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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पंचम अध्याय ११७
का झूठा अभिमान रखते हैं। उन्हें विधान की कोई जानकारी नहीं रहती और जानकार से भी वे नहीं पूछते। लोगों
के बीच प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये अपने ही मत से कर्म करते हैं। मीठे-मीठे किन्तु झूठे शब्दों से वाचाल बनने का
प्रयत्न करते हैं तथा भोग में जरा भी सुख नहीं है ऐसा कहने वालों को अप्सरादिक भोगों के लिये लालायित
लोगों को इहलोक और परलोक का लालच दिखाते हैं। यहाँ अच्छे से अच्छे भोगों का आनन्द लिया जाये और
भविष्य में स्वर्गसुख तो रखा ही है इस आशा से बेचारे यज्ञ-याग करने के पीछे दौड़ते-फिरते हैं। कर्ता भले ही
खर्च करके डूब जाय लेकिन मुझे आचार्यत्व मिले ऐसी उनकी बुद्धि रहती है। ऐसी बुद्धि से वे यज्ञ के लिये
प्रयत्न करते हैं। अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये अनेक प्रकार की कर्मचेष्टायें करते हैं और कर्मारम्भ का बहुत
बड़ा समारोह करने का भारी-भरकम प्रयास करते हैं। जिस प्रकार शराबी शराब को अमृत समझता है और
उसकी बात मधुर समझ कर अन्य लोग स्वाद लेने की इच्छा से मद्यपान की ओर प्रवृत्त होते हैं। लेकिन उससे
क्या होता है ? एक तो शरीर पर अपना संयम टूट जाता है और तत्काल दारिद्र्य और पिशाचातत्व का संचार होता
है। उसी प्रकार अधःपतनात्मक सुख को ही स्वर्गसुख मान लेते हैं और जो फल की आशा से लंपट हो जाते हैं वे
जान-बूझ कर उस काम की ओर प्रवृत्त होते हैं। कीड़ा दीवार फाँद तो नहीं सकता लेकिन उस पर चढ़ने का
प्रयत्न तो करता ही है और अपने आप गिर पड़ता है। उसी प्रकार स्वर्ग सुख के लिये भी पतन निश्चित है। कर्म
की आसक्ति से काम और लालच की अत्यधिक वृद्धि होती है जिससे ढोंग करना आवश्यक हो जाता है और
उस ढोंग में क्रोध भी अचानक बढ़ता है।
रजसा घोरसंकल्पाः कामुका अहिमन्यवः।
दाम्भिका मानिनः पापा विहसन्त्यच्युतप्रि यान्॥ ७॥
लेकिन इसके लिये बेचारे वे भी क्या करेंगे ? उनका शुद्ध सत्त्व ही नष्ट हुआ रहता है इसलिये वे रजोगुण
से काम की ओर आकर अत्यन्त कामासक्त हो जाते हैं। उस समय अप्सराओं के भोग की इच्छा बलवती होकर
स्वर्गसुख की प्रीति बढ़ने लगती है इसलिये यज्ञ आदि प्रारम्भ कर पुण्य बढ़ाने का प्रयास शुरू हो जाता है। तब
वे तंत्र-मंत्र, शुद्धि, द्रव्यशुद्धि अथवा यज्ञयाग का विधि भी नहीं देखते जिससे स्वर्ग प्राप्ति तो नहीं ही होती,
उलटे इस अविधि कृति से वे ठगे अवश्य जाते हैं। जिस प्रकार अंबील अथवा माँड पूरी तरह पकने के बाद
कड़ुई हो जाती है, उसी प्रकार कामी पुरुषों की इच्छा अर्थात् काम तृप्त न होने से उनके शरीर में क्रोध भड़क
उठता है। या जिस प्रकार घीकुआर पकने पर उसकी कडुवाहट बढ़ती जाती है, उसी प्रकार काम का भंग होने
पर क्रोध भड़क उठता है। क्रोध सचमुच ही कालसर्प है। वे द्वेष की फुफकारें छोड़ता रहता है। वह पूज्यता की
कुण्डली बना कर बैठता है और साधु निन्दा की हवा बहाता है। तो यही क्रोध का निवास है। इस स्थान पर तम
की पंचायत बैठती है और देश के खोटे सिक्के वहाँ बिकने के लिये आते हैं। फिर जो भी राह में मिलता है उसे
जन्म-मरण के प्रयोग की लत लगाकर खेचरी, भूचरी आदि बाह्य मुद्रा दिखाकर पापकर्म से पाप की प्रवृत्ति
बढ़ाता है। मुँह से स्वधर्म का पाठ अवश्य पढ़ता है लेकिन अधर्म की खदान खोल कर शुद्ध झूठ कर्माचरण
करता है। इससे पापाचार की फसल पक कर गगन को छूने लगती है। उस समय अच्छे और बुरे एक ही बाट
से अधर्म की तराजू में तौले जाते हैं। अभिमान को आश्रय देकर ज्ञानाभिमान बढ़ाते हैं और फिर साधुजनों की
निन्दा करते हैं, और सज्जनों का उपहास करते हैं। संसार में वे सबमें दोष ही देखना शुरू करते हैं। यदि उसमें
कोई निर्दोष दिखायी देता है तो उसका मजाक उड़ाते हैं और उस पर अनेक प्रकार के आरोप मढ़ते हैं। इस

१९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रकार जो अभिमान के नशे में रहते हैं उन्हें पाप बुद्धि की बाधा होती है। वे सहज बात भी करते हैं तो उसमें
हमेशा साधुओं की निन्दा ही भरी रहती है। जो श्रीहरि के प्रिय हैं वे सदा हरि की भक्ति करते हैं उनका वे
हमेशा उपहास करते हैं, उनके गुणों की चर्चा भी दोषों के ही रूप में करते हैं। ब्राह्मण जब हरि का नामस्मरण
करने लगते हैं तो उसे 'अधर्म' कहते हैं। नामसंकीर्तन का गजर सुन कर ये उसे 'महापाप' कहते हैं। जो इस
प्रकार हरिनाम की निन्दा तथा उसके प्रति दुर्बुद्धि रखने वाला होगा उसे वास्तव में दुष्ट और भजन वैरी चांडाल
समझना चाहिये।
वदन्ति तेऽन्योन्यमुपासितस्त्रियो गृहेषु मैथुन्यसुखेषु चाशिषः ।
यजन्त्यसृष्टान्नविधानदक्षिणं वृत्त्यै परं घ्नन्ति पशूनतद्विदः ॥ ८ ॥
स्त्रीकाम में बेचैन, मैथुन के सिवा अन्य कहीं सुख नहीं है इस भ्रमात्मक कामासक्ति से मूर्ख बने लोग
निश्चय ही स्त्रियों की ही उपासना करते हैं। इस प्रकार मूर्ख लोग शब्दचातुरी से अपनी मूर्खता का वर्णन करते हैं
कि विविध प्रकार की भोगविधि से स्त्रियों का उपभोग करने में ही मनुष्य जन्म की सिद्धि है। स्त्री समागम में जो
प्रत्यक्ष सुख मिलता है उसे जो छुड़ाना चाहते हैं वे महामूर्ख हैं। उन महामूर्खों ने वैराग्य के नाम पर अनेक लोगों
को ठगा है। घर के अनेक भोगविलास और सुन्दर स्त्री को छोड़कर जिन्हें वैराग्य की उत्कट इच्छा होती है, उन्हें
उनका कर्म ही सजा देता है और उनका भाग्य ही उनका सर्वस्व लूट कर उन्हें जंगल में भेजता है। क्या
गृहस्थाश्रम में भगवान नहीं हैं? इसीलिये पागल की तरह जंगल की ओर दौड़ते हैं ? ईश्वर यदि जंगल में ही
होता तो हिरन, खरगोश और व्याघ्र क्यों नहीं तर जाते ? आसन पर बैठ कर ध्यान करने से ही यदि ईश्वर की
प्राप्ति होती तो शुतुरमुर्ग के झुण्डों का क्यों नहीं उसी क्षण उद्धार हो जाता ? एकान्त गुफा में रहकर यदि ईश्वर
की प्राप्ति सम्भव होती तो बिल में रहने वाले चूहे भवसागर पार न कर चीं-चीं करते क्यों फिरते ? ईश्वर बहुत
बड़ा सर्वज्ञ है। उसने पशु-पक्षियों के युगल ही बना दिये हैं लेकिन लोगों ने उस परमेश्वर को ही पागल बनाकर
सर्वसंगपरित्याग की महिमा इतनी बढ़ा दी है। 'आनन्द का स्थान जननेन्द्रिय है' यह ईश्वर का ही वेद में वचन
है लेकिन अज्ञानी लोग उसकी परवाह न कर त्याग को ही महिमामण्डित करते हैं। ईश्वर ने ही मैथुन में
परमानन्द भर दिया है लेकिन मूर्ख लोग उसका भी त्याग कर वैराग्य लेकर संन्यासी बनते हैं। संसार में जो पागल
हैं वही स्वयं संन्यासी होते हैं। भगवान ही उन्हें दण्ड देकर घर-घर भिक्षा माँगने के लिये भेजता है। अपनी स्त्री
को त्याग कर जो कर्म छोड़कर संन्यासी बनते हैं उन्हें स्त्री शाप की बाधा होकर पेट भर भीख भी नहीं मिलती।
उन्हें यह दण्ड मिला है। मूंछे और सिर मुंडवा कर भगवा वस्त्र लपेट कर घूमना यह विडम्बना भी स्त्री शाप के
ही कारण है। दोनों हाथों में ढेर सारी मिट्टी लेकर वे गुदा में लगाते हैं और तीनों पहर गोता लगाते हैं। ऐसा
दण्ड उन्हें स्त्रीशाप के ही कारण मिला है। चूतड में लंगोटी लगा दी, हाथ में झोली लटका दी, तिस पर हाथ में
दण्ड देकर स्त्री शाप के कारण भीख माँगने के लिए भेज दिया। स्त्री सुख जैसा कोई सुख नहीं है और स्त्री त्याग
जैसा कोई पातक नहीं है यही न समझने के कारण अनेक मूर्खों ने वैराग्यरूप से सर्वसंगपरित्याग कर स्वयं दण्ड
भुगत लिया है। स्त्री संग के सिवा अन्य कितने ही सुख क्यों न हों लेकिन वे उद्वेगरूप ही हैं। सौभाग्य से जो
भाग्यसम्पन्न हैं वही स्त्री संगति से अनेक प्रकार के सुख विलास भोगते हैं। सदासर्वदा इच्छित भोग प्राप्त होना
यही ईश्वर का प्रसाद है और उसका त्याग करना यही ईश्वर का क्षोभ है। प्रत्यक्ष दिखायी देने वाले स्त्रियादि
भोग छोड़ कर मोक्ष की बात करना ही झूठ है। वेदों के वैराग्यवाद ने बेचारे भोले-भाले लोगों का विनाश कर

