों से मुक्त होता है।
स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः।
विकर्म यच्चोत्पतितं कथंचिद् धुनोति सर्वं हृदि संनिविष्टः॥ ४२॥
देह का अभिमान छोड़कर तथा अन्य देवताओं का भजन त्याग कर जो हरिचरणों की ही शरण में जाते हैं
उन्हें कर्मों का बन्धन कभी स्पर्श नहीं करता। इस प्रकार जो अनन्यशरण होते हैं वही हरि के प्रिय होते हैं और
जो इस प्रकार हरि के भक्त होते हैं उन्हें स्वप्न में श्री कर्मबन्धन स्पर्श नहीं कर सकता। हे राजा! अब तुम यदि
कहोगे कि भगवद्भक्त विहित कर्माचरणों के कारण नित्यमुक्त रहते हैं, तो तुम्हें यह बता दूँ कि वे यदि
असत्कर्म भी करें तो भी उन्हें प्रायश्चित्त का बन्धन नहीं है। जिस प्रकार सिंह का छावा मत्त हाथी के वश में नहीं
आता उसी प्रकार हरि के भक्त यदि अकर्म भी करें तो भी वे यम के वश में नहीं आ सकते। हरि के भक्त केवल
नामस्मरण कर ले, भले ही वह महान पापी ही क्यों न हो, लेकिन यम आकर उसका वन्दन करेगा। तब जो हरि
के परम प्रिय भक्त हैं उन्हें यम अकर्म के लिये दण्ड कैसे देगा? (शंका) वेदाज्ञा अर्थात् साक्षात् विष्णु की ही
आज्ञा है, उसी देवता ने धर्म और अधर्म की व्याख्या की है, फिर यदि भक्त विकर्माचरण करें तो उन पर वेदाज्ञा
का प्रभाव क्यों नहीं होगा? (समाधान) जिस प्रकार राजा का प्रिय सेवक पहरे पर के सिपाही के अधीन नहीं
होता तो फिर राजा का प्रिय पुत्र उस द्वारपाल के अधीन कैसे होगा? उसी प्रकार जिसे केवल हरिनाम् का स्मरण
रहता है उसके चरणों को वेद प्रणाम करते हैं तो जो हरि को पूरी तरह प्रिय है उसे वेद का विधान कभी बाधक
नहीं होगा। वैसे भक्त के हाथों कभी निषिद्ध कर्म नहीं होगा किन्तु यदि दैवयोग से वैसा हो भी जाय तो अच्युत
स्मरण से ही उसकी उस कर्म से मुक्तता होती है। कर्माकर्म जिसे बाँध नहीं सकता ऐसा भागवतधर्म कौन-सा