श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचम अध्याय १२१
दिखायी देता है। उमा क्रोध में अग्नि में कूद पड़ी इसलिये उतने याज्ञिक का शिरच्छेद किया और वह कामांध
तो इतना था कि मोहिनी को प्राप्त करने के लिये वह उसके पीछे नग्न होकर दौड़ने लगा। विष्णु तो हमेशा से
ही कपटी था उसमें कोई भी अच्छी बात नहीं दिखायी देतीं। बेचारी वृन्दा कितनी पतिव्रता थी लेकिन उसने उसे
भी व्यभिचारिणी बनाकर छोड़ा। ऐसा व्यभिचारी विष्णु जिस वृन्दा के वृन्दावन में वास करता है, उस वन में जो
जटादाढीधारी लोक एकत्र होते हैं उन्हें भी हम साधु कैसे मानें ? यदि सनत्कुमार को साधु कहा जाय तो उन्हें भी
वैकुण्ठ में अत्यधिक क्रोध आया और उन्होंने श्रीहरि के सेवक जय विजय वीर को अधिक शब्द कहने के
कारण शाप दे डाला। यदि ब्रह्मदेव को श्रेष्ठ कहें तो वह भी हीन और निर्लज्ज है। शंकर के विवाह में पार्वती
को देखकर 'सावधान' कहते ही उसका वीर्य स्खलित हो गया। नारद बहुत बड़ा ब्रह्मचारी था लेकिन उसने भी
जब कृष्ण से उसकी स्त्री माँगी तो कृष्ण ने उसे अच्छी तरह फँसाया। वह स्नान कर रहा था उस समय नारद
की नारदी बनकर साठ पुत्रों को जन्म दिया। जिस युधिष्ठिर को साक्षात 'धर्म' कहते हैं वह भी निखालस
अधर्मी है क्योंकि उसने गोत्रजों की हत्या का प्रयास किया। व्यास तो जारिणी का पुत्र था और उसी कर्म के
कारण पराशर भी हीन सिद्ध होता है। वसिष्ठ और विश्वामित्र के परस्पर द्वेष और ईर्ष्या की बात ही न करें।
यदि दुर्वासा को साधु कहें तो वह भी अम्बरीष का छल करने गया था। प्रह्लाद ने तो खुलेआम पितृद्रोह किया,
फिर उसे भी साधु कैसे कहा जाय ? तो फिर वर्तमान काल में साधु कोई नहीं है ऐसा यदि वे सोचते हैं तो इसमें
आश्चर्य किस बात का ? वे कहते हैं "कुछ तो अद्भुत सुनकर लोग एक के पीछे दौड़ने लगते हैं। कुछ लोग
पेट के लिए कुछ तो बकते रहते हैं। कोई आसन पर बैठ कर मुद्रा लगाते हैं, कोई बगुले की तरह ध्यान लगाकर
बैठते हैं लेकिन मन जिस पर विश्वास करे ऐसा एक भी साधु नहीं दिखायी देता।" इस प्रकार वे जानबूझ कर
साधुओं की निन्दा करते रहते हैं। संसार में कोई साधु भी है इस बात पर उन्हें विश्वास नहीं होता। जिस प्रकार
बकरे के सामने दर्पण रखने से वह आगबबूला हो उठता है उसी प्रकार साधु का नाम सुनते ही उसका पारा चढ़
जाता है। जो हरि के अत्यन्त प्रिय हैं उनसे वह घृणा करता है। जिस ईश्वर के आदेश से वे विचरण करते हैं
उसे ईश्वर मानने को वे तैयार नहीं होते। हे राजा ! ऐसे उस ईश्वर के बारे में तुम्हें बताता हूँ।
सर्वेषु शश्वत्तनुभृत्स्ववस्थितं यथा स्वमात्मानमभीष्टमीश्वरम्।
वेदोपगीतं च न शृण्वतेऽबुधा मनोरथानां प्रवदन्ति वार्तया ॥ १०॥
जो समस्त प्राणियों में भेदभावरहित तथा सदैव अखण्ड भरा रहता है, जो सब में समसमान रूप से रहता
है, कल्पांत में भी कभी न्यून नहीं होता, जो सब में सर्वकाल रहता है लेकिन व्यापकता उसे स्पर्श नहीं करती,
जिस प्रकार कमलपत्र जल में रहते हुए भी उससे अलिप्त रहता है उसी प्रकार सभी लोगों में रहते हुए भी उसका
लोकव्यवहार से सम्बन्ध नहीं रहता। हे राजेश्वर ! आकाश जिस प्रकार सभी पदार्थों को अंतर्बाह्य व्यापते हुए भी
उनसे अलिप्त रहता है उसी प्रकार अलिप्तता कायम रखते हुए वह अनन्त ब्रह्माण्ड की रचना करता है और
अकर्ता रहते हुए भी उन असंख्य ब्रह्माण्डों को अपने स्वरूप में चलाता है। इसीलिये उसे वेदों में अंतर्यामी के
नाम से जाना जाता है। वही सभी के हृदयों में स्थित चैतन्य के रूप में पहचाना जाता है। ऐसे उस ईश्वर का
निरन्तन ध्यान किया जाय, मन में चाह रखकर मुख से उसका नाम लिया जाय तो वह अभीष्ट पूर्ति की अखण्ड
वर्षा करता है। उस ईश्वर की कथाओं का गायन करने से समस्त संकटों का नाश होता है। उसे देखने से वह
प्रसन्न होकर स्वानंद की वर्षा करता है। सारांश यह कि सुखदाता भी वही है और शास्ता भी वही है। काल का