पंचम अध्याय १९९
दिया है। इस प्रकार की परस्पर चर्चा करने के बाद वे कहते हैं " 'गोविन्दा ! हमें कभी त्याग करने की बुद्धि न
देना। सर्वस्व का त्याग कर भीख माँगने से मर जाना अच्छा है। मुक्ति तो किसी ने नहीं देखी है लेकिन आज की
विपत्ति तो अभी दिखायी पड़ती है। किसी को मुक्ति प्राप्त हुई दिखायी देती, कहीं दिखायी पड़ती तो उसे सच
माना जा सकता था, लेकिन वैसी बात नहीं है, इसलिये वैराग्य से सर्वस्व का त्याग करने की बात व्यर्थ है।' ' इस
प्रकार त्याग की निन्दा कर वे हमेशा भोग की ही बात करते हैं और परस्पर इसी प्रकार का आशीर्वाद देते हैं।
स्त्रीसुख को ही अत्यन्त श्रेष्ठ मानकर हमेशा स्त्रैण बन कर रहते हैं। फिर क्या पूछना ? जागृति में, स्वप्न में तथा
सुषुप्तावस्था में सदा स्त्री का ही ध्यान करते हैं। न सद्गुरु का भजन करते हैं, न बड़ों की पूजा, न अतिथि को
अन्नदान, हमेशा स्त्रियों के अधीन रहते हैं। कहीं स्त्री के मन को ठेस न लगे, कभी स्त्री के वचन का उल्लंघन न
हो, नित्य स्त्री का ही अनुसंधान कर उसके अनुसार आचरण करते हैं। हमेशा सद्भाव से स्त्री की ही आराधना
करना। न कुलदेवता का ध्यान, न कुलवृत्ति की चिन्ता, न माता, पिता अथवा सद्गुरु की भक्ति। रुपया, पैसा सब
कुछ पत्नी के अधीन सौंप कर स्वयं उसके अधीन होकर रहते हैं। ऐसे ये स्त्रीलंपट लोग स्त्रीभोग भोगने के
उद्देश्य से द्रव्यार्जन करने के लिये केवल अहंकारवश उदरभरण के लिये ही यज्ञयाग का प्रारम्भ करते हैं। यज्ञ से
मुझे सभी प्रकार की सिद्धि प्राप्त हो ऐसा विचार भी उस दंभी के मन में नहीं रहता। केवल तात्कालिक निर्वाह
का साधन मिले इसी युक्ति की योजना की रहती है। यज्ञ की दीक्षा लेकर हाथ में यज्ञ का कंगन पहनने से
समाज में मेरी प्रतिष्ठा बढ़ेगी, मैं बड़े-बड़े लोगों के बीच पूजनीय बनूँगा, मुझे अग्रपूजा का सम्मान प्राप्त होगा
ऐसी उत्कट इच्छा मन में रखकर ही वह यज्ञ का प्रारम्भ करता है। निर्वाह तथा प्रतिष्ठा के अनेक विचारों की
योजना मन में पहले से ही करके रखता है और फिर यज्ञयाग की शुरुआत करता है। लेकिन इस काम में भी धन
कमाने का ही उसका दृढ़ निश्चय रहता है। विधिविधान की ओर उसकी दृष्टि नहीं रहती। शुद्ध मंत्रोच्चार के प्रति
आदर नहीं रहता। अन्न को बिना पकाये, सूखे अनाज से ही वह हवन करता है। मैं स्वयं यज्ञ कर रहा हूँ इस
प्रकार वह जनता में प्रचार करता है और यज्ञ के बहाने अपने कुशल मंगल को देखता है। स्वयं तो विधि विधान
नहीं जानता लेकिन जो जानते हैं उनसे भी नहीं पूछता। लेकिन ऐसे शठ, ढोंगी लोग पशु को मारने के लिये
उद्यत हो जाते हैं। फिर यज्ञ का पुरोडाश अर्थात् पशु के मांस का हवन द्रव्य शेष मजे में ग्रहण करते हैं और
अपने पवित्र होने की, निर्दोष होने की घोषणा करते हैं। जहाँ देवता के आवाहन और विसर्जन का ही ठिकाना
नहीं है वहाँ पूजा और दक्षिणा किसे दी जाये ? हाँ, अपने ज्ञान के अभिमान से सत्पात्र का अनादर और अवहेलना
अवश्य करते हैं। केवल उपजीविका के लिये पशु की हिंसा करने लगते हैं और स्वयं याज्ञिक-यज्ञकर्ता होने का
ढिंढोरा पीटते हैं। केवल जीविका के उपार्जन के लिये अविधि से हिंसा करते हैं। इससे मुझे पाप लगेगा ऐसी
चिन्ता भी उसके मन को नहीं छूती।
श्रिया विभूत्याऽभिजनेन विद्यया त्यागेन रूपेण बलेन कर्मणा।
जातस्मयेनान्धधियः सहेश्वरान् सतोऽवमन्यन्ति हरिप्रियान् खलाः ॥ ९॥
ऐसा क्रम चलता रहता है। तिस पर यदि और सम्पत्ति मिल जाय तो फिर क्या पूछना ? मदमस्त हाथी की
तरह वह घमण्ड में चूर होकर डोलने लगता है अथवा नाले में बाढ़ आने पर वह जिस प्रकार सूखे पेड़ों को
बहा ले जाता है अथवा वानर के मुँह में शराब लगने पर वह जिस प्रकार बहक कर बड़बड़ाने लगता है उसी
प्रकार सच्चा ज्ञाता मैं हूँ, यह समझ कर वह उलटा-सीधा नाचने लगता है। मेरे सामने दूसरा कोई ज्ञानी है ही

१२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
कौन ? और कहीं सौभाग्य से सुवर्ण, मोती, रत्न आदि मूल्यवान चीजें भण्डारगृह में आ जाएँ और घर के परिसर
में हाथी, घोड़े, पालकी आदि आ जाएँ तो फिर और क्या चाहिये ? वह घमण्ड के कारण इन्द्र के मस्तक पर
लात मारने के लिए भी तैयार हो जाता है। "यज्ञयाग में स्वाहाकार प्राप्त करने के लिए इन्द्र मुझ से आशा करता
है तो फिर उसे मुझसे श्रेष्ठ क्यों समझा जाय ? इसके उपरान्त शिष्य, सगे-सम्बन्धी, सज्जन एवं सेवकजन उसके
चारों तरफ इकट्ठा हो जाएँ तो फिर त्रिभुवन में मुझ जैसा कोई समर्थ नहीं है ऐसा ही वह समझने लगता है।
काँटों से भरे पेड़ के चारों ओर जिस प्रकार हरियाली लिपटी रहती है उसी प्रकार अपने चारों ओर शिष्यों का
जमावड़ा देखकर घमण्ड में वह ध्रुवमण्डल को भी अपने पैरों तले ही समझता है। बिच्छू में विष कम रहता है
लेकिन उसका दर्द भयंकर रहता है उसी प्रकार इसके पास विद्या कम लेकिन घमण्ड मानों बहता रहता है।
जुगनू जिस प्रकार अँधेरे में अपने तेज की चमक दिखाता है, उसी प्रकार वह अज्ञानी लोगों में अपनी सर्वज्ञता
तथा प्रतिष्ठा प्रदर्शित करने लगता है। पर निकली हुई चिउंटी जिस प्रकार गरुड़ के मस्तक पर पैर धरने का
प्रयास करती है उसी प्रकार यह अल्पज्ञ अपनी अल्प विद्या के घमण्ड में बृहस्पति की भी परवाह नहीं करता।
ताँबे के पैसे का एक सिक्का दान में देकर वह उदारता में बली को भी अपने से कम मानता है। वह कहता
है—दानियों में कर्ण को महान समझा जाता है लेकिन हमारे सामने वह नहीं टिक सकता। कर्ण को हर रोज
८०००० तोला सुवर्ण दान के लिये मिलता था, उसकी और हमारी बराबरी कैसी ? जिसके हाथ से हमेशा
अपकार ही होता है उसके हाथ से कभी-कभी उपकार भी हो जाता है लेकिन इतनी सी बात से उसे
गलतफहमी हो जाती है और वह अपना सारा संचित पुण्य खो बैठता है। इस प्रकार जरा से दान से दातृत्व की
शेखी बघारते हुए अपने ही मुँह से मेघ की तरह गर्जना करने लगता है। अपने सौन्दर्य के अभिमान में वह
साक्षात मदन का भी उपहास करने लगता है। सौन्दर्य केवल मुझ में ही है और मेरी बराबरी करने वाला कोई
दूसरा नहीं है ऐसी भाषा वह बोलने लगता है। कौआ अपने सौन्दर्य के आगे राजहंस को भी हेय समझता है
अथवा कछुई अपने को सीता से भी सुन्दर समझती है या जिस प्रकार सामने हरा भरा जंगल देखकर भैंसा
उन्मत्त हो जाता है उसी प्रकार अपने सौन्दर्य के गर्व से वह फूल जाता है और इसके बाद यदि उसके हाथों कोई
पराक्रम हो जाय तो फिर क्या पूछना ? कहता है मेरे सामने श्रीराम, परशुराम और बलराम क्या हैं ? मानों गोग्रहण
के युद्ध में उत्तराने किये हुए पराक्रम का वर्णन हो रहा हो। या फिर जिस प्रकार शारीरिक बल के उन्माद से
जंगली सुअर किसी को कुछ नहीं समझता उसी प्रकार वह शरीर सामर्थ्य की घमण्ड में मदमाता रहता है। ऐसे
लोग प्रारम्भ से ही अपने को ज्ञानी समझते हैं, और अब 'याज्ञिक' कहला कर प्रसिद्ध होते हैं। इसलिए स्वयं
यज्ञकर्म कर लोगों को विस्मित कर देते हैं। मिलने के लिये आने वाले लोगों के सामने अपने कार्यों की बड़ाई
करते हैं तथा अपनी कीर्ति बढ़ाने के लिये अनेक उपाय कर लोगों को बताते हैं। उसके ऐसे मिथ्या कर्माचार में
भी ज्ञातृत्व का अभिमान भरा रहता है। जिस प्रकार उल्लू अँधेरे में बाहर निकलता है उसी प्रकार ये अज्ञजनों के
बीच आत्मस्तुति से विचरते रहते हैं। बकरी की लेंडी जलने पर प्रकाश नहीं देती लेकिन धुआँ फैलाती है, उसी
प्रकार अनेक प्रकार के दंभ तथा गर्व के उन्माद से उनकी सद्बुद्धि अन्धी होकर वह केवल साधुओं की ही नहीं
बल्कि ईश्वर की भी निन्दा करता फिरता है। जिस प्रकार पीलिया होने पर सब कुछ पीला ही दिखायी पड़ने
लगता है उसी प्रकार निन्दावृत्ति तथा घमण्ड के अतिरेक से उसकी बुद्धि की प्रखरता मन्द होने लगती है। वे
निर्दोषी को भी दोष लगाने लगते हैं और निष्पाप को भी पापी समझने लगते हैं। वे कहते हैं—जो समस्त
योगियों का मुकुटमणि है, जिसे धूर्जटी अर्थात् शंकर कहते हैं, उसका व्यवहार देखने पर वह नितांत मलिन

पंचम अध्याय १२१
दिखायी देता है। उमा क्रोध में अग्नि में कूद पड़ी इसलिये उतने याज्ञिक का शिरच्छेद किया और वह कामांध
तो इतना था कि मोहिनी को प्राप्त करने के लिये वह उसके पीछे नग्न होकर दौड़ने लगा। विष्णु तो हमेशा से
ही कपटी था उसमें कोई भी अच्छी बात नहीं दिखायी देतीं। बेचारी वृन्दा कितनी पतिव्रता थी लेकिन उसने उसे
भी व्यभिचारिणी बनाकर छोड़ा। ऐसा व्यभिचारी विष्णु जिस वृन्दा के वृन्दावन में वास करता है, उस वन में जो
जटादाढीधारी लोक एकत्र होते हैं उन्हें भी हम साधु कैसे मानें ? यदि सनत्कुमार को साधु कहा जाय तो उन्हें भी
वैकुण्ठ में अत्यधिक क्रोध आया और उन्होंने श्रीहरि के सेवक जय विजय वीर को अधिक शब्द कहने के
कारण शाप दे डाला। यदि ब्रह्मदेव को श्रेष्ठ कहें तो वह भी हीन और निर्लज्ज है। शंकर के विवाह में पार्वती
को देखकर 'सावधान' कहते ही उसका वीर्य स्खलित हो गया। नारद बहुत बड़ा ब्रह्मचारी था लेकिन उसने भी
जब कृष्ण से उसकी स्त्री माँगी तो कृष्ण ने उसे अच्छी तरह फँसाया। वह स्नान कर रहा था उस समय नारद
की नारदी बनकर साठ पुत्रों को जन्म दिया। जिस युधिष्ठिर को साक्षात 'धर्म' कहते हैं वह भी निखालस
अधर्मी है क्योंकि उसने गोत्रजों की हत्या का प्रयास किया। व्यास तो जारिणी का पुत्र था और उसी कर्म के
कारण पराशर भी हीन सिद्ध होता है। वसिष्ठ और विश्वामित्र के परस्पर द्वेष और ईर्ष्या की बात ही न करें।
यदि दुर्वासा को साधु कहें तो वह भी अम्बरीष का छल करने गया था। प्रह्लाद ने तो खुलेआम पितृद्रोह किया,
फिर उसे भी साधु कैसे कहा जाय ? तो फिर वर्तमान काल में साधु कोई नहीं है ऐसा यदि वे सोचते हैं तो इसमें
आश्चर्य किस बात का ? वे कहते हैं "कुछ तो अद्भुत सुनकर लोग एक के पीछे दौड़ने लगते हैं। कुछ लोग
पेट के लिए कुछ तो बकते रहते हैं। कोई आसन पर बैठ कर मुद्रा लगाते हैं, कोई बगुले की तरह ध्यान लगाकर
बैठते हैं लेकिन मन जिस पर विश्वास करे ऐसा एक भी साधु नहीं दिखायी देता।" इस प्रकार वे जानबूझ कर
साधुओं की निन्दा करते रहते हैं। संसार में कोई साधु भी है इस बात पर उन्हें विश्वास नहीं होता। जिस प्रकार
बकरे के सामने दर्पण रखने से वह आगबबूला हो उठता है उसी प्रकार साधु का नाम सुनते ही उसका पारा चढ़
जाता है। जो हरि के अत्यन्त प्रिय हैं उनसे वह घृणा करता है। जिस ईश्वर के आदेश से वे विचरण करते हैं
उसे ईश्वर मानने को वे तैयार नहीं होते। हे राजा ! ऐसे उस ईश्वर के बारे में तुम्हें बताता हूँ।
सर्वेषु शश्वत्तनुभृत्स्ववस्थितं यथा स्वमात्मानमभीष्टमीश्वरम्।
वेदोपगीतं च न शृण्वतेऽबुधा मनोरथानां प्रवदन्ति वार्तया ॥ १०॥
जो समस्त प्राणियों में भेदभावरहित तथा सदैव अखण्ड भरा रहता है, जो सब में समसमान रूप से रहता
है, कल्पांत में भी कभी न्यून नहीं होता, जो सब में सर्वकाल रहता है लेकिन व्यापकता उसे स्पर्श नहीं करती,
जिस प्रकार कमलपत्र जल में रहते हुए भी उससे अलिप्त रहता है उसी प्रकार सभी लोगों में रहते हुए भी उसका
लोकव्यवहार से सम्बन्ध नहीं रहता। हे राजेश्वर ! आकाश जिस प्रकार सभी पदार्थों को अंतर्बाह्य व्यापते हुए भी
उनसे अलिप्त रहता है उसी प्रकार अलिप्तता कायम रखते हुए वह अनन्त ब्रह्माण्ड की रचना करता है और
अकर्ता रहते हुए भी उन असंख्य ब्रह्माण्डों को अपने स्वरूप में चलाता है। इसीलिये उसे वेदों में अंतर्यामी के
नाम से जाना जाता है। वही सभी के हृदयों में स्थित चैतन्य के रूप में पहचाना जाता है। ऐसे उस ईश्वर का
निरन्तन ध्यान किया जाय, मन में चाह रखकर मुख से उसका नाम लिया जाय तो वह अभीष्ट पूर्ति की अखण्ड
वर्षा करता है। उस ईश्वर की कथाओं का गायन करने से समस्त संकटों का नाश होता है। उसे देखने से वह
प्रसन्न होकर स्वानंद की वर्षा करता है। सारांश यह कि सुखदाता भी वही है और शास्ता भी वही है। काल का

