श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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नियंता भी वही है। उसके भय से काल भी अपनी इच्छा से अपनी सत्ता नहीं चला सकता। उसके भय से
प्राणियों का श्वासोच्छ्वास नियमित समय से चलता रहता है, उसके भय से वायु भी आकाश में मंद गति से तथा
निश्चित परिमाण में बहता रहता है। उसके भय से पृथ्वी जल में रहते हुए भी समुद्र उसे अपने में घोल नहीं
सकता। उसकी आज्ञा से सूर्य ठीक ढंग से दिनमान चलाता है और जिसकी पुरातन आज्ञा से सूर्य अपनी सीमा
का उल्लंघन नहीं करता। वेद जिसका सदा गायन करते हैं, उपनिषद जिसका वर्णन करते हैं, जिसकी यशगाथा
दुष्ट बुद्धि के लोग कभी कान से भी नहीं सुनते। जिसके नाम का स्मरण करने मात्र से समस्त पापों का विनाश
होता है, यम भी जिसके चरण छूता है और जो भक्तों को जन्ममरण से मुक्त करता है, जिसका चरित्र कर्णपथ पर
पड़ते ही विकल्प रसातल में पहुँच जाते हैं और देखते-देखते परब्रह्म से एकत्व प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार यह
पवित्रता की मूर्ति जिसका वेद सर्वकाल स्तवन करते हैं, उसकी कीर्ति का श्रवण न कर ये अभागे लोग केवल
मनोरथ की बातें करते रहते हैं। रीछ जब अपने गुर्राने में मगन रहता है उस समय उसे जिस प्रकार रणभेरी की
आवाज नहीं सुनायी देती उसी तरह हरि के गुणानुवाद न सुन वे अत्यन्त रुचि से विषय की ही चर्चा करते रहते
हैं। इसीलिये वे नितांत मूर्ख, उद्धत तथा हमेशा सुस्त और विषयांध होकर क्षुब्ध बने रहते हैं।
लोके व्यवायामिषमद्यसेवा नित्यास्तु जन्तोर्न हि तत्र चोदना।
व्यवस्थितिस्तेषु विवाहयज्ञसुराग्रहैरासु निवृत्तिरिष्टा ॥ ११ ॥
वेदों द्वारा प्रेरित न होते हुए भी सभी लोगों की सदासर्वकाल विषय के प्रति सहज ही वासना रहती है।
मांसभक्षण, मद्यपान तथा स्त्रीसहवास इन बातों के प्रति लोगों की हमेशा तीव्र वासना रहती ही है। उसमें सेवन
करने योग्य क्या है और क्या नहीं है इसका विचार कौन करता फिरेगा ? एक बार विषय का चस्का लग जाय तो
फिर वे लोग अनर्थ करने के लिये आगापीछा नहीं देखेंगे। कपास में जब आग लग जाती है तो वह बुझने का
नाम नहीं लेती उसी प्रकार विषय लंपट पुरुष के मन में विवेक सहसा उत्पन्न नहीं होता। मछली जब बंसी में
लगे मांस की ओर आकर्षित होती है तो फिर वह अपनी मृत्यु के बारे में भूल जाती है या बन्दर मुट्ठी भर चने के
लालच में स्वयमेव नलिका में फँस जाता है या जिस प्रकार दूध मिल जाने पर बिल्ली इस बात का विचार नहीं
करती कि वह ब्राह्मण के घर का है या अंत्यज के घर का, उसी प्रकार विषय में उन्मत्त लोग क्या सेवन करने
योग्य हैं और क्या नहीं हैं इसका विचार नहीं करते। इस प्रकार बढ़ती हुई विषय वासना के कारण कहीं भविष्य
में वर्ण समस्या न उत्पन्न हो इसलिये वेदों ने धर्म और आश्रम इस प्रकार विभाग बना दिये। पृथ्वी का पृष्ठ भाग
विशाल होने के कारण वहाँ सप्तद्वीप बना कर उन भिन्न-भिन्न विभागों पर विभिन्न अधिकारियों की व्यवस्था की।
वर्षा चारों ओर नियोजित ढंग से नहीं होती इसलिये वर्षा का जल बाँध बनाकर तालाबों तथा जलाशयों में एकत्र
करते हैं। फिर खेती के लिये उस जल को उपलब्ध कराने के लिये नहरें बनाते हैं। वाद्यकार जिस प्रकार बाँस से
वाद्य तैयार करते हैं और फिर विविध प्रकार की मधुर ध्वनि से उस वाद्य को बजाया जाता है उसी प्रकार विषय
की लत से कहीं लोग उच्छृंखल न हो जाएँ इसलिये वेदों ने वेदों ने नियम बना दिये हैं। उस वेदाज्ञा के बारे में
तुम्हें बताता हूँ। योनिभ्रष्टों पर नियंत्रण रखने के लिये स्त्रीसंग के लिये विवाह संस्कार का बन्धन लगाया तथा
विशिष्ट वर्णों की योजना कर उस पर नियंत्रण किया। यदि ब्राह्मण धोबिन के पास जाता है तो उसे वह संभोग
कड़ुआ नहीं लगता अथवा यदि धोबी ब्राह्मणी के पास जाता है तो वह स्त्रीसंग उसे तीता नहीं लगता। किन्तु चाहे
जो स्त्री और चाहे जिस पुरुष का संयोग होने से वर्णसंकर उत्पन्न होता है इसे टालने के लिये वेदों ने विवाह की