१२२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
नियंता भी वही है। उसके भय से काल भी अपनी इच्छा से अपनी सत्ता नहीं चला सकता। उसके भय से
प्राणियों का श्वासोच्छ्वास नियमित समय से चलता रहता है, उसके भय से वायु भी आकाश में मंद गति से तथा
निश्चित परिमाण में बहता रहता है। उसके भय से पृथ्वी जल में रहते हुए भी समुद्र उसे अपने में घोल नहीं
सकता। उसकी आज्ञा से सूर्य ठीक ढंग से दिनमान चलाता है और जिसकी पुरातन आज्ञा से सूर्य अपनी सीमा
का उल्लंघन नहीं करता। वेद जिसका सदा गायन करते हैं, उपनिषद जिसका वर्णन करते हैं, जिसकी यशगाथा
दुष्ट बुद्धि के लोग कभी कान से भी नहीं सुनते। जिसके नाम का स्मरण करने मात्र से समस्त पापों का विनाश
होता है, यम भी जिसके चरण छूता है और जो भक्तों को जन्ममरण से मुक्त करता है, जिसका चरित्र कर्णपथ पर
पड़ते ही विकल्प रसातल में पहुँच जाते हैं और देखते-देखते परब्रह्म से एकत्व प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार यह
पवित्रता की मूर्ति जिसका वेद सर्वकाल स्तवन करते हैं, उसकी कीर्ति का श्रवण न कर ये अभागे लोग केवल
मनोरथ की बातें करते रहते हैं। रीछ जब अपने गुर्राने में मगन रहता है उस समय उसे जिस प्रकार रणभेरी की
आवाज नहीं सुनायी देती उसी तरह हरि के गुणानुवाद न सुन वे अत्यन्त रुचि से विषय की ही चर्चा करते रहते
हैं। इसीलिये वे नितांत मूर्ख, उद्धत तथा हमेशा सुस्त और विषयांध होकर क्षुब्ध बने रहते हैं।
लोके व्यवायामिषमद्यसेवा नित्यास्तु जन्तोर्न हि तत्र चोदना।
व्यवस्थितिस्तेषु विवाहयज्ञसुराग्रहैरासु निवृत्तिरिष्टा ॥ ११ ॥
वेदों द्वारा प्रेरित न होते हुए भी सभी लोगों की सदासर्वकाल विषय के प्रति सहज ही वासना रहती है।
मांसभक्षण, मद्यपान तथा स्त्रीसहवास इन बातों के प्रति लोगों की हमेशा तीव्र वासना रहती ही है। उसमें सेवन
करने योग्य क्या है और क्या नहीं है इसका विचार कौन करता फिरेगा ? एक बार विषय का चस्का लग जाय तो
फिर वे लोग अनर्थ करने के लिये आगापीछा नहीं देखेंगे। कपास में जब आग लग जाती है तो वह बुझने का
नाम नहीं लेती उसी प्रकार विषय लंपट पुरुष के मन में विवेक सहसा उत्पन्न नहीं होता। मछली जब बंसी में
लगे मांस की ओर आकर्षित होती है तो फिर वह अपनी मृत्यु के बारे में भूल जाती है या बन्दर मुट्ठी भर चने के
लालच में स्वयमेव नलिका में फँस जाता है या जिस प्रकार दूध मिल जाने पर बिल्ली इस बात का विचार नहीं
करती कि वह ब्राह्मण के घर का है या अंत्यज के घर का, उसी प्रकार विषय में उन्मत्त लोग क्या सेवन करने
योग्य हैं और क्या नहीं हैं इसका विचार नहीं करते। इस प्रकार बढ़ती हुई विषय वासना के कारण कहीं भविष्य
में वर्ण समस्या न उत्पन्न हो इसलिये वेदों ने धर्म और आश्रम इस प्रकार विभाग बना दिये। पृथ्वी का पृष्ठ भाग
विशाल होने के कारण वहाँ सप्तद्वीप बना कर उन भिन्न-भिन्न विभागों पर विभिन्न अधिकारियों की व्यवस्था की।
वर्षा चारों ओर नियोजित ढंग से नहीं होती इसलिये वर्षा का जल बाँध बनाकर तालाबों तथा जलाशयों में एकत्र
करते हैं। फिर खेती के लिये उस जल को उपलब्ध कराने के लिये नहरें बनाते हैं। वाद्यकार जिस प्रकार बाँस से
वाद्य तैयार करते हैं और फिर विविध प्रकार की मधुर ध्वनि से उस वाद्य को बजाया जाता है उसी प्रकार विषय
की लत से कहीं लोग उच्छृंखल न हो जाएँ इसलिये वेदों ने वेदों ने नियम बना दिये हैं। उस वेदाज्ञा के बारे में
तुम्हें बताता हूँ। योनिभ्रष्टों पर नियंत्रण रखने के लिये स्त्रीसंग के लिये विवाह संस्कार का बन्धन लगाया तथा
विशिष्ट वर्णों की योजना कर उस पर नियंत्रण किया। यदि ब्राह्मण धोबिन के पास जाता है तो उसे वह संभोग
कड़ुआ नहीं लगता अथवा यदि धोबी ब्राह्मणी के पास जाता है तो वह स्त्रीसंग उसे तीता नहीं लगता। किन्तु चाहे
जो स्त्री और चाहे जिस पुरुष का संयोग होने से वर्णसंकर उत्पन्न होता है इसे टालने के लिये वेदों ने विवाह की

पंचम अध्याय १२३
व्यवस्था की। धर्मपत्नी बनाने के लिये पाणिग्रहण करना हो तो सजातियों में ही विवाह होना चाहिये ऐसा
निश्चित किया गया है। उसमें भी स्वगोत्र में विवाह नहीं करना चाहिये और परगोत्र में भी सप्तम पंचम छोड़कर
(बाप की सात तथा माँ की पाँच पीढ़ियाँ त्याग कर) विवाह करना चाहिये। तीन वर्ण और तीन वेद छोड़कर
अर्थात् उनमें मिश्रता न उत्पन्न हो इसका ध्यान रखकर सवेद तथा सवर्ण में ही विवाह करना चाहिये ऐसा निश्चय
वेदों ने कर रखा है। जो सवेद और सवर्ण हो और जिसे अभी रजोदर्शन न हुआ हो ऐसी कन्या उसके पिता से
माँग कर ही यथाविधि विवाह करना चाहिये। धर्म, अर्थ और काम किसी अन्य स्त्री के साथ नहीं करूँगा यह
शपथ लेकर ही वेदोक्त रीति से विवाह करना पड़ता है। वधुवर द्वारा पाणिग्रहण करते समय ब्राह्मण, देवतागण
तथा अग्नि साक्षी के रूप में रहते हैं इसलिये अन्य स्त्रियों को माता के समान मानना चाहिये। वेदों ने पुरुष के
लिये स्वस्त्रीगमन ही निश्चित कर रखा है। इस प्रकार विवाह की व्यवस्था कर वेदों ने यह आज्ञा दी है कि अन्य
सभी स्त्रियों को त्याग कर केवल अपनी स्त्री के साथ ही रमण करना चाहिये। दिन में स्त्रीसंग नहीं करना
चाहिये, रात्रि में भी पहला और अन्तिम पहर छोड़ कर मध्यरात्रि में ही संभोग करना उचित है। अपनी स्त्री से
संग करना चाहिये यह निश्चित होने पर भी रातभर संग करना उचित नहीं है। केवल सन्तानोत्पत्ति के ही लिये
स्त्रीसंग करना चाहिये और वह भी उस समय जब ऋतुकाल चल रहा हो। जो पुरुष ऋतुकाल में स्वस्त्री से भोग
करते हैं वे सचमुच ब्रह्मचारी ही हैं। वेद निवृत्ति की ही संस्तुति करते हैं। उन्होंने त्याग के साथ भोग का नियमन
किया है। 'आत्मा वैपुत्रनामासि' पुत्र के रूप में हम स्वयं ही जन्म लेते हैं। इसलिये स्त्री को पुत्रोत्पत्ति होने पर
उसके साथ सहवास नहीं करना चाहिये। यह कहकर वेद धीरे-धीरे विषय का त्याग कराता है। अब मांस खाने
पर वेदों ने किस प्रकार प्रतिबन्ध लगाया जरा देखें। पशु हिंसा न हो इसलिये उन्होंने उसमें अनेक संकट और
प्रतिबन्ध पहले से ही लगा रखे हैं। जिह्वा की रुचि के लिये अथवा स्वर्ग प्राप्ति की आशा से जो कोई पशु का
वध करेंगे उन पुरुषों को नरक प्राप्त होता है। निष्काम कर्म के लिये पशु का वध किया लेकिन वह निष्काम
कहाँ हुआ ? इसलिये वेदों का यह कहना है कि सभी धर्मों में अहिंसा प्रमुख है। रोज-रोज मांसभक्षण न कर
सके इसलिये वेदों ने यज्ञ में बचा हुआ अवशेष ग्रहण करने के लिये कहा है और वह भी बिलकुल परिमित
मात्रा में कह कर वेदों ने मांसभक्षण का निषेध ही किया है। अब मद्यपान के नियंत्रण के सम्बन्ध में बताते हैं।
'सौत्रामणि' नामक यज्ञ कर फिर मद्यपान करना चाहिये ऐसी वेद की आज्ञा को जो मानता है वह स्वधर्म से च्युत
हो गया ऐसा समझना चाहिये क्योंकि जिस कर्म में मद्यपान होता है उसे यदि स्वधर्म कहा जाय तो जीभ टूट कर
गिर जायेगी। बेचारे लंपट बने हुए लोग वेदों को विषयवासना की ओर घसीटते हैं। 'सौत्रामणि' यज्ञ यदि किया
हो तो भी स्वयं मद्यपान नहीं करना चाहिये, यज्ञ में बचा हुआ मद्य केवल सूँघना चाहिये लेकिन मुँह में नहीं
डालना चाहिये। मैथुन, मांस भक्षण तथा सुरापान ये विषयों के तीन प्रकार हैं, उनका त्याग करना चाहिये यही
निश्चित अर्थ है। त्याग ही वेदों का वास्तविक उद्देश्य है। वर्णाश्रम धर्म के माध्यम से वेद विषयों से निवृत्त होने
की ही बात कहते हैं। वह कभी भी विषयासक्ति की बात नहीं करता। अपना धन खर्च कर विवाह के लिये यज्ञ
करने तथा मद्य, मांस और मैथुन की बात वेद करें यह सम्भव ही नहीं है।
धनं च धर्मैकफलं यतो वै ज्ञानं सविज्ञानमनुपशान्ति।
गृहेषु युञ्जन्ति कलेवरस्य मृत्युं न पश्यन्ति दुरन्तवीर्यम् ॥ १२ ॥
ज्ञानाभिमानी लोग भगवान की कथा न सुनने के कारण त्रस्त रहते हैं। वास्तव में वह धन से परमार्थ की

१२४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
आशा करता है लेकिन वह स्वधर्म के अनुसार धन का विनियोग नहीं करता, विषयोपभोग की ही ओर करता है।
वही धन यदि धर्म के लिये खर्च करना हो तो एक कौड़ी के लिये भी उनके प्राण छूटने लगते हैं। धन के रूप में
साक्षात धर्म ही स्वयं प्रकट होता रहता है। जिस प्रकार भाग्यवान के सहारे निधि हाथ लगती है। उसी प्रकार धन
से धर्म की प्राप्ति होती है। जहाँ बीज रहता है वहाँ वृक्ष के साथ-साथ फल भी उपस्थित रहता है। जहाँ चन्दन
रहता है वहाँ परिमल भी रहता है। उसी प्रकार जल में समस्त स्वाद उपस्थित रहते हैं। जहाँ देह है वहाँ कर्म
रहता है, जहाँ रूप है वहाँ नाम रहता है उसी प्रकार जहाँ धन है वहाँ अच्छे से अच्छे धर्म निवास करते हैं।
एकादशीव्रत के बहाने गीत नृत्य करते जागरण करने से सन्तुष्ट होने वाले देवता द्रव्य के ही कारण भक्तों को
प्राप्त होता है। इस प्रकार धन के साथ-साथ परम धर्म भी पल्ले पड़ता है और जहाँ धर्म हो वहाँ ज्ञानसहित
विज्ञान प्राप्त होता है। चन्द्रमा के कारण ही कलाएँ बढ़ती हैं, जीवन के कारण वात्सल्य बढ़ता है उसी प्रकार
धर्मशील मनुष्य के घर में धन के कारण धर्म का अनुष्ठान दिखायी देता है। जहाँ धर्म रहता है वहाँ शुद्ध ज्ञान
उपस्थित रहता है, ज्ञान जहाँ रहता है वहाँ विज्ञान का निवास रहता है और जहाँ विज्ञान रहता है वहाँ शान्ति और
समाधान का निवास रहता है। इतना फल जिस धन से प्राप्त होता है उसे मूर्ख लोग भोग विलास में उड़ा देते हैं।
देह के आकर्षण से लोग पागल हो जाते हैं और अपनी मृत्यु को भी भूल जाते हैं। वेदों के अनुसार जलते घर में
देह रखने वाला तथा मरने वाले देह को शृंगार करने वाला डूब जाता है, लेकिन वेद की यह बात कोई नहीं
सुनता। जन्म लेते ही काल देह को ग्रसित करता रहता है। पता नहीं देह के आकर्षण में लीन होकर लोग नित्य
आने वाली मृत्यु को कैसे भूल जाते हैं ? सबकी आँखों के सामने काल बाल्यावस्था को ग्रस लेता है और फिर
युवावस्था की गर्दन मरोड़ कर उसे भी निगल लेता है। यौवन को निगलने के बाद वह थर-थर कँपाने वाला
वार्धक्य दे देता है। काल का यह कार्य-कौशल ब्रह्मदेवादि देवताओं के लिये भी दुर्धर है। उसकी एक चपेट में
जहाँ अमर देवताओं को भी मृत्यु आ जाती है वहाँ मूर्ख लोग निश्चयपूर्वक अपने जीवन को अक्षय मान लेते हैं।
जब देह ही शाश्वत नहीं है तो उसके भोग किस तरह शाश्वत हो सकते हैं ? लेकिन विषय के लिये लोग धन
खर्च कर भ्रांत हो गये हैं। इस प्रकार सांसारिक भोग नाशवान हैं इसलिये उनका भोग करने के लिये स्वर्ग में जाने
की इच्छा से वे यज्ञ करने लगते हैं। सुख प्राप्त करने के लिये जिस प्रकार पतंगा आग में कूद पड़ता है उसी
प्रकार ये लोग इस लोक और परलोक के भोग की आसक्ति से अधःपतन की ओर अग्रसर होते हैं। "स्त्री, मांस
और मद्यपान ये भोज जब वेदोक्त हैं तो उनके कारण पतन कैसा ?" यह कहने वाले मूर्खों को वेद का विधान ही
समझ में नहीं आता।
यद् घ्राणभक्षो विहितः सुरायास्तथा पशोरालभनं न हिंसा।
एवं व्यवायः प्रजया न रत्या इमं विशुद्धं न विदुः स्वधर्मम्॥ १३॥
वेदविहित कर्माचरण करने से उससे पतन कभी नहीं होगा लेकिन यदि वेद विधान में कोई त्रुटि हो जाय
तो बड़ा ज्ञानी होने पर भी उसका पतन होता है। वेदों का अर्थवाद (स्तुतिवाद) सुनकर मन में सुखविलास की
आशा करते हैं और भोग की आशा से यज्ञ के बहाने पशु हिंसा के लिये तत्पर हो उठते हैं। वेदों ने जिस
'आलभन' कहा है उसे ये लोग 'पशुहनन' कहते हैं। यह सकाम लोगों का ही विधान है। निष्काम लोग कभी
भी पशुहिंसा नहीं करेंगे। निष्काम स्वधर्म के लिये यज्ञायाग करते हैं उसमें पशु का केवल आलभन करना होता
है, वध कभी नहीं किया जाता। पशु का वध नहीं किया जाता केवल देवता के प्रीत्यर्थ उसका स्पर्श करना

पंचम अध्याय १२५
चाहिये। इसी का नाम 'आलभन' है और यही निष्काम यज्ञाचरण है। हरिश्चन्द्र के यज्ञ में (वरुण को बलि देने
के लिये) 'शुनःशेप' नामक एक ऋषिपुत्र को लाया गया था उस समय (विश्वामित्र ने) उस पर शस्त्र से प्रहार
न कर केवल वेदोक्त विधि से ही यज्ञसिद्धि की गयी। वेदोक्त मंत्रों से समस्त देवताओं को प्रसन्न कर शुनःशेप
मुक्त हो गया ऐसी कथा ऋग्वेदार्थ ऐतरेय ब्राह्मण में आती है। इसलिये यज्ञ में पशु का वध बिलकुल नहीं करना
पड़ता। हरिश्चन्द्र ने यज्ञ के लिये पशु हिंसा वर्जित कर दी थी। इस पर मीमांसकों का ऐसा मत है कि देवताओं
के लिए पशु का वध करने को ही 'आलभन' कहना चाहिये और स्वर्ग प्राप्त करने के लिये यह आवश्यक ही
है। जो केवल मांसभक्षण के लिये पशु का वध करते हैं उन्हें ही हिंसा का पाप लगता है ऐसा मीमांसकों का मत
है किन्तु देवताओं के प्रीत्यर्थ पशु का वध करने से स्वर्गप्राप्ति भले ही हो लेकिन वह स्वर्गभोग कुछ काल के
बाद कर्मक्षय के साथ नष्ट हो जाता है। इसलिये यज्ञ करने वाले को भी हत्या का पाप लगता है। अब
'सौत्रामणि' यज्ञ करने पर पुरोणाश अर्थात् यज्ञ के अवशेष को केवल सूँघने के लिये कहा गया है किन्तु मद्य का
सेवन करने का विधान वेदों में नहीं है। सारांश, जिसमें पशु का वध होता है वह कर्म दोषपूर्ण है। उससे यज्ञ
करने वाले का अधःपतन होता है। वेदों ने पाणिग्रहण अर्थात् विवाह का विधान किया है। लेकिन वह केवल
संतानोत्पत्ति के लिये अपनी स्त्री के साथ गमन करने के लिये है। इसलिये केवल रतिसुख के लिये प्रतिदिन
स्त्रीसंग किया जाय इसकी आज्ञा वेदों ने नहीं दी है। मद्य, मांस और मैथुन इनका कोई स्वेच्छा से जी भर कर
उपभोग न करे अर्थात् स्वच्छंद भोग पर नियंत्रण करने के लिये वेदों ने विवाह विधि तथा यज्ञविधि की योजना
की है। ऐसे शुद्ध धर्म को न जान मूर्ख लोग यज्ञ का बहाना कर अधर्म की ओर प्रवृत्त होते हैं और काम्य कर्म
कर भ्रमयुक्त भोगों में प्रवृत्त होते हैं।
ये त्वनेवंविदोऽसन्तः स्तब्धाः सदभिमानिनः।
पशून् द्रुह्यन्ति विस्रब्धाःप्रेत्य खादन्ति ते च तान्॥ १४॥
ये लोग घमण्ड के अतिरेक के कारण स्वयं को अधिक बुद्धिमान समझ कर वेद का क्या विधान है इसका
विचार न कर अविधि से पशु की हिंसा करते हैं। केवल जारण मारण के घृणित प्रयोग से सारे भोग प्राप्त होते हैं
ऐसा मन में विचार कर स्वेच्छा से पशु की हिंसा करते हैं। इस प्रकार वे चोर रास्ते से, अकारण ही पशुओं का
वध करते हैं। ये यज्ञकर्ता जब मरते हैं तो यही पशु तेज छुरी लेकर उन्हें मारने के लिये आते हैं। सारांश, जिस
प्रकार प्राणी द्वारा खाया हुआ विष उसके प्राणों को ग्रस लेता है, उसी प्रकार जब यज्ञ करने वाले मर जाते हैं उस
समय जिन प्राणियों का उन्होंने भक्षण किया है वही पशु परलोक में उनका भक्षण करते हैं।
द्विषन्तः परकायेषु स्वात्मानं हरिमीश्वरम्।
मृतके सानुबन्धेऽस्मिन् बद्धस्नेहाः पतन्त्यधः ॥ १५॥
श्रीहरि जो परमात्मा है वह सभी के शरीर में अंतर्यामीरूप से निवास करता है इसलिये जो दूसरे का द्वेष करते
हैं वे एक तरह से हृदयस्थ परमात्मा का ही द्वेष करते हैं। सारांश जो दूसरों का विनाश करते हैं वे स्वयं ही अपना
नाश करते हैं तथा सपरिवार अधःपतन कीं ओर जाते हैं तथा उन्हें रौरव नरक प्राप्त होता है।
ये कैवल्यमसम्प्राप्ता ये चातीताश्च मूढताम्।
त्रैवर्गिका ह्यक्षणिका आत्मानं घातयन्ति ते ॥ १६ ॥
जो ज्ञानी हैं वे स्वयं ही तर जाते हैं और अज्ञानी ज्ञानियों की शरण में आते हैं इसलिये उनके वचन पर

१२६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
विश्वास करने से उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है। किन्तु जो अज्ञानी भी नहीं हैं और ज्ञानी भी नहीं हैं, जिन्हें केवल ज्ञान
का घमण्ड रहता है उनका मन विषय के प्रति क्षुब्ध होता रहता है। ऐसे ये पुरुष आत्मघाती हैं ऐसा समझना
चाहिये। केवल अर्थ और काम साधने के लिये जो अभिचार कर्म अर्थात् जारण-मारण आदि कर्म करते हैं वे
त्रैवर्णिक (द्विज) होते हुए भी उनका वही कर्म उनके लिये आत्मघाती सिद्ध होता है। हे राजा ! शरीर के सुख के
लिये जो व्यभिचार करते हैं, वे अपने उस कर्म से ही आत्मघात कर लेते हैं। जिस डाली पर बैठा है उसे जो
स्वयं ही तोड़ता है वह जिस प्रकार उस डाल के साथ गिर पड़ता है उसी प्रकार काम्यकर्म की आसक्ति से
उसका तत्काल अधःपात होता है।
एत आत्महनोऽशान्ता अज्ञाने ज्ञानमानिनः ।
सीदन्त्यकृतकृत्या वै कालध्वस्तमनोरथाः ॥ १७ ॥
अत्यधिक कामी, अत्यन्त क्रोधी तथा क्रूर कर्म करने वाले लोग स्वयं ही अपना विनाश और अकल्याण
कर लेते हैं। स्वयं अविधि से कर्म करते हैं और उसे ही शुद्ध विधि कहते हैं। अज्ञान का 'ज्ञान' के रूप में
प्रतिपादन करते हैं। जो काम्य कर्मों से छले गये, जिन्हें महामोह ने जकड़ लिया जो घमण्ड तथा दंभ से जकड़े
गये और जिन्हें कालसर्प ने निगल लिया है, गर्व आदि के ज्वर से जिसका मुँह कड़ुआ हो गया है वे विष का
सममारक विषय सुख का आनन्द से सेवन करते हैं। साथ ही अपने विषय के लिये अपने देह को ही सगा
मानकर युक्तिपूर्वक धन संग्रह करते हैं।
हित्वाऽत्यायासचरिता गृहापत्यसुहृच्छ्रियः ।
तमा विशन्त्यनिच्छन्तो वासुदेवपराङ्मुखाः ॥ १८ ॥
मृत्यु का सामना करते हुए अमीर लोग धन प्राप्त करते हैं, मकान, स्त्रियाँ, बच्चे तथा ऐसी अनेक वस्तुओं
का संग्रह करते हैं। कष्ट से प्राप्त किये हुए सारे भोगविलास छोड़कर अपने ज्ञान पर घमण्ड करने वाले लोगों को
उनका ज्ञानाभिमान 'अधतमस' नामक नरक में ढकेल देता है जहाँ अन्धकार की आँखें भी अन्धी हो जाती हैं
वहाँ मोहरूपी रात्रि का अन्धकार उस अधतम में मिलकर और भी भयंकर हो उठता है। उस अन्धकार को
प्रकाशित करने के लिये यदि सूर्य भी आये तो वह भी काला हो जायेगा। जहाँ गहरी मूढावस्था अत्यधिक मूढ़ता
को प्राप्त होती है, जहाँ सुषुप्ति भी सो जाती है, जहाँ आलस्य भी अलसा जाता है वहाँ निन्दा और क्रोध भी
स्थायी रूप से डेरा लगा कर बैठ जाते हैं। वहाँ भजन से विन्मुख होने वाले पुरुषों का अभिमान के कारण
अधःपतन होता है। गहरे पानी में डूबा हुआ पत्थर जिस प्रकार कभी भी बाहर नहीं निकल सकता उसी प्रकार वे
भी वहाँ से बाहर नहीं आ सकते। जो सदा वासुदेव से विमुख रहते हैं, जिन्हें हरि भजन में संतोष नहीं प्राप्त होता
उनकी इस प्रकार अधोमुख अवस्था होकर वे दुःख में छटपटाते रहते हैं। ऐसे अभक्तों की कथा सुनाने की
अपेक्षा मूक रहना अच्छा है। राजा ! तुमने पूछा ही था इसलिये उनकी स्थिति के बारे में आज इतना बोलना पड़ा
अन्यथा आज तक हममें से किसी ने भी अभक्तों के वर्णन से अपनी जिह्वा को अपवित्र नहीं किया। हे
राजाधिराज ! अब हम दोनों अर्थात् मैं वक्ता और आप श्रोतागण मिलकर 'राम राम राम राम' कहकर वाणी का
प्रायश्चित्त करें। अभक्तों की दशा सुनकर राजा को अत्यन्त दुःख हुआ, वह मन ही मन थक सा गया और उसके
निवारण के लिये मन में हरि के नाम का स्मरण करने लगा। जिस हरि का उन्होंने स्मरण किया, उस हरि के बारे
में ही उनसे पूछें इसलिये हरि के भक्त युग-युग में किस प्रकार भजन करते हैं यह प्रश्न किया।

पंचम अध्याय १२७
राजोवाच
कस्मिन्काले स भगवान् किं वर्णः कीदृशो नृभिः ।
नाम्ना वा केन विधिना पूज्यते तदिहोच्यताम् ॥ १९॥
राजा ने कहा—सचमुच, जिसके स्मरण से कर्माकर्म सर नहीं उठा सकते, उस भगवान की कथा मेरे लाभ
के लिये सुनायें। वह परमात्मा श्रीहरि सृष्टि के प्रारम्भ में, .युग युगान्तर में किस नाम से, किस रूप से तथा किस
वर्ण में प्रकट होते हैं ? उसी प्रकार भक्तगण किस रूप में उसकी पूजा करते हैं ? उसी प्रकार तत्कालीन लोग उस
अधोक्षज का किस विधि से यजन करते हैं ? हे योगीराज ! यह सब आप मुझे बतायें। आपके मुख से सुने भाषण
के आगे अमृत भी फीका लगेगा। आपके भाषण से सम्पूर्ण आनन्द प्राप्त होकर जन्म-मरण की बाधा दूर हो जाती
है। उसमें भी हे स्वामी ! युगधर्म के अनुसार आचरण करने वाला नारायण, उसका गुणानुवाद तथा उसे भजन
पूजन की विधि कृपया मुझे सुनायें। राजा का यह भाषण सुनकर सभी को परम सन्तोष प्राप्त हुआ। यह हरिगुणों
का प्रश्न है यह जानकर कनिष्ट भ्राता 'करभाजन' योगी बोलने लगा।
करभाजन उवाच
कृतं त्रेता द्वापरं च कलिरित्येषु केशवः ।
नानावर्णाभिधाकारो नानेव विधिनेज्यते ॥ २० ॥
कृत, त्रेता तथा द्वापर इन युगों में भक्त नाना वर्णों से, नाना नामों से तथा नाना प्रकार के उपचारों से केशव
का यजन करते रहते हैं। 'क' कार का अर्थ है ब्रह्मदेव, 'श' कार का अर्थ है शंकर तथा 'च' कार का अर्थ है
'विष्णु'। वास्तव में निर्गुण 'केशव' इन तीनों का पूर्ण प्रकाशक है। केशव तो अर्धमात्रा है उसका व्यक्ताव्यक्त
उच्चार नहीं हो सकता। बाह्यानंतर एकत्व से वह सचमुच अव्यापक व्याप्त करता है। वही हरयुग में भिन्न-भिन्न
नामों से नाम और रूप धारण करता है। भक्तगण उस पुरुषोत्तम की नाना प्रकार की भजनविधि तथा क्रियाधर्म से
पूजा करते हैं। उनका क्रमध इस प्रकार है—
कृते शुक्लश्चर्बाहुर्जटिलो वल्कलाम्बरः ।
कृष्णाजिनोपवीताक्षान्विभ्रद्दण्डकमण्डलून् ॥ २१ ॥
कृतयुग में गौरवर्ण, जटाधारी, चतुर्भुज, वल्कल परिधान किया हुआ, हाथ में दण्डकमण्डल धारण करने
वाला, मृगचर्म, यज्ञोपवीत, हाथ में रुद्राक्ष की माला, कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला, इन लक्षणों से युक्त
मूर्तिमंत परमात्मा का कृतयुग के भक्तगण पूजन करते हैं।
मनुष्यास्तु तदा शान्ता निर्वैराः सुहृदः समाः।
यजन्ति तपसा देवं शमेन च दमेन च ॥ २२ ॥
उस काल में सभी लोग हमेशा शान्त, वैरभावरहित, सदा समदृष्टि रखने वाले तथा परस्पर सुहृद एवं
मित्रवत रहते थे। उस काल में तप करके ही देवता की उपासना करते थे। उस ताप का प्रमुख लक्षण यह था कि
शम-दम पूरी तरह साध कर स्वयं भगवद्भजन किया जाता था। हे राजा ! उस समय दस नामों से भगवान का
नामस्मरण करते थे। वे दस नाम तुम्हें बताता हूँ, सुनो।

१२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
हंसः सुपर्णो वैकुण्ठो धर्मो योगेश्वरोऽमलः।
इश्वरः पुरुषोऽव्यक्तः परमात्मेति गीयते॥ २३॥
हंस, सुपर्ण, वैकुण्ठ, अव्यक्त और परमात्मा इन नामों का वे जप करते हैं। उस काल के बड़े-बड़े भक्त
इन्हीं नामों का पाठ कर उच्च स्वर में गायन करते हैं तथा इस प्रकार संसारभय का विनाश करते हैं। कृतयुग की
यह उपासना तुम्हें सविस्तार बतायी। अब त्रेतायुग का भजन और मूर्ति का ध्यान सुनाता हूँ।
त्रेतायां रक्तवर्णोऽसौ चतुर्बाहुस्त्रिमेखलः।
हिरण्यकेशस्त्रय्यात्मा स्रुक्स्रुवाद्युपलक्षणाः॥ २४॥
त्रेता युग में पुरुषोत्तम यज्ञमूर्तिस्वरूप में रहता है। उसका वर्ण अग्नि की ज्वाला की तरह रक्तवर्ण, केश
लालिमायुक्त भूरे रंग के और हाथ चार होते हैं। उस निर्मल यज्ञपुरुष को त्रिगुणों की त्रिमेखला तथा तीन वेदों के
सम्पूर्ण ऐक्य का स्वरूप होने के कारण उस मूर्ति की शोभा तद्रूप ही रहती है। हाथ में स्रुक्, स्रुवा आदि
यज्ञपात्र लिये हुए, यही उस यज्ञमूर्ति का लक्षण होता है। त्रेतायुग में भक्तगण नारायण के इसी स्वरूप का ध्यान
करते हैं।
तं तदा मनुजा देवं सर्वदेवमयं हरिः।
यजन्ति विद्यया त्रय्या धर्मिष्ठाब्रह्मवादिनः॥ २५॥
उस काल के लोग तीन वेदों से नारायण का भजन करते हैं। श्रीहरि पूर्ण रूप से सर्वदेवस्वरूप होने के
कारण त्रेता युग का भजन इस प्रकार का होता है। त्रेतायुग के समस्त लोग वेदवचनों पर परम श्रद्धा रखने वाले
तथा भजनशील और धर्म पर श्रद्धा रखने वाले धर्मनिष्ठ होते हैं। वे धार्मिक जन आठ प्रकार के नामों से प्रतिदिन
नामस्मरण करते हैं। हे राजा! वे नाम सुनो।
विष्णुर्यज्ञः पृश्निगर्भः सर्वदेव उरुक्रमः।
वृषाकपिर्जयन्तश्च उरुगाय इतीर्यते॥ २६॥
विष्णु, यज्ञ, पृश्निगर्भ (सुतपा प्रजापति की पत्नी 'पृश्नि', उसका पुत्र होने के कारण पृश्निगर्भ), सर्वदेव,
उपक्रम, वृषाकपि, जयंत, उरुगाय, इन श्रेष्ठ नामों से उसका स्मरण किया जाता है। अब द्वापरयुग में भक्तगण
भगवान का ध्यान, नामस्मरण तथा भजन किस प्रकार करते हैं उसे सुनो।
द्वापरे भगवान्छ्यामः पीतवासा निजायुधः।
श्रीवत्सादिभिरङ्गैश्च लक्षणैरुपलक्षितः॥ २७॥
द्वापर में मेघ जैसी नीलकांति, सरसों के फूल जैसी आभा, पीताम्बर परिधान किये हुए और श्रीवत्स चिह्न
से अंकित, उसी प्रकार शंख, चक्र, गदा, पद्म ये चार आयुध धारण किये हुए ऐसे लक्षणों से युक्त भगवान श्रीहरि
का सदासर्वदा ध्यान करते हैं।
तं तदा पुरुषं मर्त्या महाराजोपलक्षणम्।
यजन्ति वेदतन्त्राभ्यां परं जिज्ञासवो नृप॥ २८॥
चन्द्रमा की तरह श्वेत छत्र तथा रत्नजड़ित चामर आदि राजलक्षणों से युक्त राजोपचार अर्पित कर द्वापर

पंचम अध्याय १२९
युग के लोग अत्यन्त भक्तिभाव से पूजा करते हैं। परात्पर परमात्मा को शीघ्र पाने की दृष्टि से वे उसकी वैदिक
तथा तांत्रिक इस प्रकार मिश्रपूजा करते हैं। तत्वजिज्ञासु पुरुष इस प्रकार भगवान का भजन करते हैं। जिससे
कलिमल दहन हो ऐसे उस काल में नामस्मरण कैसे होता था उसके प्रकार बताता हूँ।
नमस्ते वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च।
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय तुभ्यं भगवते नमः॥ २९॥
हे वासुदेव! तुम्हें साष्टांग प्रणाम करता हूँ, हे 'संकर्षण' तुम्हें नमन करता हूँ, 'प्रद्युम्न' तुम्हें प्रणाम करता
हूँ, अनिरुद्ध तुम्हें अभिवादन करता हूँ। उसी प्रकार—
नारायण ऋषये पुरुषाय महात्मने।
विश्वेश्वराय विश्वाय सर्वभूतात्मने नमः॥ ३०॥
"हे ऋषीश्वर नारायण! हे सुरेन्द्र महापुरुष! हे विश्वरूप! हे विश्वेश्वर! हे महात्मा श्रीवर! तुम्हें प्रणाम
करता हूँ। हे सर्वभूतात्मन् पुरुषोत्तम! तुम्हें नमस्कार है।" हे राजाधिराज! द्वापर युग में इन नामों से उसका नित्य
स्मरण करते हैं। इन नामों के घोष से उसे परम संतोष प्राप्त होता है और वह अकस्मात वैकुण्ठ छोड़कर उस
नाम संकीर्तन में दौड़ा चला आता है।
इति द्वापर उर्वीश स्तुवन्ति जगदीशवरम्।
नानातन्त्रविधानेन कलावपि यथा श्रृणु॥ ३१॥
द्वापर के लोग इन्हीं नामों से स्तुति स्तवन करते हैं। अब हे राजा! कलियुग के भजन तथा तंत्रयुक्त विधि के
सम्बन्ध में बताता हूँ।
कृष्णवर्णं त्विषा कृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्।
यज्ञैः संकीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः॥ ३२॥
कलियुग के देवता श्रीकृष्ण हैं इसलिये उस कृष्णकांति के प्रभाव का वर्णन करें। उसकी कांति इन्द्रनील
मणियों की कांति की तरह दमक रही थी। उसकी मूर्ति सभी अवयवों से परिपूर्ण थी तथा मुरली, श्रृंग आदि
उपांगों से युक्त थी। चारों भुजाएँ अत्यन्त पराक्रमी तथा उन चारों हाथों में शंख-चक्रादि सुन्दर आयुध
शोभा देते हैं। पीछे नन्द सुनंदादि सेवक सशस्त्र खड़े हैं। कलियुग के ज्ञानी इस प्रकार श्रीकृष्ण का सदैव चिन्तन
करते हैं। कलियुग के श्रीकृष्ण को रोज के कीर्तन के आगे मधुपर्कादिक विधानों से की गयी यथाविधि पूजा
गौण लगती है। हे राजाधिराज! कैसा आश्चर्य है कि श्रीकृष्ण को कीर्तन ही पूजा मालूम होती है। कृष्ण को
कीर्तन से इतना प्रेम है। इसी कारण से गरुड़ ध्वज को सदैव प्रसन्नता मालूम होती है। श्रीकृष्ण को कीर्तन प्रिय
है इसीलिए वह नारद को इतना सम्मान देता है। नारद निरन्तर श्रीकृष्ण का ही गुणगान करता है और उसके ही
नाम का घोष करता रहता है। नाम संकीर्तन करने के कारण ही उसने प्रह्लाद की संकटों से रक्षा की। कीर्तन से
श्रीकृष्ण को संतोष प्राप्त होता है और वह भक्तों के भवबन्धन तोड़ डालता है। गजेन्द्र ने नामस्मरण करते ही
उसे नारायण की प्राप्ति हुई। उसका संसार बन्धन तोड़ कर उसे स्वयं वैकुण्ठ में ले गये। नीचों में नीच, अत्यन्त
पापी वेश्या थी। एकाएक उसके मुख से रामनाम निकला। उस नामोच्चार के कारण श्रीहरि ने उसकी वैकुण्ठ में
रहने की व्यवस्था की। समस्त पापों की साक्षात मूर्ति अजामिल को भी नामस्मरण के कारण पवित्र कर दिया।

१३० श्रीमद् एकनाथी भागवत
इस प्रकार नाम की महिमा अद्भुत है। नामस्मरण से गोविन्द के स्वरूप में लीन होने वाली द्रौपदी को संकट से
छुड़ाया। सचमुच नाम भक्तों की व्याधियों को दूर कर देता है। अंतःकरण की शुद्धि के लिए मुख्य रूप से
हरिकीर्तन ही उपाय है। चित्तशुद्धि के लिये नाम जैसा कोई अन्य साधन नहीं है। कीर्तन में हरि को कैसी रुचि
रहती है ? उसी प्रकार जैसे गाय बछड़े को या मधुमक्खी छत्ते को एक क्षण के लिये भी नहीं छोड़ती। उसी
प्रकार नामस्मरण करने वाले भक्त की श्री हरि को चाह रहती है। भक्त को यदि जरा भी दुःख होता है तो वह
स्वयं ही उसका निवारण करता है। इसलिये जिसे हरिकीर्तनसे लगन लग गयी उसे अन्य साधनों के फेर में
पड़कर संकट में पड़ने की क्या आवश्यकता है ? जिसे हरि के नामसंकीर्तन तथा हरि के गुणानुवाद सुनाने में
चौगुना आनन्द होता है उसका सारे साधन करने की तरह उद्धार होता है। इतना ही नहीं अपितु उसके कारण
सारी पृथ्वी ही पवित्र हो जाती है। यदि एक राम का ही नाम वाणी में रह जाय तो वह समस्त पापों का पर्वत
चूर कर परमानन्द का सुख प्रदान कर सकता है। प्रेमपूर्वक हरिकीर्तन करने से श्रीहरि प्रकट होता है। उससे
श्रेष्ठ साधन और कोई नहीं है। श्रीहरि को कीर्तन से बड़ा सुख प्राप्त होता है। कीर्तन निष्ठा से भगवान सन्तुष्ट
होता है। कीर्तन से और हरिनाम से भोले भाले लोग तर गये हैं। इसलिये कीर्तन से श्रेष्ठ और प्रबल कोई साधन
नहीं है। फिर किस उद्देश्य से नीच लोग उसकी निन्दा करते हैं ? इस प्रकार जो नाम कीर्तन से विन्मुख होते हैं
उन्हें स्वप्न में भी सुख नहीं प्राप्त होता है। अलबत्ता मूर्ख लोग कीर्तन का द्वेष कर अत्यन्त विपत्तियों का सामना
करते हैं। जिसके हृदय में द्वेष ने संचार किया है उसके आचार को धिःकार है। द्वेष करने वाले लोग सदासर्वदा
अत्यन्त असहनीय दुःख ही भोगते रहते हैं। कलियुग में जो बुद्धिमान पुरुष होते हैं वे हमेशा नामसंकीर्तन में ही
मग्न.रहते हैं। वे अत्यन्त आनन्द से उस नाम का ही गौरव करते हुए अत्यन्त प्रेम से उसका स्मरण करते हैं।
अनेक महान अवतार हैं लेकिन उनमें श्री रामचन्द्र और भगवान श्रीकृष्ण का ही चरित्र अत्यन्त पवित्र है। उन्हीं
के चरणों का वन्दन करना चाहिये। कहा भी है—
ध्येयं सदा परिभवघ्नमभीष्टदोहं तीर्थास्पदं शिवविरिञ्चनुतं शरण्यम् ।
भृत्यार्तिहन्प्रणतपाल भवाब्धिपोतं वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्म् ॥ ३३ ॥
समाधि आदि ध्यान लक्षण देवी-देवताओं का ध्यान, सगुण-निर्गुण ध्येय आदि समस्त उपायों को एक
हरिचरण स्मरण ने तत्काल तृणप्राय कर दिया। इसलिये ध्यान करने के लिये वही हरिचरण श्रेष्ठ हैं। वह कल्पना
आदि के सारे कष्ट दूर कर भक्तों का अभीष्ट सारे मनोरथ सदा पूर्ण करते हैं। हे राजा! नित्य हरिचरणों का ध्यान
करने से केवल भक्त के दैहिक दुःखों का ही निवारण नहीं होता बल्कि भवरोगों का भी दुःख दूर होता है। वह
भक्तों का मनोरथ पूर्ण करता है इसका अर्थ यह नहीं है कि वे मनोरथ विषयासक्त होते हैं। हरिचरणामृत किसी
भगवद्भक्त को विषयहीन परमानन्द से तृप्त कर देता है। उन चरणों की पवित्रता का किस तरह वर्णन किया
जाय ? उसका तीर्थ साक्षात शंकर भी अपने मस्तक पर धारण करते हैं। हरि के चरण तो वास्तव में समस्त तीर्थों
की जन्मभूमि ही है। इसलिये उन चरणों के ध्यान से भक्त को भी पवित्रता प्राप्त होती है। अचानक चरण लगने
के कारण पाषाण भी पवित्र हो गये। फिर जो प्रयत्नपूर्वक उनका ध्यान करते हैं उनकी पवित्रता का कितना वर्णन
किया जाय ? जिस रावण ने सदैव शत्रुता का व्यवहार किया जो उसकी स्त्री को चुरा ले गया उसका भाई शरण
आयां तो उसे उसने निजभाव से आत्मीय बना लिया। हे राजा! उसे केवल आत्मता ही प्रदान नहीं की बल्कि उसे
सुवर्ण नगरी सौंप कर उसे वहाँ अटल रूप से स्थापित कर दिया। इसलिये हरि के चरण शरणागत के लिये शरण

पंचम अध्याय १३१
जाने योग्य ही हैं। भगवद्भक्तों के लिये उसके जैसा निर्भय स्थान नहीं है। भक्त को जरा भी दुःख हो जाय तो
वह भगवान को सहन नहीं होता। प्रह्लाद के असहनीय दुःख का उसने स्वयं ही निवारण किया। दावाग्नि को
उदर में रखकर वन में गोपालों की रक्षा की। पाण्डव जब लाक्षागृह में जल रहे थे उस समय उन्हें वहाँ से बाहर
निकाला। जो अपने सर्वांग से निरन्तर भक्तों की पीड़ा दूर करता रहता है, जो भक्तों के प्रेम के कारण रणभूमि में
उनके रथ को हाँकता है ऐसे उस भगवान के चरणों को प्रणाम करने से वह अपने भक्तों को गोद में बिठाकर
उनकी सेवा करता है। शरणागत की रक्षा करने वाला दयाशील संसार में अन्य कोई नहीं है। प्रचण्ड संसारसागर
को पार करने के लिये हरिचरणों की ही अटल नौका है। जो भी शरण आता है उन सबको वह चरणकृपा से पार
लगा देता है। शरणागत-को आश्रय देने वाले उस महापुरुष के चरणों का सनकादिक भी स्वयं ध्यान और
अभिनन्दन करते हैं। ऐसे उन चरणों की अगाध महिमा का वर्णन करते समय वेद भी मौन हो गये, ब्रह्मदेव और
शंकर भी स्तवन करते-करते मौन हो गये। उस श्रीकृष्ण के चरण अतर्क्य तथा अगम्य हैं। यह जानकर ब्रह्मदेव
और ईशान अर्थात् शंकर आदि साष्टांग दण्डवत कर उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे।
त्यक्त्वा सुदुस्त्यजसुरेप्सितराज्यलक्ष्मीं धर्मिष्ठ आर्यवचसा यदगादरण्यम्।
मायामृगं दयितयेप्सितमन्वधावद्वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्म्॥ ३४॥
जिस राजवैभव के लिये देवता भी लार टपकायें ऐसे राज्य को श्रीरामचन्द्र ने पिता के वचन के कारण
त्याग दिया। श्रीराम वास्तव में सच्चा धर्मनिष्ठ तथा पिता के वचनों का पालन करने वाला था इसलिये इतना बड़ा
राज्य छोड़ कर वनवास पर चल पड़ा। वनवास में पैदल जाते हुए भी प्रिय सीता को साथ में लिया इसलिये उसे
स्त्रीलंपट नहीं समझना चाहिये क्योंकि सीता केवल स्त्री नहीं अपितु भगवान की असीम भक्त थी। इसलिये सारे
राजभोग छोड़कर केवल श्रीराम की सेवा के स्वार्थ से उसने श्रीराम के साथ वनवास स्वीकार किया। राजा
रामचन्द्र ने अपनी सेवा का कार्य समस्त सेवकों में उनके अधिकार के अनुसार बाँट दिया था, वे सारे कार्य वन
में मैं अकेले करूँगी ऐसा हेतु मन में रखकर सेवा भी होगी और इसी प्रकार मैं कृतार्थ हो जाऊँगी इसी उद्देश्य से
वह सचमुच पैदल चलकर वनवास में गयी थी। श्रीराम के सुख का वर्णन किन शब्दों में किया जाय ? पैदल
चलते समय उसे दुःख का भान भी नहीं हुआ। प्यारे मैके को भी वह भूल गयी। सेवा में उसे अत्यधिक आनन्द
आ रहा था। मन में परिपूर्ण भक्ति के कारण ही वह वन में सेवाभाव से आयी हुई थी। भक्त की वह भक्ति केवल
रामचन्द्रजी ही जानते थे, अन्य देवतागण या दानव उसे नहीं जान सकते। निजभक्तों का मनोरथ रघुनाथ ही जानें
उसी प्रकार उसकी सेवा का स्वार्थ उसके भक्त ही जानें। भगवद्भजन का सुख केवल भाविक भक्त ही जानते हैं।
रघुनाथ ने जान लिया था कि सीता पूर्णरूप से भाविक भक्त है इसीलिये वे उसके कहने से मृग के पीछे भागे।
उस मायावी मृग के मिथ्या सुनहलेपन के बारे में वे जानते थे किन्तु भक्त का हठ पूरा करने के लिये वे मृग के
पीछे दौड़ गये। बालक का हठ पूरा करने के लिये जिस प्रकार माँ तत्पर रहती है उसी प्रकार अपने भक्त के
कहने से राम भी उस मायावी मृग के पीछे दौड़ गये। वानर की बातें सुनकर भी जिस रामचन्द्र के मन
में कभी कोई विकल्प नहीं आया वे सीता के कहने से मृग के पीछे दौड़ गये इसमें आश्चर्य की क्या बात है ?
भक्त की बात को फिर वह कैसी भी हो, रामचन्द्रजी झूठ नहीं समझते थे इसलिये वे स्वयं दौड़कर मृग के
पीछे-पीछे गये। जो अपने भक्त के कहने से तत्काल मृग के पीछे दौड़ कर गया, उसके पैरों की धूल
शंकरादि देवतागण अपने मस्तक पर लगाते हैं। मृग के पीछे दौड़ते समय उसने पाषाण को भी पवित्र कर दिया।

१३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उसके चरणों में अनन्यभाव से शरण जाकर परमभक्ति से वन्दन किया जाय। इस प्रकार उस महापुरुष के चरणों
का अभिवादन कर समस्त देवतागण उसका वन्दन करने लगे। कलियुग में लोग कीर्तन से ही परम पावन होकर
मुक्त होते हैं।
एवं युगानुरूपाभ्यां भगवान् युगवर्तिभिः।
मनुजैरिज्यते राजम् श्रेयसामीश्वरो हरिः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार कृतयुग से कलियुग तक के लोग स्वहित के लिये श्रीहरि का इन नामों से, इन रूपों से तथा इन
अवतार लीलाओं का गायन कर भक्ति के अनुसार भजन करते हैं। उसमें भी बड़े-बड़े ऋषियों ने कलियुग की
महिमा का वर्णन किया है क्योंकि इस युग में चारों मुक्तियाँ दासी बनकर रहती हैं।
कलिं सभाजयन्त्यार्या गुणज्ञाः सारभागिनः ।
यत्रसंकीर्तनेनैव सर्वः स्वार्थोऽभिलभ्यते ॥ ३६ ॥
हे सर्वज्ञ राजा! सुनो, कलियुग धन्य है कि उसमें हरिकीर्तन तथा नामस्मरण से सारे मनोरथ पूरे हो जाते
हैं। कलियुग में पाप बहुत होते हैं इसलिये केवल कीर्तन से स्वार्थसिद्धि किस प्रकार होती है ? तो जो दोषों का
त्याग कर गुण ही ग्रहण करते हैं वे हरिकीर्तन से मुक्त होते हैं। हरिकीर्तन से चित्त शुद्ध हो जाने के कारण दोषों
का त्याग कर केवल गुण ग्रहण किया जाता है। इस प्रकार सार ग्रहण करने वाले लोग कलियुग में हरिकीर्तन से
ही परममुक्त होते हैं। कलि के गुण जानने वाले लोग, नाम से ही मोक्ष प्राप्त होता है यह ध्यान में रखकर कीर्तन
ही करते हैं और वे सचमुच ही नित्ययुक्त होते हैं। कलियुग में निरन्तर नामस्मरण करना चाहिये यही सार है। हे
राजेन्द्र! जो पुरुष नित्य नाम का घोष करते हैं, पुरुष मुक्ति प्राप्त करते ही हैं।
सम्मत श्लोक १
ध्यायन्कृते यजन्यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन् ।
यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम् ॥ १ ॥
सं० श्लोक—कृतयुग में शमदमादि साधन, त्रेतायुग में वेदोक्त यज्ञ तथा द्वापरयुग में आगमोक्त तंत्रविधि
से युक्त पूजन यही साधन है। इस प्रकार तीनों युग के लोगों को, परम संकट के साधनों का प्रयोग करने पर भी
मन को रत्तीभर भी शान्ति नहीं प्राप्त होती। लेकिन कली ने कीर्तन के द्वारा उन सभी साधनों को लज्जित कर
दिया। परमात्मा को कीर्तन में नाच, गाकर वश में किया जा सकता है। गाँव के बाहर जहाँ मवेशी एकत्र होते हैं,
यमुना किनारे की बालू में गोपालों के साथ हुंबरी हमाम का खेल खेलते समय तथा प्रेम के गीत सुनकर भगवान
विभोर हो जाते हैं और उनके साथ आनन्दपूर्वक नाचने लगते हैं। कृष्णा, कान्हा, गोपाल ! ऐसे लाडले किन्तु
उलटे-सीधे नामों से वे गोपाल बार-बार गर्जना करते हैं, उसे सुनकर उस घनश्याम को सुख प्राप्त होता है। उस
सुख के कारण भगवान को परमानन्द का उफान आता है। सारांश, इस प्रकार कलियुग में कीर्तन के माध्यम से
भक्तों का अनायास ही उद्धार हो जाता है। कीर्तन के आवर्तन प्रारम्भ होते ही पापों की राशियों का बडवानल
जलने लगता है और भक्तों का तत्काल उद्धार हो जाता है। हरिनाम के कारण कलि का महत्त्व बढ़ गया है।
कलियुग की यही विशेषता है कि नामसंकीर्तन के कारण चारों वर्णों की मुक्ति प्राप्त होती है। फिर स्त्रियाँ तथा
शूद्र जैसा विचार शेष नहीं रहता। वेद अत्यन्त कंजूस हो गया कि उसने केवल तीन वर्णों की ही बात सुनी, स्त्री,

पंचम अध्याय १३३
शूद्रों से उसने बात नहीं की। वह मौन अभी भी कायम है। वेद की यह बहुत बड़ी कमी इस हरिकीर्तन ने ही
पूरी की। क्योंकि हरि के नाम से स्त्री, शूद्र अथवा अंत्यज लोगों का भी उद्धार हो जाता है। कीर्तन से स्वधर्म
जुड़ता है, कीर्तन से स्वधर्म बढ़ता है, कीर्तन से ही परब्रह्म प्राप्त होता है। अधिक क्या कहें? मुक्ति भी कीर्तन
के सामने शर्मा जाती है। कीर्तन के आनन्द के कारण ही चारों मुक्तियाँ हरिभक्तों को वरने आती हैं लेकिन भक्त
उन्हें दूर भगा देते हैं। लेकिन वे दासी बनकर उनके चरणों पर लग ही जाती हैं। हे राजा! कलियुग में ऐसा
साक्षात्कार है। कीर्तन की महिमा इतनी महान है इस सम्बन्ध में मन में जरा भी विकल्प न रखो। चाहे कृतयुग
हो, त्रेतायुग हो या द्वापरयुग हो नामस्मरण के लिये कभी भी निषेध नहीं है। लेकिन कलियुग में चारों मुक्तियाँ
नाम के पास स्वयं दासी बन कर रहती हैं।
न ह्यतः परमोलाभो देहिनां भ्राम्यतामिह।
यतो विन्दत परमां शान्तिं नश्यति संसृति ॥ ३७॥
हे राजेश्वर! जो लोग जन्म-मरण के भँवर में फँस कर संसार में चक्कर खाते रहते हैं, उन प्राणियों को
कलियुग में कीर्तन से ही सद्गति प्राप्त होती है। कलियुग में कीर्तन से ही सांसारिक बन्धन टूट कर शान्ति सुख
के अनुभव से परमानन्द से भेंट होती है। ऐसे कीर्तन में बहुत बड़ा लाभ है। देवताओं को अथवा मानवों को
(दूसरे युगों में) कष्ट करने से भी वह प्राप्त नहीं होता लेकिन कलियुग में वह सुलभ हो गया है। इसीलिये
भाग्यशाली लोग हरिकीर्तन की आशा करते हैं। कीर्तन के कारण चारों मुक्तियाँ भक्त के गले लग जाती हैं। कोई
कहेगा कि ऐसा नहीं होगा। तो हे राजा! उसकी स्थिति अर्थात् उपपत्ति बताता हूँ, सुनो। कीर्तन में हरिनाम का
घोष होता है, उसे सुनकर भगवान को अत्यन्त संतोष प्राप्त होता है, और वह वैकुण्ठ छोड़कर तीव्र गति से
दौड़कर आता है। देवता हरिकीर्तन से अत्यन्त लुब्ध होते हैं, वह वैकुण्ठ लौटना ही भूल जाते हैं। भक्त की भक्ति
देखकर उसे वही स्थान अधिक अच्छा मालूम होता है अर्थात् यदुनायक जहाँ रहता है वहीं वैकुण्ठ भी आ जाता
है। इस प्रकार भक्त कीर्तन से ही 'सलोक' मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं। नामसंकीर्तन के गजर से ही श्रीहरि भक्तों के
समीप दौड़ कर आता है। यही 'समीपता' मुक्ति है। हरिकीर्तन से ही वह भक्तों के हाथ लगती है। कीर्तन से जब
भगवान प्रसन्न हो जाता है तो वह भक्त को साक्षात दर्शन देता है। उसका श्यामसुन्दर पीताम्बरधारी ध्यान भक्त के
मन में सहज ही अंकित हो जाता है। जिस ध्यान का भक्त कीर्तन करता है वही ध्यान उसके मन में अंकित हो
जाता है। उस समय भगवान के वही रूप लक्षण भक्त को प्राप्त होते हैं। श्यामसुन्दर, चतुर्भुज, पीताम्बर धारण
कर, शंखचक्रादि आयुध हाथ में ली हुई सरूपता कीर्तन से लुब्ध होकर भक्त को माल्यर्पण करती है। उस समय
भगवान और भक्त एक समान हो जाते हैं। दोनों के अवयव एक समान और दोनों के आयुध तथा अलंकार भी
एक जैसे। भक्तिभाव से हरिकीर्तन करने से हरिभक्तों को इतनी महिमा प्राप्त होती है। लक्ष्मी जब दोनों को एक
स्थान पर देखती है तो उसमें देवता कौन है और भक्त कौन है यह वह भी नहीं पहचान पाती। ब्रह्मदेव भी
नमस्कार करते समय चौंक जाता है। शुद्ध भाव से हरिकीर्तन करने से जनार्दन को संतोष होता है। देवता और
भक्त आलिंगन में बँध जाते हैं और वह बन्धन कभी ढीला नहीं होता। तब बाह्यांतर में चराचर में देवता प्रकट हो
जाते हैं। उसे संसार में अन्य कुछ दिखायी ही नहीं देता। इस प्रकार जब वृत्ति स्वानंद में मग्न हो जाती है और
कभी उससे भिन्न नहीं होती तो उसी को 'सायुज्य मुक्ति' कहते हैं। उसमें भिन्नभाव रहता ही नहीं है। इस प्रकार
पूर्ण सायुज्यता प्राप्त कर जब वह हरिकथा करने लगता है उस समय उस कथा की तल्लीनता सभी प्राणियों को

१३४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अत्यन्त प्रिय लगती है। इस प्रकार चारों मुक्तियाँ हरिकीर्तन के पास दासी होकर रहती हैं इसलिये भक्त हरिभजन
पर लुब्ध हो जाते हैं। वे मुक्ति नहीं चाहते। इस प्रकार हरिकीर्तन ने योग, याग, तप आदि साधनों को बिलकुल
अनाथ कर दिया है। कलियुग में नामस्मरण और हरिकीर्तन से ही जड़ तथा जीवों का उद्धार होता है।
कृतादिषु प्रजा राजन् कलाविच्छन्ति सम्भवम्।
कलौ खलु भविष्यन्ति नारायणपरायणाः ॥ ३८ ॥
कीर्तन के कारण चारों मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं इसलिये कलियुग में कीर्तन भक्ति ही प्रमुख है। इसलिये
इन्द्रादि देवतागण भी कलियुग में जन्म लेने की आकांक्षा रखते हैं। स्वर्ग भोग का स्थान नहीं बल्कि वह
विषयवासनाओं का बन्दीगृह है। इसलिये भाग्यशाली जीव कलियुग में जन्म लेकर हरि का कीर्तन करते हैं। जब
स्वर्ग के देवतागण भी कलियुग में जन्म लेने की इच्छा करते हैं तो कृतादि युग के उत्तम लोग कीर्तन धर्म रूप
भजन के लिये विशेष रूप से जन्म लेने की इच्छा करते हों तो इसमें कैसा आश्चर्य है। कृतयुग के भाग्यशाली
लोगों ने यज्ञयाग कर स्वर्ग की प्राप्ति की लेकिन वे भी कलियुग के जन्म की इच्छा करते हैं। कृत, त्रेता तथा
द्वापर इन तीनों युगों के श्रेष्ठ पुरुष भी कलियुग में जन्म लेकर आने की इच्छा करते हैं। उस काल के लोग
परस्पर बातें करते हैं कि कीर्तन से चारों पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं यही कलियुग की महिमा है और इसीलिये सृष्टि
में कलियुग धन्य है। जो सचमुच भाग्यवान होते हैं वही कलियुग में जन्म प्राप्त करते हैं। सारांश, कलियुग में
जन्म लेने के लिये देवतागण, मानव तथा नाग भी उत्कंठा रखते हैं। दीन दुबलों का उद्धार हो सके इसलिये
कलियुग में श्रीनारायण नामस्मरण से ही संसार बन्धन टूट जाता है। सारांश, हरिकीर्तन सभी को तारता है।
इसलिये हे राजा ! कलियुग में हरिकीर्तन में श्रद्धा रखने से लोग अनायास ही तर जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं है।
कलियुग में अनेक प्रकार के लोग नारायण की उपासना करेंगे और स्त्रियाँ तथा शूद्र की भक्ति की महिमा का
प्रसार करेंगे।
क्वचित् क्वचिन्महाराज द्रविडेषु च भूरिशः।
ताम्रपर्णी नदी यत्र कृतमाला पयस्विनी ॥ ३९ ॥
कावेरी च महापुण्या प्रतीची च महानदी।
ये पिबन्ति जलं तासां मनुजा मनुजेश्वर।
प्रायो भक्ता भविष्यन्ति वासुदेवोऽमलाशया ॥ ४० ॥
विशेष रूप से द्रविड देश में भक्ति अधिक बढ़ेगी। तिस पर भी जहाँ प्रसिद्ध तीर्थों के स्थान होंगे वहाँ स्त्री
भक्ति में उफान आयेगा। ताम्रपर्णी नदी के तट पर हरिभक्ति की महिमा बहुत अधिक है, कृतमाला के चारों ओर
के परिसर में तो हरिभक्ति का उल्हास प्रकट होता है। निर्मल जल से युक्त नदी, उसका जल प्राशन करने से
श्रीहरिचरण के प्रति प्रेम की वृद्धि होती है और भगवद्भजन करने की बुद्धि दृढ़ होती है। कावेरी नदी के दर्शन
मात्र से पापों की राशियाँ नष्ट हो जाती हैं। जिस कावेरी तट पर श्रीरंग प्रसन्नतापूर्वक निवास करता है, वहाँ भक्ति
का प्रवाह अखण्ड बहता रहता है। नदी में डुबकी लगाते ही तत्काल चित्तशुद्धि होने का अनुभव होता है और
भक्ति की स्पर्धा बढ़ते-बढ़ते उसकी पताका वैकुण्ठ तक पहुँचती है। हे राजराजेश्वर ! सुनो। इन पाँच नदियों के
तीर्थ में स्नान करने से अथवा उनका जल प्राशन करने से भगवद्भजन में बुद्धि स्थिर होती है। इन तीर्थों का दर्शन

करने से सहज ही कलिमलक्षालन होता है तथा स्नान अथवा जलप्राशन करने से भगवद्भजन करने में उत्साह
बढ़ता है। इन तीर्थों का दर्शन, स्पर्श अथवा स्नान करने से वासुदेव का शुद्ध भजन करने की इच्छा की वृद्धि
होती है। जो इस प्रकार के भक्त होते हैं वे देवतागण, ऋषि तथा पितर इन तीनों के ऋण से मुक्त होते हैं। वे कभी
भी देवतागण, ऋषि अथवा पितरों से बँधे हुए नहीं होते।
देवर्षिभूताप्तनृणां पितॄणां न किङ्करो नायमृणी च राजन्।
सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम्॥ ४१ ॥
शरणागत के लिये शरण अर्थात् आश्रय देने वाले या संरक्षक केवल श्रीमुकुंद के चरण ही हैं। असीम भाव
से उसकी शरण में जाने से जन्म-मरण का बन्धन नहीं रहता। फिर उसे देवता, ऋषि, आचार्य अथवा पितर इनके
ऋण की क्या चिन्ता है? वे भक्त भगवद्भजन से ही मुक्त हो जाते हैं। श्रद्धापूर्वक भगवद्भक्ति करने से समस्त
पितरों का उद्धार होता है। भगवद्भक्ति के आनन्द से 'ऋषि' नित्य ही तृप्त होते हैं। भगवद्भक्ति के आनन्द से
सभी 'प्राणी' सुखी होते हैं। पुत्र यदि भगवद्भक्ति करे तो उसके माता-पिता और सगे-सम्बन्धियों का भी उद्धार
होता है। समस्त देवताओं का नियंता जो श्रीहरि है उसका उल्लासपूर्वक भजन करने से 'देवऋण' की बाधा
भगवद्भक्त को कभी नहीं होती। जो अनन्यभाव से भजन करते हैं वे कभी भी कर्म के अधीन नहीं होते क्योंकि
कर्म जिसके अधीन रहता है उस हरि की ही शरण में वे रहते हैं। अनन्यशरण हरिभक्त कभी भी कर्म का सेवक
नहीं होता अथवा देवताओं का भी चाकर नहीं होता। जो हरि की शरण में आ गया वह किसी का आश्रित नहीं
है। वह कर्माकर्म से अलिप्त तथा ऋणत्रयी से मुक्त ही रहता है। समस्त प्राणियों में वासुदेव ही भरा हुआ है ऐसा
उसका दृढ़ विश्वास रहता है इसलिये वह सभी कर्मों से अलिप्त तथा सकल कर्मों से मुक्त होता है।
स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः।
विकर्म यच्चोत्पतितं कथंचिद् धुनोति सर्वं हृदि संनिविष्टः॥ ४२॥
देह का अभिमान छोड़कर तथा अन्य देवताओं का भजन त्याग कर जो हरिचरणों की ही शरण में जाते हैं
उन्हें कर्मों का बन्धन कभी स्पर्श नहीं करता। इस प्रकार जो अनन्यशरण होते हैं वही हरि के प्रिय होते हैं और
जो इस प्रकार हरि के भक्त होते हैं उन्हें स्वप्न में श्री कर्मबन्धन स्पर्श नहीं कर सकता। हे राजा! अब तुम यदि
कहोगे कि भगवद्भक्त विहित कर्माचरणों के कारण नित्यमुक्त रहते हैं, तो तुम्हें यह बता दूँ कि वे यदि
असत्कर्म भी करें तो भी उन्हें प्रायश्चित्त का बन्धन नहीं है। जिस प्रकार सिंह का छावा मत्त हाथी के वश में नहीं
आता उसी प्रकार हरि के भक्त यदि अकर्म भी करें तो भी वे यम के वश में नहीं आ सकते। हरि के भक्त केवल
नामस्मरण कर ले, भले ही वह महान पापी ही क्यों न हो, लेकिन यम आकर उसका वन्दन करेगा। तब जो हरि
के परम प्रिय भक्त हैं उन्हें यम अकर्म के लिये दण्ड कैसे देगा? (शंका) वेदाज्ञा अर्थात् साक्षात् विष्णु की ही
आज्ञा है, उसी देवता ने धर्म और अधर्म की व्याख्या की है, फिर यदि भक्त विकर्माचरण करें तो उन पर वेदाज्ञा
का प्रभाव क्यों नहीं होगा? (समाधान) जिस प्रकार राजा का प्रिय सेवक पहरे पर के सिपाही के अधीन नहीं
होता तो फिर राजा का प्रिय पुत्र उस द्वारपाल के अधीन कैसे होगा? उसी प्रकार जिसे केवल हरिनाम् का स्मरण
रहता है उसके चरणों को वेद प्रणाम करते हैं तो जो हरि को पूरी तरह प्रिय है उसे वेद का विधान कभी बाधक
नहीं होगा। वैसे भक्त के हाथों कभी निषिद्ध कर्म नहीं होगा किन्तु यदि दैवयोग से वैसा हो भी जाय तो अच्युत
स्मरण से ही उसकी उस कर्म से मुक्तता होती है। कर्माकर्म जिसे बाँध नहीं सकता ऐसा भागवतधर्म कौन-सा

१३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है? तो तुम्हें भक्तिमार्ग के उत्तम से उत्तम धर्म बताता हूँ, सुनो। देहाभिमान के आकर्षण को त्याग कर जिसकी
हरिभक्ति समस्त प्राणीमात्र में दृढ़ रहती है वह कर्माकर्म को पैरों तले रौंद देता है, मुक्ति अपने केशों से उसके
चरण झाड़ती है। वह जिसकी भी ओर कृपादृष्टि से देखता है उसका सांसारिक भय तत्काल नष्ट होता है और
वह जहाँ कहे वहाँ तत्काल हरि की भक्ति डेरा जमा कर बैठ जाती है। उसके अनुग्रह से दीनजनों के अंतःकरण
में भगवान प्रकट होते हैं और उसके कर्माकर्म का निस्तार स्वयं श्रीहरि करने लगते हैं। जिस प्रकार सूर्य के उदय
के साथ अन्धकार भाग जाता है उसी प्रकार हृदयमन्दिर में यम प्रकट होते ही कर्माकर्म सहज ही दूर हो जाते हैं।
हे राजश्रेष्ठ! भगवान के नाम की कीर्ति इसी का नाम परमभक्ति है। भक्ति के पास चारों मुक्तियाँ दासी की तरह
सेवारत रहती हैं। भक्ति की यह पूर्ण स्थिति सुनकर राजा के शरीर पर रोमांच उभर आये, आँखों से आनन्द के.
आँसू बहने लगे और वह प्रसन्नवृत्ति से डोलने लगा। जनकराजा की इस स्थिति का वर्णन करते समय नारद मन
ही मन सुखभरित हो गया और उसी अवस्था में उसने वसुदेव को उस इतिहास का समापन सुनाया।
नारद उवाच
धर्मान् भागवतान्नित्थं श्रुत्वाथ मिथिलेश्वरः।
जायन्तेयान् मुनीन् प्रीतः सोपाध्यायोह्यपूजयत् ॥ ४३ ॥
नारद इतिहास सुना रहे थे, साथ ही साथ डोल भी रहे थे। उसी मुदित अवस्था में उन्होंने भक्ति का रहस्य
बताया। (नारद ने कहा) इस प्रकार जयंत पुत्रों ने जनकराजा को परम प्रीति का अपने स्वानुभव के अनुसार
भगवान की श्रेष्ठ भक्ति का वर्णन किया। उनका भाषण सुनकर जनक राजा को अत्यन्त आनन्द हुआ। उसने
अत्यन्त प्रेमपूर्वक उन जयंती पुत्रों की पूजा की। श्रवण से समाधान हो जाने के कारण उसे पूजा करने में भी
अत्यन्त प्रेम का अनुभव हुआ। तब जनकराजा ने अत्यन्त भक्तिभाव से उनकी पूजा की। अहिल्या का पुत्र
शतानंद राजा का उपाध्याय था। उसने भी बड़े आदर के साथ पूजा करवायी और स्वयं भी की।
ततोऽन्तर्दधिरे सिद्धाः सर्वलोकस्य पश्यतः।
राजा धर्मानुपातिष्ठात्नवाप परमां गतिम्॥ ४४ ॥
इस प्रकार वे सभी नौ श्रेष्ठ भगवद्भक्त देखते-देखते आकाश मार्ग से ऊपर जाते-जाते अदृश्य हो गये।
उस भागवत धर्म का आचरण कर तथा उस प्रकार की भगवद्भक्ति कर उस जनकराजा ने भी उत्तम गति प्राप्त
की। सद्भाव से भक्ति करने से देह में रह कर भी विदेहस्थिति प्राप्त होती है। जनकराजा को वह प्राप्त होने के
कारण वह परम शान्तिमय स्थिति में पहुँच गया।
त्वमप्येतान् महाभाग धर्मान् भागवताञ्छुतान् ।
आस्थितः श्रद्धया युक्तो निःसङ्गो यास्यसेपरम् ॥ ४५ ॥
हे वसुदेव! जहाँ सारे भाग्य की पंक्तियाँ विश्राम करने आती हैं वह भाग्यस्थिति तुम्हारे घर खेलने लगी है।
वसुदेव! तुम्हारे ही नाम के कारण भगवान को 'वासुदेव' कहते हैं। 'वासुदेव' इस नाम के प्रभाव से सभी लोगों
के दोषों का विनाश होता है। हे वसुदेव! ऐसे भाग्य के भाग्यनिधि सचमुच तुम ही हो। तुमने भागवत धर्म के
विधि को श्रवण किया। श्रद्धापूर्वक परमात्मस्वरूप का श्रवण करने के बाद मनन करते हुए उसे धारण करना
चाहिये। ऐसा करने से तुम सभी बन्धनों से मुक्त होकर तत्काल निजधाम पहुँच जाओगे। वह ऐसा निजधाम है